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गौरव कुमार की कविताएँ

May 24
4 min read

Updated: May 27



पगडंडियाँ


हम जंगलों के बीच से कभी सड़कें नहीं बनाएंगे 

हम बनाएंगे पगडंडियाँ

ताकि मेरे तुम्हारे वहाँ से गुज़रने पर

कोई पौधा, कोई पेड़, नाराज़ न हो

वह मनाए जश्न और दे तोहफ़े में हमें

फूल और पत्तियाँ

हमारा कहीं से गुज़रना 

हमेशा सृजन को जन्म दे।




तुम्हारा आना


तुम्हारा कहीं दूर से चलकर आना हमेशा ऐसा होता है

जैसी आती है बरसात बूंदों के झुंड के साथ

और कर जाती है मन गीला

जिसमें फूट पड़ती हैं कलियाँ 

सफ़ेद, गुलाबी और जामुनी फूलों की

धीमी-धीमी हवा लगती है

ख़ुश्क मौसम भी हरे होते जाते हैं

होता हूँ किसी पहाड़ी पर मैं बादलों के बीच

तुम्हारा इंतज़ार करते हुए।




धूप


धूप में चलते-चलते 

हमारी परछाइयों का एक हो जाना

देता होगा छाँव कितने ही कीट-पतंगों को

उन्हें लगता होगा घर आ गया

ठीक वैसे, जैसे मैं सोचता हूँ 

तुम्हारे साथ वहाँ खड़े-खड़े।




अभ्यास 


नाम लिखता हूँ तुम्हारा 

काग़ज़ पर

बनाता हूँ हवाई जहाज़ 

और उड़ा देता हूँ उसे आसमान में

कुछ इस तरह निरंतर 

मैं तुमसे दूरियों का अभ्यास करता हूँ।




निशान 


बस एक किताब

या उसमें गुम कहीं किसी पेड़ का एक पुराना पत्ता 

जो टूट गया था शायद वक़्त से पहले

रोया था पेड़ जिसके लिए बरस भर


या बस एक फूल 

या उससे जुड़ी

हर वो पंखुड़ी

जिसे तोड़ा किसी बच्चे ने 

और खेलते-खेलते हो गया बोर

उठा लिया गया किसी गोद में 

फूल वहीं रहा इंतज़ार में खेलने के 


हम?

या हम मिले जहाँ 

वे तमाम जगहें 

जहाँ छूटता रहा

मेरे तुम्हारे मिलने का निशान।




मुझे ख़्वाब काफ़ी था


मुझे ख़्वाब काफ़ी था

वास्तविकता की रेखा पर चलना उसकी पहली पसंद

मेरा मकान बादलों पर था

आसमान के पानी में

मुझे गोते खाना पसंद था

मेरे पंख थे


मुझसे कहा गया—

तुम्हें लौटना होगा

पथरीले सच पर

बसानी होगी सूखी घास की झोपड़ी 

बंजर ज़मीन पर


कहा गया यह भी

कि तुम बुझा दो

यह कल्पना की लालटेन 

मार दो उस जुगनू को मच्छर की तरह

एक ही बार में ताली पीटकर 

जो उड़ता है बेलगाम और तुम्हें बादलों तक ले जाता है


मैंने सब सुना और एक योजना बनाई

वास्तविकता से ख़्वाब को मिलवाया 

दोनों साथ बैठे

घंटों बातें कीं

ख़्वाब एक दिन उसके लिए फूल ले आया

दोनों ने मिलकर उसे बंजर ज़मीन पर उगाया 

पानी दिया, धीरे-धीरे ज़मीन पर बाग़ीचा दिखने लगा 

तितलियों का वहाँ घर हो गया

जहाँ उनसे मिलने जुगनू अक़्सर आने लगे

अब तक सूखी घास की झोपड़ी हरी हो गई थी

वास्तविकता अब ख़्वाब के बिना कहीं नहीं जाती 

वे अब ज़मीन और आसमान दोनों जगह रहते हैं


मेरा घर अब भी बादलों पर ही है

वहाँ हम तीनों ख़ूब गोते मारते हैं

और हरी झोपड़ी में बैठकर ख़ूब गप्पे लड़ाते हैं


उसकी तरह कभी-कभी मैं भी अब 

वास्तविकता की रेखा पर चलता हूँ

ख़्वाब की उँगली पकड़कर।




बाँबी


सारे कारज करै-करै

और मैं बेहतर हो जाऊँ

एक सांझ बीते नहीं

अगली सवेर को ललसाऊँ


कहूँ ऊँचा 

नीचा सुनूँ

जिज्ञासा का तार काट

मैं मस्त मस्तिष्क में सुस्ताऊँ


बतियाँ सब धुँधला जाएँ

मौन-सा जग भर छा जाए

कुरेदूं नहीं, उखाड़ूं नहीं

बस तृप्त ज्ञान से हो जाऊँ


क्या है ऐसा घटना मुमकिन

क्या है ऐसे पिसना मुमकिन

क्या सीख-सीख की दिनचर्या में

गिनती आएगी बिना तारे गिन


क्या खोल लूँगा रहस्य ताला

लगा बिन ब्रह्म की चाबी को

क्या मोक्ष मिलेगा कभी मुझे

बिन खोजे चींटी की बाँबी को?




बेहूदापन


कैसा बेहूदापन है ये

आवारा तुम मशगूल हुए

तुमको नहीं यह सुहाता है

तुम्हें समय कहाँ बिताना आता है


तुम तो रोज़ अलसाते थे

तुम्हें काम करने कहाँ आते थे

मटरगश्त थे इक नंबर के

ज़हनी बातें थोड़े न करते थे


आज सुरूर चढ़ा मेहनत का

मोहल्ले से तुम निकल गए

कॉटन कोमल से पैरों में

साले छाले कैसे पड़ गए


देखो! समय बहुत है लौट आओ

बेमतलब की चोट न खाओ

राह आड़ी जो ली है तुमने

उसे वहीं पर छोड़ आओ


अरे! आओ ठठ्ठे अपन लगाएंगे

बैठ चना चबाएंगे

चाय के घूट पिएंगे मिलके

बातों के तीतर 

ख़ूब लड़ाएंगे


मत रहो मशगूल मेरी जाँ

तुम्हारी यह तासीर नहीं

आवारा हो, आवारा रहो

यह बेहूदापन तक़दीर नहीं।


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जयपुर के युवा रंगकर्मी गौरव कुमार की कविताओं के प्रकाशन का यह प्राथमिक अवसर है। गौरव साल 2017 से थिएटर और फ़िल्म निर्माण में सक्रिय हैं। वे कला की बारीकियों और उसकी यात्रा में विश्वास रखते हैं क्योंकि उनका मानना है कि ‘सब कुछ प्रक्रिया (process) में ही है।’ गौरव की शॉर्ट फिल्म 'डकैत' ने मेक्सिको, फ्रांस, चीन, इटली और न्यू जर्सी जैसे कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स का सफर तय किया है। कम्युनिटी थिएटर में रुचि के चलते उन्होंने अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन से 'थिएटर फॉर सोशल चेंज' फेलोशिप की और समाज से जुड़े विषयों पर काम किया। हाल ही में उन्होंने नाटक 'लपूझन्ना' में 'लफत्तू' का किरदार निभाया और 'मन माना' जैसे प्रोजेक्ट्स से जुड़े रहे। गौरव अपनी इस रचनात्मक यात्रा को एक ‘रोलरकोस्टर राइड’ की तरह देखते हैं जिसे वे निरंतर जारी रखना चाहते हैं। इस प्रस्तुति में प्रयुक्त रंगमंच की सभी तस्वीरें देवेश पथ सारिया द्वारा ली गई हैं। इन तस्वीरों में गौरव कुमार को लफत्तू के किरदार में देखा जा सकता है।

2 Comments


योगेन्द्र पाण्डेय
May 24

बहुत अच्छी और भावपूर्ण कविताएं हैं...

पढ़ कर अच्छा लगा 🥰

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ललन चतुर्वेदी
May 24

बहुत अच्छी और प्यारी कविताएँ. कविता जैसी सुगठित .

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