कवि प्रभात से दस सवाल
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प्रभात की कविता लोक-स्मृति और मानवीय संवेदना का मीठा विलयन है। उनकी कविताई का बड़ा हिस्सा राजस्थानी लोक-संस्कृति के विस्तृत कैनवस पर संपन्न हुआ हुआ है। वे देशकाल और उससे निर्मित स्मृतियों के भीतर अपनी आवाजाहियों से हमारे समय की कविता का जिस ढब में विस्तार करते हैं, उसमें स्मृति के फूल खिलते हैं और अपने रूप-सौन्दर्य से जीवन को सुगन्धित कर देते हैं।
इन दस प्रश्नों के ज़रिए प्रभात की प्रेरणाओं, उनके अन्तः करण और जीवनानुभवों को जानने की कोशिश की गयी है। कविता और जीवन की भाँति प्रभात के उत्तर भी सादा कारीगरी से बुने गए मालूम होते हैं। ये बौद्धिक अतिरंजनाओं से मुक्त; सरल, रसमय और उजले से हैं तथा प्रभात की काव्य-प्रक्रिया और ख़याल को समझने की संभावनाओं से युक्त हैं।
~ संतोष अर्श
1. अपनों में किस तरह नहीं रह गए?
मेरे बचपन और किशोरावस्था का काफ़ी हिस्सा गाँव में बीता था। गाँव प्राकृतिक दृष्टि से बहुत ही सुंदर था। तालाब, पहाड़, खेत खलिहान, चरागाह थे, इनमें मन रमता था। कच्चे घर, बड़ी सी बाखल (अहाता) और पशुबाड़ा, ये हमारे रहने की जगह थी जिसमें हमारा संयुक्त परिवार रहता था। वह हमारे बाबा का कुनबा था जिसमें उनके चार बेटों के परिवार, हम कई सारे भाई-बहन, हमारी बुआओं की आवाजाही, घर में बहुत सारी गायें, भैंसें, बैल और हमारे खेत और पेड़। कुनबे के बाद कुटुम्ब था और कुटुम्ब के बाद गाँव जिसमें हर कोई बड़े प्यार और अपनापे से देखता था। सामूहिकता थी, गीत-गान, खेल-कूद थे। किसानों का जैसा होता है अत्यन्त साधारण जीवन था, लेकिन जीवन का रोमांच था, ज़िन्दगी का अपना ही वैभव था। हालाँकि समय के साथ यह सब कुछ नष्ट भी हो गया।
युवावस्था के दिनों में जब मैं विश्वविद्यालय की पढ़ाई पूरी कर गाँव में ही खेती-किसानी करने और वहीं बसने के उद्देश्य से गाँव आया तो, एक तो वह पुराना माहौल एकदम बदल चुका था, दूसरे आपसी भाईचारा और सामूहिकता का भाव एकदम ख़त्म हो चुका था। नए नौकरीपेशा लोगों में पैसे का प्रदर्शन और उच्चताबोध बढ़ गया था। भूख, बेरोज़गारी, और अल्पससंख्यक होने के चलते अनेक परिवार पलायन कर चुके थे। वैमनस्य और हिंसा का बोलबाला बढ़ गया था। बल्कि अब तो हमारे गाँव में एक हत्यारे के नाम का प्रवेशद्वार तक बना दिया गया है। इन अधिकांशतः नकारात्मक सांस्कृतिक परिवर्तनों के चलते भाईचारे, सामूहिकता, सादगी जैसे जीवनमूल्यों को चाहने वाले लोगों की इन नई बनती संरचनाओं में वैसे ही कोई पहचान, कोई जगह नहीं रह गई। वे उपहास के पात्र बनते जा रहे थे। कई मेहनतकश किन्तु स्वभाव से सीधे-सादे लोग पागल होकर मर रहे थे या पागल होकर जीने को अभिशप्त थे।
हत्या और आत्महत्याएँ जो कभी सुनने में नहीं आती थीं, अब वे कोई अनहोनी बातें नहीं रह गई थीं। फिर धीरे-धीरे समझ में आया कि पुरानी पारिवारिक, सामुदायिक, सामाजिक संरचना के भीतर कैसी-कैसी हिंसाएँ पहले से ही मौजूद थीं। घरेलू हिंसा को तो पहले से ही सामाजिक स्वीकृति प्राप्त थी। घरेलू व्यभिचार भी अब शर्म की बात नहीं रह गई थी। स्त्रियों से व्यभिचार और उन पर अनवरत हिंसा लोगों के मर्द होने की निशानी थी। ऐसा है कि स्त्रियाँ भी अपनों में नहीं रह पातीं, मगर वे रह रही होती हैं। और आप इन सब चीजों की ओर ध्यान देते हैं, इनमें हस्तक्षेप करना चाहते हैं तो आपका साथ देना तो दूर, कोई आपको सुनने में दिलचस्पी लेने वाला भी वहाँ नहीं है। इस तरह आप अपने ही लोगों के बीच अकेले पड़ जाते हैं। और अन्ततः अपने ही लोगों के द्वारा खदेड़ दिए जाते हैं। सार्थक कामों के बजाय पैसे कमाने का दबाव आपके घर के भीतर से ही इतना होता है कि अगर इस दबाव के आगे आप झुकने या टूटने से मना कर देते हैं तो आपका अपना घर ही आपको वहाँ रहने देने से इंकार कर देता है। फिर कैसे रह पाएँगे आप अपनों के बीच?
आपके अपने भीतरी मसले भी होते हैं जैसे मुझे लगता है कि मेरे पास गाँव में लोगों से संवाद करने की भाषा, कौशल और सामर्थ्य ही नहीं था। न ही उसे अर्जित करने का अवकाश था, जिन्दा रहने की जद्दोजहद के बीच। चीजों को बदलने के लिए जैसे संसाधन, जैसी हैसियत, जैसी क्षमता चाहिए, लोगों के बीच स्वीकृति चाहिए वह है नहीं तो आप अपने आप ही अपनों से बाहर हो जाते हैं।
2. कविता में प्रवेश कैसे हुआ? यह यातना है या उससे मुक्ति?
मैं मुँह अँधेरे में चाकी पर गाती हुयी अनाज पीसती स्त्रियों के गीत सुनते हुए पैदा हुआ हूँ। माँ के पेट में था तब भी मैं गीत सुनता रहा होऊँगा। माँ ने नौ महीने मुझे पेट में धारण किये हुए भी तो अनाज पीसा था और गाया था। मैं जीवन की उस निराली संगीतात्मकता से गुज़रा होऊँगा।
पूर्वी राजस्थान के माड़ अंचल का मेरा इलाक़ा लोकगीत संगीत और मौखिक साहित्य की परंपरा का समृद्ध क्षेत्र रहा है। अब तो बहुत कुछ व्यवसाय में बदल गया है। लोकगीत संगीत और कहानियाँ कहने सुनने के जिस माहौल में मेरा बचपन बीता, वही साहित्य के संसार में मेरा प्रवेश था। मेरे बचपन के समय से लेकर कैशौर्य और युवावस्था तक लोक साहित्य अपने सीधे-सादे और जीवंत रूप में था। मेरे पिता दंगलों में गाते थे, अपनी युवावस्था में वे गाँव के कन्दैया गीतों की जोठ के मेडिया थे। मेरे मामाओं का गाँव गीत गाता था, इलाक़े में पहचान थी उनकी गायकी की।
बाक़ी आगे जैसा सबके साथ होता है वैसा मेरे साथ भी हुआ। किशोरावस्था के दिनों में पत्र-पत्रिकाएँ और अमर चित्रकथाएँ पढ़ा करता था। काका एलआईसी में काम करते थे। जब उनको तनख्वाह मिलती, उसी दिन वे मुझे मेरी पंसद की पत्रिकाएँ ख़रीद कर दिला देते थे। किराए पर किताबें लाने के लिए भी पैसे देते थे। किलो के भाव से रद्दी की किताबें मोल ले कर भी पढ़ता था। जैसा कि सब शुरू में अनुकरण में लिखते हैं, मैं भी वैसे ही लिखता। बच्चों की पत्रिकाएँ जो पढ़ता था, उनमें रचनाएँ भेजता तो एक-दो बार छप भी गया। कविता में सही मायने में प्रवेश हुआ विश्वविद्यालय में आने के बाद। वहाँ भयंकर पढ़ाकू और विचार-विमर्श करने वाले दोस्त मिले। दोस्तों की संगत से साहित्य के मर्म को जानने-समझने में मदद मिली।
कविता यातना है या उससे मुक्ति, यह तो बाद की बात है। पहली बात तो ये है कि कविता लिखना मेरी चाहत है, मेरा प्रेम है। कविता नहीं लिख पा रहा हूँ तो यातना है, लिख पा रहा हूँ तो मुक्ति है। कविता मेरा अपने आप से और जीवन से और संसार से संवाद का ज़रिया है।
मगर अब यह यातना भी लगने लगा है। ऐसी कविता लिख पाना जिसे लिखने के बाद कुछ सृजनात्मक सुख महसूस हो सके, वह लिखने में नहीं आती या लिखने की ताब नहीं। अब निरर्थकता का बोध ज़्यादा हावी है। फिर भी अभी कुछ आकर्षण तो बचा ही है लिखने में, शायद इसलिए लिखता हूँ या अब आदतवश ही लिखता हूँ, या अब इस क्षेत्र में फँस ही गए हैं तो न लिखें तो करें क्या?
3. जीवन के दिन कैसे थे?
जीवन में सादा रोटी, कपड़ा और मकान की दिक़्क़त कभी नहीं आई, लेकिन जो काम मैंने करने चाहे उन्हें करने में बाधा लगातार बनी रही। आज भी बनी हुई है। नौकरी न करना मेरा अपना चुनाव था। उसे लेकर कभी भी कोई मलाल नहीं रहा। किन्तु घर चलाने के लिए अनियमित अनचाहे फ्रीलांस काम लगातार करने पड़े, इसी में सारी ऊर्जा खप गई। क़र्ज़ लेने और उतारने की दुश्चिंताएँ लगातार बनी रहीं। जितना पढ़ने-लिखने की चाहत रही, वह पूरी नहीं हो पाई। बीच-बीच में जब समय मिला, करता रहा कुछ-कुछ।
4. हिन्दी भाषा और समाज कैसा लगता है? इसका भविष्य कैसा होगा?
अपने इलाक़े की ‘माड़ भाषा’ और हिन्दी के अलावा मैं अंग्रेज़ी या कोई और भाषा तो जानता नहीं हूँ, अन्य भाषाओं की रचनाएँ अनुवाद के ज़रिए हिन्दी में ही पढ़ता हूँ। हिन्दी साहित्य ने जीवन को जानने, समझने में गहरी मदद की है। पढ़ने का सुख भी दिया है। हिन्दी के साहित्यिक समाज से मैं बहुत कम घुल मिल पाया हूँ। मौके ख़ूब रहे पर मैं बहुत कम आया गया हूँ। हिन्दी के व्यापक समाज से, लोगों से ज़्यादा घुला-मिला हूँ।
हिन्दी इस देश के बहुत बड़े भू-भाग की निरंतर समृद्ध होती हुई भाषा है। उसे चाहिए कि वह अपनी माँ भाषाओं का भरपूर ख़याल रखे। तमाम वे भाषाएँ जिनसे हिन्दी बनी, वे समृद्ध होती रहीं तो हिन्दी और समृद्ध होगी। साहित्य ने हिन्दी भाषा को निरंतर नई ऊँचाइयाँ दी हैं। साथ ही साथ ऐसा भी है कि हिन्दी पट्टी का समाज अब अपने आपको एक भ्रष्ट और मूल्यहीन समाज में बदल चुका है। चोरी, अन्यायी, भ्रष्टाचारी को व्यापक स्वीकृति मिली है। अब ऐसे लोगों को ग़लत या बुरा नहीं समझा जाता, बल्कि अब समाज में ऐसे ही लोग अधिक सम्मानित हैं। हिन्दी भाषा और समाज पर यह एक संकट भी है।
हिन्दी साहित्य का भविष्य तो बेहतर ही होगा लेकिन समाज का क्या होगा मेरे लिए अनुमान लगाना कठिन है।
5. प्रेम के अनुभव कैसे रहे?
कोई मुझसे प्रेम करता रह सके, यह भी मुश्किल है और मैं किसी से प्रेम करता रह सकूँ, यह भी अनिश्चित है। प्रेम अपने भीतर ही होता है। कोई और भी आपसे प्रेम करे, यह तो एक अनोखी बात होगी। कोई और आपसे प्रेम करे, इसकी हमेशा एक सीमा भी होगी। लेकिन आपके भीतर जो प्रेम है, उसकी कोई सीमा नहीं है। प्रेम के बजाय प्रेम की स्मृति दूर तक साथ चलती है।
6. कवि के निकट मृत्यु क्या है?
हरिवंश राय बच्चन की पंक्तियाँ हैं- ‘इस पार प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा ?’
मेरे लिए मृत्यु एक अनुत्तरित प्रश्न है। स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म जैसी धारणाओं पर यक़ीन नहीं होता। मृतक का राख, मिट्टी हो जाना ही उसकी वास्तविकता है, इसके सिवा और कोई वास्तविकता होती होगी, इसकी कोई अन्य कल्पना मेरे मन में नहीं है। धूल का जो भविष्य है, प्राणी जिसकी मृत्यु हो गई, उसका भी वही भविष्य है।
एक और स्तर पर ऐसा है कि जिनके साथ मैं जिया, उनमें से अब जो नहीं रहे, वे मेरी स्मृति में अभी भी हैं। मेरे समाप्त होने के साथ ही मेरी स्मृति भी गुम हो जाएगी, ऐसे में वे एक बार फिर मर जाएँगे मगर यह भी संभव है किसी और की स्मृति में रहें। यानी स्मृति में जीवित रहना भी मृतकों का एक अलग तरह का भविष्य है।
कवि का कविता लिखना बंद हो जाना, कवि के रूप में उस इंसान की मृत्यु है जो कि उसके जीते जी हो सकती है, हो जाती है। शमशेर की पंक्ति है - ‘चुका भी हूँ मैं नहीं।’ यानी कवि के रूप में अभी भी जीवित हैं। कोई कवि एक समय के बाद अगर लगातार ख़ुद को दोहरा ही रहा है तो इसका मतलब यही है कि वह कवि के रूप में अपनी मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। जैसे इंसान के जीवन पर संकट आते हैं, वैसे ही रचना प्रक्रिया पर भी आते हैं। और कवि इन संकटों से बाहर निकल भी सकते हैं।
7. किन्हें पढ़ना पसन्द है?
हिन्दी की प्रगतिशील धारा के सभी कवियों को पढ़ना पसंद है। निराला, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, आलोकधन्वा, मंगलेश डबराल, असद ज़ैदी, विष्णु खरे, राजेश जोशी, ऋतुराज, नरेश सक्सेना, विनोद पदरज, मनोज कुमार झा और बाद के भी कवियों को। जीवनानंद दास, शिम्बोर्स्का, नाजिम हिकमत को पढ़ना पसंद है। अंग्रेज़ी की लेखिका अरुंधति रॉय को पढ़ना पसंद है तो जगरौटी के लोक कवि धवले राम मीणा को भी पढ़ना पसंद है। यूँ कोई गिनती नहीं है फणीश्वरनाथ रेणु, प्रेमचंद, भीष्म साहनी, विजयदान देथा, उदय प्रकाश, सत्यनारायण को पढ़ना पसंद है तो विभूति भूषण बन्द्योपाध्याय, लेव तोल्सतोय, दोस्तोएवस्की, चेख़व, मार्खेज़, कितने ही लेखकों को पढ़ना भी पसंद है।
बच्चों के लिए लिखने वाले कवियों में निरंकार देव सेवक, श्रीप्रसाद, सर्वेश्वर, गुलज़ार से लेकर नवीन सागर, सफ़दर हाशमी, सुशील शुक्ल, फ़राह अज़ीज़ पसंद हैं। कथा एवं कथेतर में प्रियंवद, सत्यु, ऋषि साहनी, शीराज, वरुण ग्रोवर पसंद हैं। फ़ारिदेह खअ्लतबरी, हाँस सांडे, कांता ग्रेबां को पढ़ना पसंद है।
8. स्मृति रहेगी कि नहीं?
स्मृति रहेगी। कहीं तो किसी के पास तो ज़रूर ही रहेगी। नई प्रौद्यौगिकी राज ही क्यों न करने लगे, स्मृति रहेगी। क्योंकि पेड़ रहेंगे, आकाश रहेगा, भू-खण्ड रहेंगे, प्राणी रहेंगे तो स्मृति भी रहेगी। स्मृति पर हमले सहने और सृजन के लिए स्मृति रहेगी।
9. गाँव अब कैसे हैं?
दूर से देखने पर अपनी भौगौलिक स्थितियों और प्राकृतिक सौन्दर्य के चलते गाँव सुंदर ही दिखाई देते हैं। लेकिन वहाँ जाओ, रहो, लोगों से मिलो-जुलो तो गाँवों की तकलीफ़ों के बीच दम घुटने लगता है।
आज़ादी के बाद सब लोगों को तो नहीं, लेकिन पारंपरिक रूप से किसान जातियों को ज़मीन पर हक़ मिला। कृषि से मिलने वाली आय अब उन्हें पूरी तरह मिलने लगी। कृषि पर पड़ने वाली तमाम तरह की प्राकृतिक मार के बावज़ूद अब कुछ हद तक उनकी सुख-समृद्धि बढ़ी। लेकिन बढ़ती जनसंख्या के साथ खेती की भूमि टुकड़ों में बँटते-बँटते इतनी भर रह गई कि उसके दम पर जीवन चलाना जटिल हो गया। दूसरी ओर बाज़ार ने हल-बैल, गोबर की खाद और बारिश एवं तालाबों से मिल जाने वाले पानी से सम्पन्न हो जाने वाली पारंपरिक कृषि व्यवस्था को ख़त्म कर दिया। बाज़ार ने मशीनों और रासायनिक उर्वरकों से खेती को इतना महँगा कर दिया कि छोटी जोत के किसानों के लिए वह बहुत जल्दी घाटे का सौदा साबित होने लगी।
पूँजीपतियों ने सरकारों के साथ साँठ-गाँठ कर गाँवों के प्राकृतिक संसाधनों को लूटने का काम किया है। गाँवों के प्राकृतिक संसाधनों पर क़ब्ज़ा करने लिए वहाँ के निवासियों को प्रोजेक्ट्स में हिस्सेदारी देना तो दूर, उन्हें वहाँ से खदेड़ा गया है और प्रतिरोध करने पर नरसंहार किये गए हैं। बीते दशकों में किसानों ने बड़े पैमाने पर आत्महत्याएँ की हैं।
नए नौकरीपेशा लोगों और राजनीति में वर्चस्व रखने वालों का एक नव धनाढ्य वर्ग भी उभरा है। स्थानीय स्तर पर ये नए दबंग हैं। विजयदान देथा जिन्हें ‘अलेखूँ हिटलर’ कहते हैं। इन्होंने भी अपने ढंग से हिंसा को बढ़ावा दिया है। गाँव में आपसी लड़ाइयाँ बढ़ गईं। वैमनस्यता आ गई। सामूहिकता नष्ट हो गई।
सामंती और आधुनिक संस्थाओं, जीवन मूल्यों के बीच की टकराहटों के चलते भी हिंसाएँ हुई हैं। हो रही हैं। पारंपरिक शिक्षा और नैतिकताएँ नष्ट हो गई हैं और आधुनिक शिक्षा और जीवन मूल्य अपनी जगह नहीं बना पाये हैं। अज्ञान भी लोगों को तकलीफ़ों का कारण बना है। स्कूली शिक्षा की सतत अनदेखी ने उन्हें बदहाल कर दिया है।
आज गाँवों की दशा ये है कि वहाँ से बड़े पैमाने पर पलायन हुए हैं। वहाँ भुखमरी और बेरोज़गारी ने स्थानीय युवाओं को चोर लुटेरों और गैंगस्टर्स में बदल दिया है। हिंसा बहुत बढ़ गई है। उत्तर भारत में तो यही स्थिति दिखाई देती है। दक्षिण के राज्यों के गाँवों के बारे में ज़्यादा कुछ पता नहीं है। सिक्किम, गोवा, केरल सरीखे कुछ राज्यों के गाँवों को भी देखने का अवसर मिला। वहाँ ऐसा लगा कि शान्तिप्रियता, संवेदनशीलता मानवीयता बची हुई है। वहाँ मुझे स्त्री-पुरुष भेद नहीं दिखाई दिया। हालाँकि यह देखना कुछ दूर से ही देखना था।
10. ज़माने से क्या मिला?
जब हम बचपन और किशोरावस्था में होते हैं, तब हमारी अगली दो पीढ़ियों के लोग अपने समय का सामना कर रहे होते हैं। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक परिस्थितियों से जूझ रहे होते हैं। वे अपनी संतानों को बेहतर जीवन देने की कोशिश करते हैं। मेरा बचपन और किशोरावस्था अच्छे बीते। युवावस्था में अच्छे दोस्त और अच्छे साहित्य का सहारा मिला। समय और संसार की नदी की यात्रा में एक नाव जैसा सहारा।
ज़माने ने खदेड़ा बहुत। ज़माने से अपमान बहुत मिला, जिसे मैंने साहित्य में रूपांतरित करने का प्रयास किया। ज़माने ने मेरी औक़ात, मेरी सीमाएँ भी बतायीं। ज़माने से क्या मिले, कितना मिले इसमें कुछ भूमिका मेरी भी ज़रूर रही होगी। उससे ज़्यादा ही मिला जितने के मैं लायक था।
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प्रभात मिट्टी और लोक के प्रतिष्ठित कवि हैं। गोल चक्कर पर प्रभात का पूर्व प्रकाशित काम देखिए : प्रभात की कविताएँ
सन्तोष अर्श का जन्म अवध में बाराबंकी जनपद के गाँव मँझपुरवा (1987) में हुआ। छोटी उम्र से लेखन शुरू किया और कुछ समय तक लखनऊ में फ़्रीलांसिंग की। मूलतः कवि। आलोचना और सम्पादन में भी सक्रिय। जनकवि रमाशंकर यादव 'विद्रोही' पर आधारित पुस्तक 'विद्रोही होगा हमारा कवि' (2020) और 'परस्तार-ए-लखनऊ' (2025) का सम्पादन।
'आलोचना की दूसरी किताब' (2024) प्रकाशित हुई है। ईमेल : poetarshbbk@gmail.com
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बहुत सलोना साक्षात्कार।जवाब हृदयतल से निकले हुए, गैरबनावटी भाषा में।सुंदर।
कवि के जीवन की कई बातें जानने को मिली। कवि का साक्षात्कार उसकी कविताओं का संदर्भ भी होता है। वही सीधी-सरल भाषा जो उनकी कविताओं की पहचान है, यहाँ भी है।