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मलाइका राय की कविताएँ

May 6
3 min read


मलाइका राय की कविताएँ 
लिप्यन्तरण : नेहा वत्स 

नापाक़ 


माँ बोले दुपट्टा ओढ़ो

मैं कितना छुपाऊं?

कितना तोड़ूं?

बाल तो बाल हैं

औरत तो औरत है


टाँगों बीच चीर है

मैं उँगलियाँ डाल

ख़ुद को पूरा उधेड़ लूँ

या मैं सी लूँ?

ख़ुद को

टाँगों से

लबों से

नैनों तक

एक लंबा टाँका लगाऊं?


मैं ख़ुद में सिल जाऊँ?

बदन में औरत महफ़ूज़ नहीं

क़फ़न में औरत महफ़ूज़ है?

जिस्म नहीं

मैदान-ए-जंग है

लहू-लुहान कोई ना हो?


भेड़िया तो ख़ाल भी खा लेगा

लाल भी खा लेगा

दोष उसे ना दिया जाए 

मैं ख़ुद को टाँके लगाऊंगी

टाँगों के बीच से

ख़ुद मैं सिलती चली जाऊंगी


मैं कोख़ में ख़ून पालूंगी

दर्द का बच्चा जन्मूंगी

और जब जनने में

मैं पूरी चीर दी जाऊंगी

मुझे भुला मत देना

बस मुझे जला देना

मेरी लाश भेड़ियों से

बचा लेना

क़ब्र खोदने में

देर कितनी लगती है।



आदम-ख़ोर 


जैसे काला-काला कौवा,

जैसे भूखा नाग,

बैठा टाँगों बीच,

तकता-तकता करे

शरम शिकार


नोच-नोच

निर्मम क्रूर 

ख़ूंख़ार 

नोच, नोच

खाए मेरा गोश्त।

पिए मेरी पुकार


नोच नोच 

चबाए मेरा रोग

हलक़ करे लहू-लुहान 

हराम-ख़ोर 

खाए हराम ख़ुराक,

मासूम की छीने पोशाक।


नोच, नोच,

नाख़ून से खोले ख़ाल,

भेड़िए करे 

बालों का धाग

ज़ुबान की सुई।


नोच, नोच, 

खा ले मेरी जान,

ऐ कम्बख़्त हैवान

मैं तेरी ही थी,

तेरी ही कोई।


ऐ महबूब, ऐ दिलदार,

दावत के जानिब पेश है मेरी ज़ात

माफ़ कर, जाने दे,

मेरा बदन दस्तरख़्वान है।

शिकार को ख़ुद भी, अपना ज़ाएक़ा 

चखने दे, खाने दे।


होती है मोहब्बत में हार,

बे-आबरू, कूचे से

निकलना पड़ता है।

खिलाना भी,

खाना पड़ता है अपना गोश्त,

इश्क़ निगलना पड़ता है।



एंक्साइटी 


चाप से डर लगता है 

आवाज़ से डर लगता है

सवाब के एवज़ मिले

अज़ाब से डर लगता है 

रात दुश्वार गुज़रती है मेरी

आँखों को ख़्वाब से डर लगता है 

नफ़रत फिर क़ुबूल है,

मुझे अब प्यार से डर लगता है 

मुझे अब ख़ुदा से डर नहीं लगता, जानम 

मुझे बस आप से डर लगता है।



रणक्षेत्र


मैं लहू-लुहान चाक़ू,

से माँग अपनी भर लूँ 

ख़ुदा से लड़ लूँ,

बलाएँ आपकी सर लूँ


बाहें आपकी पकड़ लूँ,

आँखों से तर लूँ,

ज़ुबान से,

साफ़ करूँ घाव

एक-एक ज़ख़्म चख लूँ


साँप सी, अँगड़ाइयाँ लेती,

आपकी क़िस्मत से चिमटूँ,

मैं चाटूँ

चूमूँ 

लिपटूँ

आपकी विशाल हथेली में

तितली जैसी सिमटूँ 


मुहब्बत, महबूब, अज़ीज़

इश्क़ का ख़ंजर,

मेरी शाह रग से क़रीब

शर्त बस ये,

हो आप के पहलू में

मौत भी

ज़हे-नसीब 

ज़हे-नसीब 

ज़हे-नसीब।



भेड़ा स्टॉप 


मेरी सर्दियाँ उदास हैं,

मेरी गलियाँ बेआवाज़ हैं

मेरी बल खाती बाहों को

आप का ही इंतज़ार है

मेरे मुहल्ले की

इक-इक डाली को

आप की पहचान है

आप आफ़ताब हैं

मेरे बाग़ों का 

चाँद हैं 

मेरे गुलों, गुलाबों को

आप की ही चाह है

मेरे सिर कटे 

बाज़ुओं में

आप की ही पुकार है 

मेरा पूरा शहर 

मेरी जान के लिए

क़फ़न हाल है


आप कभी आएँ तो बताएँ 

हमारे शहर दूर नहीं

पर लोग एक घर में भी रहते हैं 

और मिलते नहीं।


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मलाइका राय लाहौर, पाकिस्तान की युवा कवयित्री और कलाकार हैं जो उर्दू और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लिखती हैं। उनके काम की विशेषता गहरे, तीव्र और संवेदनात्मक बिम्ब हैं जो मानव शरीर, प्रतिरोध और पितृसत्तात्मक कथाओं पर केंद्रित होते हैं। उन्होंने अपने काम का प्रदर्शन ‘लकीर कहानियाँ’ और ‘बीच की बैठक’ में किया है। कनाडा की बहुभाषीय पत्रिका डैल एब्सर्ड में निरंतर लेखन के अतिरिक्त उनकी रचनाएँ लकीर मैगज़ीन, दि अलेफ़ रिव्यू, आर्टिस्ट स्टूडियो और बॉर्डरलेस जर्नल्स में प्रकाशित हुई हैं।


नेहा वत्स ख़ुद को एक पाठक कहना पसंद करती हैं। अलबत्ता डायरीनुमा लेखन उनके यहाँ दिखाई देता है। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए ‌: नेहा वत्स


1 Comment


अजय
May 06

नापाक़, आदम-ख़ोर, रणक्षेत्र ये तीन कविताएँ सुन्दर लगी। नेहा वत्स को साधुवाद, बहुत ही सुन्दर लिप्यंतरण किया है।

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