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विगत की व्याधि
आहिस्ता-आहिस्ता कमर से चढ़ती हुई गर्दन के करीब आते-आते ठीक उन दिनों के जैसे उनकी देह गंध ने पीछे से उसे अपनी आगोश में भर लिया। मसालों में लिपटी हुई तेल-घी की मिश्रित गंध हमेशा की तरह उसकी दाईं ओर से तीक्ष्ण हो गई।


रवि राहगीर की कविता
माड़ की छोरियाँ
प्यार करने की तगड़ी सजा पाती हैं
कूटी जाती हैं
पीटी जाती हैं
उन्हें डाँट पिलाई जाती है :
“छोरी तू तो हमारा नाम डुबाकर छोड़ेगी
खानदान को कतई पैंदे में ले जाएगी।”


दहकते इश्तिहार
उसे पता था कि ये इश्तिहार उसके लिए नहीं हैं। न तो उसका मतदाता पहचान पत्र है और न ही जेब में रुपये।


बाकुम-बाकुम
अपने ब्याह के लिए सूजनी और तकिया खोल, यही दो चीज बनाई। तकिया खोल पर फूल और नाम काढ़े। अपनी बनाई हुई चीजें बहुत सुकून देती हैं। रानी को अहसास हुआ। तकिया पर काढ़े गए फूलों से पहली बार खुशबू आ रही थी। उसने पलट कर नाक से फूलों को छुआ। सच में उसे गुलाब की गंध निकल रही थी। ये कैसे। वो हैरान।


हैडमास्टर हृदयराम
हैडमास्टर हृदय राम की दंडिका पूत-कुपूत की पहचान करवा देती है। जो काबिल होगा, वह टिक जाएगा और लंपट तो भाग ही जाएगा। उनकी दंडिका बिल्कुल हंस न्याय करती। दूध अलग और पानी अलग। उनकी दंडिका सूप की तरह कूड़ा करकट बाहर फेंकती और असल तत्व बचाकर रखती।


लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताएँ
चूल्हे की राख-सा
नीला पड़ गया है मेरे मन का आकाश
तभी तुम झम से आती हो
जलकुंभी के नीले फूलों जैसी खिली-खिली
तुम्हें देखकर पिघलने लगते हैं
दुनिया की कठोरता से सिकुड़े
मेरे सपनों के हिमखंड।


कवि प्रभात से दस सवाल
कोई कवि एक समय के बाद अगर लगातार ख़ुद को दोहरा ही रहा है तो इसका मतलब यही है कि वह कवि के रूप में अपनी मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पा रहा है।


रसूल हमज़ातोव की कविताएँ
बुकिंग क्लर्क, मैं हूँ तुम्हारा शुक्रगुज़ार
कि तुमने उसे सीट दी मेरी बग़ल में
जिससे हमने देखे दृश्य
डिब्बे की खिड़की जितने विस्तृत।




ध्यान सिंह की कविताएँ
मैं गुलशन नहीं हूँ।
यह तस्दीक़ तो
मेरा आलोचक ही कर सकता है।
आलोचक :
जो पतझड़ की प्रतीक्षा कर रहा है।




हाइकु : क्षण भर में रोमांच का अनुभव
इस जटिल, आपाधापी की दुनिया में जब लंबी, खाली शामें हमें मुहैया नहीं हैं, तब हाइकु के माध्यम से क्षण में रोमांच खोजना हम सीख सकते हैं। इनमें प्रयुक्त बिम्ब, उनकी क्षणिकता हमें हमारे चारों ओर फैले साधारण दृश्यों को सराहने, कभी उनसे आश्चर्यचकित होने, कभी उनसे उपजी ऊब से परहेज़ न करने, कभी किसी कठोर दिन में सहज बने रहने के लिए प्रेरित कर सकते हैं


हिमांशु विश्वकर्मा की कविताएँ
जान हथेलियों पर रख
पहाड़ पर अगर
बन्दूक़ से
भालू मार गिराना है
तो ढलान की तरफ़
भागना होगा


रुत बरसन की आई (बारिशें और रेगिस्तान)
जब बरसने लगता है गरज-गरज कर तो बुढ़िया माई के चेहरे पर उतर आती है दंतविहीन मुस्कान। वह चारपाई पर बैठे-बैठे उसी मुस्कान संग देखती रहती है बच्चों के पानी के साथ छपाक-छप के करतब।


मोहन सिंह की कविताएँ
बर्फ़ गिर रही है...
पर इस बार इसके फाहे
रुई की तरह,
स्त्री के ओठों की तरह
नर्म, निग्घे और कोमल नहीं हैं




देवभूमि बनाम भूतभूमि
वक़्त बीतने के साथ उत्तराखंड के गाँवों से लोग पलायन करने लगे। गाँव ख़ाली होते गए और अब गाँवों में देवता ज़्यादा और लोग कम रह गए हैं।


लखमीचंद की रागिनियां
पीस पकाकर खिलाना, दिन भर ईख निराना
साँझ पड़े घर आना, गया सूख बदन का खून
निगोड़े ईख तूने खूब सताई रे


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