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पाताल की दुखती रगें
पाताल की दुखती रगें कहानी : तौसीफ़ बरेलवी उसे कई रोज़ से अपने हम नफ़्सों के ख़ून की बू आ रही थी लेकिन वह उस बू के पीछे जा भी नहीं सकता था। हाँ उसके अंदर से एक हौल ज़रूर उठ रही थी कि कुछ बहुत भयानक होने वाला है। पूरा जंगल रोज़ जिन परिंदों कि चहचहाहटों से अपनी सुबह करता था, अब वे आवाज़ें ख़ामोश होने वाली थीं। आख़िर ऐसा भी क्या हो गया था...? वह उस पसरती हुई ख़ामोशी का पता लगाना चाहता था लेकिन उससे कुछ करते नहीं बन रहा था। आख़िर वह कर भी क्या सकता था? अपनों के ख़ून की बू के साथ ही दिल को थर्


प्रेमचंद से संवाद (यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते)
प्रेमचंद से संवाद (यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते) हिमांशु विश्वकर्मा यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते, तो वे भारत से क्या कहते और हम उनसे क्या पूछते? यदि सचमुच मुझे आज प्रेमचंद से मिलने का अवसर मिलता, तो शायद सबसे पहले मैं उनसे यही पूछता- “प्रेमचंद जी, आज का भारत देखकर आपको कैसा लगता है?” वे संभवतः मुस्कुराकर कहते- “भारत बदला है, और बहुत बदला है। विज्ञान आगे बढ़ा है, लोकतंत्र मजबूत हुआ है, शिक्षा का विस्तार हुआ है, तकनीक ने जीवन को नई गति दी है। इन उपलब्धियों पर प्रसन्न होना च


नटनी का बारा
हम आँसुओं में पिघल जाएँ तो नाच और करतब दिखाना कैसे संभव हो? एक जगह से दूसरी जगह जाना कैसे संभव हो? बेवकूफ लड़का! हम में ठहराव खोजता है।


दुनिया में एक शहर है, जिस शहर में पूरी दुनिया मिलती है।
मैच शुरू हुआ तो लगा जैसे इधर से उधर बॉल नहीं झूम रही बल्कि लोगों के दिल खिलाड़ियों के पैरों में अटके हुए हैं। बॉल जितनी बार उछलती, उतनी ही बार लोगों के दिल उछलते और गलों की आवाज़ें किसी कोरस में आसमान तक टप्पे खाने लगतीं। गेंद गोलपोस्ट के पास पहुँचती और पूरा इलाक़ा एक साथ साँस रोक लेता। गोल होने पर ऐसा शोर उठता कि लगता, इस शहर की गगनचुंबी इमारतें भी मुस्कुराने लगती होंगी।


कल्पना मनोरमा की डायरी
याद आई नदी किनारे पड़ी नाव। महीनों पानी से दूर रहने पर उसकी देह सूख जाती होगी। फिर जब उसे दोबारा नदी में उतारा जाएगा तो वह भी एक पल के लिए ठिठकेगी। पानी धीरे-धीरे उसकी लकड़ी में उतरेगा और वह फिर से जी उठेगी।


विनीता बाड़मेरा की डायरी
हर दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है। रात बीत रही है। जनवरी शुरू होती है और बारह महीने बीतते ही दिसंबर आ जाता है। एक साल पूरा खत्म हो जाता है। मन में रह जाती है कसक, बहुत कुछ छूटने की, बीतने की, रीतने की—न चाहते हुए भी।


बेटियाँ धान के पौधे की तरह होती हैं
जैसे ही दीवारों से बेटी की आवाज की प्रतिध्वनि गूंजती है उसका मन कलप उठता है। पिता को कंधे पर कोमल हथेलियों के स्पर्श का एहसास होता है, जैसे बेटी कह रही हो- "पापा, उदास नहीं होते, साल भर कहाँ रह पाता है बसंत।


अम्मी और अतिथि
मुझे ठीक से पता नहीं कि विधवा क्या होती है, लेकिन जब पड़ोसी मुझे "विधवा की बेटी" कहते हैं तब मुझे लगता है कि वह जरूर विधवा होंगी। दूसरे सभी बच्चों के पिता हैं, लेकिन मेरे कोई पिता नहीं हैं। शायद मेरे पिता न होने के साथ माँ के विधवा होने का कोई संबंध हो।


काफ़्का को यहूदी पहचान से आगे पढ़ने की कोशिश
पीएत्रो चिताती की काफ़्का मेरे लिए एक जीवनी से कहीं अधिक है। यह किताब काफ़्का की यहूदी पहचान का निषेध नहीं करती, बल्कि उसे अपनी व्याख्या का केंद्र भी नहीं बनाती। वह काफ़्का को सबसे पहले एक रचनाकार की तरह पढ़ती है—ऐसे रचनाकार की तरह, जिसकी कल्पना अपने समय, अपने समाज और अपनी सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण करके मनुष्य की सार्वभौमिक नियति को छूती है।


दहकते इश्तिहार
उसे पता था कि ये इश्तिहार उसके लिए नहीं हैं। न तो उसका मतदाता पहचान पत्र है और न ही जेब में रुपये।


बाकुम-बाकुम
अपने ब्याह के लिए सूजनी और तकिया खोल, यही दो चीज बनाई। तकिया खोल पर फूल और नाम काढ़े। अपनी बनाई हुई चीजें बहुत सुकून देती हैं। रानी को अहसास हुआ। तकिया पर काढ़े गए फूलों से पहली बार खुशबू आ रही थी। उसने पलट कर नाक से फूलों को छुआ। सच में उसे गुलाब की गंध निकल रही थी। ये कैसे। वो हैरान।


हैडमास्टर हृदयराम
हैडमास्टर हृदय राम की दंडिका पूत-कुपूत की पहचान करवा देती है। जो काबिल होगा, वह टिक जाएगा और लंपट तो भाग ही जाएगा। उनकी दंडिका बिल्कुल हंस न्याय करती। दूध अलग और पानी अलग। उनकी दंडिका सूप की तरह कूड़ा करकट बाहर फेंकती और असल तत्व बचाकर रखती।


अपने-अपने नामवर (सात प्रसंग)
उनकी धोती पीली-सी थी। मैंने सोचा - “क्या नामवर जी नील का प्रयोग नहीं करते। फिर मुझे वे पिता की तरह लगे, मन में सोचा कि कहूं कि लाइए आपके पांव दबा दूँ।”


रामदरश मिश्र : सहजता जहाँ एक काव्य निकष है
रामदरश मिश्र अपने राजनीतिक होने का शोर नहीं करते। उनकी कविताएं भी किसी प्रकार का शोर नहीं करतीं। एक कवि के रूप में वे अपने आरंभिक दिनों से आश्वस्त हैं कि इस तरह का कोई भी शोर अंततः एक साहित्यिक प्रदूषण है।


इस दुनिया को बचाने के लिए
हर घर शुरू में बच्चों वाला घर होता है, फिर धीरे-धीरे बिना बच्चों वाले घर में बदल जाता है। बच्चे बड़े होकर एक नए घर की तलाश में बाहर निकल जाते हैं जहाँ वे अपने खोए हुए बचपन को इत्मीनान से याद कर अपने भीतर जन्मे दु:ख को महसूस कर सकें। यह जीवन की एक नियति है। जीवन का एक निर्धारित क्रम।


कॉटन कैंडी
अब बाँस को साधना वह अच्छी तरह से सीख गया था। माँ कहती कि बाँस को साधना सरल है पर ज़िंदगी को साधने का हुनर बड़ा कठिन है। हालाँकि यह बात उसके समझ में कभी नहीं आई।


कवि प्रभात से दस सवाल
कोई कवि एक समय के बाद अगर लगातार ख़ुद को दोहरा ही रहा है तो इसका मतलब यही है कि वह कवि के रूप में अपनी मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पा रहा है।


इरफ़ान : ख़लिश है ये क्या ख़ला है
यह बात उनके जाने के छः साल बाद भी गले से नीचे नहीं उतरती कि ‘इरफ़ान अब नहीं हैं।’ उनकी फ़िल्में ढूँढ-ढूंढकर देखने का अजीब-सा चस्का चढ़ा हुआ है। बीते सालों में उनके जीवन के दर्जनों काम, जो उनके रहते नज़र में नहीं आए, आज सोशल मीडिया रील्स में काट कर चल रहे हैं।
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