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मुझे एक और चाबी चाहिए
कवि और चोर के बीच की दूरी बहुत कम होती है। दोनों ही अदृश्य होकर दूसरों के जीवन के सबसे निजी हिस्सों में प्रवेश करते हैं। फ़र्क बस इतना है कि चोर भौतिक चीजों को ले जाता है, और कवि उन अमूर्त सत्यों को चुराता है, जिन्हें लोग खो चुके होते हैं अथवा खो देने का अभिनय करते हैं।


अनिल गंगल की कविताएँ
किसके खेत में भूख उगती है?
किसके घर में नफ़रत पकती है?
किसकी ज़ुबान पर ताला लगता है?
और किसके हाथ में इतनी ताक़त आ जाती है
कि वह अपने झूठ को देश का सच कह सके?


पैमाना सिर्फ़ एक है कि लिखाई अच्छी होनी चाहिए
मैं नहीं मानती कि स्त्रीवाद कभी भी ‛पूँजीवाद’ जैसी किसी भी दूसरों के दमन और शोषण पर आधारित व्यवस्था का समर्थक हो सकता है।


जेन-ज़ी का तोता
एक पोस्ट की सुबह से शाम तक की उम्र का एक मामूली-सा लेखक अपने फालोवर्स के साथ आपको गाली बकता और अपने पोस्ट की उम्र को दो-चार दिनों के लिए बढ़ाता बेदाग निकल सकता है। क्योंकि उसकी इस हरकत से उसके उस पोस्ट की वह सुबह से शाम की सीमित उम्र कुछ दिनों के लिए आगे बढ़ जाएगी।


ईश्वर से अधिक मनुष्य
यदि यह संसार केवल प्रतीक्षालय है, तो यहाँ इतनी सुंदर खिड़कियाँ क्यों हैं? पेड़ों पर धूप इतनी देर क्यों ठहरती है? बारिश के बाद मिट्टी की गंध इतनी गहरी क्यों होती है? किसी बूढ़े पिता के चेहरे पर एक नई झुर्री देखकर भीतर कुछ टूटता क्यों है?


घनश्याम की कविताएँ
तुम आग को आग नहीं लिख सकते
न रोटी को रोटी लिख सकते हो
न फूल को फूल ही
तुम्हें लिखना इतना ही पसंद है


पाताल की दुखती रगें
पाताल की दुखती रगें कहानी : तौसीफ़ बरेलवी उसे कई रोज़ से अपने हम नफ़्सों के ख़ून की बू आ रही थी लेकिन वह उस बू के पीछे जा भी नहीं सकता था। हाँ उसके अंदर से एक हौल ज़रूर उठ रही थी कि कुछ बहुत भयानक होने वाला है। पूरा जंगल रोज़ जिन परिंदों कि चहचहाहटों से अपनी सुबह करता था, अब वे आवाज़ें ख़ामोश होने वाली थीं। आख़िर ऐसा भी क्या हो गया था...? वह उस पसरती हुई ख़ामोशी का पता लगाना चाहता था लेकिन उससे कुछ करते नहीं बन रहा था। आख़िर वह कर भी क्या सकता था? अपनों के ख़ून की बू के साथ ही दिल को थर्


दुनिया में एक शहर है, जिस शहर में पूरी दुनिया मिलती है
मैच शुरू हुआ तो लगा जैसे इधर से उधर बॉल नहीं झूम रही बल्कि लोगों के दिल खिलाड़ियों के पैरों में अटके हुए हैं। बॉल जितनी बार उछलती, उतनी ही बार लोगों के दिल उछलते और गलों की आवाज़ें किसी कोरस में आसमान तक टप्पे खाने लगतीं। गेंद गोलपोस्ट के पास पहुँचती और पूरा इलाक़ा एक साथ साँस रोक लेता। गोल होने पर ऐसा शोर उठता कि लगता, इस शहर की गगनचुंबी इमारतें भी मुस्कुराने लगती होंगी।


कल्पना मनोरमा की डायरी
याद आई नदी किनारे पड़ी नाव। महीनों पानी से दूर रहने पर उसकी देह सूख जाती होगी। फिर जब उसे दोबारा नदी में उतारा जाएगा तो वह भी एक पल के लिए ठिठकेगी। पानी धीरे-धीरे उसकी लकड़ी में उतरेगा और वह फिर से जी उठेगी।


विनीता बाड़मेरा की डायरी
हर दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है। रात बीत रही है। जनवरी शुरू होती है और बारह महीने बीतते ही दिसंबर आ जाता है। एक साल पूरा खत्म हो जाता है। मन में रह जाती है कसक, बहुत कुछ छूटने की, बीतने की, रीतने की—न चाहते हुए भी।


बेटियाँ धान के पौधे की तरह होती हैं
जैसे ही दीवारों से बेटी की आवाज की प्रतिध्वनि गूंजती है उसका मन कलप उठता है। पिता को कंधे पर कोमल हथेलियों के स्पर्श का एहसास होता है, जैसे बेटी कह रही हो- "पापा, उदास नहीं होते, साल भर कहाँ रह पाता है बसंत।


गीता मलिक की कविताएँ
तुम किसी पहाड़ी संगीत की तरह लग रहे हो
नहीं हैं आस-पास कोई वाद्ययंत्र
तुम्हारी हँसी मेमने-सा निश्छल राग है


ख़्वाब के मज़बूत पंख (विश्व सिनेमा)
कला आने वाली नस्लों को मनोरंजन के साथ-साथ तमाचे और प्यार के निशान सौंपती है।


काफ़्का को यहूदी पहचान से आगे पढ़ने की कोशिश
पीएत्रो चिताती की काफ़्का मेरे लिए एक जीवनी से कहीं अधिक है। यह किताब काफ़्का की यहूदी पहचान का निषेध नहीं करती, बल्कि उसे अपनी व्याख्या का केंद्र भी नहीं बनाती। वह काफ़्का को सबसे पहले एक रचनाकार की तरह पढ़ती है—ऐसे रचनाकार की तरह, जिसकी कल्पना अपने समय, अपने समाज और अपनी सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण करके मनुष्य की सार्वभौमिक नियति को छूती है।


काफ़्का की कहानी ‘बांबी’ का अंतर्पाठ
दुर्ग गोदाम में राशन संग्रहण से वह किसी भी संभावित घेराबंदी से महीनों निश्चिन्त रह सकता है पर अपनी सुरक्षा को लेकर उसकी हालत ‘ईमां मुझे रोके है तो खेंचे है मुझे कुफ़्र’ वाली ही बनी रहती है।


अपने-अपने नामवर (सात प्रसंग)
उनकी धोती पीली-सी थी। मैंने सोचा - “क्या नामवर जी नील का प्रयोग नहीं करते। फिर मुझे वे पिता की तरह लगे, मन में सोचा कि कहूं कि लाइए आपके पांव दबा दूँ।”


ताकि स्मृति बची रहे (मंगलेश डबराल की कविता)
जो भी दिल्ली पहुँचता है, यह महानगर उसे बदल लेता है। कभी-कभी तो इस परिवर्तन का पता तक हमें नहीं लग पाता है। दिल्ली के जादू से विरले ही बच पाते हैं। मंगलेश इसके अपवाद नहीं थे।


शिम्बोर्स्का की कविता में मृत्यु का पैरहन
शिम्बोर्स्का कविताओं में मृत्यु पर प्रयोग करती हैं। वे इससे सम्बद्ध विडम्बनाओं को दिखाकर इसे विभिन्न कोणों से देखती-परखती हैं। वे मरने वाले के प्रति पर्याप्त करुणा बरतकर भी मृत्यु को वस्तुपरक नज़रिये से देखना चाहती हैं।


एंथ्रोपोसीन
वह चीज़ करीब आ रही थी। यह फटे हुए कपड़ों में एक वयस्क पुरुष था। उसका बायाँ हाथ गायब था। पहले तो मुझे लगा कि कोई हादसा हुआ होगा


विशाल प्रभु की कविताएँ
चोलों की
सबसे बड़ी और
शानदार दुकान है
शहर,
जिसके तागों से
कभी रिहा ही
नहीं होता इन्सान
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