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दो फिलिस्तीनी कहानियां
उसे जब कुछ नहीं समझ आया तो उसने बोतल का ढक्कन हटाया और अंदाज़ से उस जमीन पर पूरा दूध उड़ेल दिया जहाँ वह अपने बच्चे को छोड़कर गई थी


हॉली मैक्निश की कविता
शहरों के अस्पताल में पटापट मर रहे हैं बच्चे
उलटी-दस्त से पलक झपकते
माँओं का दूध पलट सकता है पल भर में यह चलन
इसलिए अब नहीं बैठूँगी सर्द टॉयलेट की सीटों पर


युद्ध पर कुछ प्रासंगिक कविताएँ
प्रेसीडेंट से और साथ में मुझसे ज्यादा दुखी
और कोई कैसे हो सकता है भला?


नाई की दुकान (नॉर्वेजियन कहानी)
आखिरकार मैं नाई की दुकान तक पहुँच ही गया। दरवाज़ा खोलकर अंदर दाखिल हुआ और यह देखकर चकित रह गया कि बीते दिनों में दुनिया कितनी बदल गई


मेरी ओलिवर की कविताएँ
चीज़ें, चीज़ें, कितनी चीज़ें... आग लगा दो इन सब में। जल जाएँ सारी चीज़ें। इन सबको मिला कर जो आग बनेगी, वह कितनी ख़ूबसूरत होगी।


फिलिस्तीनी बच्चे : कुछ कविताएँ
हम यहाँ रहते हैं, अपने ही मुल्क के अंदर लेकिन मुल्क से निष्कासित
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