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गीता मलिक की कविताएँ
तुम किसी पहाड़ी संगीत की तरह लग रहे हो
नहीं हैं आस-पास कोई वाद्ययंत्र
तुम्हारी हँसी मेमने-सा निश्छल राग है


दीप्ति कुशवाह की कविताएँ
ऋतुएँ आती रहेंगी
जंगलों के कंधों को छू कर
घास के रंग उलटती-पलटतीं
पहाड़ों के रंग बदलती हुईं


रवि राहगीर की कविता
माड़ की छोरियाँ
प्यार करने की तगड़ी सजा पाती हैं
कूटी जाती हैं
पीटी जाती हैं
उन्हें डाँट पिलाई जाती है :
“छोरी तू तो हमारा नाम डुबाकर छोड़ेगी
खानदान को कतई पैंदे में ले जाएगी।”


शुन्तारो तानीकावा की कविता
जब वह नाश्ता बनाती तो वह नाश्ते पर कविता लिखता
जब वह जंगली बेर तोड़ती तो वह जंगली बेरों पर कविता लिखता
जब वह अपने वस्त्र उतारती तो वह उसके सौंदर्य पर कविता लिखता


इम्तियाज़ धारकर की कविताएँ
सभी हत्यारे ऐसे मुखौटे पहने हुए हैं
जिन पर भगवान का चेहरा बना है


हर्षित मिश्र की कविताएँ
अक्टूबर जब जाता है,
तो वह केवल ऋतु नहीं ले जाता,
वह भावनाओं के तापमान को बदल जाता है।
धरती की नसों में,
पत्तों की धड़कनों में,
और मेरे भीतर, उस स्थान पर,
जहाँ तुम्हारा नाम अब भी
हल्की सिहरन बनकर धड़कता है।




लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताएँ
चूल्हे की राख-सा
नीला पड़ गया है मेरे मन का आकाश
तभी तुम झम से आती हो
जलकुंभी के नीले फूलों जैसी खिली-खिली
तुम्हें देखकर पिघलने लगते हैं
दुनिया की कठोरता से सिकुड़े
मेरे सपनों के हिमखंड।


हर्षित वर्मा की कविताएँ
सबसे भाग्यशाली थी वह दूब घास
जिसे ओस की बूँद ने ठहरने के लिए चुना था
जो दुछत्ती के ठीक कोने पर उग आई थी
जो मुँह उठाकर खुला आकाश देखती
और बदलते रंगों का हाल दुछत्ती को बताती थी


गौरव कुमार की कविताएँ
नाम लिखता हूँ तुम्हारा
काग़ज़ पर
बनाता हूँ हवाई जहाज़
और उड़ा देता हूँ उसे आसमान में
कुछ इस तरह निरंतर
मैं तुमसे दूरियों का अभ्यास करता हूँ।


टि्वंकल तोमर सिंह की कविताएँ
जिसके पास रोटी कम है
वह सपनों को अधिक चबाता है
और जिसके पास काम नहीं
वह समय को ही जला कर
धुआँ इकट्ठा करता है


दिव्या श्री की कविताएँ
नहीं हुई थी कभी
इससे पहले प्रेम और घृणा एक साथ
एक साथ इतनी ज़ोर की पीड़ा कभी नहीं हुई थी
जैसे टूटी हो मेरे दिल की हड्डी
जबकि होती नहीं है वह


गौरव अरण्य की कविताएँ
गणित इतना आसान भी नहीं
जितना दिखाई देता है
वह अक्सर
तपती धूप में
पड़े मोम की तरह
धीरे-धीरे पिघल जाता है


मलाइका राय की कविताएँ
होती है मोहब्बत में हार,
बे-आबरू, कूचे से
निकलना पड़ता है।
खिलाना भी,
खाना पड़ता है अपना गोश्त,
इश्क़ निगलना पड़ता है।




पल्लवी विनोद की कविता
ईश्वर के कपड़ों में इत्र लगाकर
वे बताते हैं : लोबान जलाओ
उसकी ख़ुशबू से नकारात्मकता भाग जाएगी


विशाल प्रभु की कविताएँ
चोलों की
सबसे बड़ी और
शानदार दुकान है
शहर,
जिसके तागों से
कभी रिहा ही
नहीं होता इन्सान


जतिन कुमार की कविताएँ
जब कभी चाय की दुकानें
अपनी जगह से हट जाएंगी
उधर बैठकी लगाते लोग भी
अपनी जगह से हट जाएंगे
वहाँ नहीं दिखेंगे, तो वे कहाँ जाएंगे?
कभी किसी ने सोचा है?




क्रिस्टीना पेकोज की कविताएँ
सेब का दरख़्त
जिसे लगवाने में उसने मदद की थी
फलने को तैयार है फिर से
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