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आज की ईरानी कविताएँ
जब वह सरहदों पर होती है।
कँटीला तार उसकी स्कर्ट चीर देता है।
फूल चीख़ उठते हैं
और पंखुड़ियाँ कँटीली बाड़ पर
टंगी रह जाती हैं


गौरव कुमार की कविताएँ
नाम लिखता हूँ तुम्हारा
काग़ज़ पर
बनाता हूँ हवाई जहाज़
और उड़ा देता हूँ उसे आसमान में
कुछ इस तरह निरंतर
मैं तुमसे दूरियों का अभ्यास करता हूँ।


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