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माँ की बातें (संस्मरण)

  • 20 minutes ago
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चिड़िया+ श्वास= माँ


यहाँ ब्रिटेन में गर्मी की शाम 9:26 बजे उसी तरह ढलती है जिस तरह गर्मी की ऋतुओं में समूचे उत्तरी भारत में 7 बजे की शाम। इस चिड़िया की शाम की चहक जो शनैः शनैः गीत बन जाती है, अल सुबह सूरज की किरणों के पृथ्वी के चरण स्पर्श की बेला में भी सुनी जा सकती है—बिल्कुल एक ही राग, आलाप और अवधि में। बाक़ी पूरे दिन इसका नामो निशान नहीं मिलता। बिल्कुल ऐसे जैसे बचपन, वयस्क और परिपक्व वयस्क होने की श्वासों के आरोह-अवरोह पर एक समुद्र की लहर की तरह एक बिंदु तक माँ की छवि प्रकट होती है और फिर पीछे हटती जैसे वहाँ कभी थी ही नहीं। आती हुई श्वास पर माँ हृदय से एकाकार होने आगे आती हैं लेकिन अगले ही क्षण अवरोही श्वास की पीठ पर बैठ कर विलुप्त हो जाती हैं। 


मैं जब यह सब कह रही थी उस ख़ास मित्र से जिसने खो दिया है अपनी माँ को अभी-अभी बिल्कुल मेरी तरह, तो चंद सेकण्ड ऐसे बीते जैसे मेरे अंदर की श्वास नहीं, बल्कि बाहर वातावरण में वायु अनुपस्थित हो गयी। झटके से मुझे याद आया कि इस चिड़िया को पहली बार मैंने उसी दिन सुना था जब माँ के असमय देहावसान की सूचना मेरे कानों को अविश्वसनीय लगी थी। एक अज्ञात भय के शिकंजे में मैं जकड़ गई थी। लेकिन इस चिड़िया की सदा मेरे लगातार क़रीब आती गयी थी। मेरे लिए वह अदृश्य ही बनी रही थी लेकिन उसकी चहक मुझे अपनी देह के अंदर से आती हुई प्रतीत होने लगी थी। यह क्या था, मैं उस समय बिल्कुल नहीं समझी थी लेकिन अब समझ गयी हूँ क्योंकि दिन के इस पहर में उस चिड़िया की चहक फिर सुनाई दी है और मेरी ठहर गयी श्वास फिर चल पड़ी है। फ़ोन पर मेरी बात सुनते हुए मेरी मित्र ने आश्चर्य मिश्रित घबराहट में कहा- "पता नहीं क्यों मेरी देह से मुझे भी चिड़िया की आवाज़ आ रही है"।



होली की आहट


होली की आहट होने लगती थी,जब हवा का मौसम बदलता था। बेटी के मन में उत्साह की हिलोर के साथ डर की पदचाप का संयोजन हो जाता था। गोया कि मार्च का महीना परीक्षाओं का हुआ करता है। एक अजब सी अनुभूति हर समय उसके हृदय से लिपटी रहती थी, जिसे शब्दों में अभिव्यक्त करना उसे नहीं आता था।


माँ उसे चुपके से देख लेतीं थीं जबकि वह सोचती थी कि अभी तो माँ चौके में काम कर रही हैं और मैं आंगन में जाकर आईना लिए बैठी हूँ। मेरे इस गुम होने में सिर्फ़ मैं ही मैं हूँ, और कोई नहीं! इस तरह से आराम से उसके विचारों की रेलगाड़ी बाएं से दाएं और दाएं से बाएं मस्तिष्क में जाती रहती... कि तभी माँ की आवाज़ से जैसे उसमें ब्रेक लग जाता-"क्यों! फिर खींच रही हो अपने होंठ, कितनी बार मना किया है तुम्हें, समझ नहीं आता! माँ के स्वर की झुंझलाहट से उसकी तल्लीनता का पैराशूट शीघ्रता से अपराधबोध की पृथ्वी पर उतर जाता।


बेटी के आश्चर्य का कोई ठिकाना ही नहीं रहता कि बग़ैर आहट के किए जाने वाले काम का अनुमान कोई कैसे लगा सकता है, वह भी बिना देखे। वह उठ कर रसोई में आ जाती, जहाँ माँ गरमागरम गुजिया शुद्ध घी से भरी कढ़ाई से तल कर उतारती हुई नज़र आतीं। वहीं पास में एक थाली में कसार, मैदे का घोल, गूंथा हुआ आटा, किशमिश, साँचा रखे हुए हैं।


"जिस तरह शुद्ध घी की लुभाने वाली ख़ुशबू के साथ जिह्वा पर आने वाले मखमली स्वाद ने तुम्हारी चिंताओं को भुला दिया, उसी तरह लगातार एक दिशा में एकाग्र हो कर की जाने वाली मेहनत अंजाम की चिंता में होने वाला फोबिया मिटा देती है"। माँ ने बेटी के मन की थाह लेते हुए कहा।



मैं तुम्हारा बचपन बोल रहा हूँ 


आज वह बातें कर रहा है उससे, जो बहुत ही विरल घटना है।


हाँ, उस दिन के लिए मैं ही ज़िम्मेदार था जब पलंग के नुकीले भाले से कोने से टकरा कर तुम्हारी खोपड़ी में गूमड़ निकल आया था। माँ ने उस वक़्त तुम्हें चुप कराने गले लगाया था या वह तुम गले लग गयी थी माँ के? दोनों में से क्या पहले हुआ, यह स्पष्ट नहीं मेरी स्मृति में।


लेकिन माँ की बुदबुदाहट याद है जिसे आँसू भरे स्वरों का झूला मिला था- "ऐसा जीवन तो कभी नहीं चाहा था मैंने इसके लिए। इसकी इस चोट के लिए सही मायनों में ज़िम्मेदार व्यक्ति को  प्रेम, भक्ति, ईश्वरीय सत्ता का कोई आभास नहीं; न अपनी बच्ची के प्रति कोई कर्तव्य बोध!"


तुम्हें ज़रा भी आभास नहीं था कि उस वक़्त वह किसे कोस रही थीं। यह तुम्हारे दो वर्ष के मस्तिष्क के विकसित होने की प्रारंभिक अवस्था थी।


तुम्हारे नादान मन को लगा था कि शायद तुम अब इस कमरे में जाने से रोक दी जाओगी लेकिन अगले दिन वह पलँग वहाँ से गायब था। कई वर्षों बाद तुम्हें पता चल सका कि माँ ने पूरा दिन लगा कर उसके हिस्से विभाजित कर उसे भंडार गृह में डाल दिया था। तब तक तुम मुझसे बहुत दूर चली गईं थीं। तुम्हारा दाख़िला कॉलेज में हो गया था। तुम्हारी किशोरावस्था का आखिरी चरण चल रहा था। लेकिन मैं देख रहा हूँ कि आज तुम इसे एक भिन्न दृष्टि से देख, समझ रही हो, जब तुम ख़ुद माँ बन गयी हो और तुम्हारी बेटी की एक-एक चोट तुम्हारी पर निर्भरता की बखिया उधेड़ती है और लाचारी पर धतूरे के फल की तरह चुभती है।


वह बहुत देर तक और भी बहुत कुछ मुझे याद दिलाता रहा तो मेरी स्मृतियों के कमरे प्रज्ज्वलित हो गए और मस्तिष्क पर उन कालखण्डों के मृदंग बहुत देर तक बजते रहे  जिन्हें मैंने भूतकाल की कोठरी में बंद कर रखा था।


सोचती हूँ पति पर आश्रित जीवन, एक स्त्री के लिए सिर्फ़ लाचारी तो नहीं हो सकती। नियति का भी इसमें ज़रूर कोई खेल है। यही खेल बेटी के जीवन में भी उसी तरह शामिल है जैसे मेरे जीवन में...। यह सोच कर मैं झील किनारे बैठने निकल पड़ती हूँ  जिसमें डालने के लिए मेरे पास कोई कंकड़ नहीं बचा। 



रिक्शा की तरह थीं माँ


ज्वर से तपती मेरी देह की आंच ने आज माँ को बहुत चिंतित कर दिया है। वह बार बार आ कर मेरा माथा छू कर देख रही हैं। मैं न आँखें खोल पाती हूँ, न कुछ कह पाती हूँ। होंठों पर जैसे मृत्यु ने अपनी भाषा रख दी है और आँखों को जैसे अपना वीभत्स चेहरा दिखा दिया है, जिससे भीषण थकान पलकों के चबूतरे पर लेट गई है। मुझे देखने वालों को ऐसा ही कुछ महसूस हो रहा है। जो खुसफुसाहटें मैं सुन पा रही हूँ, उन्हीं के परिणामस्वरूप आज यह कह पा रही हूँ। इस वक़्त एकमात्र श्रवण इंद्रिय ही ठीक से काम कर पा रही है। दिन श्यामल रात में तब्दील हो गया है, इसी गहमागहमी में… और रात काटना बहुत कठिन होता जा रहा है। माँ रात भर मेरे सिरहाने बैठकर माथे पर ठंडी पट्टियाँ रखती जा रही है। बाहर और अंदर बारिश मूसलाधार है जो जितनी तीव्रता से धरा पर हो रही है, उतनी ही तीव्रता से दर्द के जूते पहनकर देह की एक-एक मांसपेशी पर गिर रही है।


मन में संशय है कि अब क्या होगा! माँ कैसे मुझे और घर को इस डरावने मंज़र में संभालेंगी जबकि उनकी मदद के लिए पिता भी यहाँ मौजूद नहीं। वे शायद किसी दूसरे शहर काम से गए हैं और कोई रिश्तेदार इतनी बारिश में सहायता करने नहीं आ सकता और उन्हें सूचित भी नहीं किया जा सकता ।बारिश ने फ़ोन लाइन डेड कर दी हैं। सबसे बड़ी बात जो गौर करने लायक है, वो यह कि माँ को इस तरह की स्थितियों से कभी दो-चार नहीं होना पड़ा।  वे हमेशा घर के अंदर के कामों में ही संलिप्त रहीं।


मेरी इस सोच के साथ माँ मुझे 10 मिनट के लिए अकेला छोड़कर रिक्शा लेने के लिए गयीं। उसमें मुझे रेनकोट पहना कर बिठाया और ख़ुद वे एक छतरी के सहारे बैठ गयीं जो सिर्फ़ नाम मात्र की थी। मैं कभी सोच नहीं सकती थी कि मुझ जैसे बेहाल मरीज़ को बारिश में एक अदना सा रिक्शा सकुशल डॉक्टर के क्लीनिक पहुँचा सकता है। रिक्शे के चक्के आधे पानी में डूबते हुए गड्ढों में धँसते और निकलते किसी तरह आगे बढ़ रहे थे। मेरे दिल की धड़कन इतनी तेज थी कि प्रकृति के शोर के बीच भी सुनी जा सकती थी। हम डॉक्टर के क्लीनिक पर आ चुके थे। मेरा प्राथमिक इलाज हो गया था। दवाइयाँ ख़रीद कर माँ रिक्शे में बैठ गई थी। हाँ, बैठने से पहले कुछ फल भी उन्होंने ख़रीद लिए थे। उन्हें मालूम था कि मुझे जूस पीने की सलाह दी गई है। वे यह भी जानती थीं कि डॉक्टर की दी गई तासीर से तेज़ और गर्म दवाओं से मेरा हाज़मा बिगड़ सकता है।


माँ उसी रिक्शा की तरह थीं जो दिखने में अदना सा एक वाहन लगता था पर बाढ़ के हालातों में भी चलता रह कर कारगर सिद्ध हो सकता था। जिसके चलने से प्रकृति पर किसी तरह की खरोंच नहीं पड़ती। 



टूटना एक प्रारब्ध है


स्कूल से घर लौटने के रास्ते में थी वह। आज उसकी चोटी में पीले सेवंती का फूल भी लगा हुआ था। घर से बाहर निकलते हुए उसने आईना देखा और प्रफुल्लित हो गयी अपना रूप देख कर। उसके बदन में प्रसन्नता की लहर ऐसे दौड़ गयी जैसे इसके सिवा न वहाँ हड्डियाँ हों, न रक्त। स्कूल में सारा वक़्त बिताने के बाद जब वह लौटने के रास्ते पर थी तो देखा कि एक पंखुड़ी टूट कर उसकी नाक पर गिरी। एक गुदगुदी-सी हुई। सहसा वह समझी नहीं क्यों? नाक पर हाथ लगाया तो हाथ में वह मासूम पंखुड़ी थी जो सुबह उसके घर से निकलने के पहले उसके सिर पर ताज बनकर गर्वान्वित हो रही थी। अचानक वह प्रफुल्लता एक निर्दोष ख़ामोशी में तब्दील हो गई। उसकी सहपाठी सहेली जो उसके साथ पैदल जा रही थी, उसने पूछा,


"क्या हुआ इतनी देर से तुझे वह पतंग दिखा रही हूँ जो दूर आसमान में उड़ रही है लेकिन तू तो कुछ बोलती ही नहीं। तुझे तो पतंग को उड़ते हुए देखना बहुत पसंद है ना !"


नज़रें एक पल के लिए ऊपर उठीं तो… लेकिन चिड़िया के बच्चों की तरह। रोज़ की मस्ताना चाल क्यों सपाट हो गयी इस लड़की की, यह समझ न सकी वह सहेली।


घर आते ही दरवाज़े पर दस्तक की ध्वनि बदल गयी और उसने पहले ही माँ को बेटी का मन पढ़वा दिया। अंदर आते ही प्रश्न का कंगारू उचकते हुए बोला- “ये देखो मेरे फूल की पंखुड़ी नीचे गिर गयी।”


माँ ने एक संतुलित मुस्कान के साथ बेटी को देखा और कहा- "वह गिरी नहीं, टूटना उसका प्रारब्ध है। हर एक शय जो आसपास दिख रही है, वह आज नहीं तो कल टूटेगी।”  माँ, अपनी बेटी का चेहरा देख कर भांप गयी थी कि इसको कुछ समझ में नहीं आया। इसलिए बोली, “एक दिन मैं भी टूट जाऊंगी, बिल्कुल इसी तरह। इस पृथ्वी पर सबका एक दिन अंततः टूटना और समाप्त हो जाना… प्रारब्ध है।”



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तिथि दानी कवि-अनुवादक और स्वतंत्र पत्रकार हैं। कविता संग्रह : प्रार्थनारत बत्तखें, अवचेतन पर गिरते हैं संकेतों के फूल।‌ इनकी कविताओं का अनुवाद अंग्रेज़ी, रूसी जर्मन और नेपाली भाषाओं में हो चुका है। पुरस्कार/सम्मान : पहले कविता संग्रह की पांडुलिपि भारतीय हाई कमीशन लंदन से सम्मानित, वागीश्वरी सम्मान, अंतरराष्ट्रीय साहित्य सेतु सम्मान, हिंदी गौरव सम्मान। समय-समय पर हाई कमीशन लंदन, नेहरू सेंटर और लंदन स्थित हॉउस ऑफ़ कॉमन्स (संसद) में कविता पाठ और हिंदी भाषा का प्रतिनिधित्व।


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