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नटनी का बारा
हम आँसुओं में पिघल जाएँ तो नाच और करतब दिखाना कैसे संभव हो? एक जगह से दूसरी जगह जाना कैसे संभव हो? बेवकूफ लड़का! हम में ठहराव खोजता है।


रवि राहगीर की कविता
माड़ की छोरियाँ
प्यार करने की तगड़ी सजा पाती हैं
कूटी जाती हैं
पीटी जाती हैं
उन्हें डाँट पिलाई जाती है :
“छोरी तू तो हमारा नाम डुबाकर छोड़ेगी
खानदान को कतई पैंदे में ले जाएगी।”


दहकते इश्तिहार
उसे पता था कि ये इश्तिहार उसके लिए नहीं हैं। न तो उसका मतदाता पहचान पत्र है और न ही जेब में रुपये।


गौरव कुमार की कविताएँ
नाम लिखता हूँ तुम्हारा
काग़ज़ पर
बनाता हूँ हवाई जहाज़
और उड़ा देता हूँ उसे आसमान में
कुछ इस तरह निरंतर
मैं तुमसे दूरियों का अभ्यास करता हूँ।






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