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कोलम्बिया नदी : एक शब्द-चित्र
जहाज़ से देखने पर यह बिल्कुल किसी चित्रकार के लिये मुफ़ीद दृश्य जैसा दिखता था। हरा पहाड़, सफ़ेद घर, नीला आकाश, हल्की हरी नदी पर बहते सफेद याॅट।


ताकि स्मृति बची रहे (मंगलेश डबराल की कविता)
जो भी दिल्ली पहुँचता है, यह महानगर उसे बदल लेता है। कभी-कभी तो इस परिवर्तन का पता तक हमें नहीं लग पाता है। दिल्ली के जादू से विरले ही बच पाते हैं। मंगलेश इसके अपवाद नहीं थे।


रोजर डीन किसेर की कहानियाँ
हर साल जब तितलियाँ अनाथालय की ओर लौटतीं, तो मैं कोशिश करता कि वे मेरे सिर पर आकर बैठ जाएँ और मैं उनको बहुत दूर उड़ा दूँ, क्योंकि उन्हें नहीं मालूम था कि जीने और मरने के लिहाज़ से अनाथालय कितनी बुरी जगह होती है...।
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