top of page

नटनी का बारा

Jul 28
22 min read

Updated: Sep 11



नटनी का बारा
कहानी : धर्मेन्द्र कुमार सैनी 

म्यूजियम से निकलकर संजीव ने अपने को व्यवस्थित किया। किसी ऊपरी तहखाने को जाते अनेक घुमावदार कंदरानुमा सँकरे मार्ग से निकलते वक्त दीवाल की रगड़ खाने से शर्ट पर गहरा धब्बा बन गया था। गाड़ी पार्क की हुई थी। एक बार पुनः उसकी निगाह म्यूजियम और मूसी महारानी की छतरी की तरफ उठ गई। स्वच्छंद विचरण करते बारहसिंगा की पीड़ा से मन उदास जरूर हुआ, लेकिन जिस जगह को लेकर उत्सुकता थी, उसकी कल्पना मात्र से मन पुलकित हो उठा। जैसे वह चहक ही पड़ा। वर्षों की प्रतीक्षा और तलहटी में बसी वे कंजी ऑंखें...। 


उसने गाड़ी से एक पुराना चम्बा रूमाल निकाला और प्रयास किया कि किसी तरह धब्बे को शर्ट से हटाया जा सके। सहज जुगत यही है, रूमाल के कोने पर थोड़ा पानी लगाकर धीमे-धीमे रगड़ा जाए। यही सोचकर पानी की बोतल निकाली और एक कोना भिगो लिया। कामयाबी मिली तो सही, किन्तु पूर्णतः नहीं। हल्का फीका दाग धूसर मेघ के शिशु-सा झाँकता अभी भी शेष रह गया। पर बिना गौर किए चलने लायक था। गाड़ी बैक की और वह चल पड़ा। अब यहाँ से अनजान नहीं था वह। पूर्व में सब कुछ देखा-भाला था। 


मंजिल तक कल्पनाओं में खोकर जी लिया जाए—वहाँ कुछ होगा? कुछ तो अवश्य होगा। पहाड़ होंगे, निशान, पुल, मंदिर होंगे, वो झाड़ी होगी, बुलबुल होगी, घोंसला होगा और दाना डालते हाथ…वहीं तो होंगे। मैं प्रेम नहीं करता। फिर भी मन अनायास खिंचा आया? उसकी नजरों में था प्रेम। हाँ, शायद। लौटने की बात पर पलकें झुक गई थीं। मैंने उन आँखों को नहीं देखा। मतलब देखा था, बस करीब से नहीं देखा। 


वर्षों पहले आया था वह। ठीक-ठीक याद नहीं, लेकिन चार बरस के करीब हो आए। अनचाहे उन ग्रीष्म हवाओं से दिल लगा बैठा था। वे जलाती नहीं थी, बल्कि पहाड़ों से उतरकर शुष्क तन को ठंडक पहुँचाती थीं। स्वेद से निचुड़ती शर्ट से जब लू टकराती तो शीतल झोंका भीतर प्रवेश कर जाता। और आहिस्ता उसका मन एक सुकून भरी 'आह' के साथ शून्य पर खोने लगता। जैसे सम्पूर्ण कायनात नजरों से होती हुई उसके हृदय पर दस्तक देने लगती कि तुम इन्हीं के सहयात्री हो। क्या हो गया जो चार बूँदे जमीं से टकरा गईं। उसे देख! वह जलकर भी पहाड़ पर चढ़ती है। 


समक्ष कुछ दृष्टिगत हुआ तो एकाएक विस्मृतियों से वर्तमान में लौट आया—यह वही बस स्टैंड है, जहाँ से उसने उस जी-पसंद जगह की दौड़ की है तकरीबन महीने भर तक। और पिता का नितांत करीबी सखा, जहाँ से रोज सवेरे बस के साथ पिता का रोमांचित सफर शुरू होता और देर रात्रि पूर्ण। पिता की उन नम आँखों में बसा यादों का शहर देखने वह उन दिनों रफ्तार से अधिक दौड़ता रहा। लेकिन पिता का स्नेह कहीं और रहा और उसका लगाव कहीं और। 


दूर से इसी तरह दिखती थी पहाड़ियाँ। भीगती थी सड़क और आस-पास लहराते एवं दूर-दराज के तरुओं की मखमली शाखाएँ। वावो! फैंटास्टिक! सालों में परिवर्तन नहीं आया। आया तो भी क्या दूरियाँ बतला सकती हैं? शायद नहीं। झुलिया...


वह प्रथम बार आया तब अलवर रेलवे जंक्शन पर उतरा था। बिल्कुल इस तरह जैसे कोई फिल्मी नायक अजनबी जगह जाकर ट्रेन से उतरता है। मुंबईया शैली स्वरूप दाहिने कंधे पर बैग, आँखों पर गॉगल्स, कानों में क्वालिटी इयरफोन और स्पोर्ट्स जूते। एक नजर दरवाजे से बाहर झाँककर पहले दाएँ और फिर बाएँ देखा था उसने। शायद अंदाज लगाया था कि उतरकर किस ओर चलना है? थोड़ा ऊपर मुख किया तो सूर्य की एक चिलकती किरण उसके ललाट को चूम गई। 


फिक्र नहीं, जगह की पहचान करने का आसान तरीका है फ्लाईओवर। पिता ने उँगलियों में एक-एक चीज गिना रखी थी। यह अलग बात है—अनजान जगह दिमागी मानचित्र विपरीत दिशाओं में स्थित देशों को भी पड़ोसी देश बता देता है। अथवा मकड़जाल की तरह उलझाकर रख देता है। तब एक ही उपाय काम आता है, किसी से पूछ लिया जाए। 


उसने बाहर चाय वाले से पूछ लिया-‌ "हेलो डिअर! नटनी का बारा के लिए साधन मिलेंगे यहाँ?"


"पहले स्टैंड जाओ।"


"तो स्टैंड के लिए बता दो।"


"कोई भी ई-रिक्शा छोड़ देगा। उधर से।" तभी उसे कुछ याद आया- “ऐसा करो, काली मोरी चले जाओ, वहाँ से भी बस मिल ही जाएगी सूटासूट।”


सिर्फ यही जानकारी थी उसकी यहाँ पर। बाकी वह स्वतः ही पहुँचता गया। शहर को चीरते हुए बस की गति अपने पीछे कई सर्किल गुजार चुकी। और कटी घाटी से निकलकर सपाट सड़क पर आ चुकी, उसे कल रात्रि सुना हुआ गाना याद आ गया। वह धीमे-धीमे गुनगुनाने लगा- "कोई ना कोई चाहिए..."


"अभी तो जनाब टिकिट चाहिए।" कंडेक्टर मुस्करा दिया। 


कभी पापा की दौड़ भी इसी तरह होती होगी। मन किया, अभी कह दे- “मेरे पापा भी इन्हीं राहों के रिटायर्ड ड्राइवर हैं।” परन्तु कितने वक्त की बात हो गई। ये परिचित होंगे भी या नहीं। मुझे उन मार्गों पर चलना है तो बिना टिकट नहीं। टिकट लेकर यात्रा करने का आनंद ही कुछ और है।"कैसी अपोजिट लाइन है तुम्हारी” कोई शातिर होता तो विरक्ति भाव कह उठता। अभी हौले-हौले रोडवेज चलने दो। और मुझे फिर किसी गाने की मधुर पंक्तियों से गुजर जाने दो। 


आत्मविस्मृत दस-बारह मील का सफर, वह बिल्कुल रूखे ऊँचे स्थान पर उतर गया। या कहिए कि कंडेक्टर की टेर- “'नटनी का बारा वाले आगे आ जाओ” से वह आगे आ गया। सूखापन तो है ही, गर्मियाँ इसे और भी शुष्क बना रही है। दैनिक होना, किसी भी भद्देपन में खूबियाँ उत्पन्न कर देता है। शायद पापा पर उसी का असर रहा हो। संजीव को जगह कुछ खास रास नहीं आई। लेकिन एक जगह खड़े रहकर तो किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सकता। यह तो एकतरफा सम्मति होगी। गला खुश्क हो चला था। बॉटल निकाली और तीन-चार घूँट पानी गटक लिया। एक राहत भरी लम्बी साँस लेकर अब वह टहलता हुआ ब्रिज पर आ गया था। पानी के नाम पर दो-चार गड्ढे ब्रिज के पिलर से सटे हुए और एकाध दूर दिखते थे। वह खोया हुआ-सा दूसरी ओर मंदिर तक चला आया। 


इसी की खूबियाँ गिनाकर अपने को दृढ़ संकल्पित कर लिया था पापा ने। वह हर बारिश के गुणगान में इसे जरूर शामिल करते। महसूस करना यहाँ की हवा कि तुम्हें छू लेगी। देखना यहाँ के पहाड़ कि तुमसे बातें करेंगे। सुनना यहाँ कि नदी के गीत कि तुम्हारा मन मोह लेंगे। कुछ कदम चलकर देखना… अपना चलचित्र तुम्हें हृदय की कंदराओं पर चलता प्रतीत होगा। वह उन्हीं गंभीर कथनों का स्मरण करता धीमे-धीमे बढ़ता रहा। 


सहसा उसकी नजर एक युवती पर पड़ी जो बकरियों को टिटकारते हुए एक छड़ी को हवा में लहरा रही थी। यहाँ से वहाँ तक डगों को रखते हुए वह नृत्यनुमा मुद्रा बना रही थी। इस बीच उसके कंधे पर पड़ी ओढ़नी हवा के थपेड़ों से नीचे सरक जाती तो वह उसे उभारों पर सँभाल लेती। काफी देर यही क्रम चलता रहा। संजीव सविराम उसके इस व्यवहार को निर्निमेष देखता रहा—यक्षिणी कहाँ तुम विचरण करती मलयगिरी को छोड़कर इन रूखे पर्वतों की ओट में उतर आईं। यहाँ उमस, तपन, जलन सब है। जरा पानी की तरंगे तुम्हारे प्रेमिल हृदय को आनंद प्रदान नहीं कर सकती। अपने आह्लाद को किंचित सँभालो। 


युवती की नजर जब संजीव पर पड़ी तो वह ठिठक गई। और पलभर में उसकी मुद्रा परिवर्तित हो गई। वह अब जैसे संजीदा हो गई। पलकें झुकाईं और हल्की कजरारी बंकिम दृष्टि से उसे देखा। संजीव वहीं था। उसको इस तरह गड़ा हुआ देखकर वह बोल पड़ी-


"ऐसे घूर-घूर के क्या देख रहे हो?"


लड़की का बिगड़ना था कि संजीव जोर का ठहाका मारकर हँस पड़ा- "मैं तुम्हें नहीं, तुम्हारी हरकतों को घूर-घूरकर देख रहा हूँ।"


लड़की स्थिर हो गई- "हमारी हरकतों में कोई जोकरपणा छिपा है, जो हँस रहे हो?"


"हँस तुम्हारी हरकतों पर नहीं, बातों पर रहा हूँ।” उसकी हँसी फिर फूट पड़ी। 


"बातों में कौनसी मसखरी छिपी है हमारी, जो..."


"रुको तो सही, बड़ी वाचाल हो?"


"हालचाल पूछने वाले तुम कौन? चिल्लाऊँ?"


"हेलो! हेलो! मैं वाचाल बोल रहा हूँ और तुम हालचाल को लेकर बैठ गई। चिल्लाओ मत, मैं लौट जाता हूँ। ओके।”


'अजीब लड़की है?’ निषेध भाव वह मन में बुदबुदाता वहाँ से टल गया। जब ब्रिज पर लौट आया, उसने पुनः लड़की की तरफ एक नजर फेंक दी। अब उसका ध्यान बकरियों पर था। और संजीव का दूरस्थ चंचल टहनी की छाया पर। रिटायर्ड मिस्टर मेजर कुछ ऐसे ही सैल्यूट मारते थे गुड़हल के पुष्प और अशोक तरू को। वह भी शुरू हो गया। उसके घर की फुलवारी आसन बिछाती है। संजीव खुद शौकीन है और उसके पापा तो परम मित्र समझिए। रोज साँझ-सवेरे व्यायाम का आसन वहीं लगता है। पापा की छड़ी कुछ याद दिलाती है। अभी हाथ में झूमती छड़ी से भिन्नता है उसकी। ये सहारा माँगती है और वो सहारा देती है। उसने बैग को एक कंधे पर ले लिया जिससे दूसरे अंस को आराम मिले। फिर इत्थं दूसरे को। 


इक्की-दुक्की फोटो क्लिक कीं और अरुचि से यत्र-तत्र भ्रमण के बाद वह वापस सड़क के आस-पास छितरी दुकानों के पास चला आया।  “जहाँ उतरा वहीं से कुछ नजर आए?” सोचकर वह कदम पटकता दीवार के पास मँडराता रहा। अंत में एक मिनी बस में सवार होकर होटल लौट आया। 


रात्रि भोजनादि से निवृत्त होकर वह बिस्तर पर आ गया और डायरी निकाल ली। उसकी मुखाभा पर कई-कई लम्बी स्मित रेखाएँ खिंच गई। लिखना शुरू हुआ- “चंचल लड़की, तुम्हारा हालचाल नहीं पूछा था मैंने। मैं तो तुम्हारे क्रियाकलापों की तस्वीर बनाना चाहता था। उस वक्त महसूस कर रहा था कि तुम संगीत के कौनसे सुर को लाँघ रही हो। तुम्हारी उन कंजी आँखों को बताना चाहता था कि मैं डायरी लिखते भी तुम्हारी बातों को याद कर हँस रहा हूँ।” 


अचानक जैसे कहीं से आवाज आई- “तुम फिर हँसे, बोलूँ सभी को?” संजीव की मुस्कान प्रकट होकर तिरोहित हो गई। वह मीठे स्वप्नों में उसे ढूँढ़ने लगा।


प्रकृति के अंचल में कई दिनों तक इसी तरह दोनों की मीठी नोक-झोंक चलती रही। संजीव प्रकृति को निहारकर खोज करता रहा। और लड़की छेरियों सहित पहाड़ के नीचे तलहटी से गुजरती रही। उसकी बंकिम निगाहें दूर जाते हुए अब संजीव को घूरने लगी थी। एक प्रकार वह अंतस से समीपता चाहने लगी थी। संजीव तो रोज उसके भिन्न व्यवहार का अनुभव करता ही था। आज पूछ ही लिया- "नाम क्या है तेरा?"


"झूली....झुलिया" उसके हावभाव अन्य दिनों की अपेक्षा सहज थे। 


"अच्छा, समझ गया। नाम तुम्हारा झुलिया है, पर प्रेम से सभी तुम्हें झूली कहते हैं।" वह हँस पड़ा। 


"इसमें हँसने की क्या बात है? झूली हमें पसंद नहीं तो नहीं। जब माँ-बापू ने अच्छा-खासा नाम दिया है झुलिया, तो फिर क्यों झूली-झूली करना?”


"ये भी ठीक है...ओके मैं तुम्हें झुलिया ही सम्बोधित करूँगा।” अभी-भी उसके मुख पर स्मित भाव था। 


संजीव पहले दिन से ही उसकी सुकुमार्यता पर आकृष्ट था। लहँगा-चोली, एक ओढ़नी जो बाएँ कंधे पर पड़ी हुई इधर दाईं ओर कमर पर बंधी हुई थी। सुनियोजित बंधे, सघन लम्बे केश और कंजी ऑंखें। 


झुलिया के चेहरे पर मुस्कान फूट पड़ी। संध्या का सूर्य लोहित होकर एकदम समीप नजर आ रहा था। उसका मुख सिंदूरी आभा से दमकने लगा और नाक की बेसरी झिलमिलाने लगी। जाने का वक्त हुआ। बकरियाँ चरती हुई शिखर पर जा चढी थीं। वह तनिक उलझती-सुलझती थोड़ी ऊपर जाकर 'अऊ-अऊ' जैसी विशेष ध्वनि और टिटकार से उन्हें बुलाने लगी। बकरियों का भी क्या खास अंदाज था, टिटकार सुनते ही दौड़ी आईं। वह हाथ में छड़ी लिए हुए बकरियों के पीछे-पीछे गुजर गई। 


उसका इस तरह छम से चलना जैसे घुँघरूओं से ताल बिठाना हो। संजीव को शायराना बनाता है—मैं इन पैरों के तलुवे धरा से छूते देखता हूँ और तभी कोई हिलता-डुलता तिनका उनसे जा टकराता है। उसका टकराकर टूटना और मेरा चकराकर देखना अनायास, अविछिन्न तो नहीं? हाय री ढलान! तेरा भी जवाब नहीं। मुझे भगाती और उसे सँभालती है। देख कि मेरे भी हृदय के निकट उठता हुआ कई प्रश्नों का झंझावात है। मुझे उन शिलाओं को स्पर्श करना है, जिन पर ताप का प्रभाव होकर भी नहीं होता। वह उघाड़ी पीठ टिकाए उसी से तो सटी रहती है। उफ्फ! कमसिन लड़की! 


वह अब बिल्कुल राह ताकते मिलने लगी थी। जरा प्रतीक्षा भी उसे छमाही यामिनी-सी दीर्घ प्रतीत होती। उसकी अनुरक्त नजरें निरंतर संजीव के मार्ग की ओर ही लगी रहतीं। जैसे ही वह किसी साधन से उतरते दिखता, उसके हृदय की धड़कने अनायास ही बढ़ जाती। अब वह अनजान-सी बनकर दूसरी ओर मुख कर लेती। संजीव पास आकर हैलो कहता तो वह चौंकते हुए पीछे मुड़ती और बनावटी चकित भाव से पूछती- "आप कब आए?" 


यह शायद हौले-हौले युवा मन में प्रेम का प्रस्फुटन था। संजीव ठाँव की सटीक जानकारी चाहता था। उसने थोड़ा-बहुत अपने पिता द्वारा सुन रखा था, लेकिन फिर भी उसे अच्छे-भले वृत्तांत के लिए झुलिया के मुख से फिर सुनने की चाह थी। वक्त गुजारने और बतियाने का यही तरीका कारगर था-‌ “यहाँ के बारे में बताओ कुछ?”


"क्या जानना चाहते हो?” वह जैसे अपने में सिमट गई। 


"जो इस जगह को खास बनाता है।"


झुलिया किन्हीं खयालों से होती हुई गंभीर होकर बोली- "वो जो ऊपर उस डूँगर की चोटी पर पक्का निशान छल्ला देख रहे हो, हमारे पुरखों की ख्याति है।"


"तुम्हारे पुरखे वहाँ के शासक थे?”


"नहीं, उन्हें वरदान था। एक रस्सी के सहारे वो कितनी भी ऊँचाई पर चल सकते थे।”


"क्या ये सच है?”


"और नही तो क्या? वहाँ उधर दूसरी ओर देखो, वहाँ भी ऐसा ही निशान बना हुआ था। रस्सी यहाँ से वहाँ तक बाँधी जाती थी। नीचे गहरा झागदार पानी, काँटेदार बड़े-बड़े पेड़, झाड़ झांखड़ों से ढ़के हुए डूँगर। और यहाँ तलेटे पर कल-कल करती बहती हुई बारा नद्दी रूपारेल। उसके ऊपर बिना किसी सहारे रस्सी से गुजरना रोंगटे खड़े कर देता है। लेकिन आह! हमेशा ही उन्हें धोखे का शिकार होना पड़ा।”


"कैसा धोखा?"


"उनकी कला, उनके वरदान को ललकारना और निशान पाने से पहले रस्सी कटवा देना। जिससे शर्तों के अनुसार राज-पाट से हाथ न धोना पड़े। राजाओं की चालाकी..."


"अविश्वसनीय! विश्वास नही होता।"


"तुम बाहर के हो ना इसलिए। चाहो तो किताबों में पढ़ लो। क्या कहते हैं वो? ...इतिहास में देख लो। सब मिल जाएगा–गलकी, गलकी को क्यों मारा? सब का कारण एक-सा है।"


"यहाँ भी?"


"नहीं, यहाँ तो बच्चे का प्रेम काल बन गया।"


"किस तरह?" संजीव धुँधली जानकारी के बावजूद ठीक से जानने को उत्सुक था। 


"वह चलती रही, यहाँ से वहाँ की ओर, धीमे-धीमे। वरदान तो सिद्ध हुआ। जब नीचे बच्चे को दूध पिलाते वह अपना करतब निहार रही थी तो ऑंखें फटी की फटी रह गई-हाय! इतने ऊपर! मैं गिर जाती, मर जाती तो क्या होता मेरे बच्चे का? और वह दूधमुँहे को छोड़कर वहाँ जा बैठी तारों के पास।"


"अफसोस है! क्या तुम चल सकती हो ऐसे?"


"म्ह चल सकती हूँ लेकिन इतनी ऊँचाई पर नहीं। हम खूब करतब दिखाते हैं। ये तो हमारा पुश्तैनी धंधा है। बच्चा-बच्चा रस्सी पर बिना सहारे चल सकता है।”


"चल के दिखाओ तब मानू।"


"अब? और यहाँ? ...बिना आराधना वंदना किए हम ये कार्य नही करते। तौबा-तौबा प्राण निकल जावें।"


उसकी अब बकरियों से अठखेलियाँ शुरू हो चुकी थी। एक मादा मेमना उसकी गोद में चढ़ने को प्रयासरत थी। उसने उसे पुचकारते हुए उठाया और कंधे से सटा लिया। काफी देर दुलारने के बाद जब नीचे उतारा तो संजीव की प्रश्न करती भाव-भंगिमा देखकर बोली- "ये हमारी उधमी सोमी है। सब लाड़ करते हैं।"


"तुम पहले से ही ऐसी हो?" संजीव ने उसे बकरियों में घुला देखकर हैरानी भाव पूछ लिया। 


"पहले? पहले हमारा लगाव इनसे ही नहीं, कईयों से था। कभी आँख चुराकर कोई मुर्गी दड़बे से निकल फुर्र हो जाती, तो हम उन्हें पकड़ने दौड़ पड़ते। ऐसे ही जैसे पुलिस अपराधी को पकड़ने दौड़ती है। सबसे शरारती थी रंगीली। और घर की ड्योड़ी पर बेल से बँधा पड़ा चम्पू, कलेस करवा दिया एक बार केसा ताई को काटकर। तब से बेल लटका दी गई।" उसकी हँसी किसी विजन में झरने की आवाज से कम नहीं। 


"वहाँ! वो मंदिर?" संजीव प्रारम्भ से ये मनोहारी स्थल देखता था। 


"देव भगवान का मंदिर है, बहुत पुराना। हमारा तो जन्म भी नहीं हुआ था तब।” उसने वहीं से हाथ जोड़ दिए। 


"चलें वहाँ... मन बहुत उत्सुक है। कितना सुंदर दीख पड़ता है।”


"नहीं बाबूजी, आप ही जाओ। हमारा बकरियाँ ले जाने का टैम हो गया। घरवाले बाट देखते हैं।” और वह रोज की तरह विशेष टिटकार का स्वर साधे चली गई। 


मैं तुम्हें ही लिख रहा हूँ, यहाँ लैम्प के नीचे दृष्टि गढ़ाए निमग्न बैठा हुआ। उस रस्सी को लिख रहा हूँ, जो ख्याति का सहारा बनती थी। वो नदी, वो पहाड़ और मन के कोनो में उठता उत्सुकता का द्वंद्व… देकर भी बहुत कुछ हरते हैं। तुम्हारी बातों का रस सुदूर पर्वत के ऊपर कलरव करते पंछियों-सा मधुर है। तुम्हें गुनगुनाना आता है और मुझे उसमें खोना, केवल मनमोही नजरिए से। निशान मैंने देखा है और तुम्हारी छवि को वहाँ महसूस किया है। शायद वो तुम्हीं थी या हो सकती थी। तुम कितना अच्छा करतब करती हो, एकदम पहले जैसे। तुम्हारा हास्य, लड़कपन, झूमना और बाट जोहना सब करतब ही तो हैं, जिन्हें मैं बिना अघाए देर तक देखता रहता हूँ। बकरियों में खोई रहने वाली तुम किस ओर ध्यान लगाकर अपने को भुलाना चाहती हो। कितना कुछ देखा आज दिनभर। उफ्फ! आँखों में नींद भर आई है। कलम की मिठास अब ठहर रही है। 


संजीव सवेरे कुछ बादलों के झुंड चोटियों पर तैरते देखता है। आज की नमी उन्हें कल पर जलन का आक्षेप मढ़ने की गुस्ताखी करवा रही है। हवा भी जैसे धीरे-धीरे सन्निकट आकर पुल के कानों में कुछ कहने लगी। सुनने वाले दो मुक्त जीव उधर ही ध्यान लगाए हैं। एक झोंके से पानी लहरियाँ लेने लगता है और पलभर में स्थिर नीर सर्पाकार दौड़ने लगा। संजीव ने नीरवता भंग की-


"पानी कम है इस नदी में। बस कुछ गड्डे ही भरे दिखाई पड़ रहे हैं।”


"कम? ये पुल किसलिए बना है? पता भी है? यहाँ इतना पानी भरा होता था–एक किनारे से वहाँ दूसरे किनारे पर जाना सहज नहीं था। इसलिए ये पुल बना है उस पार मंदिर तक। लेकिन अभी इतनी बरसात कहाँ होती है? कभी होती है तो भर जाता है, पर पहले जितना नहीं। अधिक हो जाने पर थोड़ा बहुत नीचे होकर बहने लगता है। कभी तेज भी। उसी बहते पानी को तो हमारी पुरखिन पार करती थी अधर...केवल रस्सी पर चलकर, बिना कोई सहारे।”


"अद्भुत! लेकिन ये बीच में दीवार?”


"राजाओं की लड़ाई ने बनवा दी। मेरे चाचा बताते थे—अलवर और भरतपुर के राजा दोनों ही इस नदी का पानी अपने अधिकार में चाहते थे। बात नहीं बनी तो हो गया बँटवारा।"


"कितना यथार्थ दबा पड़ा है इन पुरातत्व घटकों में।” दोनों चलने लगे। कुछ देर शांति छाई रही। 


"कुछ समझ आया नहीं।" वह संजीव को प्रश्नसूचक दृष्टि से गौर कर देखने लगी। 


संजीव उसकी ओर मुड़ा और जैसे भूली बात याद आई हो- "तुम पढ़ी नहीं?" पूछते हुए वह चट्टान पर जा बैठा। 


वह कुछ सोचकर बोली- "जैसे-तैसे आठवीं तक तो पढ़ ही लिए। फिर कुछ साल चाचा के साथ नाच-करतब दिखाते रहे और अब बकरियाँ चराते पणिहारी गा लेते हैं। ये चट्टान मेरी सखी है। इसी से मन का बतियाना चलता रहता है। फिर बकरियाँ आ चिपकती हैं। घणी ही यादें हैं बचपने की।” उसने घर से लाए मुट्ठी भर अनाज के दाने चट्टान के आस-पास बिखरा दिए। दाने बिखेरना था कि पास की झाड़ी के घोंसले से निकलकर एक बुलबुल का जोड़ा चुगने आ लगा। 


संजीव कुछ देर उन्हें चहकते-चुगते देखता रहा, फिर बोला-‌ "मुझे लगता है, तुमसे बढ़कर नृत्य शायद ही किसी का होगा? इस बारे में मैंने सुना भी है। कहाँ से सीखा शरीर का ऐसा घुमाव, इतना लचीलापन?"


वह चौंक पड़ी, फिर गंभीर हुई- “मेरा नहीं, चाची रूपबाई के बराबर नृत्य किसी का नहीं था। पुश्तैनी बँधे गाँवों में लोग उसे नृत्य की रानी कहते थे। शरीर इतना लचीला था, रस्सी के जैसे कैसे भी तोड़-मरोड़ लेती और बाँस से बँधी रस्सी पर करतब देखकर लोग दाँतों तले अँगुली दबा लेते। तुम कहते हो मैं कहाँ से सीखी? तो जवाब है, चाची को देखकर ही मैं सीखी।"


"माँ ने नहीं किया कभी?”


"नहीं, माँ इनसे दूर रही। बापू के मरने के बाद माँ अकेली-सी हो गई। थोड़ा-बहुत खेती का काम था। और हमें पालना भी। फिर लोग बात भी बनाते थे कि माँ चाचा के साथ रहती है। अकेली जा नहीं सके नृत्य करने।”


"अब नहीं जाते तुम लोग?”


"अब कहाँ जाएँ? पहले जैसा मान-सम्मान कहाँ बचा है? अब तो लोग करतब और नृत्य को लूटने की नजर से देखने लगे हैं। मैं छोटी थी, तब जाती थी चाचा-चाची के साथ। गाँव में उत्सव छा गया था। बच्चे क्या, बूढ़े क्या, औरतें क्या...सबका जमावड़ा लग गया था। कैसी आवभगत करी थी। मैं छोटी थी, मुझे सभी गोद में उठाने को उतावले थे। पर मैं अपनी चाची के पल्लू से चिपटी रही। लोग बार-बार चाचा से पूछते-यह भी नाचेगी क्या? रस्सी पर चलेगी? लोगों के लिए अचरज बन जाता।" निराशा के बीच खुशी का उद्भव हुआ। 


"कोई रोचक घटना जिसे याद कर तुम मायूस हो जाती हो? तुम्हें दुःख होता हो?” संजीव की उत्सुकता बनी रही। 


झुलिया ने कुछ देर सोचकर कहा- “शायद वह आखिरी नृत्य था। मेरे रूप और नृत्य के वश में होकर एक लड़कें ने पाँच सौ भेंट किए थे। और वहाँ से विदा होकर आते वक्त वह कुछ इस तरह देखता रहा कि हम वहाँ से न जाएँ। जैसे कि चाचा कहते हैं—चलना हमारी नियति है। जब चले तो उसका मुँह आँसुओं से भीगा था। और ऑंखें जैसे ठहर जाने को झाला देती हुई। छोड़ने के नाम पर पीछा तक किया। हम आँसुओं में पिघल जाएँ तो नाच और करतब दिखाना कैसे संभव हो? एक जगह से दूसरी जगह जाना कैसे संभव हो? बेवकूफ लड़का! हम में ठहराव खोजता है।”


"तुम्हें बुरा नहीं लगा?"


"कोई खास नहीं। ऐसा हर जगह मिल ही जावै, कोई न कोई उसके जैसा...फिर क्या सोचना? हाँ, वो कुछ ज्यादा खो बैठा अपने को। इसलिए प्रेम नहीं, उसके ऊपर तरस आता है। दया आती है।" वह हँसती हुई बताती रही। उसका आकर्षण संजीव के प्रति निरंतर बढ़ता रहा। उसे बात करने का इतना चाव था कि संजीव के सवाल करने से पहले ही जवाब को उत्सुक रहती। उसकी गहरी कंजी ऑंखें उसे अपने में उतार लेना चाहतीं। खयालों में उसे सब कुछ मानकर अपनत्व का धागा जोड़ लेती और इस डर से व्यक्तिगत सवाल नहीं पूछती, कहीं बाबूजी का संबंध हो चुकने की बात सामने आ जाए। लेकिन एक रोज हिम्मत करके पूछ ही लिया- "बाबूजी, तुम्हारे कुटुंब में कौन-कौन हैं?”


"मेरे परिवार में? मैं, माँ-बापू और किट्टी। तुमने शायद बस ड्राइवर वाली कहानी सुनी हो, मेरे पापा इसी रूट पर बस चलाते थे। उन्हीं की वजह से मुझे यहाँ का आकर्षण बना रहा।”


"हाँ, सुनी है। बच्चे वाली कहानी। वही, जो एक होटल पर रोज कचौरियाँ देता था ड्राइवर को?"


"हाँ-हाँ! वही। और क्या सुना है?"


"लोग बताते हैं, ड्राइवर का खूब लगाव था उससे। फिर एक दिन वह उसे बिना बताए अकेला छोड़ गया। और जब आया तो बच्चे को खो दिया। बताते हुए उसके मुख पर उदासी घिर आई थी।  


"वह भी क्या ट्रेजडी थी। पापा आज तक उस घटना को नहीं भूले। कभी-कभी तो याद कर रो उठते हैं।"


कुछ देर की खामोशी के बाद झुलिया पुनः मूल विषय पर आकर अनमनी-सी बोली- "और कोई नहीं है परिवार में?" वह बात विशेष जानना चाहती थी। 


"और कौन होगा?”


"आपका ब्याह नहीं हुआ?" आखिर उसने सीधा सवाल रख दिया। 


"अच्छा! विवाह? हो गया ना।”


"क्या?”


उसे चौंकता देखकर संजीव तुरंत बोल पड़ा- "अभी नहीं रे।” वह हँस पड़ा। और कुछ-कुछ झुलिया भी। 


"तुम बड़े मसखरे हो।”


वह मुस्करा दिया- "सो तो हूँ। यहाँ कुछ खेती-बाड़ी नहीं होती? पापा तो खूब बताते थे।"

संजीव का ध्यान रूखे खेतों की ओर गया तो पूछ लिया। 


झुलिया मायूस हो गई- "घास भी उग आए तो सबर रहे, खेत हरे-भरे तो दिखें। इस तरह धूल उड़ती देख मन दुःखी होता है। कैसे भफार बरसती हैं। तन जलता है, मन जलता है और किसी का सपना जलता है। राम की लीला राम ही जाने। लेकिन हम उस ओर न देखें, तो कहाँ देखें?”


"देखना जरूरी हो जाता है, खेतों के लिहाज से।"


उसकी लेखनी फिर उन सुनी हुई घटनाओं को डायरी में समेटती है, जो दिनभर उसके सम्मुख मूर्तिमान होती रहीं। 


कुछ दिनों झुलिया ग्रीष्म ताप के जैसे ज्वर से तपती रही। इसलिए उसकी जगह चार दिन उसका छोटा भाई बलवंत बकरियों पर आया। सभी उसे प्रेमवश 'बलवा' सम्बोधित करते थे। बलवा दिखने में दुबला-पतला और साँवला था। अव्यवस्थित वेशभूषा से अपने को ढंके वह रेहड़ी पर लगे मजदूर की तरह व्यस्त मालूम पड़ता था। टिटकार, एक पेशेवर गडरिये की भाँति उठती और गिरती कम्पन होकर सुनाई देती थी। संजीव ने उसमें झुलिया का अक्स टटोलना चाहा। नैन-नक्श एक साँचे में ढले हुए। वह झुलिया की तस्वीर मन पर उतारने लगा। जिससे कि तुलनात्मक पारदर्शिता बनी रहे। लेकिन क्या इतना सरल है उसे यहाँ तौलकर देखना? वह अपने में सम्पूर्ण है और ये? आधी-अधूरी पेंटिग-सा। उसे तराशकार एक मूर्त व्यक्तित्व की कल्पना में अपने को झोंका जा सकता है। वह स्वयं भी खोया रहा है। 


जब वह आई तो ताव के प्रहार की मार चेहरे से स्पष्ट झलकती थी। नूर कुछ उतर चुका था और उसका सूखे पाले-सा कुम्हलाया तन कमजोरी पेश कर रहा था। लावण्यता बुझती बत्ती की तरह निस्तेज हो चुकी थी। संजीव को अन्य दिवसों के मुकाबले आज ज्यादा वक्त लगा आने में। कारण ये था कि बमुश्किल सात-आठ किलोमीटर चलने पर ही बस का टायर पंक्चर हो गया, जिसे ठीक करवाने में घंटाभर से अधिक लग गया। वह बेचैन-सा यहाँ-वहाँ भ्रमर की नाँई चक्कर काटता रहा। वहीं एक वृद्ध से भी थोड़ी फीकी जानकारी मिली थी उसे पापा के बारे में- “हम भी खूब सफर करते थे। उस वक्त गिनती की ही तो बसें चालू थीं। अब तो पैंड-पैंड पर बस मिल जाएँगी। प्राइवेट क्या, रोडवेज क्या। बहुत भलामानुष था तेरा पिता। भूले को भी रास्ता सुझाता था। सभी से लगाव था उसका। उस बच्चे से तो कुछ अधिक ही था, जैसे वह उसी का पूत हो।”


लीजिए पहुँच ही गए। खाने तो धक्के ही पड़े, किन्तु सड़क से ही दिखाई पड़ती पीतवर्णी ओढ़नी देखकर सारी पीड़ा छूमंतर हो गई। 


"तबियत कैसी रही? बड़ी कमजोर हो गई हो।"


"तबियत अभी ठीक है। कमजोरी तो होते से ही ठीक होगी। बुखार तोड़ भी तो कितना देता है शरीर को।"


"तुम्हें आराम करना चाहिए था। यूँ जल्दबाजी करके उल्टे अपनी परेशानी बढ़ा रही हो।”


"मेरी बकरियाँ खुश हैं तो मैं अपने आप ही खुश हूँ। देखो सोमी कैसे उछलती है… अऊ-अऊ" यह जीर्णता छुपाने का निष्फल प्रयत्न था। 


"इसी हालात में हमारे यहाँ दिल्ली में न जाने अभी कितने दिन बेड रेस्ट और करना होता।"


बेड रेस्ट का अर्थ न जान पाने के बाद दिल्ली शब्द पकड़ लिया- "बाबूजी दिल्ली तो बहुत बड़ी होगी?"


"हाँ, बहुत बड़ी है। लेकिन तुम्हारी कल्पना से अधिक नहीं।" उसने मुस्कान बिखेर दी। 


"और वहाँ मेमसाब भी खूब होंगी?"


"हाँ, एक से बढ़कर एक, रंग-बिरंगी अदाओं वाली। लेकिन तुम्हारी कल्पना से अधिक नहीं।”


"तुम्हें बातें बनाना खूब आता है। बड़े शहरों के लोग होते ही बड़े दिमाग वाले हैं। बात को ऐसे करना कि हमें तो कुछ समझ ही न आवे।"


"तुम्हारा अंदाज भी तो कायल बनाने वाला है। हरेक पत्थर तक की कहानी का मर्म तुम्हें अच्छे से आता है। कितनी खूबसूरती से इस फैली हुई खूबसूरती का बखान किया है तुमने। सच बताऊँ तो मैंने यहाँ के बारे में पहले भी सुन रखा था, लेकिन जिस तरह तुमने बताया, शायद ही किसी ने बताया हो। तुम्हारे रोम-रोम से यहाँ की गाथा बरस पड़ती है।"


"फिर भी तुम भूल ही जाओगे। खूबसूरती कितनी भी हो, रोज नहीं देखो तो एक न एक दिन मन में फीकी पड़ ही जाती है।" वह लगभग मायूस हो गई। 


थोड़ी देर चुप्पी के बाद संजीव ने गंभीर होकर कहा- "कुछ सौंदर्य हमेशा के लिए दिलोदिमाग में बस जाते हैं। पर्यटकों का ठहराव भी तुम्हारे खेल-तमाशे जैसा सीमित है। एकाध दिन में मैं लौट रहा हूँ।"


संजीव के कहते ही झुलिया का चेहरा उतर गया। वह बेबोले थोड़ी देर नजरें नीचे झुकाए ओढ़नी के पल्लू से उलझती रही। फिर हिम्मत करके बोली- "जाना तो पड़ेगा ही साब। बड़ी दूर है दिल्ली। वहाँ तो बड़ी-बड़ी मेमसाब... " वह जैसे भावुक हो गई। उसका गला रुँध गया। फिर भी अपने को सहेजे रखा। 


संजीव महसूस कर गया और उसे सांत्वना स्वरूप प्रसन्न वदन बोला- "मैं फोन पर बात कर लिया करूँगा।" 


"फोन बस चाचा के पास है।"


"तो मैं अंकल से बात कर लूँगा कि झुलिया से बात करा दो।"


"ऐसे कौन बात कराएगा अजनबी से? हमारी लज्जा इतनी बेकार नहीं है कि किसी ऐरे-गैरे से बात कराये।"


"मैं भी ऐरा-गैरा?"


"चाचा के लिए"


"ऐसी बात है। अच्छा, कुछ लाया हूँ तुम्हारे लिए।" वह बैग टटोलने लगा। 


"क्या?" धुलिया विस्मय से देखने लगी। 


"ये पायजेब। कल मार्केट की तरफ जाना हुआ तो ये दिखीं। बड़ी सुंदर लगी मुझे। एक जोड़ी खरीद ली तुम्हारे लिए। तुम्हारे पैरों में खिल उठेंगी।" उसने पायजेब धुलिया की ओर बढ़ा दी। 


वह थोड़ी पीछे हट गई- "नहीं, नहीं बाबूजी। मुझे नहीं लेनी। इस तरह कोई चीज लेना अच्छा नहीं। किसी के देखने से लज्जा पर दाग लगता है।"


संजीव उसके पास आया- “कोई कहे तो बोल देना, मैंने खुद खरीदी है। घर का खयाल तुम रख ही लेना, जैसे कि कहीं मिली हैं। गलत न समझो। मैं तुम पर कोई एहसान नहीं कर रहा। तुमने मेरे लिए बड़ी सहजता से एक गाइड की तरह काम किया है, उसी का उपहार समझो।" 


उसने बड़ी मिन्नतें कर उसे पायजेब थमा दी और बिना उसकी तरफ देखे सीधा लौट आया। झुलिया उसे देखती थी—रोज की तरह पीछे देखकर मुस्कुराना जरूर होगा। किन्तु ऐसा नहीं हुआ। उसे याद आया—कई बार उससे पहले वह स्वयं लौट पड़ती थी। लेकिन निगाहों का मेल तो हो ही चलता था। फिर आज क्यों नहीं? उसका हृदय तेज धड़कने लगा। संजीव ने केवल संकेत भर किया था, बताया नहीं था कि वह कल सुबह दिल्ली लौट रहा है। और आज यह आखिरी मुलाकात है। 


आने से ज्यादा जाने का साहस करना पड़े तो अपना कुछ अंश भार कहीं छोड़कर जाना मानिए। एक माह के करीब का सफर आज खत्म हुआ। माँ-पिता की ओर से भी कई कॉल आ चुके। वह होटल खाली कर रहा है। टैक्सी खड़ी है सामने। स्टेशन के लिए रवाना होना है, उन्हीं गार्डन के किनारे-किनारे, जहाँ उसे सवेरे को ताजगी और दिनभर की थकान को आराम मिलता था। टैक्सी में बैठते ही डायरी खोल ली थी उसने। उसके समक्ष रात्रि को देर तक लिखे पेज साकार हो उठे- “बुरा न मानना, लौट रहा हूँ। तुम्हारा साथ अच्छा लगा। पता ही नहीं चला, इतने दिन कैसे गुजर गए। तुम्हारी यादें इस डायरी में कैद किए ले जा रहा हूँ। तुम्हारी दी हुई जानकारी मैं सहेजकर बाँध चुका हूँ। पहाड़ों का सौंदर्य लिखा है। इतिहास के बिंदु अंकित किए हैं और तुम्हारी चंचलता तो है ही पहले पायदे पर। अलविदा नटनी का बारा! और अलविदा…”


आशंका से घिरी धुलिया को न रात्रि को कुछ भाया और न सुबह ही। वह उसी भाँति बकरियाँ लेकर बावरी-सी दौड़ी आई एक उम्मीद के साथ कि उसका मन कहता था- “वो आएँगे ही। मसखरी करना उनकी बान में है और लौटने की कहना भी उनकी मसखरी ही है।” 


वह निराहार भोर से साँझ तक उसी दिश टकटकी लगाए बैठी रही। लेकिन अन्य दिवस से अधिक वक्त बीत जाने पर भी कोई नहीं था। यहाँ तक कि सूर्यास्त के बाद धुँधलका शिखरों को ढंकने लगा था। उसने रुआंसी होकर सिर चट्टान से सटा लिया और उस पर नेह से हस्त फेरने लगी- "मेरी प्यारी सखी! अब मैं भी चलती हूँ। शायद, तेरा संग यहीं तक था। मेरे पीछे दुःखी न होना। अपना खयाल रखना। इस शाम मैं तुझे विदा कहती हूँ!” और वह उसे जी-भर निहारकर ओढ़नी से ऑंखें पोंछती ब्रिज के ऊपर दौड़ आई। आज प्रथम बार था, जब वह आगे-आगे और बकरियाँ पीछे-पीछे दौड़ती थीं। 


घर लौटते ही उसने रुग्णता का बहाना बनाकर अपने को कमरे में बंद कर लिया। उसकी आंतरिक भावनाएँ फूट पड़ी- "एकाध दिन की कहकर आज ही चले गए? तुम्हारे पिता एक बालक को छोड़कर गए थे। और तुम एक बालक की तरह हँसते-खेलते, किलोल करते हृदय को बिलखता छोड़कर गए हो। मैं भी वहाँ जाना छोड़ दूँगी। तुम्हारे बगैर उस छाँव को आँचल में कैसे भरूँ? अगर जाना ही था तो आए क्यों? क्यों मीठी बातों में घुलाए रखा? लेकिन तुम्हारा क्या दोष? शायद मेरे सपने ही उस चोटी से ऊँचे हो गए, जिसे लाँघना उस नटनी के वश में भी नहीं था। फिर मैं तुम्हें कैसे पा लेती? मैं भुला दूँगी सबकुछ..." इतना कहते हुए वह दबी चीख में खाट में रखे कपड़ों को नीचे फेंकने लगी- “सबकुछ भुला दूँगी... उसे भी।” और सिसकती हुई खाट पर औंधे मुँह गिर गई। 


इतने बरस पश्चात पुनः जहाँ से सफर खत्म किया, वहीं से समारंभ करने की हूक उठी है। पीछे कई सुधियाँ और उन सुधियों में बसा कोई जीता-जागता सुरम्य स्थल चित्त को आलोड़ित करता है। उसने गाड़ी साइड लेकर लगा दी। वाह! पानी का बहाव और नजरों को स्तब्ध करने वाला अप्रतिम लालित्य बिखरा पड़ा है। रूपारेल बह रही है। दूर तक क्षेत्र जलीय नीलिमा की बजाय जलकुम्भी से ढका हुआ है। हरीतिमा के प्रसार में खोए जन-समूह का निश्चेष्ट होना, कछुओं का तैरना, मछलियों की डुबक और समीर का सहलाना… सब कुछ अंतस को बाँधने वाले हैं। किन्तु फीकापन क्यों हैं? वह नजरें उठाए पाषाण शिला की ओर चल दिया। कितने ही लोग सद्य प्रसारित चारुता को कैद करने में लगे थे। कुछ रोज पहले अच्छी बारिश का प्रतिफल थी यह बिखरी हुई रमणीयता। किन्तु उसे किसी अन्य खूबसूरती की तलाश है। 


बलवा ने आ कहा- “वो शहरी बाबू घूम रहा है कैमरा लटकाए।” 


इतना सुनना था कि झुलिया बेसुध दौड़ चली। भागते वक्त उसकी ओढ़नी घर के किवाड़ से अटक गई। अधीरता से वह उसे सुलझाने लगी। यकायक उसकी निगाह दीवार से सटे दर्पण पर चली गई। उसकी माँग में किसी और का सिंदूर था। अन्य की थाती को सहज मिटा देने की भूल पीढ़ियों तक दर्द देगी। भोगने की वेदना से कहीं अधिक पराई जुबान के कटु सवालों का बोझ उससे लादा नहीं जाएगा। अपराध बोध वह उल्टे पाँव कमरे में प्रवेश कर गई और तकिए में मुँह छिपाए सुबकने लगी- “तुम्हारा जाना उसी समय था, फिर इतने बरस बाद पीड़ा पहुँचाने क्यों आए हो? मैंने उस चट्टान को बिसरा दिया है। अब मेरे कदम बेड़ियों से बंधे हैं। दौड़ेगें तो आवाज होगी और दूर तक जाएगी।”


उसने बलवा को बुलाया और टूटी हुई पायजेब थमा दी। फिर भगाया- “जाओ! उस बाबू से कहना, झुलिया उस बालक की तरह नहीं मिटी। ये पायजेब टूटी जरूर हैं, लेकिन किसी को पुकारती रही हैं। पर अब नहीं पुकारेंगी। इसलिए इन्हे लौटा रही हूँ, क्योंकि मुझे इनसे खूबसूरत पायजेब मिल गई हैं। खूब जाना वहाँ पर। घूमना, चट्टान पर बैठना, छड़ी से बतियाना। सब कुछ वही है। बस झुलिया नहीं है। और... कभी नहीं है।” वह फिर तकिए में समा गई। 


बलवा दौड़ता हुआ जा पहुँचा उसी चट्टान की शरण में, जहाँ संजीव अपना कैमरा आँखों से चिपकाए प्रकृति को हूबहू उतारने में लगा था।  पायजेब की 'छन-छन' सुनी तो वह तुरंत पीछे मुड़ा- “झुलिया! ओह! बलवा…”


उसने पुनः कैमरा आँखों से सटाकर बलवंत के सिर के दाएँ स्थित उपत्यका से झाँकते शिलाखंड पर गढ़ाकर क्लिक कर दिया। 


"बाबूजी आपकी पायजेब!" उसने हाथ आगे बढ़ा दिया और झुलिया के हर वक्तव्य से रूबरू करवा दिया। फिर कभी न आने का संकल्प था झुलिया का। और हठात बिसराने की जिद। 


पायजेब हाथ में लेते हुए संजीव का अंतर्मन विचलित हो उठा- "जब तुम्हारा संकल्प अडिग है तो मेरा भी इस शिला से संबंध विच्छेद होता है। ऊपर तैरते धवल टुकड़े को मेघ कहूँ या धूम अथवा किसी की साजिश, जो श्वेत पताका लेकर किसी हिस्से पर आधिपत्य को प्रस्तुत है। 

मैं निहारता हूँ तो कुछ खालीपन क्यों नजर आता है? बुलबुल और नीड़ कहाँ हैं? सौंदर्य के बीच मुझे किसी का आर्त स्वर कहाँ से सुनाई देता है। लौट रहा हूँ, शायद हमेशा के लिए। मेरी कलम तुम्हें ढूँढती है। तुम नहीं हो, इसलिए मैं ये पायजेब इस चट्टान को सौंपता हूँ। यह भी तो किसी की सखी रही है। तुमने अब तक नहीं भुलाया। और शायद मैंने भी। किन्तु अब भुलाता हूँ।" 


संजीव के नेत्र जलमग्न थे। उसका दिल्ली लौटना हकीकत था या स्वप्न की धुँधली यादें। केवल गाड़ी दौड़ रही थी। और डायरी के पन्ने स्वतः पलट रहे थे। 


गोल चक्कर वेब पत्रिका अत्यंत सीमित संसाधनों से चल रही है। इस वेबसाइट के संचालन में आर्थिक सहयोग देने हेतु दिए गए क्यू आर कोड का उपयोग करें :


धर्मेन्द्र कुमार सैनी युवा कथाकार-कवि हैं। कहानी संग्रह : बुलंदियों के शहर (2021); उपन्यास : फुनगी (2023); बाल कविता संग्रह : छोटी अन्नू (2023), गुन्नू जीजी (2023)।‌ धर्मेन्द्र को कुछ राज्य स्तरीय पुरस्कार भी मिले हैं। सकल भारतीय हिन्दी कहानी के परिदृश्य में वह धीरे-धीरे अपनी पहचान बना रहे हैं। ईमेल : dharmendrasaini509@gmail.com

 



Comments


bottom of page