शुन्तारो तानीकावा की कविता
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शुन्तारो तानीकावा की कविता
अंग्रेज़ी से अनुवाद : जनमेजय
कवि की समाधि
एक स्थान पर एक कवि रहता था
जो कविताएँ लिखकर अपना जीवनयापन करता था
विवाह के अवसर पर वह विवाह गीत लिखता था
और किसी की मृत्यु पर समाधि-शिला के लिए शोकगीत
आभार व्यक्त करने के लिए लोग
उसे तरह-तरह की वस्तुएँ भेंट कर जाते थे
कोई अंडों से भरी टोकरी ले आता था
तो कोई उसके लिए क़मीज़ सिल देता
कोई उसका कमरा साफ़ कर देता था
क्योंकि उनके पास देने के लिए
और कुछ नहीं होता था
उसे जो कुछ भी मिल जाता था,
वह उसी में ख़ुश रहता था
और सभी को एक समान धन्यवाद देता था
एक वृद्धा को सोने की अँगूठी के लिए
तो एक छोटी लड़की को काग़ज़ की गुड़िया के लिए
जिसे उस लड़की ने ख़ुद बनाया था उसके लिए
उसका एक नाम भी था
पर लोग उसका नाम नहीं लेते थे
वे उसे कवि कहते थे।
पहले-पहल उसे संकोच होता था
मगर धीरे-धीरे वह इसका आदी होता गया
उसकी प्रसिद्धि दूर तक फैल गई
सुदूर स्थानों से अनुरोध आने लगे
बिल्ली प्रेमी बिल्लियों पर
पेटू खाने पर
प्रेमी प्रेम पर
कविताएँ लिखने का अनुरोध उसे भेजते थे
उसने भी किसी अनुरोध को टाला नहीं
यद्यपि वे बहुत कठिन होते थे
वह अपनी पुरानी जर्जर मेज़ पर बैठ जाया करता
कुछ देर अंतरिक्ष को ताकता
और फिर पता नहीं कैसे कविता लिख देता
सभी उसकी कविताओं की प्रसंशा करते थे
कविताएँ जो उन्हें ज़ार-ज़ार रुलाती थीं
कविताएँ जो उन्हें पेट दुखने तक हँसाती थीं
कविताएँ जो उन्हें गहराई तक सोचने पर मजबूर करती थीं
लोग उससे तरह-तरह के प्रश्न पूछते थे—
“तुम इतना अच्छा कैसे लिख लेते हो?”
“मैं क्या पढ़ूँ कि मैं कवि बन सकूँ?”
“तुम्हारे सुंदर शब्दों का स्रोत क्या है?”
वह कोई उत्तर नहीं देता था।
वह चाहकर भी उत्तर नहीं दे सकता था।
वह बस इतना कहकर रह जाता, “मैं भी नहीं जानता।”
लोग कहते थे कि वह एक सज्जन लड़का है।
एक दिन एक लड़की उससे मिलने आयी।
उसने उसकी कविताएँ पढ़ी थीं, वह उससे मिलना चाहती थी।
पहली ही नज़र में लड़के को उससे प्यार हो गया
उसने सहज ही लड़की को समर्पित एक कविता लिखी।
लड़की ने जब वह कविता पढ़ी
तो उसने एक ऐसी भावना महसूस की
जिसका वर्णन वह नहीं कर सकती थी
वह समझ नहीं पा रही थी
कि वह उदास थी या प्रसन्न
वह जैसे रात के आकाश से तारों को मिटा देना चाहती थी
वह जैसे लौट रही थी अपने जन्म से पूर्व के समय में
उसने सोचा, यह कोई मानवीय भावना नहीं है
अगर यह दैवीय नहीं तो आसुरी हो सकती है
लड़के ने उसे ऐसे चूमा जैसे हवा का झोंका
वह असमंजस में थी कि वह
उसे प्यार करती थी या उसकी कविताओं को।
उस दिन से वह उसके साथ रहने लगी
जब वह नाश्ता बनाती तो वह नाश्ते पर कविता लिखता
जब वह जंगली बेर तोड़ती तो वह जंगली बेरों पर कविता लिखता
जब वह अपने वस्त्र उतारती तो वह उसके सौंदर्य पर कविता लिखता
लड़की को गर्व था कि वह एक कवि था
वह सोचती थी कि कविता लिखना
खेत जोतने, मशीन बनाने
गहने बेचने या राजा होने से
कहीं अधिक गौरवशाली काम था
लेकिन कभी-कभार उसे अकेलापन महसूस होता था
उससे एक दिन एक बहुमूल्य प्लेट टूट गई
मगर वह क्रोधित नहीं हुआ बल्कि उसे दिलासा देता रहा
वह प्रसन्न थी पर कहीं कुछ कमी थी
एक दिन उसने उसे पीछे छूट गई
अपनी बूढ़ी अम्मा के बारे में बताया
उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे
लेकिन अगले ही दिन वह यह सब कुछ भूल गया
लड़की को यह कुछ अजीब लगा
फिर भी वह प्रसन्न थी
वह उसके साथ मुद्दत तक रहना चाहती थी
जब लड़की ने उसे यह बताया तो
उसने लड़की को कसकर सीने से लगा लिया
मगर वह उसे नहीं देख रहा था
उसकी नज़रें कहीं शून्य में टिकी थीं
वह हमेशा अकेला कविताएँ लिखता था
उसका कोई मित्र भी नहीं था
और जब वह कविताएँ नहीं लिख रहा होता था
तो वह बहुत उदास होता था
उसे एक भी फूल का नाम नहीं पता था
फिर भी उसने फूलों पर ढेरों कविताएँ लिखी थीं
भेंट में उसे बहुत से फूलों के बीज मिले थे
लड़की ने आँगन में फूल ही फूल खिलाए थे
एक शाम पता नहीं क्यों पर वह उदास थी
वह उससे चिपट कर ज़ोर से रोने लगी
तभी उसने उमड़ते आँसुओं की प्रशंसा में एक गीत लिखा
लड़की ने गीत के टुकड़े-टुकड़े कर दूर फेंक दिए
वह दुखी था
उसके चहरे को देख कर वह और ज़ोरों से रोने लगी
उसने चीख कर कहा–
“मुझसे कुछ कहो, कुछ भी जो कविता ना हो
कुछ भी, कुछ भी, बस कहो!”
वह चुपचाप नीचे देखता रहा
“तुम्हारे पास कहने को कुछ भी नहीं है, कुछ भी नहीं
तुम खोखले हो
तुम्हारे अंदर कुछ भी नहीं टिकता है।“
“मैं इस स्थान पर केवल इस क्षण में जीता हूँ” उसने कहा,
“मेरा न तो भूत है न ही भविष्य
मैं एक ऐसे स्थान का स्वप्न देखता हूँ
जहाँ कुछ भी न हो
क्योंकि यह संसार इतना समृद्ध और सुंदर है”
लड़की अपनी मुट्ठियाँ भींच पूरी ताकत से
बार-बार उस पर पटकने लगी
कवि की देह पारदर्शी होने लगी
उसका ह्रदय, उसका मस्तिष्क, उसकी आँतें
उसका सब कुछ हवा की तरह अदृश्य हो गया
उसके आर-पार लड़की को
दिखाई पड़ा एक नगर
जहाँ बच्चे लुका-छिपी खेल रहे थे
प्रेमी आलिंगनबद्ध थे
माँएँ खाना बना रही थीं
वहाँ उसने देखा
नशे में धुत एक अधिकारी
लकड़ी चीरता एक बढ़ई
खाँसी से बेहाल एक बूढ़ा
और एक समाधि-शिला जो बस गिरने ही वाली थी
लड़की को जब होश आया तो
उसने देखा कि समाधि-शिला के पास
वह बिल्कुल अकेली खड़ी थी
नीला आकाश उतना ही विशाल था
जितना वह हमेशा से देखती आयी थी
समाधि-शिला पर एक भी शब्द उत्कीर्ण नहीं था।
(ताकाको यू. लेंतो के अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित)
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जापानी कवि शुन्तारो तानीकावा (1931-2024) मुक्त छंद के मास्टर कवि थे। उनके साठ से अधिक कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं। उनका पहला कविता संग्रह ‘टू बिलियन लाइट ईयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड’ जापान में अत्यधिक लोकप्रिय है। दिन-प्रतिदिन के वातावरण में स्थित और सरल भाषा में लिखी गयी उनकी कविताएँ सहज ही अस्तित्वगत, आध्यात्मिक व गहरे भावनात्मक विषयों को छूती हुई गुजरती हैं।
यहाँ प्रस्तुत कविता कवि जीवन की दोहरी हताशा को दर्शाती है—अपने रचना कर्म के कारण वह एक अलगाव में जीता है। यह अलगाव भावनात्मक तो है ही लेकिन साथ ही भौतिकता से लबरेज़ इस संसार में उसकी रचनात्मकता को अभिव्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि मात्र एक साधन के रूप में देखा जाता है। फलस्वरूप उसकी कविताएँ उसकी अपनी और एक व्यापक जन समुदाय की अभिव्यक्ति होते हुए भी उसका अलगाव इस क़दर गहरा हो जाता है कि वह भौतिक संसार से अपना अस्तित्व ही पीछे समेटने पर विवश हो जाता है।
उसकी दूसरी हताशा मृत्यु के बाद उपेक्षित गिरती हुई समाधि-शिला के रूप में प्रकट होती है। लेकिन कवि इस हताशा को सहज भाव से स्वीकार करता है; उसके भीतर न कोई उद्वेग है, न कोई शिकायत। इस तरह यह कविता एक कवि को कवि होकर जीने के लिए प्रेरित भी करती है। इस कविता को ख़लील जिब्रान की कविता ‘अ पोएट्स डेथ इज़ हिज़ लाइफ़ IV’ के समांतर रखकर भी पढ़ा जा सकता है। रचनाकाल के लंबे अंतराल के बावजूद, ये दोनों कविताएँ परस्पर पूरक लगती हैं।
जनमेजय युवा कवि है। जानकीपुल, पोएम्स इंडिया, गोल चक्कर, सेतु पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। ईमेल : jjanmejay11@gmail.com । गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : जनमेजय
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बहुत अच्छी कविता का उतना ही अच्छा अनुवाद। प्रस्तुत करने का शुक्रिया।