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इरफ़ान : ख़लिश है ये क्या ख़ला है

  • 4 days ago
  • 5 min read


जगहें ख़ाली होती हैं, फिर समय के साथ उनकी भरपाई भी किसी और तरीके से हो जाती है। जगह का ख़ाली होना एक बात है, उसका कभी न भर पाना दूसरी बात। और दूसरी बात का हो जाना बड़ी त्रासदी है। 


इरफ़ान के जाने के बाद की ख़ाली जगह अब भी पूरी तरह ख़ाली है। अब भी विशाल भारद्वाज, तिग्मांशु धूलिया के पास कोई इरफ़ान के आसपास फटकता हुआ भी नहीं दिख पाया है। दोनों अब भी इरफ़ान के बाद की अपनी पहली हिट को तरस रहे हैं। आज के इरफ़ान 2000 के बाद भट्ट कैम्प में उस ख़ास फ्लेवर की तरह यूँ ही नहीं रहे, जिसके फ़िल्म में होने मात्र से फ़िल्म खड़ी होकर दौड़ जाती थी और आज भी रीवाच मे देखी जाती है। 


इस तरह जगह के ख़ाली हो जाने को क्या कहेंगे? अच्छा या बुरा! 


जाने के बाद ही क्यों दिखती है किसी को सही-सही न आँकने की कमी?


शुरुआती सिनेमा और सीरियल में काम करने के दौरान उन्हे कई बार यह बोलकर काम देने से टाल दिया जाता था- ‘यह आदमी सीन खींचता बहुत है,’ ‘इसकी आँखें सूजी हुई हैं’, ‘इसका लुक हीरो जैसा नहीं है’ आदि आदि। भले ही उनके प्रिय मित्र तिग्मांशु की ही बात क्यों न हो, हासिल में इरफ़ान उनकी पहली पसंद नहीं थे। यह अलग बात है सालों बाद तिग्मांशु की फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ से ही उनकी झोली में दो नेशनल अवॉर्ड आए। 


इरफ़ान ने अपनी करियर में कई ऐसी फ़िल्में कीं, जिसमें अच्छा-ख़ासा पैसा देकर खड़ा किया गया मुख्य अभिनेता अपनी साँस फुला लेता है और इरफ़ान के आते ही फिल्म को नई साँस मिल जाती है। गुंडे, द किलर, संडे जैसी कितनी ही फ़िल्में इसका उदाहरण हैं। इरफ़ान का फ़िल्मों का चयन और उनमें जान डाल देना आज भी समझ से परे है। ख़राब से ख़राब फ़िल्में हो सकती हैं लेकिन इरफ़ान पूरे दम में मजबूती के साथ दिखते हैं। 


यह बात उनके जाने के साल बाद भी गले से नीचे नहीं उतरती‌ कि ‘इरफ़ान अब नहीं हैं।’ उनकी फ़िल्में ढूँढ-ढूंढकर देखने का अजीब-सा चस्का चढ़ा हुआ है। बीते सालों में उनके जीवन के दर्जनों काम, जो उनके रहते नज़र में नहीं आए, आज सोशल मीडिया रील्स में काट कर चल रहे हैं। उनकी बोली हुई पंक्तियाँ—भले वे लाइफ ऑफ पाइ की हों, मदारी, कारवां, मक़बूल, पिकू, नेमसेक, बिल्लू, हैदर, गुंडे, रोग या फिर हासिल की हों—रील्स स्क्रॉल करती हुई थकी आँखों में चमक ला देती हैं। ऐसी फ़िल्मों की भी लंबी लाइन है। 


अभिनय के साथ-साथ जीवन के अलग पहलू पर भी इतनी मुखरता से बात करने का माद्दा उनके बाद गिने-चुने अभिनेताओं, कलाकारों में बचा है। उनकी समझ और दुनियादारी की जानकारी के क़िस्से भरे हुए हैं। उनकी दर्जन भर फ़िल्में समाज की बात कहती हुई फ़िल्में हैं। मदारी, लाइफ ऑफ पाई, क़िस्सा, पान सिंह तोमर, तलवार, हासिल जैसी कितनी ही फ़िल्में मुखरता से अपनी बात कहती हैं। इरफ़ान जितने अभिनेता रहे, उतने ही दार्शनिक भी। 


इरफ़ान ने अपने रहते शायद इतनी तारीफ़ हासिल न की हो, इतना यक़ीन हासिल न किया हो, लेकिन जाने के बाद जिस तरह से सिनेमा की दुनिया या सुदूर गाँव में बैठा कोई ग्रामीण, इरफ़ान को आँकता है, मानता है, और उनके करिश्माई काम को याद कर कहता है- ‘ग़ज़ब का एक्टर रहा है यार’!

 

‘इरफ़ान की आँखें क्या ही कहतीं हैं....’ आज भी समझ से परे है। बिखरे, अधूरे से लिखे क़िरदार में भी जान डालना रूह-दार बख़ूबी जानता था। 


नाट्यशास्त्र में आँखों को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। कहा गया है कि : “सर्वेन्द्रियाणां नयनं प्रधानम्” यानि सभी इंद्रियों में नेत्र (आँख) प्रधान हैं। इरफ़ान की आँखें तो बोलती ही हैं, देह भी कुछ न करते हुए भी बहुत बोलती हैं। ‘क़िस्सा’ का वह दृश्य, जिसमे अम्बर सिंह ख़ाली मैदान में खड़े हैं—उनके भीतर घट रहा सब साफ़ दिख जाता है। 


‘मदारी’ का बाप, जब अस्पताल में अपने बेटे के बैग को लेकर छटपटाता हुआ रोता है, उसका रोना भीतर तक सिहरन पैदा कर देता है।‌‘जज्बा’ का संवाद- ‘मोहब्बत थी इसलिए जाने दिया’, और कौन कह सकता है!


इरफ़ान अभिनय की तीनों शर्तों [देह (आंगिक), आँखें (नेत्राभिनय), वाणी (वाचिक) ] में खरे उतरते हैं। उनके गुरु प्रसन्ना के साथ की उनकी बातचीत, अभिनय और जीवन के तारतम्य पर जिस गंभीरता से की गई है, देखने योग्य है। 


अभी कुछ समय पहले, वर्सोवा बीच पर बैठा हुआ था। एक लड़का हताश सा बैठा था (जैसा कि होता ही है, बीच पर या तो हताश या खिले हुए चेहरे दिखते हैं)। जाने क्या ढूँढ रहा था, अंधेरे में चमकते पानी की सतह के ऊपर। बग़ल में बैठे दूसरे उदास लड़के का फ़ोन बजा। रिंगटोन थी- ‘मैंने दिल से कहा, ढूँढ लाना खुशी’, दोनों लड़कों का चेहरा खिल गया। इरफ़ान इसी तरह उदासी को रेत की तरह उड़ा देते हैं। 


देश के बाहर उनके पहले भी कई अभिनेताओ ने काम किया, लेकिन जिस इज़्ज़त और अपनी शर्तों के साथ इरफ़ान का काम दिखता है, उसकी जगह आज भी ख़ाली है। केमियो और हिन्दुस्तानी ड्राइवर, या एजेंट का किरदार कर लेने वाले अभिनेता गुरूर करते होंगे, लेकिन इरफ़ान ने बाहर सिर्फ हिन्दुस्तानी ही नहीं, अलग-अलग जगहों के किरदार भी किए। ‘पजल’ का रॉबर्ट कैसे भुलाया जा सकता है। जब उसमें माटा से रॉबर्ट कहता है- “Life is messy. It doesn't make any goddamn sense. Sorry to break the news to you. Life's just random. Everything's random. My success, you here now. There's nothing we can do to control anything” सीने में उतर जाती है उसकी आँखें। ‘इन्फर्नो’ में सीम्स का किरदार निभाते एकेडमी अवॉर्ड जीते टॉम हैंक्स से किसी भी तरह इरफ़ान कमतर नहीं लगते। उसी फ़िल्म के दौरान भारत आए हैंक्स ने जमकर इनके काम की तारीफ़ की। 


हमारे यहाँ अच्छे अभिनेता हुए हैं, इसमें कोई शक नहीं। अच्छा अभिनेता होना, अच्छा इंसान होना और सबके दिलों में जगह पा लेना अलग बाते हैं। इरफ़ान की क़ब्र आज भी फूलों से सजी होती है, आसपास फूलों की महक होती है, और वहाँ एक अजीब सा सुकून तारी होता है। मैं आज भी वहाँ बैठता हूँ, लाइफ ऑफ पाई का संवाद अपने आप चला आता है। यही तो ज़रिया है, उनसे बात करने का। 


इरफ़ान की अंतिम फिल्म अंग्रेज़ी मीडियम (2020) थी, जिसमें उन्होंने एक पिता की भूमिका निभाई। फिल्म में इरफ़ान का संवाद है-“मैं तुम्हारे साथ हमेशा रहूँगा”।  


वर्सोवा में अभिनय की जुगत मे खपत हो रहे हजारों युवा उदासी में यूं ही इरफ़ान के पास नहीं चले जाते। 


इरफ़ान वाकई मरते नहीं।



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सुमन शेखर युवा कवि हैं।  लेखन के साथ रंगकर्म और अभिनय में निरत। गोल चक्कर पर इनका पूर्व प्रकाशित काम देखिए : सुमन शेखर की कविताएँ


2 Comments


Kumar Arun
3 days ago

'इरफ़ान का क़ब्र आज भी फूलों से सजा होता है' .. किसी केलिए भी बहुत बड़ी बात है यह !

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Guest
4 days ago

Vaah padhakar bahut sukoon mila

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