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नसीब का पत्थर
शिकार से कहीं ज़्यादा मेरी दिलचस्पी उस इंतज़ार में थी, जो शिकार से ऐन पहले आता है—मछुआरों को जाल बिछाते देखना, उनका घात लगाए बैठे रहना और साँस तक संभाल-संभालकर लेना, ताकि हवा की कोई लहर उनके जिस्म की गंध परिंदों तक न पहुँचा दे।


आज की ईरानी कविताएँ
जब वह सरहदों पर होती है।
कँटीला तार उसकी स्कर्ट चीर देता है।
फूल चीख़ उठते हैं
और पंखुड़ियाँ कँटीली बाड़ पर
टंगी रह जाती हैं


अंधेरा विलो, सोती हुई औरत
एक बार जब आप इसे गौर से देखना शुरू करते हैं, तो इंसानी कान, इसकी संरचना काफी रहस्यमय लगती है। इसमें मौजूद ये सारी अजीबोगरीब घुमाव, उभार और गड्ढे। शायद क्रमागत विकास ने इस विचित्र आकार की चीज को ध्वनियों को इकट्ठा करने या अंदर मौजूद चीजों की रक्षा करने का सबसे अच्छा तरीका माना हो।


कच्चे दूध की गंध (चीनी कहानी)
जब उनका चेहरा खुशी से दमकता तो उनके मुँह के दोनों छोरों पर डिंपल उभर आते—नई-नवेली माँ बनने का आह्लाद और गर्व उनके चेहरे से फूटा पड़ता था। उनके आसपास से जो भी गुजरता, उसे माँ के ताजे दूध की भीनी-भीनी गंध अपने आगोश में ले लेती।


शुन्तारो तानीकावा की कविताएँ
अपनी आत्माओं की व्यर्थ खोज में
हम रह जाते हैं पीछे
बादाम मिश्रित टोफू के
मीठे व्यंजन के सामने बैठे हुए


अम्मी और अतिथि
मुझे ठीक से पता नहीं कि विधवा क्या होती है, लेकिन जब पड़ोसी मुझे "विधवा की बेटी" कहते हैं तब मुझे लगता है कि वह जरूर विधवा होंगी। दूसरे सभी बच्चों के पिता हैं, लेकिन मेरे कोई पिता नहीं हैं। शायद मेरे पिता न होने के साथ माँ के विधवा होने का कोई संबंध हो।


नींद
मूल कहानी : हारुकी मुराकामी अनुवाद : श्रीविलास सिंह बिना नींद के यह मेरा लगातार सत्रहवाँ दिन है। मैं अनिद्रा रोग के संबंध में बात नहीं कर रही हूँ। मैं जानती हूँ अनिद्रा रोग क्या होता है। मुझे इस तरह का कुछ काॅलेज के दिनों में हुआ था- ‘इस तरह का कुछ’ इसलिए क्योंकि मैं निश्चित नहीं हूँ कि तब जो हुआ था वह ठीक-ठीक वही था जिसे लोग अनिद्रा रोग कहते हैं। मैं सोचती हूँ कि एक डॉक्टर मुझे इस संबंध में बता सकता था। लेकिन मैं किसी डॉक्टर के पास नहीं गई। मैं जानती थी कि इससे कोई फायदा न


बसंत का हृदय
क्या तुम्हें प्रभु से डर लगता है जिसने तुम्हारे पिता के भी पिता के लिए युद्ध में ललकारने वाले हथियार बनाए या बौने लोग, जो समंदर से निकलकर रात में आते हैं और झींगुरों के साथ आत्मा की गहराइयों से निकालने वाला गीत गाते हैं?


काफ़्का को यहूदी पहचान से आगे पढ़ने की कोशिश
पीएत्रो चिताती की काफ़्का मेरे लिए एक जीवनी से कहीं अधिक है। यह किताब काफ़्का की यहूदी पहचान का निषेध नहीं करती, बल्कि उसे अपनी व्याख्या का केंद्र भी नहीं बनाती। वह काफ़्का को सबसे पहले एक रचनाकार की तरह पढ़ती है—ऐसे रचनाकार की तरह, जिसकी कल्पना अपने समय, अपने समाज और अपनी सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण करके मनुष्य की सार्वभौमिक नियति को छूती है।


संसार का सबसे खूबसूरत डूबा हुआ आदमी
पहली बार वहां मौजूद आदमियों और औरतों ने अपनी गलियों के सूनेपन, अपने आंगन के सूखेपन, अपने ख्वाबों के ओछेपन को जाना—जब उन्होंने डूबे हुए आदमी की भव्यता और खूबसूरती का सामना किया।


रवि राहगीर की कविता
माड़ की छोरियाँ
प्यार करने की तगड़ी सजा पाती हैं
कूटी जाती हैं
पीटी जाती हैं
उन्हें डाँट पिलाई जाती है :
“छोरी तू तो हमारा नाम डुबाकर छोड़ेगी
खानदान को कतई पैंदे में ले जाएगी।”


शुन्तारो तानीकावा की कविता
जब वह नाश्ता बनाती तो वह नाश्ते पर कविता लिखता
जब वह जंगली बेर तोड़ती तो वह जंगली बेरों पर कविता लिखता
जब वह अपने वस्त्र उतारती तो वह उसके सौंदर्य पर कविता लिखता


इम्तियाज़ धारकर की कविताएँ
सभी हत्यारे ऐसे मुखौटे पहने हुए हैं
जिन पर भगवान का चेहरा बना है


हैडमास्टर हृदयराम
हैडमास्टर हृदय राम की दंडिका पूत-कुपूत की पहचान करवा देती है। जो काबिल होगा, वह टिक जाएगा और लंपट तो भाग ही जाएगा। उनकी दंडिका बिल्कुल हंस न्याय करती। दूध अलग और पानी अलग। उनकी दंडिका सूप की तरह कूड़ा करकट बाहर फेंकती और असल तत्व बचाकर रखती।




दुन्या मिखाइल की कविताएँ
लालटेनें रात की सच्ची मुरीद हैं
उनमें सितारों से ज़्यादा सब्र है
वे जलती रहती हैं सुबह तक।


सन्नाटे का भविष्य
एक जनजाति की भाषा में ‘मुझे तुम्हारी याद आती है’ अभिव्यक्ति के लिए एक अक्षर पर्याप्त है; जबकि दूसरी जनजाति की भाषा में इसके लिए दर्जनों वाक्य चाहिए। आर्कटिक क्षेत्र की एक जनजाति में तो मुँह से निकलने वाली भाप ही शब्दों का काम कर सकती है।


निकानोर पार्रा की कविताएँ
गुज़र चुका है भूतकाल
वह केवल स्मृति में है :
एक नोंचे हुए गुलाब से
एक और पंखुड़ी नहीं खींची जा सकती


नाज़िम हिकमत की कविताएँ
मेरा विश्वास करो
हम देखेंगे ख़ूबसूरत दिन
बच्चो, हम देखेंगे चमकीले दिन
हम ले जाएंगे अपनी स्पीडबोट्स खुले समुद्र में बच्चो
हम उन्हें ले जाएंगे चमकीले नीले समुद्र में...


चेस्लाव मिलोश की कविताएँ
नदियों के नाम रह जाते हैं तुम्हारे साथ।
कैसी अंतहीन लगती हैं वे नदियाँ!
तुम्हारे खेत हो जाते हैं बंजर
बदल जाता है शहर की मीनारों का रूप
तुम खड़े रह जाते हो किनारे, निःशब्द।
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