आज की ईरानी कविताएँ
Updated: 17 hours ago

आज की ईरानी कविताएँ
अनुवाद एवं प्रस्तुति : प्रिया वर्मा
हमारे देश में फ़ारसी कविता के पुरखों के तौर पर उमर ख़य्याम, हाफ़िज़, फ़िरदौसी जैसे उस्तादों के नाम सबसे ऊपर जाने जाते रहे हैं। थोड़ा सा आगे बढ़ने पर स्त्री कविता में फ़रोग़ फ़रोख़ज़ाद और मज़दूर कवि साबीर हाका की कविता के आगे की कविता की आमद में हिंदुस्तान के पाठकों के लिए कमी आ गई सी लगती थी। ऐसा होने के कारणों पर कभी विचार किया जाएगा लेकिन इस दौरान ईरानी सिनेमा की चमक से भारत के कला और साहित्य प्रेमी समाज में ईरान पर भरोसा बढ़ा। वहाँ पिछले एक वर्ष से अधिक समय से इज़राइल और अमरीकी आकाओं की राष्ट्रवादी सनक, क्रूर लालसाओं और दादागिरी की धौंस के चलते जितना तांडव मचा, उसमें विश्व के बाक़ी हिस्सों की निरुपाय चुप्पी ने सबसे अधिक व्यथित किया। अमानवीयता और बर्बर अत्याचारों की कोई हद बाक़ी नहीं रही। ऐसे समय में जब हिन्दुस्तानी पाठकों के बीच ईराकी, फ़लस्तीनी और सीरियाई कविताओं के अनुवाद प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहे और ख़ूब मन से पढ़े और पसंद किए गए, ईरानी कवियों की आवाज़ को भी ज़रूर खोजा गया होगा। ऐसे समय में ईरानी कविता के समकालीन स्वर को खोजना और अंग्रेजी से हिंदी में उसका भावानुवाद करना ज़िम्मेदारी भरे संतोष का अनुभव दे गया।
छद्म चालों, कूटनीतिक शर्तों और वादाख़िलाफ़ी की तमाम ख़बरों के बीच युद्ध विराम की अटकलों में इन कविताओं में ईरानी जन की आवाज़ को टटोलना काफ़ी हद तक ज़मीनी हक़ीकत और रोज़मर्रा की परेशानियों से दो-चार कराता रहा, कई कविताओं ने इंसानी मूल्यों की असहायता और खोखलेपन को महसूस करवाया। शक्ति प्रदर्शन करते इन युद्धों में दरअसल किसी भी मुल्क को जर्जर करने की क्षमता का तेज़ाब होता है जो सब कुछ को नष्ट कर देने की महत्वाकांक्षा से आसमान के ज़रिए बारूद बनकर शहर-शहर, गाँव-गाँव, सरहद-सरहद बरसता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि युद्ध से किसी भी उपजाऊ ज़मीन के सब कुछ को नष्ट नहीं किया जा सकता। कम अज़ कम साहित्य को तो कभी नहीं।
~प्रिया वर्मा

बक्ताश अब्तिन की दो कविताएँ
बक्ताश अब्तिन एक ईरानी कवि, लेखक और फ़िल्म निर्माता थे, जिन्हें 'राज्य के ख़िलाफ़ प्रचार' और 'राष्ट्रीय सुरक्षा के ख़िलाफ़ कार्रवाई' के लिए कभी क़ैद किया गया था। ये एकदम वही आरोप हैं जो हमारे आज के मुल्क में सवाल उठाने और बराबरी के हक़ की बात करने वालों पर जड़कर उन्हें जेल के हवाले कर वहीं जीने-मरने को छोड़ दिया जाता है। यह आरोप देशद्रोह का आरोप है जो किसी भी बुलंद और मुख़ालफ़त करने वाली साफ़-सुथरी आवाज़ की आत्मा को छलनी कर देने के लिए काफ़ी है।
अपनी कविताओं में अब्तिन जंग के मुश्किल हालातों से जिरह करते और अपनी आत्मा की पड़ताल करते समझ आते हैं। इनमें कुछ सवाल हैं जो ईरान की ज़मीन से उठते ज़रूर हैं पर पढ़ने में वे हमारी जड़ और ज़मीन के सवाल लगते हैं। दुर्भाग्यवश इनकी मृत्यु 2022 में कोविड-19 से बीमार होकर इलाज के दौरान हुई।
गोलियों का दुभाषिया
भाषा आख़िर क्या है?
और जंग का
दूसरी भाषा में मतलब
क्या होता है?
दर्द क्या है?
और आँसुओं का तर्जुमा क्या है?
ज़रा अपनी तर्जनी ट्रिगर से हटा दो तो!
फ़ौजी! गोलियों के दुभाषिए!
मैं तुमसे बात कर रहा हूँ,
ओ जंग, ओ जंग, ओ जंग!
तुम सारी भाषाओं को ढहा देती हो
और बम
इंसान की नफ़रत की आदत
को बिखेर देते हैं
किसी भी भाषा में।
किसी संकरी खंदक का अंधेरा
एक ज़ाहिर-सा सवाल हूँ मैं
किसी अँधेरी दुनिया में
क्या मुझसे बढ़कर ख़ुश हो तुम?
क्या तुम मुझसे भी ज़्यादा ख़ूबसूरत हो?
या कि तुम मुझसे भी ज़्यादा तन्हा हो?
आख़िर इस फ़र्क़ से भी क्या फ़र्क़ पड़ता है?
कि चाहे काबुल में एक खोपड़ी पड़ी हो
या कि वॉशिंगटन में!

सिमिन बेहबहानी की कविता
सिमिन बेहबहानी (1927-2014) ईरान की एक अत्यंत सम्मानित कवयित्री थीं जिन्हें ‛ईरान की शेरनी’ के नाम से जाना जाता था। वे राष्ट्रीय सत्ता के प्रति अपने मुखर और साहसी विरोध के लिए प्रसिद्ध थीं। उनकी 600 से अधिक कविताओं में दमन और हिंसा के प्रति कड़ा विरोध व्यक्त किया गया है।
मेरे देश, मैं तुम्हें फिर से बनाऊँगी
(पर्शियन क़िस्सागो महिला सिमिन दानेशवर के लिए)
मेरे देश मैं तुम्हें फिर से बनाऊँगी
अगर ज़रूरत पड़ी तो अपनी ज़िंदगी की ईंटों से
अगर ज़रूरत पड़ी तो मैं अपनी हड्डियों से
स्तंभ गढ़ूँगी, जो तुम्हारी छत को सहारा दें।
मैं तुम्हारे नौजवानों के हक़ में खिले गुलों की ख़ुशबू में
दोबारा से साँस लूँगी।
मैं दोबारा अपने आँसुओं की बारिश से तुम्हारे जिस्म पर जमा सारा लहू धो डालूँगी।
एक और बार, अँधेरापन यह घर छोड़कर चला जाएगा।
मैं आसमान का नील लेकर अपनी कविताओं को नीला रंग डालूँगी।
‛बूढ़ी हड्डियों’ को जिलाने वाला, मुझे बतौर ईनाम
अपनी परखी हुई ज़मीनों में से, पहाड़ों की शान देगा।
शायद मैं बूढ़ी हूँ, लेकिन अगर मुझे मौक़ा दिया जाए
तो मैं सीखूँ।
मैं जी सकूँ एक दूसरी नौजवानी अपनी औलादों के साथ-साथ।
मैं ‛मुहब्बत और मुल्क’ के हदीस को पुरजोश से पढ़ूँ
कि जिसका हर लफ़्ज़ ज़िंदगी से लबरेज़ हो।
मेरी छाती में यहाँ अब भी एक आग जला करती है
भाईचारे की गर्माहट को अमर बनाए रखने को
जिसे मैं अपने लोगों के लिए महसूस करती हूँ।
एक और बार, जो तुम मुझे ताक़त सौंप दो
हालाँकि मेरी कविताएँ ख़ून में सन चुकी हैं
एक और बार, मैं तुम्हें अपनी ज़िंदगी से बनाऊँगी
हालाँकि यह मेरी औक़ात से बाहर की बात है।
अज़ीता घरेमान की तीन कविताएँ
अज़ीता घरेमान ईरान के मशहद शहर में जन्मी एक ईरानी-स्वीडिश कवयित्री हैं। उनकी अब तक छह किताबें फ़ारसी में और तीन स्वीडिश में प्रकाशित हैं। उन्होंने अमरीकन कविताओं के ख़ूब अनुवाद भी किए हैं। उनके पति सोहराब रहीमी भी एक ईरानी कवि थे जिनकी मृत्यु एक कार हादसे में हो गई थी। अज़ीता लगातार लिख रही हैं।
यहाँ कोई नहीं है
ख़ामोशी
उभरती है मौत की निर्मम आँखों में
कपासी जूते पहने हुए
और एक कड़वी बूँद पानी की टपकती है
तुम्हारी चाय की प्याली में
यहाँ कोई हाथ नहीं है जो
एक लम्बा सुर्ख़ लाल धागा बुनता
शाम के सिंदूरी आसमान से
और एक सुरीली नन्ही चिड़िया का चित्र खींचता
भुलावे के परदों पर
वहाँ कोई भी नहीं है
और घड़ी की टिक-टॉक की आवाज़
घर के माथे पर
ऐसे लगती है जैसे घाव की धुकधुकी की आवाज़।
चंद सरल वाक्य
हवा पीछे हटती है
समंदर क़दम वापस लेता है
कुछ घटता है कोने में कोर्ट के
चंद सरल वाक्यों में;
पीली रेत में गुलाबी धब्बे
और कुछ जलती मोमबत्तियाँ चिड़ियों के गीत में।
हताशा
एक अंधे आदमी जैसे
छूते हो तुम पलों की दीवार को
तुम घर से निकलकर सड़क पर टहलते हो
और दंभ
एक लंबी स्कर्ट का विस्तार है
जो एकरस सरसराहट को
तुम्हारे साथ लाता है
सूखे पत्ते और घास
काग़ज़ की कतरनें और धूल
यह एक दियासलाई है
जिसे तुम लिए चले आए
रौशनी गुलज़ार करने को
एक शहर में जिसका कि कॉलर
महकता है पतझड़ के बाद
और एक मक़ान है
जिसके हाथ बर्फ़ के हैं।

फनौस बहादोरवंद की पाँच कविताएँ
दक्षिण पश्चिम ईरान के मस्ज़िद सोलेमान में जन्मीं फनौस बहादोरवंद की कविता का मूल स्वर आज़ादी, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय है। वे अंग्रेज़ी की अध्यापिका हैं और वे अनुवाद भी करती रहीं हैं। मुख्य रूप से उन्होंने फेदेरिको गार्सिया लोर्का की आठ कविता पुस्तकों और पाँच नाटकों का अनुवाद किया है।
आज़ादी
तब तलक नहीं मरेंगे
निर्दोष शब्द
ज़हरीली उँगलियों के अंदर
कविता चढ़ती है जहाँ
तुम्हारे साथ-साथ।
स्वाधीनता
ओह स्वाधीनता
ओ अविश्वसनीय मौजूदगी
पढ़ो एक कविता
ज़्यादा खूबसूरत
नरकुल की फुनगियों से।
सवाल
क्या प्यार एक छोटा रास्ता नहीं था?
क्या तुम देर से पहुँचे या मैं?
वहाँ…खारे पानी की झील के पास
या यहाँ…
मेरी खुली बाँहों के पास!
काश रात ढलती
काश बारिश आती
मैं लाती तुम तक आख़िरी लालटेन।
कविता और वह शख़्स
यह रात थी और वह शख़्स
रात के पहरुए के पाँव नहीं थे
औरत ने अपने हाथ बढ़ाए
और उसके लंबे हाथों पर रख दिए
चाँदनी में
वह शख़्स केवल होंठ था और आवाज़
आवाज़ होठों तक आई
समझदारी तक कविता
और सन्नाटे तक रात
चाँदनी गुम हो गई
एक बेचैन काले बादल के उकसावे के अँधेरे के पीछे
शख़्स केवल होंठ था और आवाज़
और उफनते हुए हाथ
रात में
औरत कुछ नहीं थी सिवाय
एक सपनीली नन्ही-सी लालटेन के
दरअसल असलियत कुछ और ही थी
वह शख़्स रात को एक कविता में खींच लाया था।
मेरी स्त्री
मई मुझे पागल बना देती है और आततायी भी
और पीछे से क़रीब पचास स्त्री नक्श
और सैंतालीस रुकावटें
जब भी मैं तुमसे मिलती हूँ
मैं अमीर होती हूँ
मैं सेब का गुलाबी फूल उठाती हूँ
आधा तुम्हें थमाती हूँ और आधा खुद चबा लेती हूँ
अगली मई तक।
अगले जन्म तक।
मैं सिलती हूँ रेशमी पोशाक सेब की ख़ुशबू
और सेब के फूल के इत्र से लबरेज़
और यक़ीन करो, चाँदनी के फूल कानों में पहनती हूँ
तुम भी
अपनी आँखें अधखुली रहने देना
जब तक मैं बम फटने की आवाज़ सुनना बंद नहीं करती
बच्चों की चीखें और ताड़ के पेड़ों का टूटना
जब तक तुम अपनी आँखें मूँद न लेना
मेरी उँगलियों के घावों पर।

परनिया अब्बासी की एक कविता
परनिया अब्बासी ईरान की उभरती हुई कवयित्री थीं, जिनका परिवार और वे ख़ुद भी इज़राइल द्वारा किए गए हमलों में मारे जाने वाले शुरुआती लोगों में से हैं। अभी वे गहन करुणा, संवेदना और आत्म-आधारित व्यंजनाओं की कविताएँ लिख ही रहीं थीं कि वे युद्ध की विभीषिका का शिकार हो गईं। वे ईरानी जेन-ज़ी पीढ़ी की प्रतिनिधि कवि कही जा सकतीं हैं।
बुझा हुआ सितारा
मैं रोई हूँ दोनों के लिए
तुम्हारे लिए
और मेरे लिए
तुम फूँकते हो
सितारों को
जो मेरे आँसू हैं
तुम्हारे जहान में
रौशनी की आज़ादी है
जबकि मेरी दुनिया
परछाइयों का पीछा करती है
तुम और मैं एक अंतिम छोर पर आएंगे
कहीं,
दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत कविता
जहाँ चुप्पियों में तब्दील हो जाएगी
तुम शुरुआत करोगे
कहीं तो
चीख़ने की
ज़िंदगी की सरग़ोशियों पर
लेकिन वहीं पर अंत होगा मेरा
अभी मैं धधकती हूँ
किसी रोज़ मैं एक बुझा हुआ सितारा
हो जाऊँगी
तुम्हारे जहान में से
उठते
धुएँ की तरह।

मेहरी रहमानी की कविता
1950 में तेहरान में जन्मी, मेहरी रहमानी ईरानी कवि, लेखक, आलोचक और शोधकर्ता हैं। वे तेहरान विश्वविद्यालय में बायोलॉजी में एम एस हैं। उनके चार उपन्यास प्रकाशित हैं और उन्होंने अनेक किताबें मनोविज्ञान पर लिखीं हैं। उनके कविता संग्रह हैं : मैं ख़ुद के जैसी हो रही हूँ, बिग बैंग का संदेह, मृतक सोहराब, अनजाना कौन है।
तन्हाई में मेरी परछाई
तंदूर में
तन्हाई का पकवान सिंक रहा है
कोई एक, आतिशदान के क़रीब
बर्फ़ गिराए जा रहा है
कुछ अजनबी इस घर में
मिलकर छत डाल रहे हैं
उनमें से हर एक
खासी दूर की स्मृति में अनूठा है।
चमचों की आवाज़ें सुनी जा रही हैं
तन्हाई के कमरे से
फ़ासले के वक़्त में
खाने की मेज़ पर बिखरी हैं
अनचाही किताबें
मकई जितनी बर्फ़ आँखों में पड़ती है
बर्फ़ की लपटों से निकलती हुई।
माइक्रोवेव बज उठता है
मैं दस्ताने उठाती हूँ
कुछ कटा है।
वह वापस आ चुकी है
एक सपने से
जिसमें उन्होंने फूल रोपे थे
सरहदों पर
जब वह सरहदों पर होती है।
कँटीला तार उसकी स्कर्ट चीर देता है।
फूल चीख़ उठते हैं
और पंखुड़ियाँ कँटीली बाड़ पर
टंगी रह जाती हैं
एक दिवास्वप्न है
आईना मुझे ख़ुद को वापस सौंपता है
और मैं खिड़की के पीछे,
सड़क के लोगों तक
कई गुणा करती हूँ।
मेरी सब तस्वीरें
मेरी फ़ैमिली एल्बम के बाहर
निकलकर चलना शुरू कर देती हैं।
सड़क मेरे होने से भरती है
और आईना अब तलक सोचता है कि उसे
मुझे वापस लौटा दिया गया है
आईना, जिसने मुझे कभी देखा ही नहीं।
तुम्हारी हर नज़र से दो बर्फ़ीली गेंदें, मेरी आँखों में पिघलती हैं।
तुम्हारे हाथों में छुअन ठहरती है।
मैं ख़ुद को ऊँचा करती हूँ
मेरी परछाईं आती है
और तुम मेरी परछाईं के संग हो जाने को तैयार हो जाते हो।

माना आघी की कविता
माना आघी 24 अगस्त 1973 बशहर, ईरान में जन्मीं। माना जानी-मानी ईरानी-स्वीडिश कवि, अनुवादक, पॉडकास्ट निर्माता एवं ईरानी भाषा की विद्वान हैं।
चाहे जो भी आए
अपनी बाँहों की ख़ामियों के बारे में क्या कह सकती हूँ मैं?
मैंने क़ुबूल कर लिया है कि यह रात मेरे सब्र से कहीं ज़्यादा लंबी है।
और चाँद तुम्हारे लिए देखे गए ख़्वाब से कहीं ज़्यादा दूर है।
मैंने क़ुबूल किया है कि ख़यालात जिस्म के बाहर ज़िंदा रह सकते हैं।
जिस्म जो भटकता है हज़ार जगहों पर
धरती की गोलाई, मैंने ख़ुद से इस्तीफ़ा दे दिया है।
और जो कुछ भी हम दोनों तक दोबारा गुज़रता हुआ पहुँचता है
मैंने क़ुबूल किया है कि ग़ैर मुमकिन भी तसल्लीबख़्श हो सकता है।
अगर समय पीछे करवट बदल ले
जैसे कि ईसा के पहले होता है
तो मैं अपने आने वाले वक़्त के होंठों को खोज सकूँगी
इश्क़ तुम्हारी निगाहों में
सच तो यह है कि आईना तुम्हारी ख़ूबसूरती को दोहरा करने को राज़ी नहीं है।
सच कि मैं बौनी दिखती हूँ अपनी ख़ुद की उस डेस्क के छोर से
यह धरती के चुम्बक का दोष नहीं है।
मैं क़ुबूल करती हूँ कि हर दायरा दमघोंटू है
और उसका व्यास हालात को केवल बेहतरीन तरीक़े से काट सकता है
दो बराबर हिस्सों में।

शीमा कलबासी की कविता
शीमा कलबासी का जन्म 20 नवंबर 1972 को तेहरान ईरान में हुआ। वे एक ईरानी-डेनिश-अमरीकन कवि, लेखक हैं जो स्त्रीवाद, युद्ध, शरणार्थियों, मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए काम करती हैं। साथ ही वे औरतों के मुद्दों पर केंद्रित फ़िल्म निर्माता भी हैं। और महिला अधिकारों, अल्पसंख्यक अधिकारों और बाल अधिकारों के लिए काम करती हैं।
मेरे आँसुओं की जेबों में
ओ ऑरलैंडो!
याद करो वह रात जिसमें हम नाचे थे
ख़ामोशी से रेत के ऊपर जहाँ संगीत
बजता था। तुम्हारे अल्फ़ाज़
आवारा थे, धीमे से कहे गए
मेरे कानों की जेबों में
ओ एस्फाहान!
तुम्हारी फ़िरोज़ी नीली मस्ज़िदें
और प्रेमी जायंदेहरूड नदी की रेत में छिपते हुए
और इस पर छाए नीले शिकारी
आकाश में, अभी तक शहद
जादू करते थे जब वे शांति से
उचारे जाते थे
मेरे कानों की जेबों में
समय अनंत है, मेरी पहचान
तुम्हारी पहचान में रहती है और तुम्हारे
लफ़्ज़ करिश्माई हैं जिन्हें मैं
बेशक़ीमती सिक्कों की तरह गिनती हूँ
जो कि सहेज कर रख दिए जाते हैं
मेरे आँसुओं की जेबों में।

इस्माइल खोई की कविता
इस्माइल खोई ऐसे ईरानी कवि और लेखक रहे जिनको ईरान से निर्वासन दे दिया गया था। वे 1980 से ब्रिटिश गणराज्य के वासी हो गए थे। साहित्य के लिए दिए जाने वाले ‛कोबर्ग रुकुर्त पुरस्कार’ को हासिल करने वाले वह पहले ईरानी लेखक थे। उनकी मृत्यु लंदन में 25 मई 2021 को हुई।
फ़रोग़ की क़ब्र से
मैं लौट रहा हूँ फ़रोग़ की क़ब्र से
ग़मगीन
मैंने कभी देखा नहीं
कोई बादल
बिखेरे हुए अपने हज़ारों रेशे शोक के
तन्हा लोगों के अजनबी दायरे पर
इस तरह मेहरबान
और ऐसा दरियादिल
क्या हमें रोना चाहिए
एक इत्तेहादी गाना गाते हुए
एक शोकसभा में
मैं मौत को जानता था
एक फ़ासले से
हाँ लेकिन किस तरह
उस बेहद ख़ुशबू को
उसके वजूद से थाम सकते हो
मैं यक़ीन नहीं कर सकता
मैं यक़ीन नहीं कर सकता
कि वह आँसू बहाता हुआ बादल
कोई झूठ है।

अली बाबाचाही की कविता
अली बाबाचाही उत्तर आधुनिक ईरानी कवि, लेखक, आलोचक हैं। इनकी रचित विविध विधाओं की 50 से अधिक साहित्यिक कृतियाँ प्रकाशित हैं। इसी वर्ष फ़रवरी 2026 में इनका निधन हुआ है।
समकालीन ईरानी कविता के प्रमुख व्यक्तित्वों में से अली बाबाचाही एक थे और दर्जनों कविता संग्रहों की रचना करने के अलावा उन्होंने समकालीन कविता पर अनेक शोध और आलोचनात्मक रचनाएँ भी प्रकाशित कीं। उनकी सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली और प्रसिद्ध रचनाओं में ‛अशांत स्थान में’, ‛दुनिया और उदास रोशनी’, ‛सूर्य के वंशजों से’, ‛मेरा चेहरा बहुत संदिग्ध है’, ‛फ़ारसी खाड़ी के पानी में पिकासो’, ‛वे अपने तरीक़े से प्यार में पड़ते हैं’, ‛अनार का बाग़ीचा इस तरह है’, ‛नार्सिसस से भरी गुफाओं में’ और ‛यह रहस्यमयी जहाज’ शामिल हैं।
बाबाचाही उन लेखकों और बुद्धिजीवियों के समूह में भी शामिल थे जो 1997 में तथाकथित ‛आर्मेनियाई बस’ घटना में शामिल थे। यह घटना इस्लामिक गणराज्य की ख़ुफ़िया सेवा के आदेश पर एक घाटी में गिरने वाली थी, लेकिन अंतिम क्षण में यात्रा कर रहे लेखक अपनी जान बचाने में कामयाब रहे।
जब तक नहीं लौटतीं तुम
मैं तुम्हारी वापसी का ऐसे ख़्वाहिशमंद हूँ
जैसे कि कोई बच्चा होता है
नवरोज़ की छुट्टी वाले दिन की सुबह को,
या एक अबाबील होती है
बहारों की किसी दोपहर में;
और मैं,
तुम्हें देखने की ख़ुशी की ख़ातिर
तुम्हारे आईने में इस कदर समाया हुआ हूँ
मानो दुनिया मेरे साथ-साथ बीतती जाती हो
जब तलक मैं अपना सिर पीछे नहीं मोड़ता हूँ।
ख़ूँरेज़ मौसम में भी
कोई इश्क़ में पड़ सकता है।
मैं आशिक़ फ़ाख़्ताओं से जलता हूँ
जो अपने पंख पसार रही होती हैं
उम्मीद को समेटने की ख़ातिर,
और मैं सितारों और बारिशों से भी जलता हूँ
जो तुम्हें चूम लेते हैं
चाँदनी से रौशन तुम्हारे चेहरे को
और मैं एक गुल हूँ
जो तुम्हारी रुख़सती पर खिलता है
ख़ूँरेज़ मौसम में भी
कोई इश्क़ में पड़ सकता है।
जब तक तुम नहीं लौटतीं
या बहार के मौसम में नहीं आतीं
या सूरज से नहीं ढलकतीं
यह दिन
एक ताबूत है
बादलों के कंधों पर रखा हुआ
हमें ले जाता हुआ
अनदेखे क्षितिजों तक;
और प्यार
अपने किसी क़रीबी की मौत है
जो अपना सिर बारिश के कंधों पर टिकाए है।
आओ!
आग के जिस्म के साथ आओ!
बिजली के इरादे के साथ
आह!
मैं तुम्हें फिर से कहाँ देख सकता हूँ
ओह रौशन सितारे?
तुम्हारे बग़ैर
मैं उम्रदराज़ हो जाऊँगा
जब तक रात की चहलकदमी का वक्त आएगा।
जैसे ही तुम लौट आती हो
ये सितारे प्यार में डूब जाएँगे
और जवानी
लौटती रहेगी
बारिशों के संग।

गोल चक्कर वेब पत्रिका अत्यंत सीमित संसाधनों से चल रही है। इस वेबसाइट के संचालन में आर्थिक सहयोग देने हेतु दिए गए क्यू आर कोड का उपयोग करें :

प्रिया वर्मा कवि-कथाकार एवं अनुवादक हैं। उनके अब तक दो कविता संग्रह ‘स्वप्न के बाहर पाँव’ (2023) और ‘एक पंक्ति के लिए’ (2026) प्रकाशित हो चुके हैं। अपने पहले कविता संग्रह के लिए उन्हें युवा कविता का प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार (2024) प्राप्त हुआ है। ईमेल : itspriyaverma@gmail.com
इस प्रस्तुति में प्रयुक्त सभी तस्वीरें Pinterest से ली गई हैं जिनके लिए हम इन तस्वीरों के फोटोग्राफर्स के आभारी हैं।
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