top of page

कच्चे दूध की गंध (चीनी कहानी)

  • 23 hours ago
  • 21 min read


मूल कहानी : बाई फेइयू 
अँग्रेज़ी से अनुवाद : यादवेन्द्र

        

उस गाँव में सिर्फ दो ही सड़कें थीं—पत्थर की बनी एक गली तीन मीटर चौड़ी और दूसरी उससे थोड़ी ज़्यादा यानी चार मीटर चौड़ी नहर। घरों की तीन कतारें थीं, नहर और गली के दोनों किनारे... और सभी घर एक-से बने हुए थे, दो मंज़िला। एक घर दूसरे घर से बिल्कुल सटा हुआ, बीच में किसी तरह की कोई जगह नहीं छोड़ी गई थी—यानी उस गाँव में सभी लोग एक दूसरे के पड़ोस या सामने के घर में रहते थे। घरों की जो तीन कतारें थीं, वे बिल्कुल सीधी नहीं थीं, जैसे-जैसे जहाँ-जहाँ नहर मुड़ती थी, वहाँ-वहाँ घरों की लाइन भी मुड़ गई थी। पत्थर वाली गली बहुत साफ-सुथरी, शांत और चमक से भरी रहती। नहर का पानी भी शीशे जैसा साफ था और उसमें पत्थर के पुल प्रतिबिंबित होते रहते—जब कोई डोंगी बीच से गुज़रती तो उससे उठती लहरों में वे पुल गुम हो जाते पर थोड़ी देर बाद वे अपने पुराने स्थान पर वापस लौट कर जड़वत हो जाते।  


यह नहर पूरब दिशा में गाँव से जैसे ही बाहर निकलती, एक बड़ी नदी में मिल जाती—उस गाँव के युवाओं के लिए नदी का एक खास महत्व था। इस गाँव के सभी युवाओं की जीवन यात्रा उस नदी से ही शुरू होती थी। वैसे गाँववासियों के लिए शीशे जैसा चमकता पानी और उसमें पुल की परछाई किसी तरह के उत्साह का संचार नहीं करती थी क्योंकि उसकी तरफ नजर जाते ही वे अपने युवाओं के हमेशा हमेशा के लिए गुम हो जाने की बात सोचने लगते थे... और यह गुमशुदगी भी ऐसी कि उनका नामोनिशान तक मिट जाए। पानी भी भला कुछ याद रखता है।


वोंगवोंग का परिवार और मिसेज हुई का परिवार आमने-सामने रहता था, बीच में पत्थर की सड़क वाली गली थी। मिसेज हुई के घर के पिछवाड़े कोई बीस-तीस मीटर ऊँचा मिट्टी का टीला था। वोंगवोंग का घर पानी के ऊपर बना हुआ था। सात वर्षीय वोंगवोंग का असली नाम किसी को याद नहीं था पर जब भी वह घर से बाहर दिखाई देता तो उसके हाथ में हमेशा वोंगवोंग ब्रांड से भरा थैला होता, इसीलिए मोहल्ले के सभी लोग उसे वोंगवोंग कहके ही पुकारते—यहाँ तक कि उसके दादा भी। वोंगवोंग शब्द अब इतना मशहूर हो गया था कि इसको बोलना और सुनना उस लड़के को भी प्रिय लगने लगा था।


वह अपने दादा के साथ रहता था। उसके माँ-पिता गाँव से दूर एक बड़ी व्यावसायिक नौका पर काम करते थे और अच्छा-खासा कमाते थे। सुनने में यह आया था कि वोंगवोंग के माँ-पिता उसके बड़े होने पर प्रांत की राजधानी के किसी कॉलेज में उसका दाखिला कराना चाहते हैं। उन्होंने इतना पैसा इकट्ठा कर लिया है कि कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ उसके लिए घर खरीदने और शादी करने का जुगाड़ भी किया जा सके। वोंगवोंग की माँ अक्सर कहती कि बेटे की शादी करा देने के बाद वे दोनों गाँव लौट आयेंगे और खुद को व्यस्त रखने के लिए एक छोटी-सी दुकान खोल लेंगे। यह बात सालों से चल रही थी और वे दोनों दूर-दराज के इलाकों तक जाकर पैसे कमा रहे थे। दरअसल पानी के ऊपर नाव में दूरियाँ तय करते उनका जीवन व्यतीत हो रहा था। धीरे-धीरे गाँव की स्मृतियाँ भी उनके मन से फिसल रही थीं—मनीऑर्डर की रसीदों पर लिखा पता-ठिकाना ही अब शेष था। ये रसीदें ही अब वोंगवोंग के दादा के अनुपस्थित बेटे और वोंगवोंग के अनुपस्थित माँ-पिता का सबूत थीं।


वोंगवोंग अपना खाली समय घर के बाहरी चबूतरे पर बैठकर बिताता था—सामने से आते-जाते एक-एक व्यक्ति को निहारता था। वहाँ बैठे-बैठे भी उसके हाथ में वोंगवोंग के पैकेटों से भरा थैला होता था। मनीऑर्डर की रसीद के बायें हाशिए पर उसके पिता की लिखावट ज़रूर होती। "हर रोज़ वोंगवोंग के पैकेटों से भरा एक थैला ज़रूर खाना है...।" होश सँभालने के बाद से ही वह वोंगवोंग के इतने थैले हजम कर चुका था कि उन्हें देखते ही अब उसे उबकाई आने लगती, पर उसके दादा थे कि उसको बाहर बैठे देखकर ही आग-बबूला हो जाते। बाहर बगैर किसी काम के बैठे-बैठे वह बोर हो जाता तो बोरियत दूर करने के लिए अपनी जेब में हाथ डाल लेता। दादा जी को एक हाथ में थैला और दूसरे हाथ में खाने का पैकेट थामे वोंगवोंग सबसे सही लगता था। अपने चबूतरे पर बैठे-बैठे वोंगवोंग मिसेज हुई के ऊपर नजर रखता—उन्होंने अपने घर की ऊपरी मंजिल पर दुकान बना रखी थी। जैसे ही कोई ग्राहक आता, वोंगवोंग अपने चबूतरे पर बैठा-बैठा जोर की आवाज लगाता और मिसेज हुई पिछवाड़े से मुस्कुराती हुईं प्रकट हो जातीं।


एक समय ऐसा आया कि मिसेज हुई ने भी गाँव छोड दिया। फिर लम्बे समय बाद वे इस बसंत में गाँव आयी थीं। दरअसल इस बार वे बच्चे को जन्म देने के लिये आयी थीं और आजकल नवजात शिशु का लालन-पालन कर रही थीं। वोंगवोंग को माँ का दूध पीना कभी नसीब नहीं हुआ—दादाजी ने बताया कि उसकी माँ को दूध उतरा ही नहीं। वोंगवांग को माँ के स्तन को मुँह में लेने का एक और सिर्फ एक मौका याद है जिसमें भी पीने को मुँह में दूध की एक बूँद नहीं आ पायी थी... उसकी माँ भी दर्द से चिल्ला पड़ी थी। जन्म होते ही कुछ दिनों बाद उसको दादी के पास पलने के लिए भेज दिया गया। थोड़े समय बाद वह इस दुनिया से विदा हो गयीं। दादी के पास परवरिश के लिए जब माँ-पिता ने उसको भेजा तो साथ में स्टेनलेस स्टील का एक कटोरा और चम्मच भी भेजा। दादी जब तक जिन्दा रहीं, उस कटोरे को क्रीम-केक, दूध, डिब्बे वाले इन्फैण्ट फॉर्मूला, अंडे की जर्दी और दाल के गाढ़े पेस्ट से भर देतीं और उसी चम्मच से सब कुछ मिलाकर वोंगवोंग के लिए खाद्य तैयार कर देतीं। शुरू से उसकी आदत थी कि खाना खत्म करते ही वह हँस पड़ता और उसके पेट भर जाने की घोषणा दादी खाली कटोरे पर चम्मच जोर से मार कर करतीं। दादी अक्सर कहतीं - "अब देखो तो चेहरा कैसा दमक रहा है... सामने नहीं है तो क्या हुआ, तुम्हारी माँ की छाती यही कटोरा है।"


यही खाना खाकर वोंगवोंग बड़ा हुआ—और ठोस और हृष्ट-पुष्ट। उसकी दादी लोगों के बीच यह जताने से कभी नहीं चूकतीं कि उसका वोंगवोंग माँ का असली दूध पीने वाले किसी भी बच्चे की तुलना में ज्यादा सेहतमंद है। दादी चाहे जो कहें,‌ उसके दादा की बेबाक राय थी- "आजकल की औरतें... एकदम सूखी होती हैं, जैसे बरसों पुरानी हड्डियाँ। सरकार ने उनके पेटों के लिए तो नई-नई नीतियाँ बनायीं पर छातियों को लहराने के लिए आज़ाद छोड़ दिया।" दादी उसको बताया करतीं : "मैंने तुम्हारे पिता को पाँच साल की उम्र तक दूध पिलाया है... पूरे पाँच साल।" यह कहते हुए वह गर्व का अनुभव करती थीं और अपने बेटे को लेकर फूली नहीं समातीं। 


मिसेज हुई एकदम अलग किस्म की महिला थीं- उनका चेहरा, आँखें, होंठ, बाँहें और पिंडलियाँ बिल्कुल गोल-मटोल और भरी-भरी थीं। उनकी कद-काठी हृष्ट-पुष्ट थी। सामने पड़ने पर वे हर किसी को देखकर मुस्कुरातीं और जब उनका चेहरा खुशी से दमकता तो उनके मुँह के दोनों छोरों पर डिंपल उभर आते—नई-नवेली माँ बनने का आह्लाद और गर्व उनके चेहरे से फूटा पड़ता था। उनके आसपास से जो भी गुजरता, उसे माँ के ताजे दूध की भीनी-भीनी गंध अपने आगोश में ले लेती। उनकी छाती असाधारण तौर पर बाहर को उभरी हुई थी और शर्ट के अन्दर रह कर भी सामने वाले को स्पष्ट महसूस होती थी—विशेष बात यह कि उससे अनवरत दूध निकलता रहता था, धाराप्रवाह। बच्चे को जिस अदा से वे दूध पिलाती थीं, उसको देखना अपने आप में अनूठा अनुभव था और अपनी दुकान से बाहर बैठ कर हर वक़्त वे यही काम आह्लादकारी ढंग से करती रहती थीं। दूध पिलाने के लिए वे अपनी शर्ट के बटन कभी नहीं खोलतीं, बस शर्ट सीने से ऊपर खिसका देतीं... बच्चे का सिर एक हथेली पर रखतीं और नीचे उसके मुँह तक झुक जातीं। जब बच्चा दूध से पेट भर लेता तो वे फिर से सीधी बैठ जातीं। दूध पिलाते हुए वे गर्दन सामने झुकाये रखतीं और बच्चे की नन्ही उँगलियाँ या कान हौले-हौले सहलाती रहतीं। इस बीच दुकान पर कोई सौदा लेने आ जाता तो वहीं बैठे-बैठे उस से जरूरत का सामान उठा लेने को कह देतीं... पैसे लेने-देने के लिए भी वे उठती नहीं, वहीं बैठे-बैठे ग्राहक को हिदायत दे देतीं कि खुले पैसे दुकान में कहाँ रखे हैं।


वोंगवोंग को बच्चे को दूध पिलाती हुई मिसेज हुई बहुत लुभाती हैं, वह उनकी उस अदा पर फिदा है। उनके सीने का उदार उभार उसको मातृत्व का आकर्षक प्रतीक लगता और जब स्तन की गोलाइयों पर उभरी नीली नसें दूर से चमकतीं तो वोंगवोंग अनुमान लगाता कि मिसेज़ हुई का दूध गुनगुना और आसमानी नीले रंग का ही होगा। जब वे बेटे को दूध पिलातीं तो वह एक स्तन को मुँह लगाये एक हाथ से दूसरे को पकड़े रहता। वोंगवोंग ने बड़े सोच-विचार के बाद निष्कर्ष निकाला कि सूरज भले ही मिसेज हुई की शर्ट के नीचे जाकर उनके स्तन को प्रकाशित न करता हो पर बेटे के नन्हे हाथ और माँ के स्तन जब इतने अंतरंग ढंग से एक-दूसरे के साथ घुलते-मिलते हैं तो उनसे कोई न कोई रोशनी ज़रूर फूटती है। और मिसेज हुई के सीने के उभार अर्ध पारदर्शी शर्ट के अन्दर से वोंगवोंग को आँख-मिचौली करते हुए लगते—उनसे कभी पाकीज़गी छलकती तो कभी ललचाता खिंचाव। जहाँ तक मिसेज हुई का सवाल था, किसी के भी सामने बच्चे को दूध पिलाने में उनको कोई लाज-शर्म न आती। उस गाँव में गिने-चुने बूढ़े और बच्चे थे, बाकी सब अधेड़ उम्र की औरतें थीं। लज्जारहित मिसेज हुई के अनावृत्त स्तन वोंगवोंग को खूब लुभाते... साथ-साथ दुखी भी करते। वह कच्चे दूध की गंध का गुलाम हो गया था... और उसका दुख भी दूध की गंध जैसा शक्तिहीन था, जो निरंतर अपने होने का सूक्ष्म एहसास कराता रहता था पर सघन रूप में हाथ नहीं आता था।


मिसेज हुई अपने घर के सामने चबूतरे पर बैठी हुई बेटे को दूध पिला रही थीं और वोंगवोंग गली में बैठा हुआ था। एक स्तन का दूध पीकर बच्चे का पेट भर गया और जैसे ही मिसेज हुई ने दूसरा स्तन उसके मुँह में डाला, मुँह से दूध के बुलबुले निकालते हुए उसने बड़ी अनिच्छा से अपना मुँह परे हटा लिया। दूसरा स्तन दूध से इतना लबालब था कि मिसेज़ हुई दर्द से कराह उठीं और फौरन कुछ दूध निचोड़ कर बाहर गिरा देने का फैसला किया। पीछे मुड़कर उन्होंने दीवार की तरफ मुँह किया और दोनों हाथ से स्तन पकड़ अच्छा-खासा दूध निचोड़ कर सामने दीवार पर गिरा दिया। वोंगवोंग की नज़रें किसी शिकारी की तरह मिसेज़ हुई की एक-एक हरकत का पीछा करती रहीं और वह एक जादुई सम्मोहन में बँधता चला गया। उसने विस्मय के साथ सामने दीवार पर सफेद दूध की एक-एक बूँद गिरती हुई देखी जो देखते ही देखते पत्थर के अन्दर समा गयी। उसकी नाक में कच्चे दूध की सघन गंध घुस गयी और पूरी गली उसकी ऊष्मा से सराबोर हो गयी।


वोंगवोंग जहाँ बैठा था वहाँ से थोड़ा खिसक कर कोने में जा कर बैठ गया। दूध निचोड़ने का काम पूरा करके मिसेज हुई ने बच्चे को फिर से अपनी टाँगों पर लिटा लिया। उन्होंने आदतन अपनी शर्ट फिर से उठायी पर बच्चे का पेट भरा हुआ था और वह स्तन को मुँह लगाने को बिल्कुल तैयार नहीं था—बस खुश होकर मुँह से आवाजें निकालते हुए हाथ से उनको थपकी देता रहा। यह सब अपनी सहज गति से चलता रहा पर मिसेज हुई को इसका आभास बिल्कुल नहीं हुआ कि वोंगवोंग कोने से खिसकता-खिसकता बिल्कुल उनके बगल में आ बैठा है। अचानक बिजली की फुर्ती से वोंगवोंग ने छोटे बच्चे का हाथ स्तन पर से हटाया, उसका सिर किनारे किया और अपना मुँह मिसेज हुई के गोल मटोल स्तन पर लगा दिया—और मुँह जो लगाया तो हटाने का होश कहाँ। दोपहर के लगभग अलसाये माहौल को तोडते हए मिसेज हुर्ड की चीख पूरी गली में गूँज गयी और ऊँघते लोगों में से अधिकांश चौकन्ने होकर जाग पड़े। यदि यह चीख न निकली होती तो वोंगवोंग भला क्यों अपनी जगह से हटता—वह वहाँ से भागा नहीं, चुपचाप मुँह खोले आसमान ताकता रहा... बेचारा सदमे में पड़ गया था, बेवकूफ। मिसेज हुई के बाएँ स्तन पर उसके दो दाँत अपना निशान छोड़ गए थे, साफ-साफ दिखायी पड़ रहा था। वे धीरे-धीरे सदमे से उबर गयीं पर तब तक पास-पड़ोस के लोग घरों से बाहर निकल कर उनसे घटना के बारे में पूछने लगे थे। इस बीच घबरा कर बच्चा रोने लगा था और वे उसको चुप कराने में लग गयीं। स्तन पर दाँत लगते ही वे दर्द से कराह उठीं और जब कुछ न सूझा तो घबरा कर पास खड़े वोंगवोंग को कस कर एक तमाचा जड़ दिया, "नरक में सड़ेगा रे तू, वोंगवोंग।"


दोपहर बाद तक पूरे गाँव को वोंगवोंग की कारस्तानियों की खबर हो गयी थी—अखबार में भले ही न छपी हो पर यह बात बातों-बातों में सब जगह फैल गयी। जाहिर है, इसकी चर्चा हर बार सेक्स पर जाकर टिक जाती थी। किसी ने कहा, "उसको शाप लगेगा... अभी उमर ही क्या है उसकी, सात साल।" किसी दूसरे ने कहा, "गाँव के जवान लड़के भी इतने निर्लज्ज और बावले नहीं हैं।" दरअसल हादसे की शिकार मिसेज हुई को लेकर किसी को वास्तविक हमदर्दी और फिक्र नहीं थी, लोग तो चटखारे लेकर बात करते और बस मजा लेते। हालाँकि यह बात जंगल की आग की तरह सब तरफ फैल गयी थी कि वोंगवोंग ने मिसेज हुई के स्तन पर अपने दाँत गड़ा दिए—लोगों ने इसे लेकर पीठ पीछे मसखरी भी शुरू कर दी। सामने पड़ने पर किसी ने टीवी में आने वाले किसी विज्ञापन की तर्ज पर व्यंग्य भी किया, "मिसेज हुई, हम सब के पास अपना-अपना वोंगवोंग होना चाहिए।" ... यह मजाक सुनते ही आसपास इकठ्ठा सब लोग हँस पड़े, यहाँ तक कि मिसेज हुई भी। हालाँकि मिसेज हुई की सास को सबके साथ बहू के हँसी ठड्ढे की बात नागवार लगी, बाहर आकर बोलीं- "जाओ देखो, तुम्हारे चूल्हे पर क्या चढ़ा है।"


वोंगवोंग के दादा को यह खबर शाम को लगी। घर में वे दो ही प्राणी थे पर खाना बिला नागा हमेशा तीन समय पकाते—और दादा खुद खाएं या नहीं, वोंगवोंग के लिए तीन बार खाने का नियम एकदम पक्का था। वोंगवोंग के माँ-पिता का दिया हुआ स्टील का कटोरा और चम्मच हमेशा साफ-सुथरा चमचम चमकता रहता—क्या मजाल कि उस पर धूल का एक कण भी दिख जाये। धीरे-धीरे उसके दादा बूढ़े होते जा रहे थे और उनके दाँत भी झड़ने लगे थे। उम्र बढ़ने के साथ उनकी जुबान भी चलने लगी थी और शायद ही कभी वे खामोश होकर बैठते। वोंगवोंग को खाना खिलाते समय वे हर कौर के साथ कोई न कोई कविता बोलते, जैसे- "काटने के लिए खोलो, चबाने के लिए बंद करो... खाना खा लेंगे जब हम, तब सोने का समय हो जाएगा।"  "खाने का कौर हो या हो गोश्त का कौर / इन्हीं से बनोगे तुम बड़े और जीतोगे मुकाबले।"


ऐसे बहुतेरे गीत उन्होंने खुद ही गढ़ लिए थे। पर आज वोंगवोंग किसी तरह भी खाने को राजी नहीं था—दादाजी बाईं तरफ से चम्मच मुँह की ओर बढाते तो वह अपना मुँह दाहिनी तरफ घुमा लेता—वैसे ही दाहिनी ओर से कोशिश करने पर वोंगवोंग का मुँह बाईं ओर हो जाता। दादा जी ने हार कर कहा- "खाओगे नहीं तो धन-दौलत कहाँ से हासिल करोगे।" तभी दादाजी का ध्यान वोंगवोंग की आँखों पर गया, वह तो निर्निमेष मिसेज हुई की दुकान की ओर निहारे जा रहा था। दादाजी को साफ दिख रहा था कि दुकान पर किस्म-किस्म के खाने-पीने के पैकेट्स रखे हैं। उन्होंने वोंगवोंग से पूछा- "क्या चाहिए तुमको, बताओ तो मुझे?" पर वोंगवोंग था कि किसी भी तरह मुँह खोलने को तैयार नहीं।


"स्निकर चाहिए?"- उन्होंने पूछा- "या चॉकलेट? … या पॉरिज?" वोंगवोंग ने मुँह नहीं ही खोला। दादाजी को पॉरिज के बगल में रखा ऑस्ट्रेलियन मिल्क पाउडर दिखाई दे रहा था, सो पूछ लिया, "दूध लेना है?" यह सुनते ही वोंगवोंग ने अपनी नजरें दादाजी की तरफ घुमाईं... उसकी आँखों में आँसू थे। दादाजी नम आँखों को देखते ही माजरा समझ गए और मिसेज हुई की दूकान पर बढ़ चले। मिल्क पाउडर खरीद कर उन्होंने पानी गर्म किया और वोंगवोंग को कटोरा भर कर दूध दिया, बोले- “तो, अपना दूध पी लो।" वोंगवोंग ने कटोरे और चम्मच को मुँह लगाया... और मुँह फेर कर पिच्च से नीचे थूक दिया। इतना ही नहीं उसने दूध भरा कटोरा भी औंधा उलट दिया... पथरीले फर्श पर स्टील के कटोरे चम्मच के इस तरह गिरने से जोर की कर्कश आवाज हुई। ऐसी शरारत देख दादाजी को गुस्सा आ गया और हाथ उठाते हुए उन्होंने वोंगवोंग को हुक्म दिया- "उठाओ बर्तन, अभी..."


वोंगवोंग जैसे माटी की मूरत बन गया था, बिलकुल भावशून्य। दादाजी का पारा सातवें आसमान पर, हाथ और ऊपर उठा कर दहाड़े- “सुनाई दिया या नहीं वोंगवोंग? उठाते हो या नहीं?" लगभग फुफकारते हुए उनका हाथ हवा में थोड़ा और ऊँचा उठा, पर असलियत यह थी कि हाथ जितना ऊपर उठा, उतना ही वोंगवोंग से दूर होता गया। अपने क्रोध को इस तरह बेअसर होते देख उन्होंने हाथ नीचे कर लिया और कोमल स्वर में बोल पडे- "क्यों सताता है दुष्ट... बर्तन उठा क्यों नहीं लेता?"


अंत में उन्होंने खुद कटोरा और चम्मच उठाया- "तुम इन्हें इस तरीके से फेंक कैसे सकते हो? इसी कटोरे और चम्मच से जब से तुमने होश सँभाला है, तब से मैं तुम्हें खिलाता आया हूँ। यह तुम्हारी माँ का दूध है... तुम इसे इस तरीके से कैसे फेंक सकते हो? बोलो, क्यों फेंका था? अब बसंत उत्सव में केवल सात महीने बचे हैं, तब तुम्हारे माँ-बाप आने वाले हैं… तो क्या सोचते हो मैं उन्हें बताऊँगा नहीं यह बात?"


रात के खाने के बाद उसके दादा बर्तनों को साफ करने के लिए दक्षिणी दरवाजे के पास रखे पत्थर पर आ बैठे। वहाँ पहले से बगल के घर के दादा लिऊ बैठकर कपड़े धो रहे थे। दादा लिऊ ने उन्हें शरारती मुस्कान के साथ देखा और बोले- "वांग, तुम्हारा पोता वोंगवोंग मिसेज हुई के साथ बहुत लगा रहता है, तुमने उसे बहुत अच्छी शिक्षा दी है। है न?"


पहले तो वोंगवोंग के दादा को समझ नहीं आया कि माजरा क्या है लेकिन जब उन्होंने लिऊ के चेहरे की झुर्रियों के अन्दर झाँक कर देखा तो उन्हें समझ आ गया कि कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर हुई है। लिऊ ने उन्हें तिरछी नज़र से देखा और बोले- “तुम्हें मालूम नहीं? आज दोपहर बाद की बात है, तुम्हारे पोते ने मिसेज हुई की छाती काट ली… वह भी इतनी जोर से कि खून निकलने लगा।"


उन्हें लगा कि यह तो मामला हाथ से बाहर निकल गया... कोई भी बताए, क्या यह वाकई बच्चे के हाथ से बाहर निकलने वाली बात नहीं हुई? घर आकर उन्होंने पहला काम यह किया कि झाडू से और हाथ के मुक्कों से वोंगवोंग की अच्छी पिटाई की। इतनी पिटाई के बाद भी वह रोया नहीं हालाँकि उसकी आँखें आँसुओं से तरबतर हो गई और मोटे-मोटे आँसू देर तक ज़मीन भिगोते रहे। वह लगातार रोता रहा लेकिन रुलाई की आवाज अन्दर-अन्दर दबाए रहा—उसकी पीड़ा और बेचारगी चेहरे पर साफ झलक रही थी। पहले कभी किसी ने उसे इस तरह रोते नहीं देखा था... दादा को उसे इस तरह देखकर सच में दया आ गई। फिर भी उन्होंने अपने स्वर में सख्ती लाते हुए डाँटकर पूछा- "किसने सिखाया तुम्हें यह सब? कौन जानवर है जो ऐसी गंदी बातें सिखाता रहता है?"


वॉगवोंग ने कोई जवाब नहीं दिया, बस सिर झुकाए खड़ा रहा...उसकी आँखों से लगातार आँसू गिर कर जमीन गीली करते रहे। दादाजी को भी कुछ समझ में नहीं आया क्या करें... लंबी साँस लेते हुए धीरे से फुसफुसाए- "खुदा का शुक्र है, त्योहार में केवल सात ही महीने बचे हैं।"


वोंगवोंग के माता-पिता साल में सिर्फ एक बार गाँव आते थे और वह भी लंबे समय के लिए नहीं बल्कि केवल छह दिन रुकते थे। उसकी माँ यात्रा के दौरान किसी तरह अपनी भावनाओं को दबा कर रखती थीं और जैसे ही बेटे को देखती उसे चूमना और दुलार से गले लगाना शुरू कर देती। वोंगवोंग इस मामले में थोड़ा जड़ बुद्धि था और माँ के अनुरूप अपनी भावनाओं को प्रदर्शित नहीं कर पाता था। वोंगवोंग माँ की इस तरह की चूमा-चाटी और खींचतान में असहज महसूस करता, कई बार उसे यह कष्टकर भी लगता। माँ-पिता के प्यार के अति उत्साह से वह इतना घबरा जाता कि न चाहते हुए भी प्रतिरोध करता और उन्हें झटक कर दूर खड़ा हो जाता। माँ-पिता उसके लिए ढेर सारे खिलौने और खाने-पीने का किस्म-किस्म का सामान लाते, नए से नए ढंग के खिलौने लाते और सब खोल कर उसके सामने ढेर बनाकर रख देते थे। उन्हें देखकर वोंगवोंग खुश हो जाता और एक के बाद दूसरा पैकेट, दूसरे के बाद तीसरा पैकेट खोलकर तब तक खाता रहता जब तक उसके पेट में दर्द न होने लगे। तीन-चार दिन बीतते-बीतते वह अपने माँ-पिता के साथ घुल-मिल जाता और उनकी उपस्थिति का अभ्यस्त भी हो जाता।


उसे उनकी आवाज अच्छी लगने लगती है, उनकी गंध अच्छी लगने लगती है। जब एक बार वोंगवोंग को वे अच्छे लगने लगते हैं, तब वह उनके आसपास मंडराता रहता है, उनसे पल भर को भी अलग नहीं होना चाहता। लेकिन उसे महसूस हुआ कि जब जब भी वह उनसे चिपकना, घुलना-मिलना चाहता है, वे वहाँ से किसी न किसी बहाने से हट जाते हैं—अभी वे यहाँ थे, अभी वे वहाँ नहीं हैं। वोंगवोंग इस बात से बहुत हैरान होता, उलझन में पड़ जाता। अभी तक उसे अपनी इस अनुभूति को इस कड़वाहट को ढंग से शब्दों में बयान करने नहीं आया था। इसलिए हर बार जब वह दुखी होता ठगा हुआ महसूस करता, तब भी कुछ बोलता नहीं था, बस चुपचाप बना रहता। दिन बीतते-बीतते उनके वापस चले जाने का समय हो जाता। उनके प्रस्थान की रात वह बहुत देर तक जागता और सुबह देर से उठता। उसके पिता की नाव गाँव के पूर्वी छोर पर नहर में बँधी होती। उसे मालूम था कि अब थोड़ी देर में नाव की चिमनी में दो पटाखों जैसे विस्फोट होंगे और वह वहाँ से उलटी दिशा में नदी में दूर से दूर होती चली जाएगी।


सुबह जब वोंगवोंग सो कर उठा तब तक धूप निकल आई थी और उसके माता-पिता घर से जा चुके थे। सिर के ऊपर आसमान में सिवा सूरज के कुछ नहीं था और पैर के नीचे धरती पर नहर में बहता पानी। ये दोनों छवियाँ वोंगवोंग की नज़रों में बस गईं। जैसे-जैसे सूरज ऊपर उठता गया उसका और पानी पर पड़ते उसके अक़्स का रंग बदलता गया-पहले सोने जैसा था, अब चाँदी जैसा हो गया।


बोंगवोंग के उचक्के जैसे हमले के बाद से मिसेज़ हुई अपने बच्चे को दूध पिलाते हुए खूब सतर्क रहने लगीं, जब भी उन्हें दूध पिलाना होता वे अपनी दुकान के काउंटर के पीछे चली जातीं और अपनी कमीज का सिर्फ दूसरे नंबर का बटन खोलतीं।


इस हादसे के दो दिनों बाद तक वोंगवोंग का मिसेज हुई को कोई अता-पता नहीं चला, उसके बाद वह दिखा भी तो इतनी कम देर के लिए और दूर-दूर से जैसे वह वहाँ मौजूद हो ही नहीं। अब वोंगवोंग की अनुपस्थिति मिसेज़ हुई को खटकने लगी थी। अगले दिन दोपहर उसने वोंगवोंग के दादा से पूछ ही लिया - "दादा, वोंगवोंग कहाँ है, दिखाई नहीं देता?" उसके दादा भी पिछली घटना की जानकारी के बाद मिसेज हुई से आमना-सामना करने से घबरा रहे थे। दादा लिऊ ने कहा भी था कि वोंगवोंग ने जो हरकत की है, वह दादा की परवरिश की कमी के कारण ही मुमकिन हो सकती है। बचने की तमाम कोशिशों के बाद भी अब वे मिसेज हुई के सामने थे और वहाँ से बच निकलने की कोई सूरत नहीं थी... फिर भी उन्होंने अपनी निगाह उस पर सीधे-सीधे पड़ने नहीं थी। बोले- "वह अस्पताल में भर्ती है, उसे आईवी ड्रिप लग रही है।"


"हैं? ऐसा कैसे हो गया... दो दिन पहले तो वह यहीं था, भला-चंगा।"


"कई दिनों से उसे बुखार चल रहा था और सभी कोशिशों के बाद भी बुखार उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था।"


"लगता है आपने उसको बहुत डाँटा-फटकारा है... बेचारा बच्चा हदस गया है।"


दादा वांग ने अपने स्वर में एक अपराध बोध लाते हुए जवाब दिया- "घर में छड़ी को आप किनारे रख दोगे तो बच्चा बिगड़ेगा नहीं तो और क्या होगा?"


मिसेज हुई ने गोद के अपने बच्चे को एक तरफ से दूसरी तरफ किया और उलाहना देने के अंदाज़ में बात आगे बढ़ाई- "क्या बात कह रहे हैं दादा वांग आप भी... सात साल के एक बच्चे को आखिर समझ ही क्या होती है। उसे आप मामूली बातों पर धमकाओ, यह बिल्कुल मुनासिब नहीं है।"


दादा वांग ने फिर से पहले वाली बात ही दुहरायी "घर में छड़ी को आप किनारे रख दोगे तो बच्चा बिगड़ेगा नहीं तो और क्या होगा?"


अब मिसेज हुई से बर्दाश्त नहीं हुआ, उन्होंने सफाई दी - "उसने मेरे साथ कोई छेड़छाड़ या ऐसा बुरा सलूक नहीं किया था, बस मेरी चमड़ी थोड़ी-सी छिल गई। अब वह मामूली-सा ज़ख़्म भी भर गया, और कहीं कुछ हुआ नहीं है।"


मिसेज हुई की यह बात सुनकर दादा वांग बुरी तरह शर्मिंदा हो गए, उन्होंने अपनी निगाहें नीचे झुका लीं और उनका चेहरा शर्म से लाल हो गया- "मैंने तो इस बारे में उससे कुछ कहा ही नहीं... और न ही मैंने उसे कभी कोई गलत सीख दी। हमेशा अच्छी बातें ही बताई... हाँ, टीवी देखता है। हो सकता है वहाँ से उसने यह सब देखा और सीखा हो।" वे धीमे से बोले।


उनकी बातें सुनकर मिसेज़ हुई को बुरा लगा, थोड़ा अपमान भी महसूस किया उन्होंने और अपनी आवाज़ ऊँचा करती हुई बोलीं- "दादा वांग, आप कैसी बातें कर रहे हो? मुझे समझ नहीं आ रहा है।"


वॉगवोंग जब अस्पताल से निकल कर आया तो एकदम से दुबला लगने लगा था, उसकी आँखें धँस गई थीं। वह एकदम चुप्पा-सा हो गया था, पूरी तरह से लज्जाशील और धीर-गंभीर।

मिसेज हुई ने उसे देखा तो बोली - "वोंगवोंग, बीमार पड़ के तो तुम और ज़्यादा सुन्दर हो गए हो।"


अब वह अपने घर के बाहर चबूतरेनुमा पत्थर पर भी नहीं बैठता था—मिसेज हुई को लगा उसके दादा ने वोंगवोंग के ऊपर अब कुछ सख्त पाबंदियाँ लगा दी हैं।


फिर भी मिसेज हुई को यह पता था कि अपने घर के अन्दर बैठे-बैठे वोंगवोंग दरवाजे की दरारों से उसे बच्चे को दूध पिलाते हुए निहारता रहता है... उसकी चमकती काली आँखें कमरे के हर कोने अंतरे से उसका पीछा करती रहतीं हालाँकि उनमें गहरी उदासी तारी होती। दादा ने वोंगवोंग को मिसेज हुई से किसी भी तरह का संपर्क रखने से बिल्कुल सख्ती से मना किया हुआ है और वे हमेशा उस पर चौकस निगाहें भी रखते हैं... इसका मिसेज हुई को अफसोस भी होता पर क्यों, यह उसे भी नहीं मालूम था।


वोंगवोंग घर के अन्दर और भी छुपा-छुपा रहने लगा, और खामोश भी... हवा में यहाँ-वहाँ तैरते हुए किसी प्रेत सरीखा ।


मौका देख कर वह एक दिन वोंगवोंग के घर उसे एक फ्रूट कैंडी देने के बहाने आई भी... गोद में लिए अपने बेटे-सी तुतलाती हुई आवाज में बोली- "मेरा भैया वोंगवोंग कहाँ छुपा है? मैं उसके लिए फ्रूट कैंडी लेकर आया हूँ।"


बॉगवोंग ने जैसे ही मिसेज हुई को अपने घर के दरवाजे पर देखा वह दौडकर सीढियों के नीचे छुप गया। उसके दादा ने मिसेज हुई को दरवाज़े पर ही रोक दिया, बोले- "देखो, मेरे घर के अपने अलहदा उसूल हैं..."


मिसेज हुई भौंचक्का होकर दरवाजे पर ही ठिठक गईं लेकिन यह याद रहा कि दादा जी के सामने बच्चों की आवाज में अब नहीं बोलना।


"और कुछ नहीं, बस एक छोटी-सी कैंडी है।"- वह धीरे से बोली।


दादा जी ने आँखों में अंगारे भरते हुए उसे देखा, चिल्ला कर बोले- "मैंने कहा न, मेरे घर के अपने कुछ अलहदा उसूल हैं।"


इसके बाद मिसेज हुई उल्टे पाँव लौट आईं... लौटते हुए पीछे मुड़कर उन्होंने वोंगवोंग को देखा, उसके चेहरे पर जो करुण भाव थे, उसे देखकर किसी भी माँ का हृदय दो टूक होना स्वाभाविक था।


अपने बरामदे पर पहुँचते ही मिसेज हुई ने आवाज लगाई -"वोंगवोंग, यहाँ आ जा मेरे बच्चे।"


दादा ने बच्चे की तरफ आँखें तरेर कर देखा और सख्त लहजे में कहा- "वोंगवोंग!"


“आपको परेशानी क्या है दादा वांग?"- मिसेज हुई ने तंग आकर पूछ ही लिया।


अपने घर के अन्दर बैठे-बैठे हुए वोंगवोंग जैसे मिसेज हुई की जैसे जासूसी करता था इसे या तो वे जानती थीं या स्वयं वोंगवोंग—कोई और नहीं जानता था। और यदि यह सिलसिला भविष्य में भी यूँ चलता रहा तो निश्चित था कि या तो मिसेज हुई पागल हो जाएँगी... या फिर वोंगवोंग। 


यह गुपचुप रहस्य आने वाले दिनों की दोपहर बाद की उनींदी शामों में पत्थर की बनी उस गली में खामोशी से तैरता-मंडराता रहा... चोरी पकड़े जाने पर धूप की गर्मी को मात देती सर्द सिहरन या तो इधर (वोंगवोंग) दस्तक देती या उधर (मिसेज हुई)। धूप के चलते वह गाँव दो हिस्सों में बँट जाता—एक तरफ पहाड़ी वाला हिस्सा तो दूसरा पानी वाला हिस्सा... संताप इधर भी, संताप उधर भी।


दादा दोपहर में खाने के बाद जब आराम करने जाते थे तो नींद आते ही जोर-जोर से उनके खर्राटे सुनाई देने लगते। वोंगवोंग को जैसे ही खर्राटे सुनाई देते, वह सीढ़ियों से दबे पाँव नीचे उतर आता था। उस दिन भी वह सीढ़ियों से नीचे उतरा और बाहर निकल कर गली में देखने लगा। तभी मिसेज हुई की नज़र उस पर पड़ी—वे उसके पास पहुँची और वोंगवोंग की कलाई थाम ली। वह मिसेज हुई को देखकर इतना घबरा गया कि उसका चेहरा डर से सफेद पड़ गया।


"डरने की कोई जरूरत नहीं, मेरे साथ आओ।" - उन्होंने बड़े शांत भाव से उससे कहा। वे उसे घसीटती हुई अपनी दुकान के पिछवाड़े ले गईं।


वहाँ एक छोटी-सी समतल जगह थी जिसके पीछे हरियाली से घिरी हुई पहाड़ी थी... पहाड़ी काट कर बनाई सीढ़ियों पर पड़ती सुनहरी धूप उनको चमका रही थी। वोंगवोंग को अपने निकट दूध की गंध आ रही थी पर वह डर से बुरी तरह हाँफ रहा था। एक साफ-सी जगह देखकर मिसेज हुई धप्प से जमीन पर बैठ गईं और एक झटके में अपना कुर्ता ऊपर उठा लिया—गोल गोल बड़ा-सा स्तन उन्होंने वोंगवोंग के मुँह के सामने कर दिया। दूध की यह गंध उसके लिए दुनिया की सबसे प्रिय गंध थी, सभी गंधों की माँ—वोंगवोंग को लगा इतनी सघन गंध उसे बेहोश कर डालेगी। वोंगवोंग पर डर इस बुरी तरह हावी था कि वह किंकर्तव्यविमूढ होकर सिर्फ उन्हें निहारता रहा । मिसेज हुई ने उसे इस अवस्था में देखा तो उसके सिर पर हल्के से एक चपत लगाई और प्यार से बोलीं- "पियो, टुकुर-टुकर देख क्या रहे हो... पी लो बच्चे।" पर वह अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ।


लुभावना और सम्मोहक मातृत्व बिल्कुल उसके सामने उपस्थित था... दोनों के बीच कुछ भी तो दूरी नहीं थी। फिर उसने उसका अपनी नाक से छुआ जाना महसूस किया। वोंगवोंग ने अपनी निगाहें ऊपर उठाईं—आँखों से टप-टप आँसू टपक रहे थे, चेहरे पर शर्मिंदगी और डर का मिला-जुला भाव काबिज था। उसकी यह हालत देख मिसेज हुई ने कहा- "डरो मत, देखो ये मैं हूँ... तुम किसी और का नहीं मेरा दूध पी रहे हो। काटो मत, इन्हें अपने मुँह में आराम से डालो और इत्मीनान से बगैर किसी डर के चूसो..." 

वोंगवोंग ने अपना माथा आगे की ओर बढ़ाया, डरते-डरते अपनी हथेलियों ऊपर की ओर मिसेज हुई के दाहिने स्तन को पकड़ना चाहा पर हथेलियाँ बीच हवा में ही ठहर गईं। वोंगवोंग के मुँह से तीखी कड़वाहट के साथ निकला : "नहीं, मैं नहीं पिऊँगा।"


मिसेज हुई बोलीं- "बुद्धू बच्चे, तुम्हारा छोटा भाई कितना भी पिए, इतना दूध नहीं पी सकता..."


वोंगवोंग की आँखों से धाराप्रवाह आँसू बह रहे थे और दोपहर बाद की धूप उन पर सीधी पड़ रही थी सो वे खूब चमक भी रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे उसका अपने आप पर से नियंत्रण छूट गया है। उसकी नजरें अब भी मिसेज हुई के अनावृत्त स्तनों पर टिकी हुई थीं... वह लगभग डूबते हुए कातर स्वर में बोला- "मैं नहीं पिऊँगा दूध... तुम मेरी माँ नहीं हो।" 


बोलते-बोलते अचानक वोंगवोंग उठ खड़ा हुआ और उसकी गिरफ्त से छूट कर भागने लगा... हड़बड़ी में मिसेज़ हुई ने अपनी शर्ट नीचे की और दौड़ती हुई पीछे से उसकी कमीज़ पकड़ने की कोशिश करने लगीं।


"वोंगवोंग... वोंगवोंग... रुको तो..."- मिसेज़ हुई चिल्लाई।


वोंगवोंग सरपट दौड़ता हुआ एक साँस में अपने घर पहुँच गया और अन्दर जाकर फटाक से पीठ पीछे दरवाजा बंद कर दिया।


यह सारा घटनाक्रम पलक झपकते हो गया। उनका चीख़ना-चिल्लाना और भाग-दौड़ गली के अन्दर दोपहर बाद पसरे सन्नाटे को चीर गया। मुँह पर बंद हो गए दरवाजे को पीटती हुई मिसेज़ हुई भी सुबक पड़ीं।


"वोंगवोंग... वोंगवोंग..."


घर के अन्दर से कोई जवाब नहीं आया... फिर दादा वांग के खर्राटे एकदम से बन्द हो गए... कुछ मिनट इसी तरह बीते और सीढ़ियों से उतरकर किसी के नीचे आने की आवाज सुनाई पड़ी।


दरवाज़ा तो नहीं खुला लेकिन अन्दर से नंगे बदन पर सटाक-सटाक मार पड़ने की आवाजें आने लगी। मिसेज़ हुई वहाँ खड़ी-खड़ी तिलमिला गईं, बदहवासी में चिल्लाने लगीं- "दादा वांग... दादा वांग!"


देखते-देखते आसपास के घरों से पड़ोसी निकल आए, उन्होंने जैसे ही मिसेज हुई को इस तरह दरवाजा पीटते देखा तो समझ गए—वोंगवोंग ने फिर से कोई शरारती वारदात की है। उनमें से कोई चिल्लाया- “इस राक्षस की हिम्मत बढ़ती ही जा रही है... बगैर लातों के यह सुधरने वाला नहीं..."


मिसेज हुई ने अपनी गर्दन घुमाई और वहाँ जमा हो गए उत्तेजित पड़ोसियों को घूरने लगीं... उसका चेहरा लगातार बहते आँसुओं के चलते गीला होकर चमक रहा था। क्रोध से उनका पूरा शरीर काँप रहा था, उन्होंने अपने स्वर को ऊँचा कर लगभग गरजते हुए कहा- "अभी आप सब यहाँ से फूटो, कोई तमाशा नहीं हो रहा है... आपको कुछ मालूम भी है, क्या हुआ? चलो निकलो यहाँ से... अभी..."


(मूल चीनी से एरिक अब्राहमसेन के अँग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित)


गोल चक्कर वेब पत्रिका अत्यंत सीमित संसाधनों से चल रही है। इस वेबसाइट के संचालन में आर्थिक सहयोग देने हेतु दिए गए क्यू आर कोड का उपयोग करें :



बाई फेइयू का जन्म 1964 में चीन में हुआ। अपनी रचनाओं में वे मुख्य तौर पर स्त्रियों के मन की आंतरिक दुनिया की पड़ताल करने के लिए जाने जाते हैं। बीस से ज्यादा भाषाओं में अनुवाद। उनकी कृतियों पर बेहद चर्चित फिल्में भी बनी है और उन्होंने फिल्म लेखन भी किया हैं।


अंग्रेज़ी में यह कहानी Lactating Woman शीर्षक से छपी है। हिंदी समाज और भाषा की सेंसेबिलिटी को ध्यान में रखते हुए अनुवादक ने अधिक व्यंजनात्मक शीर्षक चुना।


यादवेंद्र वरिष्ठ अनुवादक हैं। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए ‌: यादवेंद्र





Comments


bottom of page