डिस्कवर
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डिस्कवर
कहानी : उर्मिला शिरीष
मैं रात भर सोया नहीं।
यह पहली बार नहीं हुआ है मेरे साथ। यह सातवीं या आठवीं बार हो रहा है कि देश-विदेश की धरती पर कोई भी प्राकृतिक या मानवीय दुर्घटना घटी हो और मैं उन दृश्यों को देखकर विचलित न हुआ होऊँ या मेरी आँखों में आँसू न आये हों। पहले मैं इन दृश्यों को देखकर, चीख-पुकार सुनकर भी अनदेखा अनसुना कर देता था और यह कहने में मुझे जरा भी संकोच नहीं होता था कि मैं अकेला रह सकता हूँ, मुझे किसी के साथ की, किसी से बात करने की कोई ज़रूरत नहीं है। लेकिन इधर बीते पाँच महीने की घटनाओं ने मेरी नींद उड़ा दी है। मेरी रातें डरावनी और मेरे दिन उदास हो गये हैं। बाढ़ और बाढ़ में बहते मकान... गाड़ियाँ... मवेशी... लोग... फिर वो जलता हुआ विमान, उसके आसपास फैला हुआ मलबा, मलबे के बीच खूबसूरत सपनों से भरे हँसी-खुशी यात्रा करने वाले यात्रियों के शरीर के क्षत-विक्षत टुकड़े। रोते-बिलखते स्वजन, रिश्तेदार, मित्र, परिचित, अपरिचित। ऐसा छाती-फोड़ क्रन्दन कि आँखें देखकर भी नहीं देख पा रही थी। इससे पहले हुए आतंकवादी हमले, इससे पहले की सैकड़ों घटनाएँ। युद्ध... युद्ध के नाम पर मारे जा रहे हज़ारों निर्दोष लोग... बच्चे! भूख से तड़पते मरते बच्चे! उफ! मैंने उठकर पानी पिया। ठंडा पानी, जिसकी धार छाती में बीचों-बीच महसूस हो रही थी। खिड़की के बाहर झाँककर देखा। सड़क सुनसान थी। पेड़ खामोश थे। फूल सो रहे थे। बादलों ने पहाड़ों को ढाँप लिया था। सब कुछ कोहरे में डूबा। इस कॉलोनी में आने का एक कारण यह भी था कि सामने से दीखते पहाड़... उन पर छाये बादलों के बदलते हुए रंग-रूप और खूबसूरत पेड़ों की कतारें। इस समय वही सारी चीजें अजनबी, दूर और खामोश लग रही थीं। चुप और अपने आवरण के भीतर। इंसान भी तो सैकड़ों आवरणों के भीतर छुपा होता है। उसका स्वभाव भी पता नहीं चलता कि वह कब किस बात का बुरा मान जाये या किसी को धोखा दे दे या किसी को बीच रास्ते में छोड़ दे या किसी से ईर्ष्या करने लगे या नफरत करने लगे या इतना स्वार्थी हो जाये कि उसे दूसरे का दुःख दुःख ही न लगे। अजीब सी घबराहट हो रही थी। किससे बात करूँ? किसको फोन लगाऊँ? कौन है जो इस समय मुझसे बात करने के लिए अपनी नींद खराब करेगा। दस-बारह साल के अन्तराल ने सबको अलग-अलग कर दिया था। सबकी अपनी पसन्द-नापसन्द। समय की पाबंदियाँ। पैसे होने न होने का अन्तर। केवल और केवल अपने परिवार के बारे में सोचना।
रवि को फोन लगाऊँ। नहीं। वह मोबाइल बंद करके सोता है। सुबह चार बजे जिम जाता है फिर ऑफिस ऑफिस से लौटकर ड्रिंक्स और डिनर लेकर सो जाता है। वह केवल रविवार को फोन करता है। विनीत ! विनीत इस समय अपनी मंगेतर को लेकर रेस्टोरेंट गया होगा या फिल्म देख रहा होगा। शाम को अपनी मम्मी के साथ सीरियल देखता है फिर ग्यारह बजे से दो बजे तक टी.वी. की बहसें सुनता है। इस समय मेरा और उसका समय अलग-अलग होता है। वहाँ दिन... यहाँ रात। पता नहीं लोग इतनी आराम की जिंदगी कैसे जी लेते हैं। रिश्वत का कमाया पैसा बाप ने प्रॉपर्टी खरीदने में लगा दिया था। वही प्रॉपर्टी इतनी महँगी हो गयी थी कि करोड़ों की बिकी। करोड़ों रुपया आया तो फिर से बचत योजनाओं में लगा दिया। कुछ रुपये ब्याज पर उठा दिये। पापा ने कितनी बार कहा था कि बेटा दुनियादारी के हिसाब से चलो। थोड़ा सा नाटक, थोड़ी सी मुँह देखी बातें... थोड़ी सी झूठी प्रशंसा करना सीख लोगे तो सबके चहेते बने रहोगे... वरना अकेले रह जाओगे। सचमुच आज मैं अकेला ही तो रह गया हूँ। किसी समय मौसियों, बुआओं, मामा-मामियों, चचेरे ममेरे-फुफेरे मौसेरे भाई बहिनों का हीरो... आज मैं नितान्त अकेला रह गया हूँ क्योंकि मैं पापा के बताये फार्मूले पर नहीं चला था, बल्कि पापा के सम्मान की खातिर सबको त्याग दिया था। पापा समझाते रहे, "बेटा, अपमान मेरा हुआ है, तेरा नहीं। उन्हें मेरा अपमान करने का हक है, क्योंकि मैं उनके पैरामीटर पर फिट नहीं बैठता हूँ। रिश्तेदारी में मान-अपमान सब चलता है।" "आपके लिए चलता होगा, मेरे लिए नहीं। मुझे चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए जो अपने बाप की बेइज्जती देखकर भी उनके साथ रहूँ, बात करता रहूँ और मज़े से हँसता रहूँ।" पापा ने मुझे सीने से लगा लिया था और देर तक रोते रहे थे। तब दो ग्रुप बन गये थे। एक तरफ पैसे वाले रिश्तेदार... और दूसरी तरफ मेरी माँ और पापा। जिन्हें किसी भी फैमिली पार्टी में, शादी-ब्याह में नहीं बुलाया जाता था।
बचपन सबके बीच, सबके साथ बीता था। बचपन में कुछ समझ में नहीं आता था... किसी के भी दिए कपड़े पहन लेता था। किसी के भी जूते और जैकेट ले लेता था। सबको लिए घूमता रहता था, सबके काम करता रहता था यह सोचकर कि मौसी-बुआ, मामा के बच्चों के काम हैं पर उसी घर में माँ-पापा की बेइज्जती होते हुए देखकर तब समझ में नहीं आता था कि आखिर यह सब क्यों? पापा सरकारी नौकरी में थे। सीमित सैलरी, जिम्मेदारियाँ ज़्यादा। कभी भी रिश्वत का पैसा नहीं लिया। माँ भी अपनी सैलरी में घर की चीजों में, कामों में सहयोग करती थी। उस दिन मौसी की सगाई थी... सबसे छोटी मौसी की। परिवार पैसे वाला था। फाइव स्टार होटल में प्रोग्राम हो रहा था। मैं पहले से पहुँच गया था। पापा माँ को लेकर आने वाले थे। पापा अपने रोज के कपड़ों में थे और माँ ने हल्की जरीवाली साड़ी पहनी थी। एक हाथ में घड़ी थी दूसरे में चाँदी का कड़ा। मैंने देखा... मामा ने किसी से भी पापा का परिचय नहीं करवाया, न माँ महिलाओं की सजी-धजी टोली में शामिल थी।
"कैसी आ गयी?"
"मतलब।"
"क्या तुम्हारे पास ढंग की साड़ी नहीं थी?"
"इतनी अच्छी तो है।"
"नंगा गला, न हाथ में कुछ... नकली ही पहन लेती... रिश्तेदार क्या सोचेंगे...?"
"कौन क्या सोचेगा? सोचने दो?"
मैं माँ का उतरा हुआ चेहरा देख रहा था। वे बार-बार पलकें झपका रही थीं आँसू रोकने के लिए।
फिर मैंने देखा, सारे रिश्तेदार और परिवार के लोग एक लंबी टेबल पर एक साथ बैठकर डिनर ले रहे हैं और पापा एक कोने में खड़े अकेले खाना खा रहे हैं। माँ अकेली एक कुर्सी पर बैठी थी।
"खाना खा लिया?"
"नहीं।"
"खा लो... फिर चलते हैं।"
"सबको फ्री हो जाने दो।"
एक-एक करके मेहमान जा रहे थे। उनका टीका किया जा रहा था, लिफाफे दिये जा रहे थे। माँ-पापा की तरफ किसी का ध्यान न था।
"अब चलें!"
"मामी, आप क्यों कह रही थीं माँ से कि कैसी साड़ी पहनकर आ गयी हो। क्यों? मेरी माँ के पास ऐसी ही साड़ियाँ हैं... उनके पास कोई गहने नहीं है, आपको शर्म आ रही थी, तभी न आप सब एक टेबल पर बैठकर खाना खा रहे थे और मेरी माँ और पापा यहाँ बैठे थे।"
"अरे केतन, तुम बेकार बात का बतंगड़ बना रहे हो, हमने तो यूँ ही बोल दिया होगा।"
"यूँ ही नहीं मामा। आप लोग भी कम बेइज्जती नहीं करते हो। मज़ाक उड़ाते हो। किसी के पास पैसा नहीं है तो क्या वह बेइज्जती सहन करता रहेगा।"
"केतन, सॉरी बोलो मामा-मामी को।" बड़ी मौसी ने मेरा हाथ झटककर कहा था "वो बड़े हैं। कह दिया तो क्या हुआ ! शादी-ब्याह में जाने का एक ढंग होता है... चार लोग आते हैं... क्या ऐसे ही आ जाना चाहिए?"
"आप भी!"
"हाँ, हम भी। तुम्हारी बदतमीजी बर्दाश्त नहीं करेंगे। सॉरी बोलो।"
"चलो पापा। माँ चलो।" मैंने दोनों का हाथ पकड़ा था और चला आया।
"बहुत ही बदतमीज हो गया है। आगे से बुलाना नहीं किसी प्रोग्राम में। पूछता कौन है। ईमानदार बने फिरते हैं।" मामा हिकारत से कह रहे थे।
"बेटा, क्या हो गया?"
"आपको कसम है माँ, जो दुबारा कभी आयीं तो।"
"ये मेरा घर...।"
"आपका घर नहीं है अब... जितने जल्दी इस सच को स्वीकार लोगी उतना ही अच्छा रहेगा।"
फिर तो जैसे अनकही जंग शुरू हो गयी थी। सबसे बातचीत बंद हो गयी थी। मैं अपनी पढ़ाई के लिए बाहर आ गया था। बाद में नौकरी के लिए यहाँ विदेश में।
पापा अकेले हो गये थे।
माँ बीमार।
मैं बीच-बीच में जाता, उनके लिए सारी व्यवस्थाएँ कर आता। देखभाल के लिए लड़का और दो बाईयाँ भी।
पहले पापा गये। फिर माँ।
बचा रह गया मैं। अकेला। माँ पापा की एक ही चिंता थी कि समय पर मेरी शादी हो जाये। पर मेरा मन उचट गया सारी चीज़ों से, शहर से, शहर के लोगों से, यहाँ तक कि शादी से भी। मेरी लड़कियों से दोस्ती भी रही। लिव इन में भी दो-तीन महीने रहा पर मन... उन संबंधों में रमता ही नहीं था। एक-दो लड़कियाँ अभी भी मेरे ‘टच' में हैं पर हालचाल जानने वाली।
*****
अजीब बात थी कि जो लोग दस में से दस बार अपमान करते थे, उनको बस मैंने एक बार पलटकर इतना भर जताया था कि वे मेरे माँ-पापा की बेइज्जती न करें। मेरी जायज बात का उन्हें इतना बुरा लग गया! उन्हें मेरी और कोई बात याद नहीं रही। मुझे याद है जब तीनों मौसियाँ एक साथ आती थीं किसी की बर्थडे या राखी पर, तब कितना हंगामा मचता था। देर रात तक बातें होती रहती थीं। ठहाके लगते थे। डांस होते थे। सामान के बैग खोले जाते थे। गिफ्टों का आदान-प्रदान होता था। नानी बार-बार आकर देखती। हँसकर कहती "पूरी रात जागोगी? बातें करके पेट नहीं भरता तुम लोगों का।" वही हाल मेरे घर में होता था। बुआएँ अपने-अपने बच्चों के साथ आती थीं रक्षाबंधन पर और दादी की बर्थडे पर। तब पूरा-पूरा दिन उनका शॉपिंग में गुज़रता था। फिर वो अपनी दोस्तों से मिलने जातीं... उनकी दोस्त घर आती। माँ सबके लिए खाना बनाती। पापा उनके काम करवाने में लगे रहते और मैं बुआओं के आगे-पीछे घूमता रहता। आज सोचता हूँ तो ग्लानि से भर उठता हूँ कि माँ-पापा को मैंने क्यों यूँ सबकी सेवा करने दी। क्यों हरेक की शादी-ब्याह, बर्थडे, विवाह की वर्षगाँठ, यहाँ तक कि रिश्तेदारों के यहाँ होने वाली मृत्यु, अंतिम संस्कार और मृत्युभोज तक में जाने दिया था। उनको कभी टोका भी तो पापा कहते- 'अगर हम किसी के घर नहीं जाएँगे तो हमारे यहाँ कौन आएगा। कोई नहीं आया पापा! किसी ने एक बार भी खबर नहीं ली। खुद होकर फोन करके यह भी नहीं पूछा कि मैं कहाँ हूँ... कैसा हूँ। मजे की बात यह भी थी कि दोनों के बीच इसी बात को लेकर झगड़ा होता था कि कौन कितनी देर तक अपने भाई-बहिनों से बात करता है और समय का खेल कि उन दोनों का ही अपने अपने भाई-बहिनों से कोई संबंध नहीं रहा। सबने एक दूसरे को 'कट ऑफ’ कर दिया था। क्योंकि अब मैंने सबको अपने नजरिये से देखना शुरू कर दिया था। मेरी दृष्टि में कई चीजें गलत थीं। कई चीजें बदली जा सकती थीं खासकर माँ-पापा की। पर बेचारे सदाशयता के पुतले जो थे...।
बड़ी बुआ सबसे ज़्यादा बातूनी थी। चालाक और मीठा बोलने वाली। अपने बच्चों के लिए 'सर्वश्रेष्ठ' क्या हो सकता है? कौन हो सकता है? कौन क्या कर सकता है। के आधार पर संबंध बनाती थी। वह स्वयं को हमारे घर की मालकिन समझती थी और पापा पर उनका एकछत्र अधिकार था। जब भी पति-पत्नी को बाहर जाना होता, वो अपने दोनों बच्चों को हमारे घर छोड़ जाते... बेचारी माँ काम कर-करके थक जाती थी... पर लौटते ही उन्हें माँ से कोई सहानुभूति नहीं होती, उल्टा पचासों शिकायतें करने बैठ जाती। पापा दोनों के बीच पिस जाते।
उन दिनों मैं भी आई.आई.टी. की तैयारी कर रहा था और इधर पापा जिस संस्था का अवैतनिक काम किया करते थे, उसकी बैठकें भी हर तीसरे रविवार हमारे घर में हुआ करती थीं। उस बैठक की सारी व्यवस्था माँ ही करती। फिर भी पापा को बुआ की चिंता रहती। आये दिन होने वाले झगड़ों को सुलझाने के लिए पापा को भागना पड़ता और फिर मैंने सुना कि बुआ तलाक ले रही है... उनके रहने की व्यवस्था पापा को करनी थी... उनके बच्चों का भार पापा पर आने वाला था। वह समय... कितना जानलेवा था कि हम सब एक मनहूस समय में जी रहे थे। पापा ने बड़ी मुश्किल से बुआ की नौकरी लगवायी... अलग मकान दिलवाया... उनके बच्चों के लिए एक पिता का रोल निभाया पर जब पापा बीमार पड़े तो न तो बुआ आकर रुकती थी न उनके बच्चे! पापा को अंतिम समय में लगने लगा था कि उन्होंने अपनी जिंदगी का आधा हिस्सा तो केवल इन लोगों पर खर्च कर दिया। जिन दिनों वे स्कूल-कॉलेज के गेट पर खड़े रहते थे, उन दिनों वे घूम सकते थे, फिल्में देख सकते थे, जंगलों में जा सकते थे, अपने संगठन के लिए काम कर सकते थे, जो हर वक्त मुसीबत में पड़े लोगों के लिए सहायता करने के लिए काम करता रहता था। कम से कम दो-चार लोग आकर हॉस्पिटल में मिलने तो आ जाते। उफ पापा की वो सूनी-सूनी निगाहें जब वे इन लोगों की प्रतीक्षा में बाहर देखते रहते थे।
देखूँ ये लोग फेसबुक पर हैं या नहीं। मैंने फेसबुक प्रोफाइल देखी। बुआ अपने बच्चों के साथ मुस्कुराती नज़र आ रही थी... कई स्थानों के फोटो थे- उनकी बेटी का पति, बेटे का बच्चा। पापा की मृत्यु के बाद उन लोगों से पूरी तरह से संबंध खतम हो गये थे। छोटी बुआ तो शादी के बाद से ही बहुत कम आती-जाती थी। उनके ससुराल में दामाद का दर्जा सम्माननीय माना जाता था, इसलिए जब वे (साल में एक बार) हमारे घर आते थे तो उनकी आवभगत मेहमानों की तरह करनी पड़ती थी। उनका अलग रूम होता था। उसमें एसी नहीं तो कूलर तो होना ही चाहिए। फूफाजी का खाना एकदम अलग होता था। उनके दोनों बेटे सिर पर चढ़े, गँवार और अकडबाज थे, जो हर चीज हाथ में चाहते थे। वे सब रेस्ट करते और माँ काम में लगी होती। वे सब घूमने जाते और माँ खाना पका रही होती। वे सब पिक्चर देखते, माँ उनके लिए पकौड़े तल रही होती या बच्चों के लिए कुछ बना रही होती। पापा.... इतने परेशान हो जाते कि अगले साल उनके न आने की कामना करते। एक दिन तो पापा ने बोल ही दिया था, "राखी, तुम अपने प्रिंस और उनके राजकुमारों को लेकर मत आया करो। हम तेरे साथ बैठ तक नहीं पाते... चौबीस घंटे उनके ही नखरे उठाते रहो।"
"भइया, आपने बहुत बड़ी बात कह दी!"
"सच तो कह रहा हूँ।"
"अगर आपको मेरे बच्चों और पति से इतनी प्रॉब्लम है तो बुलाते ही क्यों हो? हम तो आपका ही सम्मान रखने के लिए आते हैं... वरना हमारे घर में कोई कमी थोड़ी न है...।"
"जानता हूँ राखी... पर…"
"बस भइया, अब सुनने के लिए कुछ नहीं बचा।" राखी बुआ ने रोना शुरू कर दिया था। माँ को हाथ जोड़कर माफी माँगनी पड़ी थी। बस वो वर्ष था कि राखी के समय छोटी बुआ कभी नहीं आई, पापा की बीमारी में भी नहीं। अंतिम संस्कार में आई थी अपने बच्चों और पति के साथ, तो होटल में रुकी थी और वहीं से वापस चली गयी थी। हाँ पापा जरूर उनके बेटे की शादी में 'भात' लेकर गये थे... वो भी बैंक से लोन उठाकर... डेढ लाख का सामान लेकर।
उफ... मैं आज क्यों इन लोगों को याद कर रहा हूँ। क्यों इन लोगों की तरफ मेरा मन लौट रहा है। शायद माँ-पापा की वजह से। पापा कितने जिंदादिल इंसान थे, हमेशा हँसी-मजाक करना। हमारा घर दुनिया की बातों के रंग में रंगा रहता था। हमारे यहाँ फिल्मों की, राजनीति की, नेताओं की, समस्याओं की, विचारकों की बातें होती थीं। अलग सोच रखने वाले लोग सबसे पहले अपने घर और घरवालों द्वारा फेंक दिए जाते हैं इस मुनादी के साथ कि जाओ। भुगतो। तुम्हारी यही सजा है!
मंझली बुआ का नेचर शुरू से ही आत्मकेन्द्रित था। अपने शौक पूरे करना। अपने लिए सामान खरीदना। स्कूल में नौकरी करते हुए वे ठाठ से रहती थीं। उन्होंने ससुराल में जाकर भी अपना अलग मकान ले लिया था। फूफाजी आरामतलब इंसान थे। अपने बड़े भाई के आई.ए.एस. होने का फायदा इन दोनों पति-पत्नी ने ही उठाया था। रिश्वत के पैसों का, सुविधाओं का, रुतबे का मक्खन यही लोग चाटते थे। बदले में अपने भाई की चापलूसी करते और बुआ अपनी स्मार्टनेस से उनको पटाकर चलती थी। देखते-देखते इन दोनों का बंगला बन गया। फार्महाउस ले लिया। दोनों बच्चों को डोनेशन देकर डॉक्टर बनवा दिया। बुआ सारे रिश्तेदारों में एक आधुनिक, वाचाल, स्मार्ट लेडी के रूप में स्थापित हो चुकी थी। पापा ने एकाध बार किसी काम के लिए बोला होगा तो उन्होंने तपाक से मना कर दिया था। पापा ने भी उनके घर आना-जाना कम कर दिया था।
उनकी फेसबुक देख रहा हूँ। फेसबुक पर बुआ का पूरा परिवार था। बंगले, फार्महाउस के फोटो थे। दोनों बेटों और बेटी के चमकते हुए चेहरे नज़र आ रहे थे। क्या मैसेज करूँ! नहीं। उन्हें लगेगा मेरी गरज है, इसलिए होकर मैं उन्हें मैसेज कर रहा हूँ।
चलो.. अब मौसियों और मामाओं की दुनिया में प्रवेश किया जाये। बड़ी मौसी जो जनसम्पर्क विभाग में पदस्थ थी, अब रिटायर हो गयी होगी। मौसाजी संस्कृति विभाग में थे। उनकी दोनों बेटियों होशियार थीं। बड़ी बेटी जर्मनी चली गयी थी और छोटी बैंक में मैनेजर थी। मैंने बीच में सुना था कि मौसाजी की डेथ हो गयी है। तब मैंने मैसेज लिखकर भेज दिया था... पर उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया था। बाद में मैंने भी उस तरफ ध्यान नहीं दिया था। मौसी इन्दौर में होगी? मैंने उत्सुकतावश उनकी फेसबुक प्रोफाइल चेक की... पर मौसी फेसबुक पर नहीं थी, उनका कोई पता भी नहीं था।
छोटी मौसी से मेरा कई सालों तक संवाद बना रहा था। छोटी मौसी मतलब रूबल मौसी। बेहद खूबसूरत थी। उनकी खूबसूरती की चर्चा पूरे रिश्तेदारों में होती थी। उनके नखरे भी थे। उनकी शादी में इसीलिए अड़चनें आ रही थीं क्योंकि उन्हें कोई भी लड़का पसन्द नहीं आता था, जो आता था वह शराब, सिगरेट और नॉनवेज लेता था। मौसी की पहली शर्त यही थी। पर दुर्भाग्य कि जिस लड़के से मौसी की शादी हुई, वह शराब और सिगरेट तो पीता ही था, नॉनवेज भी खाता था और ससुरालवाले इतने रूढ़िवादी कि सिर पर पल्लू डालने को लेकर ही मौसी को ताने मारते रहते थे। मौसी डिप्रेशन में चली गयी थी। बाद में पता चला कि वे बैंगलोर चली गयी थी जहाँ उन्होंने टीचर की नौकरी ज्वाइन कर ली थी। पर उनके जीवन की वो रौनक नहीं लौटी, जो शादी के पहले थी। उनके एक बेटे ने आर्मी ज्वाइन की थी और दूसरा भी मर्चेन्ट नेवी में चला गया था। मुझे लगता था कम से कम मौसी के दोनों बेटे मेरे सम्पर्क में रहेंगे पर वो भी मेरे सम्पर्क में नहीं रहे। अब कैसी लगती होंगी मौसी? पचास साल की हो गयी होंगी! उनको देखने के लिए मैंने फेसबुक पर उनका नाम सर्च किया। मौसी का हँसता हुआ चेहरा सामने था... कितनी मोटी हो गयी है। क्यों? उनकी तबियत तो ठीक है? मैंने मैसेंजर पर लिखा– 'मौसी कैसी हो? सालों बाद आपको देखा।’ बस इतना ही काफी है। मैंने अपना मोबाइल नंबर लिख दिया, शायद वे मुझे कॉल करें... या मैसेज भेजें या अपना मोबाइल नंबर भेजें।
जब तक मैं अपनी तीसरी मौसी के बारे में न जान लूँ मुझे बेचैनी होती रहेगी। ये सबसे छोटी मौसी है। तब मौसियाँ पढ़ रही थीं और इन सबकी शादियों की बात चल रही थी। छोटी मौसी का एकमात्र सपना था, सरकारी नौकरी में जाना। उन्होंने कितनी डिग्रियाँ ले रखी थीं- बी.ए., एम.ए., एल.एल.बी., एल.एल.एम. । मामा का कहना था कि वे या तो बैंक की नौकरी करें या कॉलेज की, लेकिन रूबल मौसी अपनी मर्जी की मालिक थी। सबको खरी-खरी बातें सुनाकर सबको चुप करवा देती थी। दो साल बाद सबने सुना कि उनका सिविल जज के लिए सिलेक्शन हो गया है। कुछ महिने बाद ही मौसी की पोस्टिंग हो गयी। वे उधर गयी और इधर मैं अपनी पढ़ाई में लग गया। धीरे-धीरे उनसे बात होनी बंद हो गयी। उनकी शादी एक सामान्य से दिखने वाले मजिस्ट्रेट से हो गयी थी। पापा ने मौसी से मजाकिया लहजे में कहा था, "रूबल, तुझे कोयला इतना पसन्द था, मुझे आज पता चला। अगर तेरे बच्चे तेरे पति पर चले गये तो...?" उन दिनों कोई किसी के मजाक का बुरा नहीं मानता था। रूबल मौसी भी हँसकर टाल देती थीं। उसके बाद यानी मेरी पीढ़ी के बच्चों में बुरा मानने की, नीचा दिखाने की, स्वयं को सुपीरियर दिखाने की मानसिकता आ गयी थी।
क्या मौसी फेसबुक पर होगी...? मैं चैक कर रहा था... पर रूबल मौसी का कोई फेसबुक एकाउण्ट नहीं था।... देखता हूँ कौन मिलता है... कौन नहीं! कौन बात करता है कौन नहीं? बीच का अन्तराल कब पंख लगाकर उड़ गया पता ही नहीं चला। अपने परिवार का इकलौता लड़का मैं माँ-पापा की छोड़ी गयी जिम्मेदारियों को पूरा करने में लगा रहा। उस दुःख और अकेलेपन से भरे समय में कभी किसी ने... नहीं पूछा कि तुम कहाँ हो? कैसे हो? सबको लगता था कि मुझे ही फोन करना चाहिए। मुझे ही सबसे मिलना चाहिए। छोटी बुआ ने तो चार पेज का पत्र लिखकर जता दिया था कि मैं और माँ-पापा कहाँ-कहाँ गलत थे। अपने को श्रेष्ठ क्यों समझते थे? अगर मुझमें विनम्रता नहीं आई तो एक दिन ऐसा आयेगा जब 'तुम्हें' कोई पूछने वाला नहीं होगा... तब तुम किसी से मिलना भी चाहोगे तो कोई तुमसे नहीं मिलेगा। तभी से मैंने स्वयं को सबसे अलग कर लिया था। अच्छा ही हुआ था कि मैं सबकी बातों से, दबावों से मुक्त हो गया था। न मुझे किसी के पास जाना था न किसी से बात करनी थी, न किसी की जरूरत थी।... हाँ जब तक नानी थी तब तक मैं महीने, दो महीने में एकाध बार बात कर लेता था। नानी के जाने की सूचना भी उन लोगों ने मुझे नहीं दी थी... सबने खुद ही तय कर लिया था कि मैं नहीं आऊँगा... जबकि नानी की मृत्यु की खबर पाकर मैं पूरे दिन दुःख और अवसाद में डूबा रहा था।
मेरे पास बीस दिन की छुट्टियाँ हैं। बीस दिन काफी होते हैं। पहले जब जाता था तो सबके लिए कुछ न कुछ गिफ्ट लेकर जाता था लेकिन मैंने महसूस किया कि उन गिफ्ट्स की कोई कीमत नहीं थी... पर बाद में समझ में आया था कि पापा सच ही कहते थे कि उतनी ही लम्बी दीवार पर चढ़ो जिससे तुम सुरक्षित कूद सको। मैं तो लम्बी-लम्बी दीवारों पर चढ़ना चाहता था... पर दूसरी तरफ से गिरना तो तय था !
दूसरे दिन की रात्रि। मैं अपने पुराने शहर में खड़ा था। एयरपोर्ट के बाहर टैक्सीवाले खड़े थे, टैक्सी बुकिंग बूथ भी बने थे। 'कहाँ जाना साब', 'कहाँ जाना…’ पूछने वालों की तरफ मैं गौर से देख रहा था। कहाँ जाना है, उन्हें कैसे बताऊँ! क्योंकि जहाँ जाता था वो मकान तो कब का बिक चुका था, गाड़ी तथा सामान भी बेच दिया था। बाकी सामान बाई, माली और ड्राइवर ले गये थे।
अपने ही शहर में पराया बन गया था।
होटल पहुँचकर खाना खाकर लेट गया... पर आँखों में नींद न थी। तीन दिन की थकान थी। शरीर का पोर-पोर दुःख रहा था। फिर भी नींद न थी। जब पापा के पास आता था तो पापा सबसे पहले मुझे बैठाकर लम्बी ड्राइव पर निकल जाते थे। माँ बार-बार फोन लगाती। मैं उठकर नीचे आ गया... सड़क पर। ढलान से नीचे उतरते हुए मुझे अच्छा लग रहा था... कब तक मैं पुलिया पर बैठा रहा, याद नहीं! यहाँ से बड़ी झील का एक हिस्सा दिख रहा था। माँ पापा... आप लोग क्यों इतनी जल्दी चले गये?
मन बेचैनी से भर उठा... उल्टे पाँव रूम की तरफ चल दिया।
सुबह उठा तो नाश्ते का टाइम हो गया था। नहा-धोकर, नाश्ता करके मैंने रवि को फोन लगाया... जानता हूँ इस समय वह सो रहा होगा। मैसेज छोड़ दिया। क्या करूँ, मामा के पास जाऊँ या नहीं? क्या कहूँगा...? पापा के दोस्त... तीन दोस्त जो पापा के बेहद ख़ास थे, सोचा उनसे मिलना चाहिए। दिनभर के लिए टैक्सी बुक की। पहले ब्रजेश अंकल से मिला, फिर राकेश अंकल से और फिर निर्मल अंकल से।
बातों में पता ही नहीं चला कि कब शाम हो गयी। अंकल, आंटी बिना डिनर किए आने ही नहीं दे रहे थे। पूरे परिवार के साथ फोटो निकाले, फोन नम्बर लिखे और दुबारा मिलने का वायदा करके लौटा तो मेरा मन हल्का हो चुका था। पापा को याद करने वाले लोग यानी उनके दोस्त आज भी वैसे ही हैं। राकेश अंकल ने आते-आते पूछा था कि मामा लोग कैसे हैं? उनसे मुलाकात हुई? वहीं रुके हो ना! मैं उनके सामने झूठ नहीं बोल पाया था। उन्होंने सारी बात सुनकर कहा था, "बेटा, आये हो तो एक बार जाकर मिल लो। जो कुछ हुआ था... उसे भूल जाओ। तुम्हें अपनी ड्यूटी निभानी है... बस यही सोचकर चले जाना।"
मैं दस-बारह साल बाद उस रोड पर जा रहा था जहाँ मेरा बचपन बीता था। जिन सड़कों पर दिन में दो बार आना-जाना होता था। उन पर वर्षों बाद आ रहा था। मन कह रहा था न जाऊँ पर राकेश अंकल की बात याद करके आगे बढ़ता जा रहा था...। इस समय सुबह के ग्यारह बज रहे थे, अभी सबको घर में होना चाहिए। घर के सामने टैक्सी रुकी, मेरी निगाह ऊपर से नीचे तक गयी। बगल वाला प्लॉट भी अब बैंगले में शामिल हो गया था। छः गाड़ियाँ लाईन से खड़ी थीं।
"कौन...?"
"मामा! मैं केतन...।"
"अरे इतने साल बाद...!"
"जी...।"
"कब आये हो?"
"कल आया था।"
मामा कोई पेपर देख रहे थे।
"आप कैसे हो?"
"बढ़िया... क्या जॉब कर रहे हो?"
"जी।"
"अरे देखो केतन आया है।" मामा ने जोर से कहा।
थोड़ी देर बाद ही मामी बाहर आई– "तुम तो एकदम बदल गये हो? शादी-वादी की या... वहीं बसने का इरादा है?"
इस बीच नौकर पानी की ट्रे रखकर चला गया था।
"ये लोग...!" मैंने ही पूछा।
"वो लोग ऑफिस के लिए निकल गये हैं।"
मैं चुप। मामा अपने काम में व्यस्त। मामी किसी से बात कर रही थी।
"चाय पियोगे या कुछ ठंडा?"
"अभी नाश्ता करके आ रहा हूँ।"
"कब तक रुके हो?"
"अभी तो एक हफ्ते हूँ। सबसे मिलना है।"
"कुछ लाओ भई।"
नौकर तीन ग्लास जूस ले आया।
सब एक दूसरे का चेहरा देख रहे थे। मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि क्या बोलूँ? ड्राइंगरूम एकदम बदला हुआ था। मुझे लगा मैं बेकार ही आ गया।
"मौसी वगैरह।"
"सब मस्त हैं।"
तभी मामा का फोन आ गया... वे देर तक बात करते रहे... फिर एकाएक उठकर बोले– "मुझे निकलना है, तुम बैठो, फिर मिलते हैं... फोन करके आ जाना।" मैंने जूस गटका और उनके साथ बाहर निकल आया। बाकी सबसे मिलने का मन मर चुका था...। रवि का मिस कॉल था... "कहाँ हो?"
"मामा से मिलने आया हूँ।"
"मैं तुम्हारे रूम के बाहर खड़ा हूँ।"
"आ रहा हूँ।"
रवि को सामने देखकर न जाने क्यों मैं उसके गले लगकर रोने लगा।
"चलो पैकिंग करो।"
"क्यों!"
"तुमने घर बेचा है, मैंने नहीं...।"
मैं चुपचाप सामान पैक करने लगा।
"क्यों गये थे वहाँ... मालूम था कि वे तुम लोगों को पसन्द नहीं करते हैं।"
"मन में ये मलाल तो नहीं रहेगा कि उस शहर में जाकर भी नहीं मिला।"
"टेढ़ी रस्सी कभी सीधी होती है?"
"मैं सही था...।"
"आगे क्या करना है...?"
"दो काम हैं।"
"क्या..?"
"पापा के स्कूल जाना है... जहाँ से उन्होंने शुरूआती पढ़ाई की थी।"
"क्यों!"
"तू चलेगा...?"
"चलूँगा न!"
जब हम दोनों पापा के स्कूल पहुँचे तो दिन के तीन बज रहे थे। सड़क के किनारे बने मैदान में स्कूल था। बाहर से दीवारों का कलर निकल चुका था, पलस्तर झड़ रहा था पर अन्दर का बरामदा और कमरे साफ-सुथरे थे।
प्राचार्य कक्ष में जाकर हम दोनों बैठ गये।
"बताइए।" प्राचार्य ने हम दोनों को उपेक्षित निगाहों से देखते हुए कहा।
"सर, मैं अनूप सोलंकी का बेटा हूँ। यू.एस. में रहता हूँ। मैं पापा के नाम पर एक स्कॉलरशिप शुरू करवाना चाहता हूँ। पापा साइंस के स्टूडेन्ट थे और मैरिट होल्डर भी। वे यहाँ के स्कूल की बहुत तारीफ करते थे। उनका अपने स्कूल से और इस जगह से बहुत लगाव था।"
अब प्राचार्य ने प्रशंसा भरी निगाहों से मेरी तरफ देखा और बोले, "यह अच्छी बात है पर इसकी भी एक प्रक्रिया होती है। अभी यहाँ बोलकर जा रहे हो, दो-चार साल की स्कॉलरशिप के लिए आपने पैसा दे भी दिया, उसके बाद आने वाले सालों में क्या होगा?"
"नहीं सर, मैं चाहता हूँ स्कॉलरशिप परमानेन्ट हो। जो भी उसकी प्रक्रिया है, उसे मैं पूरा करूँगा। जितनी भी राशि होगी, मैं देकर जाऊँगा पर मैं ये काम करके ही जाना चाहता हूँ।"
प्राचार्य ने प्यून से किसी को बुलाने को कहा। उन्होंने सारी नियमावली बतायी। मैंने औपचारिक पत्र लिखकर दिया। फायनल हुआ कि अगले सत्र से ये स्कॉलरशिप शुरू कर दी जायेगी। दूसरे दिन आकर मुझे कुछ पेपर्स पर साइन करने थे और चेक देनी थी।
"अचानक ये ख्याल क्यों आया?"
"यार पापा थे तो इंटेलीजेंट... परिस्थितियों ने उन्हें पैसे से कमजोर बना दिया था। मैं चाहता हूँ उनका नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाये...।"
रवि ने मेरा हाथ थपथपाया... "तू बहुत दूर की सोचता है।"
"यार, कल एक जगह और चलना है... चलेगा?"
"चलेंगे न।"
मैं और रवि आधी रात तक गप्पें लगाते रहे। अपने दोस्तों को याद करते रहे।
"क्या तू कभी वापस नहीं आयेगा?"
"नहीं मालूम।"
"मकान नहीं बेचना था।"
"ठीक है यार... आने का इरादा बना तो फिर खरीद लेंगे।"
दूसरे दिन मैं और रवि प्रदीप अंकल के ऑफिस में बैठे थे।
"अंकल, मैं अनूप सोलंकी का बेटा हूँ। मम्मी-पापा यहाँ के प्रोग्रामों में रेगुलर आते रहते थे। आपकी बहुत तारीफ करते थे।"
"हाँ-हाँ... इतने साल तुम कहाँ रहे... और क्या वापस आ गये हो?"
"नहीं अंकल। बस सबसे मिलने चला आया।"
"बहुत अच्छा किया।"
"अंकल, आपकी संस्था बहुत सारे पुरस्कार देती है।"
"हॉ।"
"मैं माँ के नाम पर एक पुरस्कार शुरू करवाना चाहता हूँ।"
"भावुकता में बोल रहे हो या सचमुच कुछ करना चाहते हो! यहाँ का मामला अलग है। सब कुछ नियम-कायदे से होता है। एकमुश्त राशि जमा करनी होती है, फिर उसके ब्याज का जो पैसा आयेगा... उसमें पुरस्कार की राशि, पुरस्कृत व्यक्ति की आवास व्यवस्था, किराया... स्मृति चिह्न का भी खर्चा आता है। जानते हो न।"
"जी, आप सब कुछ जोड़कर मुझे बता दें। बस मेरी एक ही रिक्वेस्ट है कि मैं उस अवसर पर आना चाहूँगा। आप समझ सकते हैं अंकल, मेरा इमोशनल अटैचमेंट!"
"आप जरूर आएँ, हमें अच्छा लगेगा। आप अन्यथा न लें, मैं आपको स्पष्ट बता रहा हूँ क्योंकि रुपये-पैसे का मामला है। हमारी संस्था पारदर्शी ढंग से सारा काम करती है। पुरस्कार किसको देना है, किस क्षेत्र में देना है, यह हम तय करके आपको बता देंगे। आपका कोई सुझाव हो तो बता दें। आपका पैसा सही जगह सही व्यक्ति को जायेगा, इसकी मैं गारण्टी लेता हूँ। पूरी लिखा-पढ़ी होती है। पैसे... पैसे का हिसाब रखा जाता है।"
"जी अंकल, मैं समझ सकता हूँ।"
"आप कल आ जाइए, चैक लेते आना।"
"जी अंकल....।"
"ये सब करने का मकसद...।" रवि पूछ रहा था।
"पहले झील किनारे चल, वहीं चलकर चाय पीते हुए बात करेंगे। आज बोटिंग करें? मजा आयेगा।"
"चलो।" मैंने और रवि ने बढ़िया चाय पी, फिर बोटिंग की। उसके बाद हम दोनों लंच के लिए शहर से बाहर निकल गये।
"तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया।"
"क्या तू अपने मम्मी-पापा की बेइज्जती सहन कर सकता है?"
"नहीं! मेरे और पापा के इतने झगड़े होते हैं पर जब भी कोई उनसे ऊँची आवाज़ में कुछ बोलता या उन्हें परेशान करता है तो एकमात्र में ही वो बंदा होता हूँ जो उनके लिए लड़ने, मार खाने, गालियाँ खाने के लिए सामने जाकर खड़ा हो जाता है।"
"बस... वही बात है... बचपन से मैंने अपने माँ-पापा को बेइज्जत होते हुए देखा था। तिरस्कार! मखौल ! अलग-थलग करके रखना... क्योंकि पूरे रिश्तेदारों में ये दोनों पैसों से सबसे ज्यादा कमजोर थे। दूसरा ये दोनों स्वार्थी नहीं थे। अपने परिवार के लिए, रिश्तेदारों के लिए आधी रात को खड़े रहते थे... दुनियादारी से अलग थे... तो उन्हें सब बेवकूफ समझते थे। वे दोनों अपने सम्बन्ध किस हद तक निभाते थे, मुझे याद है माँ एक बार सीधे अहमदाबाद से मौसी मी मैरिज एनीवर्सरी में पहुँच गयी। बजाय उनकी तारीफ किये मौसी ने पता है क्या शिकायत की कि माँ को तमीज नहीं है कि पार्टियों में कैसे जाना चाहिए। उन्हें शर्म आ रही थी माँ के यूँ पहुँच जाने पर, जबकि माँ कितने प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़कर काम करती थी। पर तब माँ के नाम पर यह पुरस्कार दिया जायेगा तो उनके जीवन के बारे में बताया जायेगा। तब सबको पता चलेगा कि माँ क्या थी! कितना सम्मान डिजर्व करती थी.... l"
"यार, तेरी सोच को कोई छू नहीं सकता।"
"सोचता हूँ कल पापा के संगठन के लोगों से और भेंट कर लूँ... उन लोगों ने पापा की बहुत देखभाल की थी। उसके बाद पापा जिनको बहुत ज़्यादा मानते थे ताऊजी के बेटे को, जो कोरोना में मर गये थे, वहाँ जाकर उन लोगों को और देख आऊँ। फिर वापसी की तैयारी भी करनी है। तू चल न एकाध जगह घूम आते हैं। मैं वहीं से वापस चला जाऊँगा।"
संगठन के तीन लोग तो जा चुके थे। बाकी जो बचे थे वे भी अब बूढ़े बीमार से लग रहे थे... पर उनके जोश में कोई कमी नहीं आई थी। मुझे उनसे मिलकर, बात करके बहुत अच्छा लगा। क्योंकि ये वो लोग थे, जो फ्री में सबके लिए, सारे काम करते थे। मेरे मन में इन सबके प्रति आज भी उतना ही सम्मान था जितना पापा के समय में था।
दूसरी शाम मैं कार से ही पापा के ताऊजी के बेटे के घर जा पहुँचा। ताऊजी तो अब इस संसार में थे नहीं, हाँ उनका बड़े बेटे का बेटा और बहू अलबत्ता थी। ताई एकदम बूढ़ी हो गयी थी। उनके चेहरे का रंग फीका पड़ गया था। उनकी बहू और उसका बच्चा अजीब सी स्थिति में थे। उदासी भरे माहौल में। न वे बाहर जा सकते थे, न ताई को छोड़ सकते थे। चारों तरफ अजीब सी खामोशी और उदासी छायी थी। घर के सामने के पेड़ काटे जा चुके थे। गाय, बैल, भैंस भी नहीं थी।
"पापा थे, तब तक सम्बन्ध रहे। वे बराबर आते थे। सबकी खबर रखते थे। उनके जाने के बाद हम लोग एकदम अकेले हो गये।"
"मैं भी तो आया हूँ।"
"खानदान के बेटे हो। भूलना आसान नहीं है।"
"भाभी क्या करती है?"
"कुछ नहीं। यहाँ रहकर क्या करेगी?"
"कुछ करवाइए! अभी कितनी उम्र है उनकी? विनीत भइया से आठ-नौ साल छोटी है।"
"बच्चे को पालने की जिम्मेदारी उसी की है।"
"ताई, पापा का आप लोगों से बहुत ज़्यादा लगाव था। हमेशा याद करते रहते थे। आप बताओ... क्या करना है?" मैंने उनका हाथ थामकर कहा।
"बस बेटा, ये बच्चा पढ़-लिख जाये... यही आखिरी निशानी है। खेतीबाडी तो सब अधिया-बटिया पर दी है। हमारा भी भरोसा नहीं है, कब भगवान बुला लें।"
मैं पूरा माहौल देखकर ही घबड़ा गया था। मृत्यु कैसा अभिशाप छोड़कर जाती है... यहाँ आकर मुझे महसूस हो रहा था।
"भाभी, आपसे मेरी ज़्यादा बात नहीं हुई पर विनीत भईया हमारे फेवरेट भाई थे। वे हमारे पास आकर रुकते थे। पापा भी उन्हें बहुत प्यार करते थे। आप मुझे अपने परिवार का ही समझें। वैसे हम हैं तो एक ही खानदान के। आप इसको ठीक से पढ़ाएँ। पैसे की चिंता न करें। उसका चाचा किस दिन काम आयेगा। आप संकोच न करें भाभी। मैं साल में एक बार तो आया ही करूँगा।"
भाभी जिसका नाम 'सुमन' है, फूट-फूटकर रोने लगी "भईया, मम्मी बहुत बुरा व्यवहार करती हैं। लेकिन मैं उन्हें अकेली छोड़कर नहीं जा सकती। इसको पढ़ाना भी जरूरी है। यहाँ की खेती-बाड़ी का हिसाब रखना भी जरूरी है वरना सब छीन-छान लेंगे।"
"आप इसकी पढाई की चिंता मत करो। मेरा नंबर लिख लो। मैं पैसे जमा कर दिया करूँगा। आप भी अपनी तरफ ध्यान दो... आगे कुछ पढ़ना चाहो तो आप भी पढ़ सकती हो, आप भी कोई नौकरी कर सकती हो...।"
"भईया, आपके पापा हमेशा विनीत को डांटकर रखते थे। मुझसे भी बात करते थे... पर उनका जाना, फिर... आपके पापा का. मम्मी का जाना... ऐसे में किससे क्या कहते... बस जी रहे थे...।"
"भाभी...।" दो अजनबी अपने-अपने आँसू पोंछ रहे थे।
एक दिन के बजाय मैं वहाँ दो दिन तक रुक गया... अरसे बाद गाँव आया था। खेतों पर जाकर घंटों बैठा रहता। चिड़ियों को देखता रहता। बच्चों से बातें करता रहता। रवि मुझे छोड़कर चला गया था।
लौटते हुए लगा मैं अकेला कहाँ हूँ, मेरे साथ तो मेरा इतना बड़ा परिवार है... मेरे माँ-पापा ने करोड़ों की दौलत न छोड़ी हो पर लोगों के साथ जुड़कर, उनको अपना बनाकर कैसे चलना चाहिए, ये कला सिखाकर गये थे पापा।
लौटते हुए... मैं महीने गिन रहा था कि अगले साल इसी माह में आऊँगा... और माँ-पापा के जीवन को चमकते हुए सितारों के रूप में देखूँगा। मैं रवि को विदा करते हुए फिर भावुक हो उठा।
"मिलते हैं जल्द।"
"अकेले नहीं... अब अपनी शादी के बारे में भी सोच।"
मैंने रवि को गले लगाया।
"पहुँचकर फोन करना।"
रवि अपने आँसू पोंछ रहा था।
तभी फोन की घंटी बजी।
मैंने फोन उठाया। फोन सुमन भाभी का था। उधर से बंटी की आवाज़ आ रही थी "चाचा, जल्दी लौटकर आना।"
मुझे लगा मेरे जीवन की एक नयी यात्रा आरम्भ हो रही है।
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उर्मिला शिरीष हिंदी की समादृत कथाकार हैं। केन्द्रीय साहित्य अकादमी नई दिल्ली की जनरल कांउसिल की सदस्य। स्पंदन संस्था भोपाल की अध्यक्ष तथा संयोजक।
रचना कर्म : चौदह कहानी संग्रह। तीन उपन्यास। एक साक्षात्कार, एक आलोचना तथा एक जीवनी (गोविन्द मिश्र) की पुस्तक। उर्मिला शिरीष की श्रेष्ठ कहानियाँ, लोकप्रिय कहानियाँ, ग्यारह लंबी कहानियाँ, चयनित कहानियाँ, दस प्रतिनिधि कहानियाँ आदि संकलित। मेरे साक्षात्कार। पाँच कहानी संग्रहों तथा सात अन्य पुस्तकों का सम्पादन
अनुवाद : उपन्यासों का मैथिली, बांग्ला, ओड़िया, अंग्रेजी तथा मराठी में अनु़वाद। कहानियों का अंग्रेजी, ओड़िया, उर्दू, मलयालम, सिंधी, मैथिली, पंजाबी, मराठी, कन्नड़सहित कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद।
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फैलोशिप : भारत सरकार (संस्कृति विभाग) की सीनियर फैलोशिप। धर्मपाल फैलोशिप, धर्मपाल शोधपीठ, भोपाल।
ईमेल : urmilashirish@hotmail.com
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