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पाताल की दुखती रगें

Aug 2
12 min read

Updated: Aug 29



पाताल की दुखती रगें
कहानी : तौसीफ़ बरेलवी

उसे कई रोज़ से अपने हम नफ़्सों के ख़ून की बू आ रही थी लेकिन वह उस बू के पीछे जा भी नहीं सकता था। हाँ उसके अंदर से एक हौल ज़रूर उठ रही थी कि कुछ बहुत भयानक होने वाला है। पूरा जंगल रोज़ जिन परिंदों कि चहचहाहटों से अपनी सुबह करता था, अब वे आवाज़ें ख़ामोश होने वाली थीं। आख़िर ऐसा भी क्या हो गया था...? वह उस पसरती हुई ख़ामोशी का पता लगाना चाहता था लेकिन उससे कुछ करते नहीं बन रहा था। आख़िर वह कर भी क्या सकता था? अपनों के ख़ून की बू के साथ ही दिल को थर्रा देने वाली आवाज़ें भी लगातार उस के क़रीब बढ़ने लगी थीं। आख़िर एक रोज़ उसे दिखाई देने लगा कि जंगल के एक सिरे पर दरख़्तों को तहस-नहस करती हुई मशीनें आगे बढ़ रही हैं और दरख़्तों का सफ़ाया कर रही हैं। यह वह जंगल था कि जिसने अपने अंदर कई क़बीलों से लेकर कई क़िस्म के जानवर सदियों से पाले थे। फिर उसके बाद शिकारगाह और दूसरी सरगर्मियों के तौर पर राजाओं, सुल्तानों और बादशाहों ने उसका इस्तेमाल किया। अंग्रेज़ों ने जंगल में न सिर्फ़ शिकार खेले बल्कि उसकी क़ीमती लकड़ी को भी ख़ूब लूटा। सदियों पुराने दरख़्तों की लकड़ी से उनकी कोठियों के दरवाज़े, खिड़कियाँ, कुर्सियाँ और मेज़ें बनीं। अंग्रेज़ों से निजात मिले अभी कुछ देर भी नहीं हुई थी कि ये जंगल फिर देश के विभिन्न रईसों और नवाबों के उपभोग में चला गया। शोषण के रास्ते तय करते करते अब जंगल की स्थाई सफ़ाई का हुक्म जारी हो गया था, जिसके कारण दरख़्तों की कटाई आधुनिक मशीनों से की जा रही थी ताकि वक़्त और दौलत दोनों को बचाया जा सके।


सबसे पहले सदियों पुराने दरख़्त को उसके अपनों के क़त्ल की ख़बर हवा ने लाकर दी थी। वह अनमोल क़िस्म का दरख़्त अब तन्हा रह गया था जिसके ख़ानदानी दरख़्त अब दुनिया में नहीं रहे थे। मशीन तो मशीन होती है, उसे कहाँ मालूम होता है कि कौनसा दरख़्त ख़तरे के निशान से ऊपर है और कौनसा नीचे, कौनसा दरख़्त Red Data Book में दर्ज है और कौनसा नहीं। उस अनोखे दरख़्त ने अंदाज़ा लगा लिया था कि जिस तेज़ी से जंगल का सफ़ाया हो रहा है उसमें वह चंद ही दिन और ज़िंदा रह सकेगा। उसका पत्ता-पत्ता उदास और परेशान था, उस में कोई तरंग और सरसराहट बाक़ी नहीं रह गई थी। मौत सामने से क़त्ल व ग़ारतगरी के ढोल बजाती आ रही हो तो चैन व सुकून कब दिल से निकल कर दूर खड़े तमाशबीन बन जाएँ, कुछ कहा नहीं जा सकता। अस्ल में ये घबराहट मौत की नहीं थी बल्कि वुजूद के खो जाने की थी। दरख़्त के फल सूख कर तैयार थे जो शायद किसी बहुत अहम नुस्ख़े के तौर पर काम आते होंगे लेकिन उन नुस्खों को जानने और तैयार करने वालों का भी अब अता-पता नहीं था क्यूंकि ज़माना अब हकीमों और वैद्यों का नहीं बल्कि डॉक्टरों का था।


वह अपने ख़ानदान के साथ सदियों से उस जंगल में ज़िंदगी बसर कर रहा था। उसके सामने न जाने कितने दरख़्त ज़मीन से सर उठा कर खड़े हुए और ख़त्म भी हो गए, अब उसके पीछे कारण जो भी रहे हों—पर्यावरणीय बदलाव या फिर इंसानों के अत्याचार। वह ख़ुद बहुत शान व शौकत वाला ख़ानदानी दरख़्त था और आस-पास के गाँव वाले उसके तमाम ख़ानदानी दरख्तों को पवित्र मानते थे। वह पर्यावरणीय बदलाव का मुक़ाबला करने में भी कामयाब रहा था इसलिए उसकी नस्ल बची रही और वंश आगे बढ़ता रहा। उसने जंगल में बेशुमार ख़ुशहाली के दिन देखे थे। जानवरों के छोटे-छोटे बच्चों की शरारतें, जवानी की तरफ़ बढ़ते हुए जानवरों की मस्तियाँ, ख़ास तौर पर बारहसिंघों और नीलगायों के नस्ल बढ़ाने के दृश्य देखे थे। साथ ही शेरों के शिकार भी अच्छी तरह देखे थे। आस-पास के गाँव वालों का जब जंगल में दख़ल बढ़ने लगा तो शेर, चीते और दूसरे जानवर अंदर की तरफ पनाह लेने लगे। फिर भी दिन में दो बार वे जानवर उस दरख़्त की तरफ से ज़रूर गुज़रते थे क्यूँकि पानी वहाँ से क़रीब था। हरियाली का आलम यह था कि हरे रंग के अलावा दूसरा रंग सिर्फ फूलों और फलों का दिखाई देता था। सूरज की किरन शायद ही कहीं ज़मीन को छू सकती थी। परिंदे, चरिन्दे और दरिंदे ख़ुश ख़ुश अपना खाना हासिल करते और अपनी नस्ल बढ़ाते।


एक अँधेरी रात में भरपूर लदे-फंदे सर सब्ज़ दरख़्त ने ख़्वाब देखा :


''एक समुद्री हरी आँखों वाली, लम्बी और छरहरी लड़की उस पवित्र दरख़्त के सामने तंग और आधुनिक लिबास में घुटनों के बल बैठने की कोशिश कर रही है। दरख़्त उससे न जाने किस ज़बान में बातें कर रहा है जो उसे समझ में आ रही है लेकिन वह दरख़्त की ज़ख़्मी आवाज़ से परेशान हो जाती है।''


वह पहली लड़की नहीं थी बल्कि उस की न जाने कितनी पुश्तें उस दरख़्त को पूजती आ रही थीं। उस पवित्र दरख़्त से उनका पुराना सम्बन्ध था। वह अपने दुख-सुख बाँटते बल्कि वह अपने दुख उस दरख़्त को ज़रूर बताते और बदले में दरख़्त के सूखे फल अपने साथ प्रसाद के रूप में ले जाते। घर ले जाकर उसके फल को तमाम सदस्य चख लेते, उसके बीजों को अपने लिए बरकत वाला समझते और उन्हें अपने ख़ज़ानों में बढ़ोतरी की नियत से रख देते थे। इंसानों और जानवरों सब के अपने अलग-अलग समय थे, कोई किसी के आड़े नहीं आता और इस तरह यह सिलसिला सदियों पर फैलता गया।


जंगल सदियों से था और अब अपने ख़ात्मे की तरफ बढ़ रहा था। उसके वारिस बदलते रहे थे और अपनी ज़रूरत, हवस और ग़रज़ के तहत सबने उसको लूटा था। उस नुक़सान की भरपाई कुछ हद तक यूँ हुई कि जब अंग्रेज़ कमज़ोर पड़ने लगे तो फिर ज़मीन की सतह से दरख़्त सर उठाने लगे। पवित्र दरख़्त इसलिए बचे रहे कि आस-पास के लोगों की दिली वाबस्तगी उनसे थी और अंग्रेज़ों के लिए वे दरख़्त किसी काम के नहीं थे।


जंगल अगर शहर की तरफ़ बढ़े तो ये नेक शगुन होता है लेकिन शहर जब जंगल की तरफ़ बढ़ने लगे तो यह बिल्कुल अपशगुन ही है क्यूँकि शहर का फैलाव बहुत असंगठित, बड़ा ही आक्रामक और भयानक होता है। वह न तो हरियाली को बख़्शता है और न ही कमज़ोर घरों को। ऐसा लगता है शहर को लोग नहीं बल्कि लोगों को शहर चलाता है।


उसी रात दूर-दराज़ के किसी इलाक़े में एक लड़की को भी वही ख़्वाब आता है जो दरख़्त ने देखा था। यह उसका पहला ख़्वाब नहीं था। लड़की बहुत घबराई और समझ नहीं पा रही थी कि उसे क्या करना चाहिए। वह अतीत-ख़्वाब-कल्पना की दुनिया में गुम हो गई। फिर किसी नतीजे पर पहुँचते ही वह उजड़ते हुए जंगल के लिए रवाना हो गई और बड़े-बड़े स्थानीय राजनेताओं, संगठनों और कई लोगों से संपर्क करने के बावजूद भी जंगल के किसी दरख़्त को बचा न सकी। लड़की की किसी भी बात पर ध्यान नहीं दिया गया और मशीनें दरख़्तों को उलटते हुए आगे बढ़ती गईं। लड़की ने देखा कि अब कुछ नहीं हो सकता इसलिए वह ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गई। उसने आँखें बंद कर लीं और हाथ जोड़ लिए। फिर उसने हाथ बढ़ा कर उसके ख़ुश्क फल तोड़ने की कोशिश की लेकिन नाकाम रही क्योंकि फल की टहनी तक उसका हाथ नहीं पहुँच सका। फ़ौरन वह दरख़्त पर चढ़ गई, उसके पास जूते उतारने का समय भी नहीं था। अभी वह चंद ही फलों को तोड़ कर अपनी जेब में ठूंस पाई थी कि मशीन पवित्र दरख़्त की तरफ़ बढ़ चुकी थी। लड़की को पहले ही हुक्म दे दिया गया था कि वह अगर उजड़े हुए जंगल में दिखाई दी तो अपनी हालत की ज़िम्मेदार वह ख़ुद होगी। दरख़्त के ज़मींबोस होने से पहले लड़की कूद कर भागने में कामयाब रही लेकिन कुछ गुंडे उसके पीछे पड़ गए थे। लड़की गिरते-पड़ते किसी तरह सड़क पर पहुँची जहाँ एक नए ज़माने की कार उसका पहले ही इंतज़ार कर रही थी।


*****


लड़की अपनी ज़िंदगी से बहुत मायूस थी। यूँ तो वह बहुत हुनरमंद, पढ़ी-लिखी और होनहार थी लेकिन उसका अतीत उसे चैन से नहीं जीने नहीं देता था या यूँ कहें कि उसके दादा ने उसे कुछ कहानियाँ सुनाई थीं जिनका असर भी उसकी ज़िंदगी पर पड़ा था जिसे वह चाह कर भी अपने वुजूद से अलग न कर सकी। उसकी रातों को बुरे ख़्वाबों ने आ लिया था। जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखने के बाद बहुत काम रातें उस की ज़िंदगी में सुकून से गुज़री थीं। इधर कुछ नए ख़्वाबों का सिलसिला भी उसकी ज़िंदगी में शुरू हुआ था।


ख़्वाब-1‌ : सफ़ेद साड़ी में लिपटी सुन्दर सेविका जो बिना आभूषणों से लदी, चेहरे पर एक क़िस्म का तेज लिए हुए, बेइंतेहा ख़ूबसूरत, दरख़्त के सामने घुटनों पर बैठी थी। सुरक्षा टुकड़ी ख़ासे फ़ासले पर उसकी तरफ पीठ किये खड़ी थी। साथ ही उसकी पालकी रखी थी जो ख़ालिस सोने से बनी हुई थी और विभिन्न बेशक़ीमती पत्थरों से सजी हुई थी।


ख़्वाब-2: वही पवित्र दरख़्त और उसके सामने तनहा घुटनों के बल बैठी हुई एक मठवासिनी जिसने शायद दुनिया से मुँह मोड़ा हुआ था। उसके चेहरे की रौनक़ और मलाहत देखने लायक थी।


ख़्वाब-3: एक नया शादीशुदा कम उम्र जोड़ा पवित्र दरख़्त के सामने खड़ा था। फ़ौजी दस्ता दूर पीठ किये खड़ा था और एक सफ़ेद आला नस्ली घोड़ा और ख़ूबसूरत पत्थरों से सजी ख़ालिस सोने से बनी हुई पालकी भी क़रीब ही रखी थी।


ख़्वाब-4: तलवारों की आवाज़ें , लड़ते हुए सिपाही, ख़ून में लथ-पथ लाशें, चीख़ते चिंघाड़ते कटे-फटे शरीर… ख़ून में लिथड़े हुए ज़िरहबख्तर पहने हुए दो नौजवान जो ग़ालिबन भाई थे, उस पवित्र दरख़्त के सामने हाथ जोड़े घुटनों पर दिखाई दिए। हिफ़ाज़ती दस्ता हद-ए-फ़ासिल पर था लेकिन इस बार उनकी पीठ नहीं बल्कि मुँह उस पवित्र दरख़्त की तरफ थे। दो आला नस्ली घोड़े शान व शौकत के साथ खड़े हरियाली पर मुँह मार लेते थे।


ख़्वाब-5: एक समुद्री हरी आँखों वाली, लम्बी और छरहरी लड़की उस पवित्र दरख़्त के सामने तंग और आधुनिक लिबास में घुटनों के बल बैठने की कोशिश कर रही है। दरख़्त उससे न जाने किस ज़बान में बातें कर रहा है जो उसे समझ में आ रही है। लेकिन वह दरख़्त की ज़ख़्मी आवाज़ से परेशान हो जाती है।


अगली सुबह जब वह जागती है तो हैरान व परेशान थी। दिन का कुछ हिस्सा बाहर गुज़ारने के बाद जब वह अपने घर लौटी तो बिस्तर पर गिरते ही अनोखी दुनिया में धँसती चली गई। वह खुली आँखों से उस पवित्र दरख़्त को देख रही थी और ख़ुद अपने जिस्म से निकल कर उस दरख़्त से जा लिपटती है। वह उस दरख़्त को ऐसे चूमने-चाटने लगती है जैसे कोई इंसान दूसरे इंसान को। दरख़्त की शाख़ें और मुलायम टहनियाँ नशे में झूमने लगती हैं। जोश के कारण उसने अपने पत्ते नीचे गिरा दिए। अभी दरख़्त के फूलों का मौसम नहीं आया था। आस-पास के दरख़्तों से सफ़ेद, गुलाबी और पीले फूल बरस रहे थे। लड़की भी दरख़्त की गिरफ़्त में बहुत बेताब हो रही थी। वह अब ज़मीन पर नहीं बल्कि दरख़्त की शाख़ों में फँसी हुई उसके तने से लिपटी सुरूर के जाम पी रही थी। वह वक़्त भी आया कि जब दरख़्त ने अपनी शाख़ों से लड़की को पकड़ कर तने से कस के चिमटा लिया। शायद यही रचनात्मक समय था। लड़की का पूरा बदन अब शाख़ों से लिपटा और तने से चिमटा हुआ था। उसके जिस्म पर अब लिबास नहीं बल्कि दरख़्त की मुलायम शाख़ें थीं। लड़की ने अपने लम्बे लम्बे नाख़ून दरख़्त के तने में उतार दिए और उसकी आँखें बंद होने लगीं।


वह बिस्तर से उठ खड़ी हुई। उसकी साँसें बहुत तेज़ थीं। उसे अच्छी तरह मालूम था कि अब उसे कहाँ और क्यों जाना है।


जंगली ज़मीन की बेपनाह गहराइयों में उतरी हुई चंद दरख़्तों की जड़ें आपस में संपर्क में थीं और कहीं न कहीं उन्होंने एक निज़ाम बनाया हुआ था। यह निज़ाम अपनी अमीक़ गहराइयों से जंगल को मज़बूती, शादाबी और संतुलन देता था लेकिन जब उन दरख़्तों के तने ही नहीं रहेंगे तो उन जड़ों का क्या होगा? आख़िर कब तक वह उस निज़ाम को बनाए रख सकेंगी? ज़मीन की गहराइयों में दूर तक जाने वाली ये जड़ें नहीं बल्कि ज़मीन की रगें हैं जो उसे बहुत कुछ देती हैं और बहुत कुछ लेती हैं जिसे हम इंसान कितना समझ सकते हैं और सारी बात तो समझ ही की होती है। बाक़ी इस दुनिया में क्या है जिस पर ग़ौर व फ़िक्र किया जाये। ये समझ ही तो हमें किसी क़ाबिल बनाती है। पाताल जब बाँझ होने लगे तो दुनिया पर फिर से जंगल बसाये जा रहे होते हैं, हाँ यह भी एक हक़ीक़त है कि वह जंगल पत्थर, कंक्रीट, सीमेंट और लोहे के होते हैं। बहुत से दरख़्तों की लाशें उन जंगलों की दीवारों में चुनी होती हैं। कंक्रीट से बने जंगल के कुछ हिस्सों में सुर्ख़ लकड़ी के कुछ जानवरों और नंगी औरतों की मूरतें लोग फ़ख्र से रखते हैं। इस के पीछे का बेवक़ूफ़ाना तर्क सिर्फ़ इतना-सा है कि वह दरख़्त बेश क़ीमत और दुनिया पर बहुत कम संख्या में होते हैं। उन लकड़ी की मूर्तों को अपने ठिकानों और अड्डों पर सजाने वाले भी आम नहीं बल्कि ख़ूंख़्वार होते हैं।


पवित्र दरख़्त मशीन के सामने झुक कर गिरा और उसका सम्बन्ध पल भर में पाताल से कट गया। ये सम्बन्ध के ख़ात्मे का समय था। दरख़्त के गिरते ही झाड़ी से ख़ूबसूरत हिरन निकल कर भागा और ऊबड़-खाबड़ सी ज़मीन पर छिपने के लिए दरख़्तों और झाड़ियों को ढूँढ़ने लगा लेकिन उसकी रिहाइश अब कहाँ थी, ये उसे कैसे मालूम हो सकता था? उसके कुनबे के बक़िया सदस्य जंगल के क़त्ल-ए-आम की आँधी में कहाँ तितर-बितर हो गए थे, उसे अंदाज़ा भी नहीं था। वह बेचारा अपना वुजूद बचाने के लिए कोशिश कर रहा था और उजड़े जंगल के किसी किनारे पर फैले हुए जाल में फँस जाना उसका मुक़द्दर था।


लड़की ज़ख़्मी हालत में एक ख़ूबरू नौजवान के सामने खड़ी थी। नौजवान की आँखों में हैरत थी और लड़की की आँखों में सच्चाई के डोरे तैर रहे थे। उसने अपनी हालत के बारे में बताने के बाद नौजवान को बहुत कुछ बताया और समझाया भी। लड़की के उस नए रूप से नौजवान परेशान हो उठा था। अभी वह कुछ और पूछताछ करता कि लड़की ने हुक्म देने के अंदाज़ में कहा :


''मरने के बाद मुझे नास्तिकों के क़ब्रिस्तान में ही दफ़नाना। वह जगह तुम ने कई बार देखी है।''


कहते हुए उसने एक छोटी-सी पोटली नौजवान के हाथ पर रखी और राज़दारी के अंदाज़ में उसके कान में फिर कुछ कहना शुरू किया। बात मुकम्मल करते ही लड़की निढाल-सी नौजवान की बाँहों में आ रही। बदन के कई हिस्सों से ख़ून रिस-रिस कर ख़ुश्क हो चुका था और उसके दाहिने कंधे से गोली भी छू कर गुज़री थी।


सर सब्ज़ जंगल मुकम्मल तौर पर महज़ ज़मीन के लम्बे-चौड़े अहाते में तब्दील हो चुका था और वहाँ पर कृत्रिम जंगल तैयार किया जा रहा था। उस कृत्रिम जंगल में घास से लेकर बड़े-बड़े दरख़्त, सब कृत्रिम थे। अलबत्ता जानवर असली रखे जाने थे जिन के लिए मख़सूस जगह बनाई गई थी। यह कोई चिड़ियाघर या अभयारण्य नहीं बल्कि कुछ और ही था, जहाँ विभिन्न प्रकार के वैद्युत-इंटरनेट तमाशे होने अभी बाक़ी थे। चूँकि शहर रोज़-बरोज़ क़रीब आता जा रहा था और अपने साथ हरियाली को मिटाते हुए आना उसकी फ़ितरत नहीं बल्कि ज़रूरत थी। शहरी बच्चों ने जंगल कहाँ देखे थे? अब उन्हें महँगे टिकट लेकर कृत्रिम जंगल देखने का शौक़ चर्राया था। यह कितनी खौफनाक प्रक्रिया थी कि जिसकी भरपाई किसी भी तरह मुमकिन नहीं थी। अस्ल जंगल को ख़त्म करके कृत्रिम जंगल बनाना, ये ख़ुद को धोखा देना था। शहर धीरे-धीरे अब कृत्रिम जंगल से मिल रहा था और उसका धुंधलापन बढ़ता ही जा रहा था।


उस हादसे के बाद लड़की स्वस्थ न हो सकी। उसकी सेहत दिन-बदिन गिरती गई और बदन इतना कमज़ोर हो चुका था कि बिस्तर से उठना भी मुहाल था। नौजवान बरसों से लड़की का वफ़ादार था इसीलिए उसका सिर अपनी गोद में लिए हुए बैठा था कि तभी लड़की ने वह पोटली माँगी और उसमें से एक बीज मुँह में रख कर पानी के साथ निगल लिया। पोटली उस लड़के को देते हुए उसने कहा :


''तुम जानते हो तुम्हें क्या करना है।''


नौजवान ने बड़ी ही मोहब्बत और कृतज्ञता से अपना सर झुकाया। लड़की की आँखों में इत्मीनान साफ़ तौर पर झलक रहा था और धीरे-धीरे उसकी आँखें बंद होने लगीं।


बेजान लड़की में कशिश नाम की कोई भी चीज़ बाक़ी नहीं रह गई थी। नौजवान के ख़यालात चूँकि लड़की से बहुत मिलते-जुलते थे और वह उसका लम्बे समय से साथी भी था इसलिए उसने लड़की की सारी वसीयतें पूरी करने का दृढ निश्चय किया हुआ था। लड़की के शरीर को क़ब्र में उतारने के बाद नौजवान ने अपनी जेब से पोटली निकाली और उसमें से पवित्र दरख़्त के बीज निकाल कर लड़की के दोनों कानों और नाक में रख दिए, उसके बाद स्तनों के बीच, नाफ में और यहाँ तक के Hymen तक बीजों को पहुँचाने का हुक्म उसे मिला हुआ था। बक़िया बीजों को उसे किसी ख़ास पते पर पहुँचाने जाना था। नास्तिकों के क़ब्रिस्तान में बड़ा-सा अहाता लड़की ने पहले ही ख़रीद रखा था जिसमें उसकी क़ब्र बनाई गई। दफ़ीने के बाद भारी क़दमों से नौजवान उल्टे पांव चंद क़दम चला और बड़े ही एहतेराम से अपना सर झुकाया। जैसे आख़िरी सलाम करते हुए कह रहा हो, “मैंने अपने वादे पूरे किए और आगे भी करूँगा।”


*****


नौजवान नए सफर पर था और कृत्रिम जंगल के मालिकान की ज़मीनें और शेयर्स महँगे होते जा रहे थे। शहर में धुंधलापन, घुटन और तरह-तरह के रोग फैले हुए थे क्यूँकि वहाँ नए-नए इंडस्ट्रियल पार्क खुलते ही जा रहे थे। कृत्रिम जंगल ठंडा था, साफ़ था लेकिन वहाँ कुछ ही देर घूमने के लिए भारी क़ीमत चुकानी पड़ती थी और शहर घुट रहा था, तड़प रहा था।


बरसों बाद एक UFO-नुमा Aerocar नास्तिकों के क़ब्रिस्तान में बिना किसी इलेक्ट्रॉनिक अनुमति के उतरती है जिसमें पहले से कहीं ज़्यादा क़ब्रें बन चुकी हैं लेकिन कार जिस क़ब्र के सामने रुकती है, उस क़ब्र का आयत बहुत बड़ा है। क़ब्र से एक ऐसा दरख़्त निकला हुआ है जो एक ही क़िस्म के कई दरख़्तों का संग्रह मालूम होता है और तनावर दरख़्त बनने की राह पर चलता हुआ दिखाई देता है जिसके कारण क़ब्र का नामोनिशान भी मालूम नहीं होता। हवाई कार में से एक रोबोट बाहर आता है जो उस जवान दरख़्त के सामने घुटनों के बल बैठ जाता है और अपना सर थोड़ा-सा झुकाता है। फिर कुछ देर बाद उस दरख़्त पर लटकने वाले चंद ख़ुश्क फलों को तोड़ता है। ऐसा करते ही क़ब्रिस्तान के तमाम कैमरे और सेंसर्ज रोबोट की तरफ केंद्रित होते हैं और एक इलेक्ट्रॉनिक ध्वनि से उसे सावधान करते हैं। रोबोट अपना काम कर लेने के बाद हवाई कार में बैठ कर आसमान की बुलंदियों में कहीं गुम हो जाता है।


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साहित्य अकादेमी दिल्ली द्वारा उर्दू के लिए युवा सम्मान (2023) से सम्मानित तौसीफ़ बरेलवी हिंदी और उर्दू लेखन‌ तथा अनुवाद के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पुस्तकें : नज़र इ सर सय्यद (2017), गोखरू (हिंदी से उर्दू अनुवाद, 2019), ज़हन ज़ाद (कहानी संग्रह, 2020), दर्द का आख़िरी तवाफ़ (सम्पादित कहानी संग्रह)। रेडियो पर भी कहानियों का प्रसारण। ईमेल : tauseefbareilvi1@gmail.com


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