रवि राहगीर की कविता
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रवि राहगीर की कविता
माड़ भाषा से अनुवाद : देवेश पथ सारिया
माड़ की छोरियाँ
(1)
बारिश के दिनों में
हाथ में दरांती लेकर
डेढ़ कोस पैदल चलकर
माड़ की छोरी जाती है
खेतों में न्यार (चारा) लेने के लिए
खेतों की मेड़ पर
बड़ा-बड़ा न्यार काटने के समय
उसे बहुत डर सताता है
सांप-गोहरे का
बारिश के भय से
जल्दी-जल्दी न्यार काटने के चक्कर में
हाथ से फिसल जाती है दरांती
कट जाती है उँगली
फूट निकलती है ख़ून की धार
ख़ून रोकने के लिए
बाँध लेती है लूगड़ी की लीर
ख़ून बहना रुकते ही
फिर से न्यार काटने लगती है
न्यार काटने के बाद
घर पहुँचने से पहले ही
रास्ते में आ जाती है
बारिश और आँधी
जिससे बुरी गत हो जाती है
हाल बेहाल हो जाते हैं उसके
न्यार का भरोटा (गट्ठर) भीग जाता है
भरोटे का वजन दोगुना हो जाता है
दुखने लगता है शरीर
माथा फटने लगता है
चक्कर आने लगते हैं
काली चिकनी मिट्टी में
पैर फिसल जाता है
उसके ऊपर गिर पड़ता है भरोटा
हाथ-पैर में चोट आ जाती है
कीचड़ में सन जाते हैं उसके कपड़े
घर पहुँचते ही
फेंक कर भरोटे को बाखळ* में
ग़ुस्से में पिता से कहती है :
“काका, मैं नहीं लाऊँगी न्यार का भरोटा
इस कीचड़ में
आग लगा दो तुम्हारी भैंसों को
मेरी तो उँगली कट-बळ गई।”
*बाखळ : मवेशियों को रखने की जगह।
(2)
आँगन में मांडणे बनाती
माड़ की छोरियाँ
गेरू-सी खिल जाती हैं
खड़ी* में मिल जाती हैं
अपने मांडणे को देख-देख
फूली नहीं समाती हैं
मेहमान आने वाले हैं
बारिश का डर सताता है
गिरने लगती है बारिश
धुल जाते हैं मांडणे
मिट जाते हैं रंग
फिर बारिश को गालियाँ देने लगती हैं :
“गैबी*, आज ही बरसना है क्या तुझे
मेहमानों के जाने के बाद बरस जाता
तो क्या बिगड़ जाता तेरा
तुझ में आग लग जाए, बळ* जाए तू।”
*खड़ी : मांडणे बनाने में प्रयुक्त सफ़ेद घोल।
*गैबी : माड़ की भाषा में प्यार से दी जाने वाली गाली।
*बळना : आग से झुलस जाना।
(3)
माड़ की छोरियाँ
जवान होने के बाद
जयपुर-दिल्ली पढ़ने नहीं जाती हैं
कौन भेजेगा उनको वहाँ
वे तो जाती हैं फसल काटने खेतों पर
जलावन की लकड़ी बीनने जंगल में
पानी भरने कुएँ पर
घर वाले उनसे कहते हैं :
“तुम क्या करोगी पढ़-लिखकर
तुमको तो चूल्हे में ही माथा देना है।”
(4)
माँ के गुज़र जाने के बाद
पढ़ने-लिखने की उम्र में ही
वह खेतों में काम करने लगी
जिससे अपने भाई को पढ़ा सके
खिलौनों से खेलने की उम्र में
अपनी नाज़ुक उँगलियों को जलाया उसने
चूल्हे के अंगारों में
किताबों की जगह
उसके हिस्से आई
तपती दोपहर की गर्मी
फटी एड़ियाँ
हथेलियों में उभर आए छाले
उसने अपने हाथों में थाम ली
कुदाली और दरांत
जिससे उसका भाई
अपने सपनों को लिख सके
पैन और किताब से
ठंडक दे सके
उसके छाले भरे हाथों को
और फटी एड़ियों को
भर सके कोमलता से
उसकी गीली आँखों में
भर सके चमकते सपने
और जीत ले ज़िंदगी की
सारी तकलीफ़ों को।
(5)
यूँ उम्र है
दोनों बहनों की
खेलने, कूदने, पढ़ने की
दोनों बहनें
अपने बचपन के सपनों को
ज़िम्मेदारियों के तले दबाकर
अपनी बकरियों को चराने जाती हैं
भीषण गर्मी में
चलती लू में
भूख-प्यास से लड़ते हुए।
(6)
माड़ की छोरियाँ
प्यार करने की तगड़ी सजा पाती हैं
कूटी जाती हैं
पीटी जाती हैं
उन्हें डाँट पिलाई जाती है :
“छोरी तू तो हमारा नाम डुबाकर छोड़ेगी
खानदान को कतई पैंदे में ले जाएगी।”
(7)
सावन की झड़ी में
काली चिकनी मिट्टी में
माड़ की छोरियाँ
सिर पर मटकी रखकर चलती हैं
चिकने रास्ते पर
फिसल कर गिर जाती हैं
चप्पल टूट जाती है
मटकी फूट जाती है
हाथ-पैर छिल जाते हैं
सिर से ख़ून निकल आता है
घर पहुँचते ही उन्हें
सुननी पड़ती है भाई की डाँट :
“न जाने कहाँ ध्यान रहता है तुम्हारा
देखकर चलना भी नहीं आता।”
(8)
माड़ की छोटी-सी छोरी
सिर पर रखकर छोटा-सा घड़ा
ठुमक-ठुमक करती
कुएँ पर पानी भरने जाती है
प्यारी-सी मुस्कान है उसकी
रास्ते में लोगों को देख-देख शरमाती है
कुएँ पर पहुँचते ही माँ से कहती है :
“आज के बाद पानी लेने नहीं आऊंगी
मेरे तो पांव दुखने लग गए”
जवाब में माँ कहती है :
“ससुराल में बैठी-बैठी को कौन रोटी दे देगा
घर का काम-काज तो सीखना ही पड़ेगा।”
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हिंदी-राजस्थानी कवि रवि राहगीर की कविताएँ हिंदी में पहली बार प्रकाशित हो रही हैं। ईमेल : raviraahgeer@gmail.com
देवेश पथ सारिया द्वारा गोल चक्कर के लिए किए गए अन्य अनुवाद देखिए : देवेश पथ सारिया
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ओस की पारदर्शी बूँदों सी तरल छिटक छिटक कर ललचाती छोरियों को कवि ने बड़े जतन और संभाल के साथ पकड़ा है। उनके जीवन का साक्षात्कार कराने के लिए बधाई देवेश। कवि को मेरा सलाम कहना।
यादवेन्द्र