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एक टिकट मेरे लिए भी

3 hours ago
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एक टिकट मेरे लिए भी
कहानी : रामनगीना मौर्य

मध्यांतर बाद विश्वजीत के बगल की सीट पर लगभग अठारह-उन्नीस बरस का एक नौजवान आकर बैठ गया। ध्यान से देखने पर उसके माथे पर शिकन, चेहरे पर अजीब-सी घबराहट पसरी हुई लग रही थी। विश्वजीत ने महसूस किया कि वह बीच-बीच में उचक-उचककर, कुछ कौतूहल, कुछ आशंका से अपने पीछे व आसपास की सीटों पर भी देख लेता।


‘‘क्या बात है? अब तक कहाँ बैठे थे?’’ उसे यूँ हैरान-परेशान, उलझन में देखकर विश्वजीत ने पूछा।


‘‘जी, मैं?’’ विश्वजीत के पूछने पर मानो वह अचकचा-सा गया।


‘‘हाँ! तुम्हीं से पूछ रहा हूँ। कहाँ बैठे थे?’’


‘‘जी, वहाँ… तीन ‘रो’ पीछे बैठा था।’’ उस लड़के ने बिना पीछे मुड़े, सिर्फ उँगली से अपने पीछे की सीट की तरफ़ इशारा किया।


‘‘तो, अब वहाँ बैठने में क्या दिक्कत है?’’ विश्वजीत ने उससे आश्चर्यमिश्रित उत्सुकता से पूछा।


‘‘कुछ नहीं। वैसे, ये सीट भी तो खाली है? फिर… मैं तो अपनी सीट से आगे वाली ‘रो’ में आकर बैठा हूँ।’’ उस लड़के ने प्रकृतिस्थ होने का प्रयास करते थोड़ी लापरवाही से जवाब दिया।


‘‘हाँ, वो तो ठीक है। सीट तो ये भी खाली ही है। लेकिन तुम कुछ परेशान से लग रहे हो? क्या बात है?’’ विश्वजीत ने उस लड़के से आत्मीयता जताने हुए पूछा।


‘‘ये पोपटमारी… समझते हैं न…?” शायद उपयुक्त शब्द न मिलने के कारण, हाथ में ली हुई मैगज़ीन को गोलाकार मोड़कर मुट्ठी में लेते, अजीब तरीके से हिलाते, झिझकते हुए उस लड़के ने कुछ अस्पष्ट-सा संकेत किया।


‘‘मतलब...?’’ विश्वजीत का इतना कहना भर था कि वो लड़का मानो फट पड़ा।


उस लड़के ने संकोच और आशंका के मिले-जुले स्वर में जो कुछ भी बताया, उसके आधार पर विश्वजीत उसकी मनःस्थिति को भली-भाँति समझ सकता था कि उसके मन में क्या कुछ चल रहा होगा। उस पर क्या बीत रही होगी? ऐसी झंझावात भरी मनःस्थिति का सामना वह वर्षों पहले कर चुका था। उस नौजवान की बातें सुन, उसके चेहरे पर आते-जाते अजीब तरह के भय मिश्रित, बदहवासी के भावों को देख, विश्वजीत को वर्षों पहले अपने संग बीती वो घटना याद आ गई। समूचा घटनाक्रम किसी धुँधले अक्स के बजाय, सूत्रबद्ध तरीके… यके-बाद-दीगरे उसके ज़ेहन में उभरने लगा।


विश्वजीत को अच्छी तरह याद है, उसकी बहन की शादी की तैयारियाँ बडे़ जोर-शोर से चल रही थीं। चूँकि परिवार में पहली शादी थी, सो सभी पारिवारिक सदस्य अपनी-अपनी तरह से व्यस्त व उत्साहित थे। लड़का, यानी होने वाले बहनोई सिंचाई विभाग में इंजीनियर थे। लड़के के पिता जी अपने शहर के जाने-माने ठेकेदार थे, उनकी इच्छा थी कि शादी इस कदर धूमधाम से होनी चाहिए कि नात-रिश्तेदार, गाँव-जवार के लोग वर्षों याद रखें। विश्वजीत के पिताजी की तरफ से भी शादी की तैयारियों में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी जा रही थी। सब कुछ लड़के वालों के कहे अनुसार ही चल रहा था। बर्तन, गहने, कपड़े-लत्ते, टीवी, फ़्रिज, दोपहिया वाहन आदि की व्यवस्था के साथ-साथ शहर के सबसे प्रतिष्ठित हलवाई, टेंट आदि की भी बुकिंग हो चुकी थी।


विश्वजीत के पिता अपने ज़माने के मैथमैटिक्स में मास्टर डिग्री धारक थे। वह बचपन से ही उन्हें देखता आया था कि वे हर कार्य को सिस्टमैटिक तरीके से किए जाने के हिमायती थे। सुनियोजित ढंग से कार्य करने के पिता के व्यवहार एवं कार्यकलापों के तईं विश्वजीत को अब भी याद है कि बचपन में गर्मी की छुट्टियों में जब भी उन्हें सपरिवार गाँव जाना पड़ता, तो पिता द्वारा यात्रा में साथ ले जाए जाने वाले सामानों की बाकायदा लिस्ट बनाई जाती थी। यात्रा के दौरान अटैची, गठरी, होल्डाॅल, बक्सा और बैग आदि के भार और आकार अनुसार निर्धारित रहता कि वह, उसके भाई, बहन, अम्मा और खुद पिता किन-किन सामानों की देख-रेख करते रहेंगे तथा बस, ट्रेन आने या स्टेशन आने पर तत्काल कौन-कौन से सामान किस-किसके द्वारा चढ़ाए-उतारे जाएँगे। सब कुछ पहले से ही तय होने के कारण यात्राओं में उनका कभी भी कोई सामान गायब नहीं हुआ। यात्रा सदैव सुखद रही। खैर...।


इसी तर्ज़ पर शादी में कितने कार्ड छपेंगे; यहाँ तक कि किसे शादी का सामान्य कार्ड, किसे विशिष्ट कार्ड भेजना है एवं किसे केवल मौखिक रूप से कह देना है‌; यह सब उन्होंने महीनों पहले ही तय करके सभी मेहमानों की लिस्ट बना रखी थी। दोस्तों, रिश्तेदारों और मेहमानों आदि को विश्वजीत के पिता जी द्वारा शादी का कार्ड भेज कर इत्तिला की जा चुकी थी। इस अवधि में घर-परिवार में किन-किन सदस्यों को क्या-क्या कार्य निबटाने हैं, पिता द्वारा सभी को ताकीद की जा चुकी थी। पिता ने, उसके बड़े भाई को आने वाले मेहमानों के रुकने की व्यवस्था, बारातियों का स्वागत-सत्कार, कुर्सी-मेज़, शामियाने आदि का कार्य संभालने एवं चाचा जी को कैटरर्स के लिए राशन, सब्ज़ी, फल, सलाद आदि खरीदने की जिम्मेदारी सौंप रखी थी। घर-परिवार व रिश्तेदारों को उपहार में दिए जाने वाले साड़ी, कपड़े, गहने एवं छोटे-मोटे गिफ्ट-आइटम आदि की खरीदारी भी की जा चुकी थी। साथ ही रिटर्न गिफ्ट के रूप में किन मेहमानों को कहीं से मिला पुराना-धुराना गिफ्ट ही उपहार स्वरूप टिका देना है, तो किन्हें विशिष्ट उपहार देना है, यह भी तय हो चुका था।


चूँकि विश्वजीत शहर में रहकर विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहा था, उसकी सेमेस्टर परीक्षाएँ शुरू होने वाली थीं। अच्छी बात यह थी कि शादी के तीन दिन पहले ही उसकी सेमेस्टर परीक्षाएँ समाप्त होने वाली थीं। वैसे भी, विश्वजीत के पिताजी पढ़ाई-लिखाई के मामले में किसी भी तरह की कोताही के पक्षधर नहीं थे। अतः उन्होंने उसे सख्त हिदायत दे रखी थी कि वह मन लगाकर अपनी सेमेस्टर परीक्षाएँ दे। शादी की तैयारियों को लेकर उसे किसी तरह की चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है। उसके पिता ने उसे सिर्फ यही काम सौंपा था कि शादी से दो दिन पहले, गाँव आते समय वह शहर से शनील की डबल बेड की रजाइयाँ व गद्दे भी लेता आएगा। उसके पिता ने शादी के लगभग महीना दिन पहले ही चौक घंटाघर स्थित ‘रज्जन भाई रजाई वाले’ की दुकान से शनील की डबल बेड की दो रजाइयाँ, दो गद्दे भरवाने का ऑर्डर दे रखा था।


विश्वजीत की सेमेस्टर परीक्षाएँ दोपहर तीन बजे खत्म हो गईं। तत्पश्चात तुरंत हॉस्टल आकर मेस में भोजन करने के पश्चात वह गाँव जाने के लिए तैयार हुआ। जल्दी-जल्दी अपनी ज़रूरत भर का सामान एक बैग में रखने के उपरांत, पिताजी के बताए अनुसार बैग, जैकेट, पानी की बोतल सहित चौक घंटाघर स्थित रजाई-गद्दे बनाने वाले ‘रज्जन भाई रजाई वाले’ की दुकान पर पहुँच गया। रज्जन भाई अपने दोनों कानों में इत्र से तर रूई के फाहे ठूँसे, दीवान पर मसनद का सहारा लिए, मुँह में पान की गिलोरियाँ दबाए, हौले-हौले जुगाली कर रहे थे। दुकान में पूछने पर विश्वजीत को पता चला कि रजाइयाँ और गद्दे तो तैयार होकर रखे हैं, लेकिन अभी उनकी तगाई होना बाकी है। उसे काटो तो खून नहीं। उसका तो सारा प्रोग्राम ही ध्वस्त हो गया था।


‘‘सहालग के कारण सभी कारीगरों के अतिरिक्त काम करने के बावजूद हम काम पूरा नहीं कर पा रहे हैं। आज सुबह ही बेमौसम की बरसात के कारण थोड़ी दिक्कत हो गयी, लेकिन, आपकी रजाइयाँ-गद्दे कल तक ज़रूर तैयार हो जाएँगी।’’ रज्जन भाई, जिनकी उम्र पैंतालीस-पचास के आसपास होगी, ने दुकान से बाहर निकलकर एक तरफ मुँह करके पान थूकते, असहाय-सी देहभाषा में अपनी मजबूरी बताई।


‘‘लेकिन, मुझे तो आज ही गाँव जाना है। आपको तो पता है, मामला शादी-विवाह का है। आपने आज ही रजाइयाँ-गद्दे देने का तगादा किया था। मेरे पास समय एकदम नहीं है। मेरी ट्रेन रात नौ बजे की है, फिर अगली ट्रेन रात डेढ़ बजे ही मिलेगी। आप ऐसा कीजिए अभी पौने छह बजे हैं। बड़ी मेहरबानी होगी यदि आपको जिन ग्राहकों को एक-दो दिन बाद रजाइयाँ-गद्दे आदि देने हों, उनका काम रोक कर आज आप मेरे इन रजाई-गद्दों की ही तगाई पहले करवा दें। प्लीज, मेरी मजबूरी समझिए। चाहें तो मेरी तरफ़ से आप अपने कारीगरों को पंद्रह-बीस रुपये एक्स्ट्रा दे दीजिएगा।’’ विश्वजीत ने अपनी मजबूरी बताते, रज्जन भाई से लगभग कातर स्वर में कहा।


‘‘अरे! आप ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं? आपको शायद सही-सही मालूमात न हो, आपके बाबूजी हमारे बहुत पुराने ग्राहक हैं। हम आपका काम जल्दबाज़ी में और हल्के-फुल्के तरीके से नहीं कर सकते। आखिर, ग्राहक का विश्वास हमारे लिए बहुत बड़ी चीज़ है। तगाई का काम महीन और मेहनत वाला होता है। ये हमारे लिए लगभग चार घंटे का काम है। फिर भी, आपकी मजबूरी है तो मैं अभी अपने तीनों कारीगरों को आपका ही काम पूरा करने के लिए लगा देता हूँ। कारखाने में काम-काज तो देर रात तक चलता ही रहता है। हाँ! अब आप रात नौ बजे वाली ट्रेन से जाने के बजाय डेढ़ बजे वाली ट्रेन से गाँव वापसी के बारे में सोचिए। आप ऐसा कीजिए तब तक आसपास कहीं घूम-टहल कर ग्यारह, साढ़े ग्यारह बजे तक आ जाइए। चिंता मत कीजिए, आपको रजाइयाँ-गद्दे एकदम तैयार हालत में मिलेंगे। ये रज्जन भाई की ज़बान है।’’ रज्जन भाई ने विश्वजीत की मजबूरी समझते हुए उसे अपनी ओर से पूरी तरह आश्वस्त करने का प्रयास किया।


‘‘ठीक है। मैं और भी जल्दी आने की कोशिश करूँगा। लेकिन प्लीज मुझे निराश मत कीजिएगा।’’ विश्वजीत ने पुनः निवेदन किया।


‘‘निस्सफ़िक्र होकर जाइए। आपका काम एकदम फर्स्ट-क्लास होगा। हो सकता है कि बताए गए टाइम से पहले ही आपका काम हो जाए।’’ रज्जन भाई के आश्वासन पर विश्वजीत उनकी दुकान से लौटने का विचार करते सोचने लगा कि अब इतना समय कैसे और कहाँ बिताया जाए? और ये अपने बैग इत्यादि कहाँ रखूँ...?


‘‘आप ऐसा कीजिए, अपना ये बैग वगैरह यहीं दुकान में ही एक तरफ हिफाजत से रखवा दीजिए। खाना-वाना खाकर आराम से आइए। नौजवान आदमी हैं। सड़क उस पार लगभग दो फर्लांग आगे बढ़ेंगे, तो चौराहे पर जो ‘अनुभव’ टॉकीज है, उसमें एक ठो लल्लन-टॉप फिलिम लगी है। नाइट शो फिलिम देखिए। चोला मस्त हो जाएगा। उधर आपका टाइम भी पास हो जाएगा, इधर हमारा काम, या चाहें तो ऐसी गुनगुनी ठंडक में नदी की तरफ निकल जाइए। घाट-वाट तक घूम आइए। नौका-विहार ही करते आइए। ये और भी बढ़िया टाइम-पास होगा... हें-हें-हें।’’ रज्जन भाई ने शायद विश्वजीत की मजबूरी भाँप ली थी। उन्होंने लगे हाथ उसे अपना ये धड़ाम-धकेल आइडिया सुझाया। उसे भी रज्जन भाई की तजवीज़ बेहतर लगी।


‘‘वाह! रज्जन भाई, मौके की नज़ाकत को देखते हुए आपने पूरी तरह व्यावहारिक और काबिल-ए-तारीफ़ सुझाव दिया है…। एग्जाम की वजह से महीनों से मैं कोई पिक्चर-विक्चर नहीं देख पाया था। यही ठीक रहेगा। मैं अपने ये बैग आदि यहीं आपकी दुकान में ही छोड़े जा रहा हूँ। आपके बताए समय से पहले ही आने की कोशिश करूँगा। लेकिन आप…आप अपना वादा मत भूलिएगा। और हाँ! ज़ल्दबाजी में काम में बिल्कुल लापरवाही न हो।’’ काउंटर के नीचे अपना सामान रखते हुए विश्वजीत ने अपनी आशंका पुनः दोहराई।


‘‘अरे भाई! फिकर मत कीजिए। बेधड़क जाइए। हमारे सभी कारीगर भरोसे वाले हैं। आपको शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा। बताया न! काम एकदम फर्स्ट-क्लास मिलेगा। फिर… हमारा काम बोलता ही नहीं, दिखता भी है।’’ रज्जन भाई ने उसे इस बार अति-आत्मीयतापूर्वक आश्वस्त किया।


‘‘ठीक है। मैं चलता हूँ।’’ कहकर विश्वजीत दुकान से बाहर आ गया। उसने सुन या पढ़ रखा था कि इच्छाओं को मार कर जीने के बजाय उसे कार्यरूप में परिणत करते हुए उसकी खूबियों-खामियों का अनुभव लेना चाहिए। शायद यही सोच वह अन्यत्र घूमने के बजाए, फिल्म देखने की अपनी इच्छा को मार नहीं सका और उसके कदम खुद-ब-खुद ‘अनुभव’ टॉकीज की ओर बढ़ गये। रज्जन भाई के बताए अनुसार वह सड़क पार कर थोड़ा आगे बढ़कर, चौराहे तक आ गया।


सामने ‘अनुभव’ टॉकीज की बाहरी दीवार पर ‘केवल वयस्कों के लिए’ निर्देश के साथ चिपकाए गए फिल्म के पोस्टर्स देखते, कुसुमवाण चलाते कामदेव की तस्वीर के साथ ही अलंकारिक तरीके से लिखे फिल्म का नाम पढ़ते, फिल्म के बारे में वह थोड़ा-बहुत आश्वस्त हुआ। ‘अनुभव’ टॉकीज के सामने वाली सड़क पर दो-तीन ढाबे भी थे। लेकिन वहाँ ग्राहकों की भीड़ नहीं दिखी। अभी भोजन करने का समय भी तो नहीं हुआ था। उसे भी भूख नहीं लगी थी। विश्वजीत ने सोचा, ‘चौक घंटाघर तक आया हूँ तो कॉम्पिटिशन से संबंधित कुछ किताबें भी खरीदता चलूँ। साथ ही उसने यह भी सोचा कि किताबें देखने-खरीदने में कुछ समय तो लगेगा ही‌। तत्पश्चात वहाँ से लौटकर पहले खाना खाऊँगा, फिर फिल्म देखने के बाद रजाई-गद्दे लेने चला जाऊँगा। इस तरह समय का भी बेहतर सदुपयोग हो जाएगा...’ यही सोचकर उसने कॉम्पिटिशन से संबंधित किताबों की प्रसिद्ध दुकान ‘फकीरदास स्टेशनर्स’ जो पास में ही थी, की ओर रुख किया।


किताबों की दुकान में उसे अपनी मनपसन्द किताबें व कुछ स्टेशनरी आदि खरीदते, पैसे चुकाते लगभग डेढ़ घंटा लग गया। वहाँ से निकलकर, मेनरोड पर ही थोड़ा आगे बढ़कर उसे एक होटल दिखा, जो काफी साफ-सुथरा दिख रहा था। वहाँ ग्राहकों की भीड़ भी थी। ‘खाना यहीं खा लिया जाए।’ यही सोचते, विश्वजीत उस होटल में घुस गया। हाथ-मुँह धोकर टेबल के सामने बैठते ही उसने जल्दी से बेयरे को बुलाकर पनीर, दालफ्राई और तंदूरी रोटी ऑर्डर किया। तेज़ भूख लगे होने और समयाभाव के दृष्टिगत उसने जल्दी-जल्दी, लगभग ठूँसते हुए खाना खत्म किया।


होटल से खाना खाकर निकलते उसने घड़ी देखी। पौने नौ बजे थे। मेनरोड पर अभी भी लोगों की अच्छी-खासी आवाज़ाही दिख रही थी। रिक्शे और टैम्पो वाले सवारियों के इंतज़ार में खड़े थे। ‘अनुभव’ टॉकीज नज़दीक ही तो हैं… भोजन के बाद थोड़ी दूर पैदल ही चलना बेहतर रहेगा...। यही सोच विश्वजीत ने पैदल ही ‘अनुभव’ टॉकीज का रुख किया। वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि फिल्म केवल डेढ़ घंटे की ही थी। रात्रि शो साढ़े नौ बजे से शुरू होने वाला था। सिनेमाघर के सामने दर्शकों की ज्यादा भीड़ नहीं थी। हाँ, यह ज़रूर गौरतलब था कि दर्शकों में ज्यादातर युवा मर्द ही दिख रहे थे। जाड़े का मौसम होने के बावजूद मशीन का ठंडा पानी बेचने वाले एक ठेले पर उसकी नज़र गई। ठेले पर ‘पच्चीस पैसे में बड़ा गिलास, दस पैसे में छोटा गिलास’ लिखी एक तख्ती दिखी। भोजन करने के बाद अब उसे हल्की प्यास महसूस हो रही थी। उसने ठेले वाले के पास जाकर दस पैसे में एक छोटा गिलास पानी पिया।


लघुशंका के बाद पिक्चर-हॉल में प्रवेश करना उचित होगा। यही सोच उसने सड़क किनारे बने मू़त्रालय का रुख किया। ‘बचपन की गलतियों से निराश न हों। नामर्दी, शीघ्रपतन, धातुरोग में जड़ी-बूटियों से गारण्टीशुदा इलाज के लिए ‘वैद्य जी कंचनगढ़ वाले’ से शीघ्र मिलें या लिखें, जवाबी लिफाफे के साथ।’ मूत्रालय की दीवारों पर लिखे और चिपकाए गए इन चिर-परिचित पोस्टर्स, पैम्फलेट्स आदि को पढ़ते, लघुशंका से निवृत्त हो, अगले ही पल विश्वजीत सिनेमाघर के ‘पुरुष’ टिकट-खिड़की के सामने खड़ा था। ‘क्यू’ में उसके आगे चार और युवक खड़े थे। बगल के ‘केवल महिलाएँ एवं बुज़ुर्ग’ वाले टिकट खिड़की के सामने तीन बुज़ुर्ग पुरुषों को टिकट के लिए ‘क्यू’ में खड़े देख, विश्वजीत के आगे खड़े एक युवक ने फिकरा कसा, ‘‘अंकल जी! आप लोग भी...? भजन-कीर्तन की इस उमर में ‘अभी चढ़ी जवानी बुड्ढे नूँ…’ में ही लगे-फँसे पड़े हैं?’


‘‘अरे बेट्टा! क्या हमें ऐसी फिलिम देखने की मनाही है...? वो कहावत तो सुनी होगी ना तुमने… ‘जब तक जवनका लोट-पोट, तब तक बुढ़वा तीन-चोट… हा-हा-हा’’ उस बुज़ुर्गवार ने भद्दे तरीके से खीसे निपोरते हुए जवाब दिया था। वह युवक खिसियाकर रह गया। बहरहाल... जल्दी ही टिकट लेने वास्ते विश्वजीत का भी नंबर आ गया।


‘‘एक टिकट मेरे लिए भी… ले लो भाई साहब।’’ टिकट खिड़की के आगे ‘क्यू’ में खड़े विश्वजीत ने आवाज की तरफ पीछे पलटकर देखा। हाथ में बीस रुपये का नोट लिए टिकट खरीदने का अनुरोध करने वाले लगभग पैंसठ-सत्तर साल के एक बुज़ुर्ग-सज्जन थे। उनके द्वारा अपने लिए कहा गया ‘भाई साहब’ का संबोधित सुनकर उसे कुछ अजीब-सा लगा। बड़ा बेढ़ब व्यक्तित्व था उनका। विश्वजीत ने उन्हें सिर से पाँव तक देखा। कॉरडरॉय की ट्वीड के नीचे पहनी कमीज के कॉलर का बटन ऊपर तक बंद था। बड़े-बड़े बाल, जिन्हें उन्होंने चोटी की तरह पीछे बाँध रखा था। चेहरे पर झुर्रियों की वजह से या उनकी बनावट ही ऐसी थी, उन बुजुर्गवार का चेहरा कुछ-कुछ महिलाओं सरीखा दिख रहा था। भद्दी-सी पकौड़े जैसी नाक, जो साइड से देखने पर एक चर्चित चरित्र अभिनेता के जैसी दिखती थी। नीचे के होंठ खिंचे हुए, खैनी चबाते, टूथपिक से दाँत खोद रहे थे। उनके बोलते ही मुँह से पायरिया का दुर्गंधयुक्त भभका-सा उठा। गौर से देखने पर व्यक्तित्व से जाहिलपना-सा भी झलक रहा था। लेकिन… ‘इन्हें तो बुज़ुर्गों वाली पंक्ति में खड़ा होकर आराम से टिकट ले लेना चाहिए था, खैर… मुझे क्या लेना-देना इस नमूने से? मुझे बस इनके लिए एक टिकट ही तो खरीदना है?’ यही सोच विश्वजीत ने उन बुजुर्गवार के हाथ से रुपये लेकर टिकट काउंटर पर बैठे क्लर्क से एक टिकट और माँगा।


टिकट काउंटर से दो टिकट खरीदने के बाद, एक टिकट उन बुजुर्ग‌ सज्जन को थमाकर वह जल्दी-जल्दी सिनेमाहॉल के गेट तक आ गया। गेट पर खड़े गेटमैन ने दो सीढियाँ नीचे उतरते, टॉर्च की रोशनी में उसे हॉल की दूसरी या तीसरी ‘रो’ के लगभग बीच वाली सीट पर बिठा कर चला गया। फिल्म शुरू नहीं हुई थी। पर्दे पर अभी विभिन्न उपभोक्ता उत्पादों के विज्ञापन ही दिखाए जा रहे थे।


बहरहाल… फिल्म शुरू हुए बमुश्किलन अभी तीस-पैंतीस मिनट ही हुए होंगे, पर्दे पर कुछ ऐसे दृश्य आए कि हॉल में निविड़ शान्ति के बीच, विश्वजीत के आगे-पीछे की सीटों से कुछ फुसफुसाहटें सी सुनाई देने लगीं। चुम्बनों की बौछार के बीच, पर्दे पर नायक-नायिका का आपसी प्रणय-प्रसंग चल रहा था। इसी बीच विश्वजीत ने गौर किया कि किसी ने उसके बाएँ हाथ को पकड़ा। उसने देखा तो बगल वाली सीट पर वही बुजुर्ग सज्जन बैठे थे, जो टिकट खरीदते समय काउंटर पर मिले थे। उन्हें देख उसे अचानक ध्यान आया– ‛अरे! हाँ… मैंने, अपने और इन बुजुर्ग सज्जन के लिए एक साथ ही तो टिकट खरीदा था, इसीलिए हमारे टिकट नंबर एक ही सीरियल में होने के कारण, हमारी सीटें भी अगल-बगल हैं।’ यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं थी। बहरहाल, जब उसने उन बुजुर्गवार की ओर देखा तो वे कुछ सकपकाते, अचकचा से गए। पता नहीं क्यों… ‘सॉरी-सॉरी’ कहते पर्दे की ओर देखने लगे। खैर… उनकी तरफ से ध्यान हटाते, विश्वजीत फिर से फिल्म देखने में मशगूल हो गया।


फिल्म देखते अभी पंद्रह-बीस मिनट ही हुए होंगे कि विश्वजीत ने उन बुजुर्गवार के हाथ का स्पर्श एक बार फिर अपने बाएं हाथ पर महसूस किया। परंतु इस बार उसे जाने क्यों ऐसा लगा कि गलती एक बार हो सकती है, दोबारा फिर वही हरकत...? यहाँ तक कि वे पर्दे पर आते कुछ दृश्यों पर बीच-बीच में मुँह में उँगली डालते भद्दे तरीके से सीटी भी बजा देते। पता नहीं उसे क्यों ऐसा लगा कि उन्हें डाँट देना चाहिए? पर शायद संकोचवश वह उन्हें टोक नहीं सका।


विश्वजीत ने यह भी महसूस किया कि उन बुजुर्गवार ने उसकी बाँह पर दो-तीन बार अपनी कुहनी से छुआ, लेकिन पर्दे पर चल रहे दृश्य की बारीकियों में खोए रहने के कारण उसका ध्यान एकबारगी उनकी इन हरकतों पर नहीं जा सका था। बुजुर्गवार की इन हरकतों की वजह से कोहनी का टेक लगाए बैठे उसके हाथ बार-बार कुर्सी के हत्थे से फिसल-फिसल भी जा रहे थे। परंतु अब वह सतर्क हो गया था।


‘‘अंकल जी, आप अपना हाथ क्यों मुझसे बार-बार ‘टच’ करा रहे हैं?’’ विश्वजीत ने उन बुजुर्गवार की ओर तनिक तल्खी से देखते हुए तीखे स्वर में कहा।


‘‘ओह! सॉरी-सॉरी...?’’ एक बार फिर वो बुजुर्गवार ‘सॉरी-सॉरी’ कहते, पर्दे की ओर मुखातिब हुए।


पर इस बार तो इंतेहा हो गयी। पर्दे पर सुहागरात का दृश्य चल रहा था। नायक-नायिका द्वारा परस्पर आलिंगनबद्ध होकर किसिंग, हाथों-पैरों के स्पर्श के अत्यन्त नज़दीकी शॉट के बीच सभी दर्शकों संग विश्वजीत भी मंत्रमुग्ध-सा फिल्म देखने में मशगूल था कि उन बुजुर्गवार के हाथ का स्पर्श उसने एक और बार अपने बाएं हाथ पर महसूस किया। उसे लगा कि कुछ मसलों पर कभी-कभी अनावश्यक प्रतिक्रिया, दुनियावी मसलों पर हमारी अज्ञानता ही बताती है। यही सोच उसने उन्हें रोकने-टोकने के बजाय, उनकी हरकतों पर चुपचाप गौर करने का इरादा किया। अगले ही पल, एक मंजे हुए कलाकार की तरह उन्होंने उसका हाथ लगभग पकडते, हौले-हौले अपनी ओर खींचना शुरू किया। विश्वजीत ने कनखियों देखा, बुजुर्गवार के पेंट की खुली जिप में उनकी उँगलियाँ अन्दर-बाहर फिसल रहीं थीं। विश्वजीत को अब उस खूसट बुड्ढे के लिजलिजे गंदे शरीर से उठती अजीब किस्म की दुर्गंध सी भी महसूस हुई। टिकट खरीदते समय उसे उन बुजुर्गवार का आशय ठीक-ठीक समझ नहीं आया था। लेकिन बूझ-अबूझ की इस पहेली के द्वंद्व के बीच विश्वजीत उनकी इस अजीबोगरीब हरकत का आशय अभी भी कुछ समझा, तो कुछ समझ पाने में असमर्थ रहा। उस खूसट बुड्ढे की ऐसी हरकत पर उसे तेज गुस्सा आया।


‘‘क्या बात है, अंकल जी...? क्या दिक्कत है...? ठीक से बैठ नहीं सकते...? दिमाग खराब है क्या...?’’ इस बार विश्वजीत ने उस खूसट बुड्ढे को कड़ाई से डाँटते हुए झिड़का। वह इस कदर तिलमिलाकर रह गया, मानो उसके अंदर कोई ज्वालामुखी सा फटने को बेताब हो। हालाँकि, वह फिल्म समाज में सेक्स को लेकर व्याप्त अनेकों भ्रांतियों, कुशंकाओं, कतिपय कुंठाओं के दृष्टिगत अत्यन्त शिक्षाप्रद उद्देश्य से समाज को जागरूक करने के वास्ते बनाई गई थी, परंतु विश्वजीत के लिए तो यहाँ का सब मंजर ही उल्टा-पुल्टा हो गया था। चूँकि वह ऐसे किसी अनुभव के लिए तैयार नहीं था, सो तत्काल उसकी कुछ समझ में नहीं आया कि वह क्या करे? उसने फिल्म को आधा-अधूरा ही छोड़कर सिनेमाहॉल से बाहर निकलने का मन बना लिया। साथ ही अब उसे यह रहस्य भी समझ में आ गया था कि बुजुर्गों के लिए निर्धारित टिकट खिड़की से इस बुड्ढे ने टिकट क्यों नहीं खरीदा?


विश्वजीत का मूड लगभग अपसेट हो चुका था। परंतु साथ ही वो यह भी सोचने लगा कि ऐसे लंपट, सिर्री लोगों की सोच-समझ के बारे में भला क्या कहा जा सकता है? क्या इन्हें सबक सिखाया जा सकता है? अगर वह अभी अपनी सीट से उठकर आसपास की सीटों पर बैठे, फिल्म देखने में मशगूल लोगों से इस बुड्ढे की ऐसी हरकतों के बारे में ज़िक्र करते शिकायत करे भी, तो इन महाशय की उम्र को देखते, शायद ही वहाँ बैठे किसी दर्शक को उसकी बात पर यकीन होगा? फिर, ज़रूरी नहीं कि उसे लोगों का समर्थन मिले ही। स्पष्ट है कि जीवन में ऐसे अनेक प्रसंग आते हैं जिनमें हम किसी संतोषजनक निर्णय पर नहीं पहुँच पाते। काहे से कि बहुत सारी स्थितियों-परिस्थितियों पर भी तो हमारा कोई इख्तियार नहीं। उसे लगा कि ऐसी अप्रत्याशित स्थिति में ज्यादा मगजमारी न ही सुकूनदायक होगा। अतः जीवनानुभव की कमी या शायद उम्र के तकाजे के चलते, उन बुज़ुर्गवार की और अपनी उम्र को देखते, ज़ेहन में आए ढेरों विकल्पों, संभावनाओं पर तीव्रता से सोचते-विचारते विश्वजीत ने चुप रहने का निर्णय लिया और वहाँ से अन्यत्र हट जाना ही बेहतर समझा। यकीनन उसके मन में यह प्रबल धारणा भी बनी कि लोगों को ऐसे मसलों पर सचमुच जागरूक किए जाने की आवश्यकता है।


‘स्साला मौगड़ा, सिटियाबाज कहीं का...? सारा मूड झंड कर दिया...।’’ उसे मन-ही-मन बीसों गालियाँ देते, ढेरों गलीज विशेषणों से नवाजते, बुदबुदाते, बुरा सा मुँह बनाते वह वहाँ से उठकर आगे की ‘रो’ में एक खाली सीट देखकर वहाँ जाकर बैठ गया। विश्वजीत के लिए यह एक साथ ही शर्म, अपमान और शायद संतोष के भी पल थे, क्योंकि उलझनों और परेशानियों के उन गंभीर क्षणों में, अपनी जान उसने सटीक फैसला लिया था। हालाँकि उस बुढ़ऊ के लिए उसके मन में अथाह घृणा और कड़वाहट भर गई थी।


दिलोदिमाग में भरी झंझावात की ऐसी स्थिति में विश्वजीत ने बाकी की फिल्म देखने का मज़ा लिया या नहीं। अब क्या ही कहे...? बहरहाल। फिल्म खत्म होने के बाद वह बदहवास-सा जल्दी से सिनेमाहॉल से बाहर निकला। ‘रज्जन भाई की दुकान बंद न हो जाए’ सोचता हुआ तेज कदमों से चौक घंटाघर की ओर चल दिया। बाहर से बेचैन, बदहवास तो अंदर से हाहाकार लिए, लगभग यंत्रवत भागते वह फुटपाथ पर उभरे एक पत्थर से टकराकर गिरते-गिरते बचा। तेजी से सामने से लड़खड़ाते, गुनगुनाते हुए चले आ रहे, जासूसी फिल्मों के किसी पात्र की तरह लंबा सा ओवरकोट पहने एक अधेड़ आदमी से भी टकराते-टकराते बचा। गुस्से में काँपते विश्वजीत इस कदर अपसेट था कि एकबारगी उसका मन हुआ कि उसने उस अधेड़ शराबी को पंचिंग-बैग समझ, उसकी कसकर धुनाई क्यों नहीं कर दी? परंतु, दारू के नशे में पूरी तरह टुन्न वह अधेड़ तो खुद ही दुखी आत्मा लग रहा था। चलते-चलते दो-तीन राहगीर तो आगे ऐसे भी मिले मानो वे उसे ही रहस्यमय तरीके से देख रहे हों। उसकी बदहवासी और भी बढ़ गई।


जाड़े की रात थी। सर्दी बढ़ रही थी। तिस पर चतुर्दिक कोहरे की घनी चादर-सी छाई हुई थी। सड़क पर लगभग पंद्रह मीटर से आगे कुछ भी साफ-साफ नहीं दिख रहा था। सड़क के दोनों ओर बने मकानों में से कुछेक में ही बत्तियाँ जल रही थीं, बाकी मकान घुप्प अँधेरे में डूबे थे। हाँ, स्ट्रीट-लाइट की वजह से सड़क ज़रूर रोशन थी। सड़क के दोनों किनारे की दुकानों के ऊपर लगे कहीं चमकते तो कहीं धुँधलाते साइन-बोर्ड्स अजीब तरह की रहस्यात्मकता लिए दिख रहे थे। बुरी नज़रों से बचने के वास्ते एक निर्माणाधीन मकान के आगे रेलिंग से बंधे डरावने मुखौटे वाला नज़रबट्टू, अजीबोगरीब तरीके से चमक रहा था। दिन में भीड़-भाड़ की वज़ह से संकरी लगने वाली वह सड़क, दुकानें बंद होने और अब सूनसान होने के कारण काफी चौड़ी दिख रही थी। उसे ऐसा लग रहा था मानो, रात में यह रास्ता भी खासा लंबा हो गया है। रह-रहकर दूर किसी गली से आ रहे आवारा कुत्तों के भौंकने की आवाज़ों से वातावरण की नीरवता ज़रूर भंग हो जाती थी। कुछेक दुकानों के शटर आदि गिरे हुए ज़रूर थे, मगर उन शटर्स की झिर्री से छनकर आ रही हल्की रोशनी, ठक-ठक, धप-धप जैसी आवाजों से अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि दुकानों के अंदर कारीगर अभी भी काम में लगे हुए हैं। बीच-बीच में इक्का-दुक्का दोपहिया या चौपहिया भी आते-जाते दिख जाते। सड़क के किनारों की सीलन भरी, बजबजाती नालियों के इर्द-गिर्द चिंचिंयाते चूहे, छछूंदर आदि दौड़ लगाते दिख जा रहे थे। ऊनी कैप रज्जन भाई की दुकान में रखे बैग में ही रह जाने के कारण कानों में लग रही ठंड से बचने के वास्ते उसने अपने जैकेट का ऊपरी बटन बंद करते हुए जैकेट के कॉलर को सीधा कर लिया। एक हाथ से कंधे पर किताबों का झोला संभाले, तो दूसरा हाथ अपनी जेब में डाले, वह बड़े-बड़े डग भरता ताबड़तोड़ अपने कदम बढ़ा रहा था। रज्जन भाई की दुकान तक जल्द-से-जल्द पँहुचने की फ़िक्र में या किसी अनजान आशंकावश उसने एक बार भी पीछे पलटकर नहीं देखा। उसकी साँसे धौंकनी की तरह चल रही थीं। गड्डमड्ड सी ऐसी मनःस्थिति में उसके मन-मस्तिष्क में ढेरों विचार उमड़-घुमड़ रहे थे। अजीब दिमागी हालत थी उसकी।


समय बिताने के लिए फिल्म देखने के अपने निर्णय पर विश्वजीत को अफ़सोस भी हो रहा था। सोचने लगा कि कहीं पार्क या पास स्थित किसी लायब्रेरी में भी तो जा सकता था? या रज्जन भाई के सुझावानुसार नदी घाट की ओर भी जा सकता था। इस गुनगुनी-सी ठंडक में अच्छा-खासा नौका-विहार ही हो जाता। मूड इस तरह अपसेट तो न होता? दिन-भर का अच्छा-खासा मूड चौपट करने के लिए एक लंपट ही काफी है। पर अब अफ़सोस करने से फायदा भी क्या? हालाँकि, विश्वजीत अपनी इस मूर्खता पर सिर्फ अफ़सोस ही नहीं कर रहा था, बल्कि बीच-बीच में उसे हँसी भी आ जा रही थी। इसी अफरा-तफरी, उधेड़बुन में वह कब रज्जन भाई की दुकान पर पहुँच गया, उसे पता ही नहीं चला। बहरहाल, रज्जन भाई की दुकान पर पहुँचने से पहले ही विश्वजीत ने अपनी बदहवासी, दिमाग में इंद्राज बेतरतीब विचारों, भावों पर काबू पाते, खुद को प्रकृतिस्थ कर लिया था। वाबजूद इसके यह घटना उसके लिए किसी बुरे और हौलनाक हादसे से कम नहीं थी।


बाद के वर्षों में इस महानगर में रहते हुए विश्वजीत जब कभी भी उस रास्ते से गुजरता, उसकी नज़रें बरबस उस ‘अनुभव’ टॉकीज की तरफ चली जातीं। हालाँकि, अब वह टॉकीज शहर के इतिहास में दर्ज हो चुका है। अब तो वहाँ अच्छा-खासा मल्टीप्लेक्स मॉल बन गया है। तथापि उस फिल्म को देखने का अनुभव और वह घटना, एक फिल्म की तरह उसके ज़ेहन में आज भी ताज़ा है। फिल्म का टिकट खरीदते समय उस खूसट बुड्ढे द्वारा कहा गया वाक्य―‘एक टिकट मेरे लिए भी...।’ विश्वजीत के कानों में अक्सर गूँजता रहता है।


उस अप्रत्याशित घटना का अविस्मरणीय प्रभाव ही है कि बस या ट्रेन में सफर के दौरान कंडक्टर या टिकट-चेकर द्वारा ‘टिकट-प्लीज’ की आवाज़ देने पर विश्वजीत के ज़ेहन में वर्षों पुराना वही मंजर किसी फिल्म के दृश्य की भाँति अभी भी घूम जाता है। उसके तईं इस घटना का महत्वपूर्ण सबक यह रहा कि गुजिश्ता सालों के साथ-साथ इंसानों को जानने-समझने में निश्चय ही उसके नज़रिए में बदलाव आया था। शायद ठीक ही कहा गया है―‘हम जो देखते हैं, अनुभव करते हैं, उसके बाद वही नहीं रहते, जो पहले होते हैं।’ इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से विश्वजीत की यह धारणा भी पुख्ता हुई थी कि जवान होती पीढ़ी को ‘गुड टच-बैड टच’ आदि के बारे में विस्तृत जानकारी दिया जाना कितना जरूरी है।


इन्हीं सब बातों, घटनाओं में खोए-खोए फिल्म कब खत्म हो गई, विश्वजीत को पता ही नहीं चला। उसकी तंद्रा फिल्म खत्म होने के बाद टूटी। विश्वजीत का ध्यान अचानक अपने बगल की सीट पर गया। उसने देखा कि उसके बगल आकर बैठा वह नौजवान तो जाने कब का अपनी सीट छोड़कर जा चुका था।


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रामनगीना मौर्य वरिष्ठ कथाकार हैं। अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित। यथा : आखिरी गेंद, आप कैमरे की निगाह में हैं, सॉफ्ट कॉर्नर, यात्रीगण कृपया ध्यान दें, मन बोहेमियन, आगे से फटा जूता, रामनगीना मौर्य की 23 चयनित कहानियाँ, खूबसूरत मोड़, ठलुआ चिन्तन (कुछ रम्य, कुछ हास्य, कुछ व्यंग्य), कारूं का खजाना (चयनित कहानियाँ)।


पुरस्कार/सम्मान : डॉ. विद्यानिवास मिश्र’ पुरस्कार, यशपाल पुरस्कार, प्रो. श्यामनारायण लाल स्मृति सम्मान-2020 आदि।


कुछ कहानियों के नेपाली, भोजपुरी, एवं उड़िया अनुवाद प्रकाशित। पंजाब केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा में कहानी संग्रह ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ पर लघु शोध प्रबन्ध।



 








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