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बेहतर दुनिया के लिए छोटे-छोटे स्वप्नों की पोटली
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जब जीवन के संघर्षों का अनुभव, उन्हें देखने वाली सूक्ष्म दृष्टि, उन्हें भीतर तक महसूस करने वाली संवेदना और उन्हें अभिव्यक्त करने वाली सधी हुई भाषा एक जगह आ मिलती है, तभी ‛पोटली के दाने’ जैसा संग्रह संभव होता है।


ईश्वर से अधिक मनुष्य
यदि यह संसार केवल प्रतीक्षालय है, तो यहाँ इतनी सुंदर खिड़कियाँ क्यों हैं? पेड़ों पर धूप इतनी देर क्यों ठहरती है? बारिश के बाद मिट्टी की गंध इतनी गहरी क्यों होती है? किसी बूढ़े पिता के चेहरे पर एक नई झुर्री देखकर भीतर कुछ टूटता क्यों है?


ख़बरों से बाहर ग़ज़ा (पुस्तक समीक्षा)
शरणार्थी होना केवल अपना भूगोल खो देना नहीं है। यह धीरे-धीरे अपनी रोज़मर्रा की स्वायत्तता खो देना भी है। खाना कब मिलेगा, राशन कब बँटेगा, काम मिलेगा या नहीं, बच्चे के लिए कपड़ा आएगा या नहीं—जीवन के सबसे साधारण निर्णय भी किसी दूसरी व्यवस्था की अनुमति पर टिक जाते हैं।


प्रेमचंद से संवाद (यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते)
प्रेमचंद से संवाद (यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते) हिमांशु विश्वकर्मा यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते, तो वे भारत से क्या कहते और हम उनसे क्या पूछते? यदि सचमुच मुझे आज प्रेमचंद से मिलने का अवसर मिलता, तो शायद सबसे पहले मैं उनसे यही पूछता- “प्रेमचंद जी, आज का भारत देखकर आपको कैसा लगता है?” वे संभवतः मुस्कुराकर कहते- “भारत बदला है, और बहुत बदला है। विज्ञान आगे बढ़ा है, लोकतंत्र मजबूत हुआ है, शिक्षा का विस्तार हुआ है, तकनीक ने जीवन को नई गति दी है। इन उपलब्धियों पर प्रसन्न होना च


दुनिया में एक शहर है, जिस शहर में पूरी दुनिया मिलती है।
मैच शुरू हुआ तो लगा जैसे इधर से उधर बॉल नहीं झूम रही बल्कि लोगों के दिल खिलाड़ियों के पैरों में अटके हुए हैं। बॉल जितनी बार उछलती, उतनी ही बार लोगों के दिल उछलते और गलों की आवाज़ें किसी कोरस में आसमान तक टप्पे खाने लगतीं। गेंद गोलपोस्ट के पास पहुँचती और पूरा इलाक़ा एक साथ साँस रोक लेता। गोल होने पर ऐसा शोर उठता कि लगता, इस शहर की गगनचुंबी इमारतें भी मुस्कुराने लगती होंगी।


कल्पना मनोरमा की डायरी
याद आई नदी किनारे पड़ी नाव। महीनों पानी से दूर रहने पर उसकी देह सूख जाती होगी। फिर जब उसे दोबारा नदी में उतारा जाएगा तो वह भी एक पल के लिए ठिठकेगी। पानी धीरे-धीरे उसकी लकड़ी में उतरेगा और वह फिर से जी उठेगी।


विनीता बाड़मेरा की डायरी
हर दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है। रात बीत रही है। जनवरी शुरू होती है और बारह महीने बीतते ही दिसंबर आ जाता है। एक साल पूरा खत्म हो जाता है। मन में रह जाती है कसक, बहुत कुछ छूटने की, बीतने की, रीतने की—न चाहते हुए भी।


बेटियाँ धान के पौधे की तरह होती हैं
जैसे ही दीवारों से बेटी की आवाज की प्रतिध्वनि गूंजती है उसका मन कलप उठता है। पिता को कंधे पर कोमल हथेलियों के स्पर्श का एहसास होता है, जैसे बेटी कह रही हो- "पापा, उदास नहीं होते, साल भर कहाँ रह पाता है बसंत।


ख़्वाब के मज़बूत पंख (विश्व सिनेमा)
कला आने वाली नस्लों को मनोरंजन के साथ-साथ तमाचे और प्यार के निशान सौंपती है।


काफ़्का को यहूदी पहचान से आगे पढ़ने की कोशिश
पीएत्रो चिताती की काफ़्का मेरे लिए एक जीवनी से कहीं अधिक है। यह किताब काफ़्का की यहूदी पहचान का निषेध नहीं करती, बल्कि उसे अपनी व्याख्या का केंद्र भी नहीं बनाती। वह काफ़्का को सबसे पहले एक रचनाकार की तरह पढ़ती है—ऐसे रचनाकार की तरह, जिसकी कल्पना अपने समय, अपने समाज और अपनी सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण करके मनुष्य की सार्वभौमिक नियति को छूती है।


काफ़्का की कहानी ‘बांबी’ का अंतर्पाठ
दुर्ग गोदाम में राशन संग्रहण से वह किसी भी संभावित घेराबंदी से महीनों निश्चिन्त रह सकता है पर अपनी सुरक्षा को लेकर उसकी हालत ‘ईमां मुझे रोके है तो खेंचे है मुझे कुफ़्र’ वाली ही बनी रहती है।


अपने-अपने नामवर (सात प्रसंग)
उनकी धोती पीली-सी थी। मैंने सोचा - “क्या नामवर जी नील का प्रयोग नहीं करते। फिर मुझे वे पिता की तरह लगे, मन में सोचा कि कहूं कि लाइए आपके पांव दबा दूँ।”


रामदरश मिश्र : सहजता जहाँ एक काव्य निकष है
रामदरश मिश्र अपने राजनीतिक होने का शोर नहीं करते। उनकी कविताएं भी किसी प्रकार का शोर नहीं करतीं। एक कवि के रूप में वे अपने आरंभिक दिनों से आश्वस्त हैं कि इस तरह का कोई भी शोर अंततः एक साहित्यिक प्रदूषण है।


कोलम्बिया नदी : एक शब्द-चित्र
जहाज़ से देखने पर यह बिल्कुल किसी चित्रकार के लिये मुफ़ीद दृश्य जैसा दिखता था। हरा पहाड़, सफ़ेद घर, नीला आकाश, हल्की हरी नदी पर बहते सफेद याॅट।


ताकि स्मृति बची रहे (मंगलेश डबराल की कविता)
जो भी दिल्ली पहुँचता है, यह महानगर उसे बदल लेता है। कभी-कभी तो इस परिवर्तन का पता तक हमें नहीं लग पाता है। दिल्ली के जादू से विरले ही बच पाते हैं। मंगलेश इसके अपवाद नहीं थे।


शिम्बोर्स्का की कविता में मृत्यु का पैरहन
शिम्बोर्स्का कविताओं में मृत्यु पर प्रयोग करती हैं। वे इससे सम्बद्ध विडम्बनाओं को दिखाकर इसे विभिन्न कोणों से देखती-परखती हैं। वे मरने वाले के प्रति पर्याप्त करुणा बरतकर भी मृत्यु को वस्तुपरक नज़रिये से देखना चाहती हैं।


कवि प्रभात से दस सवाल
कोई कवि एक समय के बाद अगर लगातार ख़ुद को दोहरा ही रहा है तो इसका मतलब यही है कि वह कवि के रूप में अपनी मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पा रहा है।


बाबूजी की साइकिल (संस्मरण)
प्यारी साइकिल न जाने किस दिन अज्ञात पथ पर विदा हो गयी। मुझे भी नहीं पता। मेरी स्मृतियों में पिताजी मुस्कुराते हुए साइकिल से घर लौट रहे हैं।


इरफ़ान : ख़लिश है ये क्या ख़ला है
यह बात उनके जाने के छः साल बाद भी गले से नीचे नहीं उतरती कि ‘इरफ़ान अब नहीं हैं।’ उनकी फ़िल्में ढूँढ-ढूंढकर देखने का अजीब-सा चस्का चढ़ा हुआ है। बीते सालों में उनके जीवन के दर्जनों काम, जो उनके रहते नज़र में नहीं आए, आज सोशल मीडिया रील्स में काट कर चल रहे हैं।


माँ की बातें
तुम्हें ज़रा भी आभास नहीं था कि उस वक़्त वह किसे कोस रही थीं। यह तुम्हारे दो वर्ष के मस्तिष्क के विकसित होने की प्रारंभिक अवस्था थी।


अलारिज : स्पेन का एक चमत्कारिक नगर
यूरोपीय देश अपनी स्मृतियों को मिटाते नहीं, उन्हें भीतर से नया रूप देकर भी पुरातन कला को जीवित रखने की कोशिश करते हैं।


इतिहास के आवरण में होर्हे लुईस बोर्हेस की अपनी सृष्टि
इस्लाम जब ईरान में आया तो उसका सामना शासन और सभ्यता की लम्बी चली आ रही सुस्थापित परम्पराओं से हुआ। निश्चय ही धर्म के तौर पर इस्लाम इस नये क्षेत्र में सफल रहा, पर कहीं न कहीं वह ईरान के विचारों, दर्शन, जीवनशैली, भाषा और संस्कृति से प्रभाव ग्रहण किये बिना न रह सका होगा।


आशुतोष प्रसिद्ध की डायरी
दिनों बाद सुकून की कोई लय लगातार सुनता रहा। एक हँसी, एक छेड़ लगातार गूँजती रही। फिसलते रास्ते पर हम सम्भलकर चलते रहे और अन्ततः सही राह पा गए।


हाइकु : क्षण भर में रोमांच का अनुभव
इस जटिल, आपाधापी की दुनिया में जब लंबी, खाली शामें हमें मुहैया नहीं हैं, तब हाइकु के माध्यम से क्षण में रोमांच खोजना हम सीख सकते हैं। इनमें प्रयुक्त बिम्ब, उनकी क्षणिकता हमें हमारे चारों ओर फैले साधारण दृश्यों को सराहने, कभी उनसे आश्चर्यचकित होने, कभी उनसे उपजी ऊब से परहेज़ न करने, कभी किसी कठोर दिन में सहज बने रहने के लिए प्रेरित कर सकते हैं


मिर्ज़ा ग़ालिब : आशिक़ या शायर
है बस कि हर इक उनके इशारे में निशा और
करते हैं मुहब्बत तो गुज़रता है गुमां और


रुत बरसन की आई (बारिशें और रेगिस्तान)
जब बरसने लगता है गरज-गरज कर तो बुढ़िया माई के चेहरे पर उतर आती है दंतविहीन मुस्कान। वह चारपाई पर बैठे-बैठे उसी मुस्कान संग देखती रहती है बच्चों के पानी के साथ छपाक-छप के करतब।


गैब्रियल मात्ज़नेफ़ : साहित्य का अपराध और वनेसा स्प्रिंगोरा का प्रतिरोध
प्रश्न यह है कि जब कोई लेखक खुले तौर पर बच्चों के साथ यौन संबंधों को महिमा के साथ प्रस्तुत करता है — और जब समाज उसे पुरस्कार, पेंशन और मंच देता है — तो क्या वह केवल लेखक रह जाता है? या फिर वह एक अपराधी बनकर भी समाज के विवेक की परीक्षा लेता है?


भूकंप-कथा (जो बचा रह गया)
घर के बीज तो हम ख़ुद में छिपाये फिरते हैं इसीलिए सैकड़ों बार उजड़ने के बाद दोबारा स्थापित हो जाते हैं।


काश ऐसे ही फूल हमारी ज़िंदगियों में भी खिल पाएं
बड़ा फूल कह रहा है, बच्चा फूल सुन रहा है : “कल मैं मुरझाकर मर जाऊंगा तब तुम महकाना इस बगिया को!”


हिन्दी साहित्य में विकलांग विमर्श
समाज में और स्वयं में विमर्श की भाषा का विकास करना होगा तभी हम सही मायने में विकलांग-विमर्श में सक्षम हो पाएंगे।


देवभूमि बनाम भूतभूमि
वक़्त बीतने के साथ उत्तराखंड के गाँवों से लोग पलायन करने लगे। गाँव ख़ाली होते गए और अब गाँवों में देवता ज़्यादा और लोग कम रह गए हैं।


शब्द शरीर
जीवन भर मृत्यु चाहने वालों के पास जब मृत्यु पहुँचती है तो वो भागते फिरते हैं। भागने वालों के लिए कोई भी दुनिया सुकून भरी नहीं हो सकती।
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