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रसूल हमज़ातोव की कविताएँ

  • 2 days ago
  • 13 min read


रसूल हमज़ातोव की कविताएँ 
अंग्रेजी से अनुवाद : श्रीविलास सिंह 

सौ स्त्रियां जिन्हें मैं प्रेम करता हूँ 


सौ स्त्रियां जिन्हें मैं प्रेम करता हूँ,

मैं देखा करता हूँ उन सभी को। 

सोते-जागते, बेहोशी में, ऊँची उड़ान में 

किन्तु नहीं कर सकता उन्हें बदनाम। 

एक लड़की जिसे भूल नहीं सकता मैं कभी भी 

जिसने जगाया था आनंद पहली बार मेरे ह्रदय में 

जब जाते हुए जलधारा की ओर, वह मिली थी 

एक नंगे पाँव देहाती लड़के से। 

नहीं लड़की लगती थी कहीं दूर की 

जो न थी बड़ी अपने पानी के बर्तन से। 

शीतल था जल जिसे लेने को 

जलधारा से वह झुकी थी। 

शीतल? नहीं ! वहाँ खड़े हुए महसूस किया था मैंने 

उसने दग्ध कर दी थी मेरी देह और डंक मारा था। 

उसकी दृष्टि कितनी जिज्ञासु और बनावट से मुक्त,

सम्मोहित करती है मुझे आज दिन तक। 


कालांतर में, भटकते हुए यूँ ही 

फाख्ता के धूसर रंग वाले कैस्पियन सागर के तट पर 

मैंने प्यार किया एक लड़की से, पर था बहुत शर्मीला 

दे पाने को दस्तक उसके दरवाज़े पर।

तो बस भटकता रहता था उसके घर के इधर-उधर,

एक प्रेमी पागल सा,

चढ़ जाता हुआ ज़ैतून के वृक्ष पर देखने को 

परदे पर उसकी छाया : 

वह रहती थी दूसरी मंज़िल पर..... 

और अब भी मैं प्रेम करता हूँ उस युवा लड़की को। 


और थी एक और युवा लड़की, जो 

यात्रा कर रही थी मास्को की, रेलगाड़ी से

और इस युवा लड़की को भी 

मुझे अच्छा लगेगा पुनः देखना। 

बुकिंग क्लर्क, मैं हूँ तुम्हारा शुक्रगुज़ार 

कि तुमने उसे सीट दी मेरी बग़ल में 

जिससे हमने देखे दृश्य 

डिब्बे की खिड़की जितने विस्तृत। 

और अपने सारे जीवन, उस लड़की के संग 

मैं ख़ुशी से यात्रा करता रहूँगा इस दुनिया की।


एक नाराज़ लड़की को मैं प्रेम करता हूँ अब भी 

कोई लाभ नहीं होगा कहने का उसके बारे में,

जिसने, गुस्से से पागल हो, कर डाली थी

टुकड़े-टुकड़े मेरी पाण्डुलिपि। 


मैं प्रेम करता हूँ एक और लड़की को अब भी 

ख़ुशी से टिमटिमाती आँखों वाली 

जिसने सैकड़ों बार करके तारीफ़ मेरी कविताओं की 

चढ़ा दिया उन्हें आसमान पर। 

एक द्वेष से भरी लड़की को मैं प्रेम करता हूँ,

और एक सीधी-सादी लड़की को भी,

प्रेम करता हूँ एक पाखंडी लड़की को भी, 

और उसे भी जो बुरा मान जाती है ज़रा सी बात का,

और उसे भी जिसे लगता है यह सब बोरियत भरा,

एक लड़की को जो है बहुत विनम्र,

एक मस्त लड़की को भी मैं प्रेम करता हूँ 

और अग्नि शमन केंद्र को भी। 

हर क़स्बे और गाँव में है एक लड़की 

जिसे मैं करता हूँ प्रेम,

और दर्जनों महिला छात्राओं को 

जो बना देती हैं मेरी अनुभूतियों को रोमांचकारी। 

मैं पुकारता हूँ उन सबको ‘मेरी प्रिय’, ‘मेरी फाख्ता’

निडर और उत्साही उन्माद में—

हैं एक सौ लड़कियां जिन्हें मैं करता हूँ प्रेम 

एक जैसे जूनून से।


तुम क्यों घूर रही हो मुझे ऐसे 

जैसे कोई घूरता है अपने दुश्मन को? 

“तो फिर मैं हूँ उन एक सौ में से एक?

मुझे बताने के लिए शुक्रिया।”


नहीं, नहीं, ठहरो ! सौ, क्या तुम नहीं देख रही 

सब हैं तुम में ही दृष्टिगत। 

एक सौ लड़कियां तुम्हीं हो मेरे लिए

और मैं हूँ केवल तुम्हारा। 

उस समय जब मैं भटक रहा था 

एक देहाती लड़का नंगे पाँव,

यह तुम्हीं थी जिसे मैं मिला था जलधारा के समीप 

जिसने जगाया था मेरे ह्रदय में आनंद। 


और सागर किनारे के उस शहर में 

जहाँ बहा करती थी नमक भरी हवाएँ,

तुम निश्चय ही स्मरण करोगी मुझे,

युवा जो पीछा करता था तुम्हारा। 

तुम निश्चय ही याद करोगी 

भागती हुई ट्रेन के पहियों की आवाज़, जो जा रही थी मास्को?

तुम हो एक में ही सौ लड़कियां, 

और वे सभी हैं आलिंगनबद्ध। 

तुम में मैं पाता हूँ दुःख और आनंद दोनों ही,

ठिठुरता मौसम और बसंत की गरिमा,

कभी-कभी तुम होती हो निस्पृह 

और क्रूर भी, मैं स्वीकार करता हूँ,

और अन्य किसी समय—आज्ञाकारी 

और ह्रदय से सज्जन। 

जहाँ-जहाँ तुमने की कामना उड़ने की 

मैंने अनुगमन किया तुम्हारे हर क़दम का। 

जिस किसी चीज़ की, की तुमने कल्पना

मैंने अर्जित की तुम्हारे लिए। 

हमने देखीं मौन पहाड़ियाँ,

जहाँ बादल आलिंगन करते हैं झाड़ियों का,

और तमाम कौशल से आपूरित शहरों को 

गए हम साथ-साथ। 

हैं एक सौ लड़कियां जिन्हें मैं प्रेम करता हूँ,

सभी को समान आवेग के साथ...... 

यह तुम हो जिसे मैं पुकारता हूँ ‘मेरी प्रिय’, ‘मेरी फाख्ता’

निडर और उत्साहपूर्ण पागलपन में। 


सच है, मैं प्रेम करता हूँ एक सौ लड़कियों को,

किन्तु उनमें से हर एक तुम ही हो !


(1964)



सुबह और शाम, अंधकार और प्रकाश 


सुबह और शाम, अंधकार और प्रकाश-

काले मछुआरे और गोरे मछुआरे। 

दुनिया है एक समुद्र की मानिंद; मछलियों की भांति हैं हम,

उन मछलियों की भांति जो तैरती हैं सागर की गहराइयों में। 


दुनिया है समुद्र की भांति जहाँ मछुआरे हैं प्रतीक्षारत,

तैयार करते अपने जाल, अपने काँटे और अपना चारा। 

ओ समय, फिर कितने शीघ्र तुम ले कर आओगे मेरा अंत 

रात्रि के जाल में अथवा दिन के चारा लगे काँटे के साथ। 


(1964)


 

दागिस्तान से एक गीत..


कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि सैनिक, 

जो कभी नहीं आए वापस 

हम तक रक्तरंजित मैदानों से,

बच न पाए युद्ध भूमि से और कर न पाए पार नदी को,

लेकिन इसकी जगह जो बदल गए श्वेत चीखते सारसों में। 


और उस समय से उड़ रहा है वह झुण्ड- संकरी 

या चौड़ी, अथवा लम्बी पंक्ति में- और सम्भवतः इसी कारण 

अक्सर और आकस्मिक शोक के साथ 

हम रुक जाते हैं एकाएक, देखते हुए आकाश की ओर। 


उड़ते हैं त्रिभुजाकार झुंड अतिक्रमण करते प्रत्येक सीमा का-

एक दुःखी संरचना, सा-रे-गा-मा की श्रेणियाँ, 

और एक रिक्ति है उनकी खुली पंक्तियों में : 

क्या यही है वह स्थान जो उन्होंने आरक्षित रखा है मेरे लिए। 


वह दिन भी आएगा : साँझ के बादलों के नीचे 

मैं उडूंगा, सारस होंगे मेरे दाहिने, मेरे बाएं 

और उन्हीं जैसी एक तीखी और तीव्र आवाज़ में,

पुकारूंगा, पुकारूंगा उन्हें जो हैं धरती पर 

कि जा चुका हूँ मैं। 


(1968)



दहलीज़ पर बारिश 


होती है दहलीज़ पर बरसात- 

चकित, मैं स्वप्न देखता हूँ तुम्हारा,

चोटियों पर गिरती है बर्फ़- 

चकित, मैं स्वप्न देखता हूँ तुम्हारा। 

भोर का निरभ्र आकाश- 

चकित, मैं स्वप्न देखता हूँ तुम्हारा,

गर्मियों के अनाज के खेत- 

चकित, मैं स्वप्न देखता हूँ तुम्हारा। 

अबाबीलें गोता लगातीं, उड़ान भरतीं लम्बवत- 

चकित, मैं स्वप्न देखता हूँ तुम्हारा,

इकट्ठे होते और अलग होते- 

चकित, मैं स्वप्न देखता हूँ तुम्हारा।

पत्तियां जो हिलती हैं और घूमती हैं हवा से, 

पत्तियां जो चमकती हैं ओस की बूंदों से 

नहीं देतीं मुझे कोई राहत- 

चकित, मैं स्वप्न देखता हूँ तुम्हारा।

निश्चय ही तुम हो उन सब से बेहतर लड़की 

जिन्हें मैं जानता था 

तभी सारे दिन और सारी रात- 

चकित, मैं स्वप्न देखता हूँ तुम्हारा। 


(1968)



ओ समय, तुम पीछा कर रहे मेरा आतंक के सिपाहियों संग 


ओ समय, तुम पीछा कर रहे मेरा आतंक के सिपाहियों संग

पीड़ादायक खुलासे, अनादर, बेचैनी;

आज तुम आरोपित कर रहे मुझे कल की ग़लतियों के लिए 

और ध्वस्त कर दे रहे मेरे भ्रम रेत के क़िलों की भांति। 


कौन जानता था कि इतनी आसानी से ध्वस्त हो जाएँगे पुराने सत्य?

फिर तुम क्यों हँसते हो मुझ पर, इतनी कठोरता क्यों?

मैंने उन्हीं बातों में गलतियाँ कीं जहाँ गलत थे तुम भी,

दोहराते हुए तुम्हारे शब्द अपनी उन्मत्त अंधता में!


(1968)



उनमें से भी कुछ जिनके पास हैं अधिकतम… 


उनमें से भी कुछ जिनके पास है 

अधिकतम बस पाँच मिनट का संक्षिप्त समय 

शेष जीने को- और अधिक नहीं ,

पसंद-नापसंद करते हैं बिना एक क्षण के विश्राम के 

मानो उनके पास अभी शेष हों सैकड़ों वर्ष जीने के लिए,


जब बर्फीली चोटियाँ, समवयस्क सृजन में,

मौन कठोरता से क्षुद्र मानव हेतु,

खड़ी हैं जमी हुई स्थिर शोकपूर्ण अपेक्षा में 

जैसे बस पाँच और मिनट हों शेष उनके जीवन के। 


(1968)  



मेरा बड़ा भाई बारह साल पहले मर गया...


मेरा बड़ा भाई बारह साल पहले मर गया 

स्टालिनग्राद के युद्ध के मैदान में। 


किन्तु मेरी वृद्ध माँ अब भी सहेजे है अपना शोक

और घर में फिरती है विलाप के कपड़ों में। 


मेरे लिए है पीड़ा और कड़वाहट 

यह जानने में कि अब मैं उससे अधिक उम्र का हूँ। 



एक लड़का जो कभी रहता था हमारे गाँव में...


एक लड़का जो कभी रहता था हमारे गाँव में,

उसकी थी नवयौवना दुल्हन, गहरे काले केशों वाली 

ठीक उसी वर्ष जब वे दोनों हुए बीस के, 

शुरू हुआ युद्ध, और छीन ले गया उसे उसकी सुन्दर दुल्हन से। 


नायक की दुल्हन है अब नायक की विधवा,

भूरे हो गए हैं उसके केश, उसकी आँखों ने खो दी है अपनी आग;

उनका पुत्र, जो धारण करता है अपने पिता का बेशक़ीमती नाम 

आज अधिक उम्र का है अपने शहीद पिता से। 


(1964)



मित्रता


तुम जी चुके हो लम्बा जीवन, अब भी संतुष्ट 

बचाने को तुम्हें जीवन के झंझावातों से 

तुम नाम नहीं ले सकते एक भी मित्र का 

जिसके लिए गर्माहट हो तुम्हारे एकाकी ह्रदय में। 


जब गुज़र चुके होंगे वर्ष 

और तुम हो गए होगे वृद्ध 

लोग मुड़ेंगे और कहेंगे : 

“यहाँ रहता था एक व्यक्ति, एक शताब्दी पुराना, बेचारा 

जो कभी न जिया एक दिन के लिए भी।”


(1957)



बंद करो डींगें मारना, समय, कि मनुष्य और कुछ नहीं बस हैं तुम्हारी परछाइयां.....  


बंद करो डींगें मारना, समय, 

कि मनुष्य और कुछ नहीं बस हैं तुम्हारी परछाइयां,

कि उनका समस्त वैभव प्रतिबिंबित करता है तुम्हारे वैभव को। 

ये लोग जो उधार देते हैं अपना यश तुम्हारे युगों को,

ये मनुष्य जगमग कर देते हैं समय को अपनी प्रसिद्धि से। 


आभारी रहो कवि के, विचारकों के, नायकों के 

जो डालते हैं हम पर आत्मा और मस्तिष्क का प्रकाश। 

किसी युग की सर्वकालिक प्रतिभा 

प्रस्फुटित होती है मानवता की मशालों से। 


(1964)



मेरा दाग़िस्तान 


जब मैंने यात्रा की कई देशों की,

थका हुआ, घर से विदा के पश्चात

मैं वापस भेज दिया गया,

झुके हुए मुझ पर पूछा दाग़िस्तान ने :

‘क्या तुम पहुँच गए थे दूर वाले छोर तक?’


पर्वतों पर, जिन पर मैं चढ़ा था और ऊंचाई से, 

भर कर सीने भर गहरी सांस, दाग़िस्तान ने दिया जवाब : 

‘बहुत से छोर देखे मैंने पर तुम हो 

सबसे प्रिय अब भी रोशनी में।’


कसम से हो सकता है मैंने किया हो प्रेम तुम्हें कभी ही,

नहीं हूँ नया प्रेम के लिए, लेकिन यह भी कसम खाऊंगा कि यह नहीं है नया,

ख़ामोशी से, मैं करता हूँ प्रेम, क्योंकि मैं हूँ भयभीत : 

सैकड़ों बार दोहराया गया शब्द ढक लेगा। 


और यदि इन स्थानों का कोई पुत्र

चिल्लाता है तुम पर, सूचना की भांति कि कसम खायेगा प्रेम,

फिर यह परेशान करेगा तुम्हारी पत्थर की चट्टानों को 

सुनने को और जवाब देने को दूर प्रतिध्वनि द्वारा। 


जब तुम डूबे हुए थे आँसुओं और रक्त में 

तुम्हारे पुत्र, कुछ थोड़े कि कहूं तो, गए मृत्यु तक, 

पुत्रवत प्रेम की सौगंध के साथ 

खंजर से ध्वनित वह क्रूर गीत।


और बाद में, जब शांत हो गया था युद्ध,

तुम्हारे लिए, मेरे दाग़िस्तान, वास्तविक प्रेम में 

तुम्हारे चुप और शांत पुत्रों ने शपथ ली 

खड़खड़ाते सर्कस और घनघनाते चरागाहों से। 


सदियों तक तुमने किया अध्ययन सब कुछ 

और मुझे नहीं शोर भरा काम करना और जीना, 

लेकिन दुस्साहस किया तुमने कि 

शब्द है अधिक प्रिय एक घोड़े की तुलना में,

और पर्वतारोही नहीं बांधते काठी अपने घोड़ों पर बिना किसी कारण के   


और अब भी जाता हूँ, अजनबियों के यहाँ से लौट कर,

दूर दराज़ की बातूनी और फर्ज़ी राजधानियों से,

मुश्किल होगा मेरे लिए चुप रहना 

तुम्हारी आवाज़ गुनगुनाती धाराओं और गर्वीले पर्वतों की। 



वहाँ हों तीन गीत…


वहाँ हों तीन गीत जो भर देते हैं रोमांच से

मनुष्य का वक्ष 

तीन गीत आप्लावित मनुष्य के शोक और आनंद से।

उनमें से एक है औरों से अधिक ख़ुशियाँ लिए हुए-

गीत जो गाती है माँ पालने के पास बैठी हुई।


दूसरा भी गाया जाता है माँ द्वारा ही-

दुलारते शीतल गालों को विलाप करती उँगलियों से,

वह गाती है इसे पुत्र की क़ब्र के पास।


तीसरा गीत गाते हैं अन्य तमाम गायक।



मेरी माँ के लिए 


बचपन में 

मैं था शरारती,

बहुत डाँट खाई थी मैंने,

किंतु आते ही वयस्क दृढ़ता, 

शांति से त्याग दी मैंने सारी शिकायतें।


मानते हुए अपनी क्षमताओं को बेहतरीन 

मैंने किया नहीं पलायन कभी नियति से।

फिर भी मैं अब आता हूँ तुम तक शर्माता

किसी बच्चे की भाँति, हिचकिचाता हुआ।


अब हम हैं अकेले साथ-साथ,

मैं व्यक्त करूँगा अपने हृदय की पीड़ा।

और रख दूँगा अपना वृद्ध हो चला सिर 

तुम्हारी कोमल हथेलियों में।


मैं रहा हूँ एक उद्दंड, गरिमाविहीन

क़ैदी अपनी सनक का!

मैंने नहीं दिया पर्याप्त ध्यान 

तुम पर, मेरी माँ।


तब मैं सुखपूर्वक लूट में व्यस्त था 

जब मैंने सुनी हृदय की एक गहरी आह :

क्या मैं वास्तव में भूल रहा था 

अकेली छूट गयी अपनी वृद्ध माँ को।


व्यग्रता से, पर बिना किसी आक्षेप के

देखा तुमने मेरी ओर स्नेह से,

तुम ने भरी आह और एक कोमल 

आँसू टपक गया अकस्मात्।


जैसे एक तारा क्षितिज पर 

भागता हो अपने अंतिम लक्ष्य की ओर,

तुम्हारी हथेलियों में तुम्हारा यह बच्चा 

ग्लानिवश धर देता है अपना थका, वृद्ध मस्तक।



मैं वापस आ गया हूँ…


मैं वापस आ गया हूँ…

मैं वापस आ गया हूँ,

सौ वर्षों पश्चात्

इस धरती के एक अंधेरे से।

पलकें झपक गयी हैं देख कर प्रकाश को।

थोड़ी सी स्मृति है मुझे अपने ग्रह की..

अकस्मात् मैं सुनता हूँ :

सरसराती है घास,

सरिता में है जल का जीवंत प्रवाह।


“प्रेम करता हूँ तुम्हें !” शब्द ध्वनि करते हैं 

और जगमगाते हैं, मत पड़ जाओ पुराने…

बीत चुकी है सहस्त्राब्दी।

मैं पुनः वापस आ चुका हूँ धरती पर।

हर वस्तु जो मुझे स्मरण थी, ढक चुकी है 

किसी और समय की रेत से।

किंतु जाओ जैसे होती जाती है 

मद्धिम अग्नि किसी तारे की,

जान कर कि शीघ्र ही आने को है सूर्य।

और लोग-

आजकल भी-

पड़ जाते हैं प्रेम और घृणा में…


मैं चला गया था और आ गया वापस पुनः

छोड़ कर एक अनंत अपने पीछे।

दुनिया बदल गयी है जड़ों तक।

यह सब कुछ अतिक्रमित है एक नवीन आकांक्षा से।

किंतु जो भी हो-

सर्दियाँ हैं श्वेत।

किसी घास के मैदान में चमकते है फूल उनींदे से।

प्रेम वैसा ही बना रहा है जैसा था 

और झगड़े भी हैं वैसे ही बने हुए।



तुम्हारी आँखें 


मैंने देखा तुम्हारी आँखें हैं अलग सी :

जब होती है एक ख़ामोशी सी उनमें,

जब होता है एक तूफान,

जब वे होती हैं ग्रीष्म के दिन के प्रकाश सी

जब वे होती हैं रात्रि की कालिमा सी काली

जब वे होती हैं किसी पहाड़ी झील सी,

भौंहों के नीचे से देखती एक अदृश्य दृष्टि

मैंने देखा उन्हें जब वे स्वप्न देखती हैं किसी चीज़ का,

जब वे लम्बी बरौनियाँ छिपाती हैं 

इन्हें एक हँसी द्वारा, मैंने देखा है इसे घटित होते हुए।


एक उदासी से, थका हुआ दिखने से

मेरी पंक्ति की एक ढलान से…

वे उड़ा ले गयीं स्पष्टता और शांति 

मेरी बेचैन न होने वाली आँखों से-

और मैं हूँ अजब, 

मैं गाता हूँ उनके लिए बारम्बार।



मैं स्वीकार करता हूँ : मैं सोचता हूँ कभी-कभी 


मैं स्वीकार करता हूँ : मैं सोचता हूँ कभी-कभी,

जैसे कि पुनर्जीवित हो गए हम तुम्हारे साथ 

प्राचीन कहानियों से, जिनमें नायक

दंडित किए जाते हैं मरने को प्रेम में।


प्रेम कसा हुआ अपने जाल में 

यह जलता है प्रेम करने वालों की अग्नि से

प्रिय हंस रहता नहीं जीवित अधिक समय तक 

मात्र घृणित कौए ही जीते हैं तीन शताब्दियों तक।


वृद्ध होना नहीं है नियति में हंस की, 

किंतु वह प्रेम में जीता है अपना संक्षिप्त जीवन 

और विलाप करता है हंस गीत में 

वह है कुछ और प्रसन्न कि कौए हैं अब भी दूर।


दी गयी हैं कम से कम तीन शताब्दियाँ कौवों को 

जीने को इस दुनिया में  लुत्फ़ लेते हुए शवों का।



मित्रों को बचाओ


मित्रों को बचाओ 

मेरे मित्र जानो क़ीमत शत्रुता की और दोस्ती की 

और मत करो अंगीकार पाप को जल्दबाज़ी में 

मित्र से क्रोध, हो सकता है तात्कालिक 

मत करो शीघ्रता प्रगट करने की।


संभवतः तुम्हारे मित्र ने स्वयं कर दी जल्दबाज़ी 

और बुरा लग गया तुम्हें ।

मित्र था दोषी और स्वीकार कर लिया उसने-

उसका एक पाप जो स्मरण नहीं है तुम को।


लोगो, हम वृद्ध होते हैं और क्षय हो जाते हैं,

और हमारे वर्षों और दिवसों की धारा में 

जितनी आसानी से हम खो देते हैं मित्र 

उन्हें पाते हैं हम उतनी ही मुश्किल से।


यदि स्वामिभक्त अश्व लड़खड़ा जाए अकस्मात् और पुनः पुनः  

पाँव के घायल हो जाने से

दोष मत दो उसे, दोष दो रास्ते को 

और मत करो शीघ्रता घोड़े को बदलने की।


लोगो, मैं पूछता हूँ तुम से, ईश्वर के लिए,

मत हिचकिचाओ अपनी कृपालुता के लिए।

इतने अधिक नहीं हैं मित्र पृथ्वी पर :

डरो मित्रों को खोने से।


मैं चिपका रहा औरों के नियमों से

कमज़ोरी में देख कर घृणा को।

मेरे जीवन में बचे हैं कितने मित्र,

मुझसे दूर चले गए कितने ही मित्र।


बाद में घटित होता है बहुत कुछ 

और घटित हुआ भी आकस्मिक रूप से 

मैंने अफ़सोस किया, जो नहीं था पर्याप्त 

मेरे लिए मैंने खो दिए अपने मित्र !


और अब मैं तुम सब में देखता हूँ तृष्णा 

जो करते थे मुझे प्रेम कुछ समय पूर्व तक,

नहीं किए गए माफ़ मेरे द्वारा 

अथवा जिन्होंने नहीं किया मुझे क्षमा।



क्योंकि मैं जानता था उस बात को लम्बे समय से 


क्योंकि मैं जानता था उस बात को लम्बे समय से

किसी शब्द में है विश्वास काग़ज़ के एक टुकड़े से भी कम 

मैं लिखता हूँ—

“दिया हुआ है कि वर्तमान में 

मैं करूँ प्रेम वफ़ादारी और दृढ़ता से।

मैं स्वीकार करूँ अंत तक 

अनिच्छा से तुम्हारे प्रिय को 

क्या होगा मेरे अस्वीकृत न किए जाने योग्य आवेग का 

हर दिवस होता जा था अधिक गर्म और अधिक कठोर।”


और प्राचीन काल से ही, 

सच में प्रेम करने पर 

किस कारण से होता है संदेह 

मैं हस्ताक्षरित करता ही यह निबंध 

सम्मान शीर्षक है- “आपको प्यार”

दे देता हूँ इसे अनंत के भंडार हेतु 

तुम्हें, लगा कर एक गोल मुहर।



मेरे बच्चे का प्रकाश करता है प्रकाशित 


मेरे बच्चे का प्रकाश करता है प्रकाशित 

हर कोई सो रहा है घर में,

बस सो नहीं सकता मैं अकेला 

मैं झुकता हूँ तुम पर जब सोए हो तुम 

कहने को पुनः, “मैं प्रेम करता हूँ तुम्हें !”

और मेरे दिन थे मधुर और मधुर 

किंतु जब मैं हो गया कुछ वृद्ध, 

मैं पाता हूँ स्वयं को ऐसा करते 

जो मैं दोहराता हूँ अब अक्सर 

वही एक बात, “मैं प्रेम करता हूँ तुम्हें !”

और मैं, कभी-कभी एक पापी अनैतिकतावश 

मैं प्रार्थना करता हूँ मात्र एक चीज़ के लिए :

मत सोचो कि विभ्रमित हूँ मैं

झूठ बोलता इस स्वीकारोक्ति के साथ :

“मैं प्रेम करता हूँ तुम्हें !”

और मेरा एकमात्र, मेरा वास्तविक

मात्र यह छंद : “मैं प्रेम करता हूँ तुम्हें !”



तीन स्त्रियां 


जब मैं चला 

मैंने चुम्बन लिया तीन स्त्रियों का 

छतनार वृक्ष के नीचे 

खड़ी एक ने कहा : 

“यदि तुम भूल गए,

मैं नहीं बहाऊँगी एक भी आँसू तुम्हारे लिए !”

दूसरी ने कमर पर घड़ा रखे

दरवाजे पर खड़े हुए कहा मुझसे : 

“जल्दी वापस आना, अलविदा !”

तीसरी ने खड़े-खड़े बस एक आह भरी। 

पहली को जल्दी ही भूल गया 

चकदार आसमानों के नीचे।

दूसरी को मैंने याद रखा 

बस अगली सुबह होने तक। 

मैं गुज़रता रहा, चलता रहा बहुत सारे रास्तों पर 

और सुस्ती के समय उत्प्रेरित करता घोड़े को 

क्योंकि सदैव ही मेरा पीछा करती रहीं   

स्मृतियाँ तीसरी की।

पहली, झगड़ालू, थी छत पर 

मुझे सरपट जाते देखने को। 

दूसरी, सुशील और मुस्कराती हुई, ने दिया 

मुझे जल झरने से। 

तीसरी नहीं थी, कहीं न थी दिखाई पड़ती,

उसकी अनुपस्थिति वहाँ हुई मुझे महसूस,

और वही थी वह स्त्री जिसके बारे में 

देखता हूँ मैं स्वप्न- 

तीसरी जिसका मैंने चुम्बन लिया।   


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रसूल हमज़ातोव (1923-2003) का जन्म उत्तर-पूर्वी काकेसस के एक अवार गाँव तसादा में हुआ। उनके पिता हमज़ात तसादासा एक अवार लोक कवि थे। रसूल हमज़ातोव अवार बोली के जाने-माने कवियों में गिने जाते हैं। उन की कविता 'ज़ुरावली' सारे रूस में गा‌ई जाती है। हिंदी जगत में कविताओं के अतिरिक्त उनकी गद्य रचना 'मेरा दागिस्तान' बहुप्रशंसित है।



श्रीविलास सिंह वरिष्ठ कवि, गद्यकार एवं अनुवादक हैं। गोल चक्कर पर इनका पूर्व प्रकाशित काम देखिए : पतंगबाज़ (अफ़ग़ान कहानी), बिल्लियों का क़स्बा, वृद्ध स्त्री की त्चचामहमूद दरवेश की कविताएँ, केन का मेमना 







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