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अम्मी और अतिथि

  • 3 days ago
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Updated: 3 days ago



मूल कहानी : चु यो-सप
अँग्रेज़ी से अनुवाद : विजय कुमार यादव

(1)


मेरा नाम पाक ओखुई है और इस साल मैं छह साल की हो जाऊँगी। मेरे परिवार में बस दो ही लोग हैं- मैं और मेरी अम्मी, जो इस संसार की सबसे सुंदर औरत हैं। अरे! मैं अपने मामा को तो भूल ही गई थी।


वे मिडिल स्कूल में हैं और आवारागर्दी करते रहते हैं। इसलिए भोजन के समय को छोड़कर वे यहाँ शायद ही आते हैं। कभी-कभी तो कई-कई दिनों तक हमें उनकी परछाईं तक नजर नहीं आती। ऐसी स्थिति में अपने परिवार में शामिल करने के बारे में मैं यदि कुछ पल के लिए उन्हें भूल भी गई तो क्या आप मुझे इसका दोषी मानेंगे?


मेरी माँ अपूर्व सुंदरी हैं और इस पूरे विश्व में दूसरा कोई शायद ही उनसे ज्यादा सुंदर हो। उनकी उम्र तेईस साल है और वह विधवा हैं। मुझे ठीक से पता नहीं कि विधवा क्या होती है, लेकिन जब पड़ोसी मुझे "विधवा की बेटी" कहते हैं तब मुझे लगता है कि वह जरूर विधवा होंगी। दूसरे सभी बच्चों के पिता हैं, लेकिन मेरे कोई पिता नहीं हैं। शायद मेरे पिता न होने के साथ माँ के विधवा होने का कोई संबंध हो।



(2)


नानी बताती हैं कि मेरे जन्म से एक माह पहले ही मेरे पिता की मृत्यु हो गई थी। उस समय मेरी माँ और उनकी शादी हुए एक साल ही हुआ था। मेरे पिता किसी दूर-दराज वाली जगह के थे और यहाँ स्कूल में पढ़ाने आए थे। इसलिए जब उनकी शादी हुई तो माँ यहीं रह गई थीं और उन्होंने यह घर खरीदा था (नानी के घर के पास वाला)। वे लोग यहाँ एक साल भी न रह पाए थे कि अचानक मेरे पिता की मौत हो गई। चूँकि मेरे पिता की मौत मेरे जन्म से पहले हो गई थी, इसलिए मैं उन्हें कभी साक्षात देख नहीं पाई और बहुत कोशिश करने के बाद भी मेरे मन में उनकी कोई छवि नहीं बन पाई। हाँ, यह बात अवश्य है कि मैंने उन्हें तस्वीरों में कई-कई बार देखा है और इस निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कि वे सचमुच ही बहुत सुंदर थे। अगर आज वे जीवित होते तो यह तय है कि मेरे लिए संसार के सबसे सुंदर पिता होते। यह कहना ठीक नहीं कि मुझे उन्हें देखने का कोई मौका नहीं मिला। कई-कई बार मैंने उन्हें तस्वीर में देखा है। लेकिन जब भी मेरी माँ उनकी तस्वीर अपनी डेस्क पर रखतीं, नानी आकर माँ से वह तस्वीर वहाँ से हटा देने को कहतीं। अब तो पिता की वह तस्वीर दिखती नहीं, पता नहीं कहाँ रख दी गई है। मुझे याद है कि एक दिन जब मैं घर आई तो देखा कि माँ संदूक से कुछ निकालकर उसे चुपके से देख रही हैं। जब उन्हें मेरे आने की आहट मिली तो उन्होंने उस वस्तु को झट से संदूक में छिपा दिया। शायद वह पिताजी की तस्वीर रही होगी।

अपनी मृत्यु से पूर्व पिताजी हमारे गुजर-बसर के लिए थोड़ी-बहुत जमीन छोड़ गए थे। पिछले ग्रीष्म में - मेरा अनुमान है कि तब तक शरद की शुरुआत हो गई थी - माँ मुझे कुछ मील दूर स्थित एक पहाड़ी दिखाने ले गईं । पहाड़ी की तलहटी में फूस के छप्पर वाला एक घर था। हमने कुछ शाहबलूत तोड़े फिर घर के भीतर जाकर मुर्गे का शोरबा लिया। माँ ने बताया कि यह हमारी जमीन है। हमें इस जमीन से पर्याप्त चावल मिल जाता है जिसके कारण हमें भूखे नहीं रहना पड़ता। लेकिन मांस और सब्जियाँ या अन्य जरूरी वस्तुएँ खरीदने के लिए हमारे पास पैसा नहीं है, इसलिए वह सिलाई-फड़ाई का काम करती हैं। मछली, अंडे और मेरे लिए मिठाई खरीदने का पैसा वहीं से आता है।

तो सब मिलाकर मैं और माँ, यही दो लोग थे। लेकिन चूँकि अब पिताजी का अध्ययन कक्ष खाली पड़ा था, इसलिए माँ ने उसका उपयोग करने और इसके साथ ही घर के रोजमर्रा का काम करने के वास्ते किसी को रखने का मन बनाया। और इस तरह छोटे मामा आकर हमारे साथ रहने लगे।



(3)


एक दिन माँ ने कहा कि वह वसंत में मुझे नर्सरी स्कूल में भेजेगी। स्कूल में मुझे अपने दोस्तों के साथ खेलना बड़ा अच्छा लगता था। लेकिन उस दिन जब खेल कर घर आई तो देखा कि बड़े मामा (यानी मेरे पिता के कमरे में रहने वाले छोटे मामा के बड़े भाई) वहाँ बैठे हुए हैं और किसी आदमी से बात कर रहे हैं जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था।


"ओखुई", बड़े मामा ने मुझे पुकारा, "ओखुई, यहाँ आओ और इनको नमस्कार करो।"


मैं संकोच से अपनी जगह खड़ी रही।


वहाँ बैठे अजनबी ने बड़े मामा से कहा, "कितनी प्यारी बच्ची है! क्या यह आपकी भांजी है?"


"हाँ, यह मेरी बहन की बेटी है ......। जब ग्योंग-सियोन की मौत हुई, तब इसका जन्म भी नहीं हुआ था। यह उसकी एकमात्र संतान है।"


"ओखुई, इधर आओ", अजनबी ने कहा, "तुम्हारी आँखें बिल्कुल तुम्हारे पिता की आँखों की तरह हैं।"


"ओखुई, अब तुम बड़ी हो गई हो। शरमाते नहीं। यहाँ आओ और नमस्कार करो। ये तुम्हारे पिता के पुराने दोस्त हैं। वह यहाँ तुम्हारे पिता के कमरे में रहने आ रहे हैं, इसलिए अच्छा होगा कि उन्हें नमस्कार करो और एक-दूसरे से परिचित हो लो।"


अजनबी मेरे पिता के कमरे में रहने आ रहे हैं, यह जानकर मुझे बेहद खुशी हुई। इसलिए मैं उनके पास गई और बड़े सलीके से झुककर उनका अभिवादन किया। फिर दौड़ती हुई भीतर के आँगन में चली गई। मेरे पीछे बड़े मामा और अजनबी की हँसी की आवाज आती रही।


मैं सीधे माँ के कमरे में गई और उनका आस्तीन पकड़कर खींचने लगी।


उत्तेजना से भरी आवाज में बोली, "माँ!बड़े मामा अपने साथ यहाँ एक आदमी लाए हैं! वह गेस्ट रूम में रहने आ रहे हैं !"


"हाँ।"


मैंने अनुमान लगाया कि इसके बारे में माँ को पहले से ही पता था।


"वह कब से रहेंगे?"


"आज ही से।"


"हुर्रे!"


मैंने ताली बजाना शुरू किया लेकिन माँ मेरे हाथ पकड़ते हुए बोलीं, "अब उधम क्यों मचा रही हो?"


"लेकिन छोटे मामा का क्या होगा?"


"वे भी वहीं रहेंगे।"


"तुम्हारा मतलब दोनों एक साथ?"


"उँ-हाँ!"


"एक ही कमरे में?"


"क्यों नहीं? वे स्लाइडिंग पार्टीशन को बंद कर लेंगे, फिर दोनों के लिए अलग-अलग जगह बन जाएगी।"


मैं नहीं जानती थी कि ये नए अंकल कौन हैं, लेकिन मेरे साथ उनका व्यवहार बहुत बढ़िया था और इस कारण मैं भी उन्हें बहुत पसंद करने लगी। बाद में बड़े लोगों से यह सुना कि वे मेरे पिता के बचपन के दोस्त थे। वे अध्ययन के लिए दूसरी जगह चले गए थे और अब वहाँ से लौटने के बाद इस स्कूल में पढ़ाने के लिए उनकी नियुक्ति हुई है। बड़े मामा से भी उनकी दोस्ती है। चूँकि हमारे पड़ोस के बोर्डिंग हाउसों के कमरे उतने साफ-सुथरे नहीं थे इसलिए उनके रहने की व्यवस्था हमारे गेस्ट रूम में की गई। सबके बाद अच्छी बात तो यह थी कि उनके रहने के कारण हमें कुछ अतिरिक्त पैसे मिलते, जिनकी हमें बहुत जरूरत थी।


नए अंकल के पास तस्वीरों वाली पुस्तकों का पुलिंदा था। जब भी मैं उनके कमरे में जाती, वह मुझे अपनी गोद में बैठाकर उन किताबों की तस्वीरें दिखाते। कभी-कभार खाने के लिए कोई मिठाई दे देते। एक दिन दोपहर का भोजन करने के बाद मैं चुपके से उनके कमरे में घुसी। उस समय उन्होंने भोजन करना शुरू किया ही था। उन्हें खाता हुआ देखे बिना मैं चुपचाप उनके सामने बैठ गई।


"ओखुई, कौन सी साइड डिश तुम्हें सबसे ज्यादा पसंद है?" उन्होंने मुझसे पूछ।


"उबले अंडे", मैंने कहा। मेरी बात सुनकर उन्होंने थाली में रखे अंडों में से एक अंडा निकालकर मुझे दिया और उसे खुद छीलकर खाने को कहा। मैंने अंडा छीला और उसे खाना शुरू किया।


"अंकल आपको कौन-सी साइड डिश सबसे ज्यादा पसंद है?"


मेरे सवाल पर वे एक पल के लिए मुस्कुराए।


"उबले अंडे।"


यह सुनने के बाद मैंने खुश होकर ताली बजाई।


"बहुत खूब, ठीक मेरी तरह। मैं जाकर माँ को बताती हूँ।"


मैं वहाँ से जाने के लिए उठ खड़ी हुई लेकिन अंकल ने मुझे पकड़ लिया।


"अरे, ऐसा मत करो।"


लेकिन मैं जब एक बार कुछ करने का मन बना लेती हूँ तो उसे कोई रोक नहीं सकता। अत: मैं दौड़ती हुई भीतर के आँगन में जा पहुँची।


"माँ, माँ!" मैंने चिल्लाते हुए कहा, "जानती हो, उबले अंडे नए अंकल की भी पसंदीदा साइड डिश हैं, ठीक मेरी ही पसंद की तरह!"


"अब ज्यादा उत्पात मत मचाओ तो," माँ ने मुझ पर आँखें तरेरते हुए कहा।


लेकिन नए अंकल की अंडे पसंद करने वाली बात मेरे लिए लगभग वरदान बन गई। उस दिन के बाद से माँ एक ही साथ बहुत सारे अंडे खरीदने लगीं। अंडे बेचने वाली बूढ़ी औरत जब भी आती, माँ उससे दस या बीस अंडे एक ही साथ खरीद लेतीं। वह उन अंडों को उबालतीं और भोजन के समय उनमें से दो अंडे अंकल को भिजवा देतीं और मुझे भी हमेशा एक अंडा दे देतीं। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। कभी-कभी जब मैं अंकल के पास जाती तो वे दराज से एक या दो अंडे निकाल कर मुझे खाने को देते। इस तरह उसके बाद से मैंने जी भर के अंडे खाए। मैं सचमुच अंकल को बहुत चाहने लगी थी। लेकिन कभी-कभी छोटे मामा अंकल पर कुढ़ जाते। मेरा अनुमान है कि वे नए अंकल को ज्यादा पसंद नहीं करते थे। और शायद इसका असली कारण यह था कि नए अंकल की खिदमतगारी करने का तरीका उन्हें नहीं सुहाता था। एक दिन मैंने देखा कि छोटे मामा और माँ के बीच किसी बात को लेकर कहा-सुनी हो रही है।


"देखो, अब फिर भागने की कोशिश मत करना। तुम उनके कमरे में इंतजार क्यों नहीं कर सकते? उनके लौटने के बाद उनके भोजन की ट्रे तो तुम्हें ही ले जानी होगी।"


माँ की बात पर छोटे मामा ने मुँह बिचकाया।


"बकवास है, जब भी मुझे किसी काम से जाना होता है, वह जानबूझ कर देर से भोजन करने आता है।"


“ठीक है, लेकिन मैं क्या करूँ? उन्हें भोजन पहुँचाने के लिए मुझे कोई आदमी तो चाहिए?”


“तुम खुद नहीं पहुँचा सकतीं, दीदी? देखो, अब समय बहुत बदल गया है। समझ में नहीं आता कि मर्दों को लेकर तुम्हारी सोच इतनी पुरातनपंथी क्यों है ?”


सहसा माँ का चेहरा लाल हो गया। उन्होंने कुछ कहा तो नहीं लेकिन छोटे मामा को जिस क्रुद्ध दृष्टि से देखा, उसे भुलाया नहीं जा सकता। माहौल को हल्का करने के लिए छोटे मामा हँस पड़े और गेस्ट रूम से बाहर चले गए।


मैंने किंडरगार्टन जाना शुरू किया जहाँ हमारी टीचर ने हमें गाना सिखाया। उन्होंने हमें नाचना भी सिखाया। वह पैडल ऑर्गन बहुत बढ़िया बजाती थीं। हम जिस प्रोटेस्टेंट चर्च में जाते थे वहाँ रखे ऑर्गन के तुलना में यद्यपि यह ऑर्गन छोटा था, फिर भी इससे अच्छी आवाज निकलती थी। तभी मुझे याद आया कि मैंने हमारे कमरे के दूर वाले कोने में रखी ठीक किंडरगार्टन के ऑर्गन की तरह दिखने वाली कोई चीज देखी है। अत: उस दिन घर आते ही मैंने माँ से उसके बारे में जानने की जिद‌ की और उनसे पूछा-


“अम्मी, यह ऑर्गन है। है न?”


माँ मुस्कुराईं।


“ठीक कहा। लेकिन तुमने कैसे जाना?”


“हमारे किंडरगार्टन में भी ऐसा ही एक ऑर्गन है। क्या तुम भी इसे बजा सकती हो, माँ?”


मुझे यह बात पूछनी पड़ी, क्योंकि इसके पहले मैंने कभी भी उन्हें इसे बजाता नहीं देखा था। लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।


“बजाने की कोशिश करो माँ, प्लीज।”


मेरी बात सुनकर उनका चेहरा उतर गया।


“तुम्हारे पिता ने यह ऑर्गन मेरे लिए खरीदा था। उनकी मृत्यु के बाद मैंने इसका ढक्कन तक नहीं खोला...”


उनके चेहरे को देखकर ऐसा लगा, जैसे वह अब कभी भी रोना शुरू कर देंगी। इस कारण मैंने वह विषय बदल दिया।


“अम्मी, मुझे एक कैंडी दीजिए न।”


उसके बाद मैं उन्हें वापस हमारे कमरे के अंतिम छोर तक ले गई।


देखते ही देखते अंकल को आए हुए एक महीना बीत गया। मैं प्राय: रोज उनके कमरे के सामने मंडराती रहती। कभी-कभी माँ कहतीं कि उन्हें इस तरह परेशान करना ठीक नहीं है। लेकिन सच तो यह है कि मैंने कभी भी उन्हें तनिक भी परेशान नहीं किया, बल्कि अंकल ही मुझे परेशान करते रहते थे।


एक दिन उन्होंने मुझसे कहा, “ओखुई, तुम्हारी आँखें तो बिल्कुल तुम्हारे पिता की आँखों की तरह हैं, लेकिन तुम्हारी सुंदर नाक तुम्हारी माँ की नाक की तरह है; और तुम्हारा छोटा मुँह भी। मैं ठीक कह रहा हूँ न? तुम्हारी माँ, तुम्हारी ही तरह सुंदर हैं न?”


"अंकल, आप भी न मूर्खों जैसी बात करते हैं! क्या आपने उनका चेहरा नहीं देखा है?"


मेरी इस जली-कटी बात को सुनकर वे एक शब्द भी नहीं बोले।


"क्या हम अंदर जाकर माँ से मिलें?" मैंने अंकल का आस्तीन पकड़कर खींचते हुए कहा।


मेरी बात सुनकर वे घबरा गए।


“नहीं, नहीं... इस समय मैं बहुत व्यस्त हूँ।” उन्होंने मुझे अपनी तरफ खीचते हुए कहा। 

हालाँकि वे तनिक भी व्यस्त नहीं दिखे‌ क्योंकि उन्होंने मुझे वहाँ से चले जाने को नहीं कहा, बल्कि मेरा सिर सहलाते हुए मेरे गालों को चूमा और मुझे वहाँ से जाने नहीं दिया। बीच-बीच में वह मुझसे अजीब-अजीब सवाल किया करते थे। 


“तुम्हारा यह सुंदर जैकेट किसने सिला है? क्या रात को तुम माँ के साथ सोती हो?”


वह मुझे यह दिखाने का प्रयत्न करते कि मैं उनके लिए खास हूँ। लेकिन छोटे मामा के वहाँ आते ही अंकल का रवैया अचानक बदल जाता। वह मुझसे ऐसी सारी बातें पूछना बंद कर देते और मुझे गले भी नहीं लगाते। इसके विपरीत वह चौकन्ने हो जाते और मुझे चित्रों वाली पुस्तक दिखाते। शायद वे छोटे मामा से डरते थे।


कारण जो भी रहा हो, मैं अंकल को परेशान करती हूँ, यह समझकर माँ मुझे डाँटती थीं। डिनर के बाद कभी-कभार वह मुझे कमरे में लाकर अपने पास बैठा लेतीं, लेकिन वह ज्यों ही अपना ध्यान सिलाई में लगातीं, मैं चुपके से वहाँ से खिसकने की चेष्टा करती। वह जब भी दरवाजा खुलने की आहट पातीं, उठकर मुझे पकड़ लेतीं। लेकिन इस बात के लिए वह कभी भी मुझ पर गुस्सा नहीं करतीं। वह कहतीं, “मेरे पास आओ, तुम्हारे बाल बना दूँ।” उसके बाद वह मुझे खींचकर अंदर लातीं और फिर से मेरे बालों की सुंदर चोटी बना देतीं। वह कहतीं, “मैं चाहती हूँ कि तुम्हारे बाल सुंदर दिखें। अगर इस तरह अपने बिखरे बाल लेकर बाहर निकलोगी तो नए अंकल क्या सोचेंगे?” या फिर कहतीं, “अपने जैकेट का हाल देखा है?” और मुझे नया जैकेट पहना देतीं।



(4)


एक शनिवार को नए अंकल ने मुझसे पूछा कि क्या मैं उनके साथ थोड़ी दूर पैदल सैर करना चाहूँगी। यह सुनकर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा और उनके साथ चलने को तुरंत राजी हो गई।


“पहले भीतर जाकर अपनी माँ से पूछ लो,” वे बोले।


मैंने सोचा कि उनका कहना बिल्कुल ठीक है।

माँ ने कहा "ठीक है", लेकिन इससे पहले कि वह मुझे जाने देतीं, उन्होंने मेरे चेहरे को साफ किया और मेरी चोटी बना दी। फिर मुझे गले लगा लिया।


“अब ज्यादा देर मत करो,” उन्होंने तेज आवाज‌ में कहा। मैं शर्तिया कह सकती हूँ कि अंकल ने भी यह सुना होगा।


हम एक पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गए और नीचे का रेलवे स्टेशन देखने लगे। लेकिन रेलवे स्टेशन पर कोई गाड़ी नहीं दिखी।


मुझे घास के लंबे तिनकों को खींचने और जमीन पर लेटे हुए अंकल को चिकोटी काटने में बड़ा मजा आया। बाद में जब पहाड़ी से नीचे उतरते समय अंकल ने मेरा हाथ पकड़ रखा था, तभी मेरी मुलाकात अपने किंडरगार्टन के कुछ बच्चों से हुई।


"देखो, देखो, ओखुई अपने पिता के साथ कहीं गई थी," उनमें से एक ने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा।


उस लड़की को पता नहीं था कि मेरे पिता का निधन हो गया है। उसकी बात सुनकर मेरा चेहरा उत्तेजना से गर्म हो गया, शायद इसलिए कि मैं सोच रही थी कि क्या ही अच्छा होता, यदि अंकल सचमुच मेरे पिता होते। मेरी तीव्र इच्छा हो रही थी कि एक बार ही सही, मैं उन्हें ‘पापा’ कहूँ। आप नहीं जानते कि अंकल का हाथ पकड़े हुए गलियों से होकर घर तक पैदल चलने में मुझे कितना आनंद आया। अंत में हम घर के सामने वाले दरवाजे पर पहुँचे।


“अंकल, काश आप मेरे पापा होते,”‌ मैंने जोर से कहा। मेरी बात सुनकर अंकल का चेहरा टमाटर की तरह लाल हो गया। उन्होंने धीरे से मुझे कोंचा और लगभग फुसफुसाते हुए कहा, “तुम्हें ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए।” उनका स्वर काँप रहा था। उनकी यह मुद्रा देखकर मुझे लगा कि शायद वे मुझ पर गुस्सा हो गए हैं। मैं सहमती हुई, बिना कुछ कहे घर में घुस गई।


मुझे देखकर माँ ने मुझे गले लगाते हुए कहा, “किस जगह गई थीं?” लेकिन उनकी बात का जवाब देने की जगह मैं सुबकने लगी। “क्या हुआ, ओखुई? तुम ठीक हो न? क्या हुआ मेरी लाड़ली को?” लेकिन मैं बस रोती ही रही।



(5)


अगले दिन रविवार था। उस दिन मैं और माँ चर्च जाने के लिए तैयार हो रहे थे। माँ जब अपने कपड़े बदल रही थीं, तब मैंने गेस्ट हाउस के दरवाजे के भीतर अपना सिर घुसाकर अंकल के मूड का अंदाज लगाने के लिए झाँका।वह अपनी डेस्क पर बैठकर कुछ लिख रहे थे। मैं दबे पाँव भीतर घुसी। मेरे आने की आहट पाकर उन्होंने अपना सिर ऊपर उठाया। उस समय उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थी। उनकी मुस्कुराहट से मैं फिर से सहज हो गई। मैं आश्वस्त हो गई कि अब वह मुझसे नाराज नहीं हैं। अंकल ने एक बार मुझे सिर से पैर तक निहारा।


“ओखुई, इतना सज-धज कर कहाँ जा रही हो?”


“मैं अम्मा के साथ चर्च जा रही हूँ।”


“अच्छा? ”अंकल बोले। कुछ देर तक चुप रहकर वह कुछ सोचतेरहे, फिर पूछा, “किस चर्च में?”


“वही, पास वाले में।”


“कहाँ?”


उसी समय मैंने सुना कि माँ धीमे स्वर में मुझे बुला रही हैं। मैं वहाँ से दौड़ती हुई हमारे कमरे में चली गई, लेकिन जाते-जाते मुड़कर अंकल की ओर ताकती रही। अचानक उनका चेहरा फिर से गुस्से से तमतमाया हुआ लगा। मैं समझ नहीं पा रही थी कि उन्हें आजकल इतनी जल्दी गुस्सा क्यों आ जाता है।


चर्च में अपनी सीट पर बैठकर हमने एक स्तोत्र का पाठ किया; उसके बाद प्रार्थना हुई। प्रार्थना के दौरान मेरे मन में यह विचार आया कि शायद अंकल भी वहाँ उपस्थित हो सकते हैं। इसलिए मैं बैठ गई और पुरुष दीर्घा में अपनी नजर दौड़ाने लगी। वह पुरुषों के बीच दिख पड़े। लेकिन वह दूसरे श्रद्धालुओं की तरह अपनी आँखें बंद कर प्रार्थना नहीं कर रहे थे। हम बच्चों की तरह उनकी आँखें खुली हुई थीं और वे बेचैनी से इधर-उधर ताक-झाँक कर रहे थे। मैंने तो उन्हें तुरंत पहचान लिया, लेकिन मेरा अनुमान था कि वह मुझे नहीं पहचान पाए थे, क्योंकि जब मैं उन्हें देखकर मुस्कुराई तो मेरी मुस्कान का उत्तर देने की जगह उनकी आँखें दूर कहीं खोई हुई-सी लगीं। तब मैंने उनकी ओर देखते हुए अपना हाथ हिलाया। लेकिन अंकल ने तुरंत अपना सिर झुका लिया। उसी समय माँ ने मुझे हाथ हिलाते हुए देख अपने दोनों हाथों से मुझे अपनी ओर खींच लिया। मैंने तुरंत माँ के कान के पास अपना मुँह सटा कर फुसफुसाते हुए कहा, “अंकल भी यहाँ आए हैं।”


यह सुनते ही माँ लगभग उछल पड़ीं और उन्होंने मेरे मुँह पर अपना हाथ रख दिया। उसके बाद उन्होंने मुझे अपने सामने बैठा कर मेरा सिर जबरदस्ती नीचे झुका दिया। उस समय मैंने यह लक्ष्य किया कि अब माँ का चेहरा टमाटर की तरह लाल हो गया है।


उस दिन चर्च जाने का अनुभव अच्छा नहीं रहा। प्रार्थना पूरी होने तक माँ का चेहरा क्रोध से तमतमाया रहा। पूरे समय वह बस सीधे उपदेश मंच की ओर ताकती रहीं। उन्होंने नीचे नहीं देखा और मेरी ओर ताक कर पहले की तरह एक बार भी नहीं मुस्कुराईं। जब मैंने फिर अपना सिर उठा कर पुरुष दीर्घा में उपस्थित अंकल को देखा, तब भी उन्होंने मेरी तरफ एक बार भी नहीं देखा, बल्कि मुँह फुलाए बैठे रहे। माँ ने भी मेरी ओर नहीं देखा, हाँ, बीच-बीच में मेरा सिर पकड़कर उसे जोर से नीचे झुकाने का काम अवश्य किया। मुझ पर ज्यादती की जा रही थी। मैं समझ नहीं पा रही थी कि प्रत्येक व्यक्ति मुझसे कन्नी क्यों काट रहा है। इस अवस्था में एक बार तो मन में आया कि जोरों से चिल्ला उठूँ, लेकिन उसी समय देखा कि हमारी जगह से थोड़ी दूर हमारे किंडरगार्टन की टीचर भी बैठी हुई हैं। इस कारण मैं किसी तरह अपनी रुलाई पर काबू रख पाई, हालाँकि उस पर काबू रख पाना मेरे लिए बहुत आसान नहीं था।



(6)


जब मैंने पहले-पहल किंडरगार्टन जाना शुरू किया था, उस समय छोटे मामा मुझे वहाँ छोड़ने जाते और छुट्टी हो जाने पर लिवाने आते। लेकिन कुछ दिनों के बाद मैं वहाँ अकेले ही जाने-आने लगी। घर लौटने के समय माँ बगल वाले दरवाजे पर खड़ी होकर हमेशा मेरा इंतजार किया करतीं। (हमारे घर के दो दरवाजे थे- बगल का दरवाजा और अंकल के कमरे तक जाने वाला दरवाजा। माँ हरदम बगल वाले दरवाजे का ही व्यवहार करतीं।) मुझे देखते ही माँ दौड़ी हुई आतीं और मुझे गले लगा लेतीं। फिर हम घर के भीतर चले जाते।


लेकिन एक दिन जब मैं किंडरगार्टन से घर लौटी तो देखा कि पता नहीं क्यों माँ दरवाजे पर खड़ी नहीं हैं। मैंने सोचा शायद वह नानी को देखने गई होंगी, फिर भी मुझे यह सोचकर बहुत बुरा लगा कि मैं घर लौट आई और कोई मेरा इंतजार नहीं कर रहा। मैंने सोचा कि इस तरह घर से बाहर जाना उनके लिए ठीक नहीं है। बस, मैंने माँ को अच्छा सबक सिखाने का फैसला किया। ठीक उसी समय दरवाजे के बाहर मुझे उनकी आवाज सुनाई पड़ी।


“हे भगवान! तो वह घर के भीतर ही थीं।”


मैं दौड़ती हुई घर के भीतर चली गई। मैंने अपने जूते उतार लिए थे ताकि उन्हें मेरे पैरों की आहट न लगे और मेरे वहाँ होने का पता न चले। उसके बाद मैं भंडारघर की मचान पर चढ़कर वहीं छिप गई।


बाहर आँगन से आ रही माँ की आवाज मुझे स्पष्ट सुनाई पड़ रही थी।


“ओखुई, अभी तक तुम घर नहीं लौटीं ?....हुँ… लगता है कि नहीं लौटी है।”


इसके बाद लगा कि वह फिर बाहर चली गईं। मुझे इसमें मजा आ रहा था और मैं मन ही मन हँस रही थी।


लेकिन फिर थोड़ी देर बाद अचानक पूरे घर में कोलाहल मच गया । सबसे पहले मैंने माँ की आवाज सुनी, फिर नानी की, फिर छोटे मामा की।


“मैं पूरे दिन घर पर ही थी, माँ। लेकिन जब मुझे यह एहसास हुआ कि ओखुई के लिए घर में कुकीज नहीं हैं, उसी समय मैं आपके पास आई थी। और अब लगता है कि कुछ गड़बड़ी है।” माँ नानी से कह रही थीं।


“और किंडरगार्टन वाले कह रहे थे कि वह तो बीस मिनट पहले ही घर जा चुकी है। हे ईश्वर, क्या तुम्हें लगता है कि घर लौटते समय रास्ते में कुछ...?” यह नानी की आवाज थी।


“मैं बाहर जाकर उसे खोजता हूँ। यह छोटी शैतान जरूर कहीं चली गई होगी।” छोटे मामा कह रहे थे।


उसके बाद माँ ने रोना शुरू किया और फिर नानी कुछ बोलने लगीं, जो मुझे सुनाई नहीं पड़ा। अब मैंने खुद से कहा कि अब यह खेल खत्म करना चाहिए, लेकिन उसके बाद फिर मैंने सोचा, “पिछले रविवार को चर्च में वह मुझ पर गुस्सा हुई थीं, इसलिए मुझे उसका बदला जरूर लेना चाहिए।” मैं वहीं लेट गई । मचान सामान से भरा हुआ है और वहाँ गर्मी है, यह अनुभव करने के पहले ही मैं नींद की गोद में समा गई।


मुझे नहीं पता कि वहाँ कितनी देर तक सोई रही। लेकिन नींद खुलने के बाद याद नहीं रहा कि मैं मचान पर कैसे पहुँच गई। फिर यह सोचने लगी कि ऐसी अद्भुत जगह सोई-सोई मैं क्या कर रही थी? सामान से अटी हुई, अँधेरी और गर्म जगह थी वह...। अचानक मुझे बड़ा डर लगने लगा और मेरी चीख निकल गई। अपनी उस चीख के बाद पास से ही मुझे माँ की चिल्लाहट सुनाई पड़ी और मचान वाले घर का दरवाजा झटके से खुल गया। माँ दौड़ती हुई अंदर आईं औरअपनी बाँहों के सहारे मुझे मचान से नीचे उतार दिया।


“शैतान की बच्ची!”


उन्होंने मुझे पीटना शुरू किया, जिससे मेरा रोना और बढ़ गया। फिर माँ ने मुझे अपने पास खींचा और वह भी रोने लगीं।


“ओखुई, ओखुई, सब ठीक है, अब अम्मी तुम्हारे पास हैं। रोओ मत, ओखुई। अब तुम मिल गई हो, तुम्हारी अम्मी तुम्हारे लिए ही जी रही हैं। मुझे और कुछ नहीं चाहिए। तुम ही मेरी एकमात्र आशा हो। रोओ मत, ओखुई, मत रोओ, ओखुई, समझीं?” मुझसे यह कहते हुए वह खुद भी रोती जा रही थीं।


“छोटकू....शायद इस पर शैतान सवार हो गया था, नहीं तो उसके मन में मचान पर छिपने का विचार कैसे आया?” छोटे मामा को सुनाते हुए नानी बोल उठीं।


“कितना बुरा रहा आज का दिन भी,” छोटे मामा बोले और वहाँ से उठकर चले गए।


अगले दिन किंडरगार्टन से घर लौटते समय मैं सोचने लगी कि मचान पर छिपकर मैंने माँ को किस तरह बहुत रुलाया। मैं खुद पर लज्जित हो रही थी। “आज मुझे माँ को खुश करना चाहिए,” मैंने सोचा। फिर सोचने लगी कि उनके लिए क्या ले जाऊँ, जिससे वह खुश हो सकें। अचानक मुझे अपनी टीचर की डेस्क पर रखे गुलदस्ते की याद आई, जिसमें कुछ सुंदर लाल फूल सजाकर रखे हुए थे। मैं उनफूलों को पहचान नहीं पाई थी,क्योंकि न तो वे फोरसाइथिया के फूल थे, न ही अजेलिया के। मैं उन फूलों को पहचानती थी और यह भी जानती थी कि अब तक वे तो खिलकर झड़ भी गए थे। गुलदस्ते में रखे हुए फूल अवश्य ही समुद्र के उस पार वाले देश से आए होंगे। मैं जानती थी कि मेरी माँ को फूल पसंद हैं। इसलिए सोचा कि अगर मैं इन लाल फूलों में से कुछ फूल माँ के लिए ले जाऊँ तो वह बहुत खुश होंगी।


यह सोचने के बाद मैं तुरंत लौटकर कक्षा में गई। सौभाग्य से वहाँ कोई नहीं था। टीचर शायद आसपास कहीं गई होंगी, इसलिए वहाँ नहीं दिखीं। मैंने गुलदस्ते से कुछ फूल चुराए और दौड़ती हुई किंडरगार्टन से बाहर आ गई।

माँ दरवाजे के पास मेरा इंतजार कर रही थीं । उनके पास जाते ही उन्होंने मुझे गोद में उठा लिया।


माँ ने मेरे हाथ से फूल लिए, फिर उन्हें सूँघा और मुझसे पूछा, “ये इतने सुंदर फूल तुम्हें कहाँ से मिले?”


मुझे नहीं सूझ रहा था कि मैं उनके उस प्रश्न क्या जवाब दूँ। मुझे उनसे यह कहने में शर्म आ रही थी कि मैं ये फूल किंडरगार्टन से लाई हूँ । कहूँ तो क्या कहूँ? साहस कर मैंने झूठ का सहारा लेने का निर्णय क्या।


“गेस्ट रूम में रहनेवाले अंकल ने तुम्हें देने को कहा था”, मैं बुदबुदाई।


मेरी बात सुनकर माँ एकदम से घबरा गईं। ऐसा लगा जैसे मेरी बात ने उन्हें चौंका दिया हो। और फिर एकदम से उनका चेहरा फूलों से भी ज्यादा लाल हो गया। अपनी जिन उँगलियों से उन्होंने फूल पकड़ रखे थे, उनमें कँपकँपी होने लगी। उन्होंने डरते-डरते अपनी निगाह चारों ओर दौड़ाई।


“ओखुई, तुम्हें ये फूल नहीं लेने चाहिए थे।” उनका स्वर कुछ ज्यादा ही काँप रहा था। माँ को फूल पसंद हैं और फूलों को लेकर वह इतना गुस्सा करेंगी, यह मेरी कल्पना से बाहर की बात थी। मैंने खुद से कहा कि अच्छा हुआ कि मैंने झूठ-मूठ अंकल का नाम ले लिया था और माँ को यह नहीं बताया था कि फूलों को मैं ही लाई हूँ। मुझे नहीं मालूम कि वह गुस्सा क्यों हो रही थीं, लेकिन मेरे लिए राहत की बात यह थी कि वह किसी दूसरे पर गुस्सा हो रही थीं यानि अंकल पर, मुझ पर नहीं। थोड़ी देर बाद माँ मुझे घर के अंदर ले गईं।


“ओखुई, इन फूलों के बारे में किसी से न कहना, समझीं?”


“ठीक है।”


मुझे लगा था कि माँ उन फूलों को बाहर फेंक देंगी, लेकिन उसके बदले उन्होंने फूलों को एक गुलदस्ते में सजाकर उन्हें ऑर्गन के ऊपर रख दिया। वहाँ वे बहुत दिनों तक रखे रहे और अंत में मुरझा गए। तब माँ ने उनके डंठल काट दिए और सूखे फूलों को अपनी प्रार्थना की पुस्तक के पन्नों के बीच रख दिया।


एक रात मैं अंकल की गोद में बैठकर चित्रों वाली पुस्तक पढ़ रही थी। अचानक मुझे लगा कि अंकल तनाव में आ गए हैं। वह कुछ सुनने की चेष्टा कर रहे थे। उनके साथ-साथ मैंने भी सुनने की चेष्टा की।


यह ऑर्गन की आवाज थी!


निश्चित रूप से यह ध्वनि हमारे कमरे से निकलकर आ रही थी। निश्चित रूप से माँ ही ऑर्गन बजा रही हैं, मैंने सोचा। मैं वहाँ से भागी-भागी हमारे कमरे में पहुँची। कमरे में रोशनी नहीं की गई थी, लेकिन पूर्णिमा की रात होने के कारण आधा कमरा चाँद की उज्ज्वल रोशनी से भर गया था, जिसके कारण कमरे में दिन जैसा उजाला फैला हुआ था। देखा कि माँ ने सफेद वस्त्र पहने हुए हैं और शांत होकर ऑर्गन बजा रही हैं।


मैं छह साल की हो गई थी, लेकिन उस दिन पहली बार मैंने माँ को ऑर्गन बजाते देखा। वह हमारे किंडरगार्टन की टीचर से भी अच्छा बजा रही थीं। मैं जाकर उनकी बगल में बैठ गई, लेकिन वह अपनी धुन में खोई ऑर्गन बजाती रहीं। मेरा अनुमान है कि उन्हें पता नहीं चला होगा कि मैं वहाँ हूँ। थोड़ी देर बाद माँ ने संगीत की धुन के साथ गाना शुरू किया। मुझे नहीं पता था कि उनका गला इतना मधुर है। उनकी आवाज हमारी टीचर की आवाज की तुलना में बहुत ज्यादा मधुर थी और वह बड़ी अच्छी तरह गा भी रही थीं। मैं वहाँ चुपचाप खड़ी होकर माँ का गाना सुनती रही। वह बहुत ही सुंदर गीत था। उस समय मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे गीत का यह स्वर रुपहले धागों से झूलता हुआ तारों के देश से मेरे पास आ रहा हो।


लेकिन उसके थोड़ी देर बाद ही माँ की आवाज धीरे से काँप उठी। ऑर्गन का सुर भी काँपने लगा। गीत का स्वर मंद होते-होते अंत में रुक गया। ऑर्गन से निकल रही स्वर-लहरी भी बंद हो गई। माँ उठ खड़ी हुईं। वह बिलकुल शांत दिख रही थीं। उन्होंने मेरे सिर को थपथपाया। उसके बाद मुझे गोद में उठाया और हम बाहर बरामदे में आ गए। पूर्णिमा की चाँदनी रात में उनका चेहरा बिलकुल उज्ज्वल दिख रहा था। 


“वह सचमुच में परी हैं,” मैंने खुद से कहा।


माँ की आँखों से आँसुओं की धारा बहकर उनके शुभ्र गालों पर आ रही थीं। यह दृश्य देखकर मेरा भी मन रोने-रोने को हो आया।


“माँ, आप रो क्यों रही हैं?” मैंने सुबकते हुए पूछा।


“ओखुई।”


“हुँ?”


एक मिनट तक वह कुछ भी नहीं बोलीं। उसके बाद कहा, “ओखुई, तुम ही मेरे लिए काफी हो।”


“हाँ, अम्मी ।”


उन्होंने बस इतना ही कहा।



(7)


अगली शाम अंकल के कमरे में खेलते-खेलते मुझे नींद आने लगी। हमारे कमरे में जाने के लिए जब मैं वहाँ से निकलने ही वाली थी कि अंकल ने ड्राॅवर से एक सफेद लिफाफा निकालकर मुझे दिया।


“ओखुई, इसे अपनी माँ को दे देना। इसमें पिछले माह के ठहरने और भोजन की रकम है।”


मैंने वह लिफाफा माँ को दे दिया। लेकिन लिफाफा लेते ही माँ के चेहरे का रंग उड़ गया। उस समय माँ का चेहरा उससे भी ज्यादा सफेद दिख रहा था, जितना पहली वाली रात की चाँदनी में दिखा था, जब हम बरामदे में बैठे हुए थे। वह बहुत व्याकुल लग रही थीं, मानों यह तय नहीं कर पा रही हों कि उस लिफाफे का क्या किया जाए।


“अंकल ने कहा है कि इसमें पिछले माह के ठहरने और भोजन की रकम है।”


“ओह।” यह सुनते ही माँ चौंक उठीं, जैसे अभी-अभी नींद से जागी हों। उनके चेहरे की रंगत तुरंत लौट आई। उनकी काँपती उँगलियाँ लिफाफे के भीतर गईं और उसके भीतर से कई कागज निकाल लाईं । उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई और उन्होंने राहत की साँस ली। लेकिन उसके बाद तुरंत उन्हें किसी बात पर निश्चित रूप से आश्चर्य हुआ होगा, क्योंकि वे पुन: तनाव में आ गईं और उनका चेहरा फिर पहले की तरह सफेद पड़ गया और होंठ थर्राने लगे। मैंने देखा कि उनके हाथ में कागज के नोट हैं और नोटों के साथ तह किया हुआ सफेद कागज का एक टुकड़ा है।


ऐसा लग रहा था कि माँ ऊहापोह की स्थिति में हैं कि क्या करें। फिर शायद उन्होंने अपना मन दृढ़ किया। होंठ काटते हुए तह किए गए कागज के टुकड़े को खोला और उसमें लिखी इबारत पढ़ी। उस कागज में क्या लिखा था, यह जानना मेरे लिए संभव नहीं था, लेकिन मुझे माँ का लाल होता और फिर पीला पड़ता चेहरा दिख पड़ा। उनके हाथ काँप भर नहीं रहे थे, बल्कि जोरों से हिल रहे थे, जिससे कागज सरसरा रहा था।

काफी देर के बाद माँ ने उस कागज को फिर से तह किया और रुपयों के साथ उसे भी लिफ़ाफ़े में रखा। फिर उसे अपनी सिलाई की टोकरी में डाल दिया।उसके बाद वह बैठ गईं और होशो-हवास खोए किसी व्यक्ति की तरह बिजली की बत्ती को एकटक देखती रहीं। मैं उनकी उठती-गिरती छाती देख सकती थी। मुझे लगा कि शायद उनकी तबीयत ठीक नहीं है या फिर उन्हें और कुछ हो गया है, इसलिए मैं दौड़ती हुई आकर उनकी गोद में दुबक गई।


“माँ, क्या हम सोने चलें?”


माँ ने मेरे गालों का चुंबन लिया। उनके होंठ बहुत गर्म थे। इतने गर्म कि लग रहा था जैसे होंठ न होकर आग में तपाए गए पत्थर के गर्म टुकड़े हों।

हम सोने चले गए। थोड़ी देर बाद माँ को पकड़ने के लिए अर्धनिद्रा में मैंने अपना हाथ बढ़ाया। बीच-बीच में ऐसा करना मेरी आदत में शुमार हो गया था। अर्धनिद्रा में अपना हाथ बढ़ाकर उनकी देह का स्पर्श कर उनकी त्वचा की कोमलता को महसूस करती। उसके बाद नींद में चली जाती। लेकिन उस दिन वह वहाँ नहीं थीं।


माँ नहीं हैं! मैं डर गई। मैंने पूरी तरह अपनी आँखें खोलीं और चारों तरफ देखने लगी। कमरे की बत्ती बुझी हुई थी, लेकिन आँगन में चाँदनी पसरी हुई थी और उसका प्रकाश पर्याप्त रूप से कमरे में आ रहा था, जिससे कमरे में रखी वस्तुएँ थोड़ी-बहुत दिखाई पड़ रही थीं। कमरे के दूर वाले कोने में एक छोटा संदूक था, जिसमें पिताजी के कपड़े रखे हुए थे। कभी-कभी माँ वह संदूक खोलकर पिताजी के कपड़े निकालतीं और उन्हें छूकर देखतीं। उस रात संदूक खुला हुआ था और फर्श पर सफेद कपड़ों का अंबार लगा हुआ था। रात्रि के कपड़े पहने माँ उसकी बगल में बैठी और सन्दूक पर किंचित झुकी मुद्रा में दिख पड़ीं। उनका सिर ऊपर की ओर था, लेकिन आँखें मुँदी हुई थीं। मैं उनके होंठों का हिलना-डुलना देख पा रही थी। लग रहा था कि वह प्रार्थना कर रही हैं। मैं उठ बैठी, फिर रेंगती हुई जाकर उनकी गोद में छिप गई।


“माँ, क्या कर रही हो तुम?”


मेरी आवाज सुनते ही उन्होंने बुदबुदाना बंद किया, अपनी आँखें खोलीं और मुझे देर तक देखती रहीं।


“ओखुई।”


“हुँ?”


“बिस्तर पर जाओ।”


“ठीक है। लेकिन तुम भी चलो, अम्मा।”


“हाँ, अम्मा भी जाएगी।”


उनका स्वर बुझा-बुझा-सा था।


माँ एक-एक कर पिताजी के कपड़े उठाने लगीं, फिर बड़ी कोमलता से अपनी हथेलियों से उनकी सलवटें ठीक कर उन्हें पुन: संदूक में रखने लगीं। अंतिम कपड़ा रखने के बाद उन्होंने संदूक को बंद कर उसमें ताला लगा दिया। उसके बाद उन्होंने मुझे गोद में उठाया और हम बिस्तर पर चले गए।


“माँ, पहले हमें प्रार्थना करनी चाहिए न?”


“हर रात मुझे बिस्तर पर ले जाने के बाद सोने से पहले माँ प्रार्थना जरूर करती थीं। मैं केवल एक ही प्रार्थना जानती थी-ईश्वर की प्रार्थना। उस प्रार्थना के शब्दों का अर्थ तो मैं नहीं जानती थी, लेकिन माँ के साथ-साथ उन शब्दों को दुहराते हुए मुझे वे शब्द अच्छी तरह याद हो गए थे। उस समय मुझे याद आया कि किसी कारणवश पिछली रात भी माँ प्रार्थना करना भूल गई थीं। मैं उन्हें प्रार्थना करने के बारे में याद दिलाना चाहती तो थी, लेकिन वह इतना उदास दिख रही थीं कि मैं चुप रही थी और उन्हें कुछ कहे बगैर नींद की गोद में चली गई थी।


“ठीक है, चलो प्रार्थना कर लेते हैं,” माँ ने शांत स्वर में कहा।


उस समय मैं माँ की वह कोमल आवाज सुनना चाहती थी, जिसमें वह प्रार्थना किया करती थीं।


“अम्मा, तुम शुरू करो।”


“हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है” उन्होंने प्रार्थना शुरू की, “तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसे स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो। हमारे दिन भर की रोटी आज हमें दे; और जिस प्रकार हमने अपने अपराधियों के अपराधों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर, और हमें प्रलोभन में न पड़ने दे...और हमें प्रलोभन में न पड़ने दे... हमें प्रलोभन में न पड़ने दे... हमें प्रलोभन में न पड़ने दे...हमें न पड़ने दे...हमें न पड़ने दे...”


मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। माँ प्रार्थना के अगले शब्दों को भूल गई हैं। यह अजीब बात थी। सोच रही थी कि यह प्रार्थना तो मुझे ही पूरी तरह याद है। इसका एक भी शब्द भूले बिना मैं पूरी प्रार्थना कर सकती हूँ।


“....हमें न पड़ने दे ..... ....हमें न पड़ने दे .....”


माँ इन्हीं शब्दों को दुहराती रहीं और जब मुझसे और ज्यादा इंतजार नहीं हुआ तो मैंने माँ से कहा, “अम्मा, बाकी मैं पूरा कर देती हूँ : "परंतु हमें बुराई से बचा। क्योंकि राज्य और पराक्रम और महिमा सदा तेरे ही हैं ।" ”


प्रार्थना खत्म होने के बहुत देर के बाद अंत में माँ फुसफुसाईं , “आमीन।”



(8)


अब माँ की मानसिकता का अंदाज लगाने के अलावा मेरे पास और कोई विकल्प नहीं था। कभी-कभी वह बहुत प्रसन्न लगतीं। शाम को ऑर्गन बजातीं या कोई भजन गातीं। मुझे यह सब सुनना बहुत अच्छा लगता था, इसलिए उनकी बगल में चुपचाप बैठकर सुना करती। लेकिन पता नहीं क्यों वह अचानक गाना बंद कर देतीं और उनकी आँखों में आँसू आ जाते। उस समय मेरी आँख भी भर आतीं। तब माँ मुझे बेहिसाब चूमतीं और कहतीं, “ओखुई, मुझे केवल तुम्हारी जरूरत है, हाँ, बस तुम्हारी।” फिर वह लगातार रोती रहतीं।


एक रविवार को माँ के सिर में दर्द होने के कारण उन्होंने चर्च न जाने का फैसला किया। (यह गर्मी की छुट्टियों के लिए किंडरगार्टन के बंद होने के बाद वाला दिन था।) गेस्ट हाउस वाले अंकल कहीं बाहर गए हुए थे और छोटे मामा भी कहीं आस-पास नहीं थे। घर में बस हम माँ-बेटी ही मौजूद थीं। सिर दर्द के कारण माँ लेटी हुई थीं। अचानक मैंने सुना कि मेरा नाम लेकर माँ मुझे बुला रही हैं।


“ओखुई, क्या तुम्हारे पापा का न होना तुम्हें बुरा लगता है?”


“हाँ अम्मा, मैं चाहती हूँ कि मेरे भी कोई पापा हों।” मैं बाल सुलभ हरकतें करती हुई सुबकने लगी।


मेरी बात सुनकर माँ कुछ देर तक कुछ नहीं बोलीं, बल्कि अपनी सूनी आँखों से छत को देखती रहीं।


“ओखुई, तुम जानती हो कि तुम्हारे पैदा होने के पहले ही तुम्हारे पापा की मौत हो गई थी। इसलिए ऐसा नहीं कि तुम्हारे पापा नहीं हैं, बस वे जल्दी ही गुजर गए। अब अगर कोई तुम्हारे नए पापा बन भी गए तो लोग तुम्हें गालियाँ बकेंगे। तुम नहीं जानतीं, लेकिन सारी दुनिया तुम्हारे ऊपर उँगली उठाएगी, संसार के सभी लोग तुम्हें गाली देंगे। कहेंगे कि ओखुई की माँ भ्रष्ट औरत है। सभी लोग यह कहेंगे कि बाप के मरने के बाद ओखुई को दूसरा बाप मिला है, देखते जाओ अब आगे और क्या-क्या होता है! सभी लोग तुम पर उँगली उठाएँगे। और जब तुम बड़ी हो जाओगी तो हम तुम्हारे लिए कोई अच्छा पति नहीं खोज पाएँगे। अगर पढ़-लिखकर तुम सफल भी हो गईं, तो भी लोग तुम्हें भ्रष्ट औरत की औलाद ही कहेंगे।”


उन्होंने यह बात इस आवेश में कही मानो मुझे न कहकर खुद को कह रही हों। कुछ मिनट के बाद उन्होंने मुझसे बहुत कुछ कहा।


“ओखुई?”


“हुँ?”


“ओखुई, मैं नहीं चाहती कि तुम कभी भी मुझे छोड़ जाओ। मैं चाहती हूँ कि तुम हरदम और सदा के लिए अम्मी के पास रहो। मैं चाहती हूँ कि तुम उस समय भी अपनी अम्मी के साथ रहो, जब वह बूढ़ी और शरीर से जर्जर हो जाएँ। किंडरगार्टन के बाद, प्रीप्रेटरी स्कूल के बाद, ग्रेड स्कूल के बाद, कॉलेज के बाद तुम संसार की सबसे अच्छी औरत क्यों न बन जाओ, मैं चाहती हूँ कि तब भी तुम अपनी अम्मी के साथ ही रहो। समझीं? बताओ तो तुम अम्मी को कितना प्यार करती हो?”


“इतना।” मैंने अपनी बाँहें पूरी तरह फैलाकर कहा।


“कितना? अच्छा उतना!”


“ओखुई, मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे हरदम और सदा के लिए प्यार करती रहो। मैं चाहती हूँ कि तुम खूब मन लगाकर पढ़ो-लिखो और एक अच्छी औरत बनो...”


माँ की काँपती हुई आवाज सुनकर मैं डर गई‌ क्योंकि मुझे लगा कि वह फिर रोने वाली हैं। अत: मैंने यथासंभव अपनी बाहें फैलाईं और कहा, “इतना, माँ, इतना।”


माँ रोईं नहीं।


“ओखुई, तुम अम्मी के लिए सब कुछ हो। मुझे और कुछ नहीं चाहिए। मैं बस ओखुई को लेकर ही खुश हूँ, हाँ, मैं हूँ।”


उन्होंने मुझे अपने और करीब खींचा और अपने सीने से भींच लिया। वह तब तक मुझे गले लगाए रहीं, जब तक कि मेरी साँस अटकने-अटकने को न हो आई।


उस दिन डिनर के बाद माँ ने मुझे बुलाकर अपने पास बैठाया और मेरे बाल सँवारने लगीं। फिर उन्होंने मेरे बालों की नई चोटी बनाई और मुझे नए ब्लूमर, जैकेट और स्कर्ट पहनाए।


मैंने पूछा कि हम कहीं जा रहे हैं क्या?


माँ मुस्कराईं, “हम कहीं नहीं जा रहे।” यह कहकर उन्होंने ऑर्गन की बगल से इस्त्री किया हुआ एक सफेद रूमाल उठाया और उसे मेरे हाथ पर रख दिया।


“यह रूमाल गेस्ट हाउस वाले अंकल का है। क्या यह रूमाल उन्हें दे आओगी? वहाँ ज्यादा देर तक रुकना मत, बस रूमाल देना और तुरंत लौट आना, समझीं?”


रूमाल को हाथ में लेने के बाद मुझे ऐसा महसूस हुआ कि उसकी तहों के बीच कोई चीज रखी हुई है। लेकिन मैंने उसे खोलकर नहीं देखा।


मैं अंकल के दरवाजे पर जाकर रुक गई। वे लेटे हुए थे, लेकिन मेरे हाथ में रूमाल देखते ही वे उठे और सीधा होकर बैठ गए। किसी कारण से वे मुझे देखकर पहले की तरह नहीं मुस्कुराए बल्कि उनका चेहरा एकदम से सफेद पड़ गया। मेरे हाथ से रूमाल लेते वक्त वे अपने होंठ चबाने लगे। उस दिन उन्होंने मुझसे एक शब्द भी नहीं कहा।


उनकी यह हालत देखकर मैंने समझ लिया कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ी है, इसलिए अंकल के कमरे में जाने की बजाय मैं वहाँ से उलटे पैर वापस चली आई। उस समय माँ ऑर्गन के सामने बैठी थीं। वह अवश्य किसी गंभीर चिंता मे लीन रही होंगी, क्योंकि वह बस वहाँ बैठी हुई थीं। मैं ऑर्गन के पास जाकर चुपचाप बैठ गई। तभी माँ ने बहुत ही धीमी आवाज में ऑर्गन बजाना शुरू किया। धुन का तो मुझे पता नहीं था, लेकिन उस धुन में एक तरह की उदासी और एकाकीपन का भाव था।


माँ देर देर रात तक ऑर्गन बजाती रहीं। वह बार-बार उदासी और एकाकीपन वाली वही धुन बजाती रहीं।



(9)


उस घटना के कई दिन बाद एक दोपहर को मैं अंकल के कमरे में गई। उस समय वे अपना सामान समेटने में लगे हुए थे। जिस दिन मैंने उन्हें रूमाल दिया था, उसके बाद से ही वे इस कदर उदास रहने लगे थे मानो उनके दिमाग में बहुत सारी दुश्चिंताओं ने घर कर लिया हो। मुझे देखने के बाद भी वे मुझसे कुछ बोलते तक नहीं, अपितु मुझे एकटक निहारते रहते। इसलिए मैंने भी उनके कमरे में खेलने जाना बंद कर दिया था।


अचानक उन्हें अपना सामान समेटता देख मैं आश्चर्य में पड़ गई।


“अंकल, क्या आप कहीं जा रहे हैं?”


“ऊँहूँ...हाँ...हाँ...बहुत-बहुत दूर।”


“कब?”


“आज।”


“ट्रेन से?”


“हाँ।”


“वापस कब आएँगे?”


मेरे प्रश्न का जवाब देने की जगह अंकल ने अपने ड्राॅवर से एक सुंदर गुड़िया निकालकर मुझे दी।

“इसे तुम रखो, समझीं? अंकल के जाते ही तुम उन्हें भूल जाओगी न, ओखुई? है न?”


“उहूँ।” अचानक मैं बहुत उदास हो गई।


गुड़िया के साथ मैं हमारे कमरे में लौट आई।


“अम्मी यह देखो! अंकल ने मुझे दी है। कह रहे थे कि आज वे ट्रेन से बहुत दूर जा रहे हैं।”


माँ कुछ नहीं बोलीं।


“अम्मी, अंकल दूर क्यों जा रहे हैं?”


“क्योंकि उनके स्कूल में छुट्टियाँ चल रही हैं।”


“वह कहाँ जा रहे हैं?”


“वह अपने घर जा रहे हैं...और कहाँ जाएँगे?”


“क्या अंकल फिर लौट कर आएँगे?”


माँ ने कोई उत्तर नहीं दिया।


“मैं नहीं चाहती कि अंकल चले जाएँ,” मैं खीझकर बोली।


उसी समय बातचीत को दूसरी तरफ मोड़ते हुए माँ बोल उठीं : “ओखुई, कोठरी में जाकर देख आओ तो कितने अंडे बचे हैं।”


मैं मन मारकर कोठरी में गई। छह अंडे बचे थे।


“छह,” मैंने बताया।


“सभी अंडे लेती आओ।”


माँ अंडों को उबालने की तैयारी करने लगीं। उसके बाद उबले अंडों को एक रूमाल में लपेटा। फिर एक कागज में एक चुटकी नमक रखकर उसे रूमाल के भीतर घुसा दिया।


“ओखुई, इन्हें अंकल को दे आओ और कहना कि इन्हें ट्रेन में खा लें, समझीं?”



(10)


अंकल के जाने के बाद उस दोपहर मैं उनकी दी हुई गुड़िया से खेल रही थी। गुड़िया को अपनी पीठ पर लेकर उसे लोरी सुना रही थी। उसी समय माँ रसोई से निकलकर बाहर आईं ।


“ओखुई, क्या तुम पहाड़ी पर जाकर ताजा हवा खाना चाहोगी?”


“हाँ, हाँ, हाँ, चलो चलते हैं! मैं खुशी से उछल पड़ी।”


माँ ने छोटे मामा से थोड़ी देर के लिए घर की निगरानी रखने को कहा और मेरा हाथ पकड़कर चलने को हुईं।


“अम्मा, क्या मैं अंकल की दी हुई गुड़िया अपने साथ ले चलूँ?”


“हाँ, हाँ! ”


मैंने अपने एक हाथ से गुड़िया को अपने सीने से चिपकाया, दूसरे हाथ से माँ का हाथ पकड़ा और हम अपने घर के पीछेवाली पहाड़ी पर चढ़ गए। पहाड़ी की चोटी से रेलवे स्टेशन तकरीबन साफ-साफ दिख रहा था।


“अम्मा, देखो वह रहा रेलवे स्टेशन। ट्रेन अभी वहाँ नहीं आई है।”


माँ कुछ नहीं बोलीं। उनकी रेमी स्कर्ट की झालर मंद हवा में लहरा रही थी। पहाड़ी की चोटी पर चुपचाप खड़ी माँ दूसरे दिनोंके मुकाबले कुछ ज्यादा ही सुंदर लग रही थीं।


तभी दूरवाली पहाड़ी की बगल से होकर आती ट्रेन दिख पड़ी।


“अम्मी, ट्रेन आ रही है!” मैं उल्लास से चहक उठी।


ट्रेन स्टेशन पर रुकी और ठीक एक मिनट बाद सीटी बजाकर वहाँ से रवाना हो गई।


“अब ट्रेन जा रही है!” मैंने ताली बजाते हुए कहा।


माँ ट्रेन को जाते हुए तब तक देखती रहीं, जब तक वह दूसरी तरफ की पहाड़ी की ओट में जाकर अदृश्य न हो गई। लेकिन उसके बाद भी ट्रेन के इंजन से निकले धुएँ को फैलकर ऊपर आकाश में विलीन होने तक वह उसे निहारती रहीं।


उसके बाद हम पहाड़ी से नीचे उतरे। कमरे में आने के बाद माँ ने ऑर्गन का ढक्कन बंद कर दिया और पहले की तरह उसके ऊपर सिलाई वाली टोकरी रख दी। उन्होंने भरे मन से प्रार्थना की पुस्तक निकाली और उसके पन्ने तब तक पलटतीं रहीं, जब तक उन्हें उसमें रखे सूखे फूल न मिल गए।


“ओखुई, इन्हें ले जाकर बाहर फेंक आओ।” उन्होंने मेरे हाथ में सूखे फूल देते हुए कहा। उन सूखे फूलों को देखकर मुझे याद आ गया कि ये वही फूल थे, जिन्हें किंडरगार्टन से लाकर मैंने उन्हें दिया था।


ठीक उसी समय बगल वाला दरवाजा चरमराकर खुल गया।


“अपने अंडे ले लो।”


यह अंडे बेचने वाली बुढ़िया थी, जो रोज अपने सिर पर अंडे की टोकरी लिए आती थी।


“अब से हम अंडे नहीं खरीदेंगे,” माँ बोलीं। “अब यहाँ उन्हें खानेवाला कोई नहीं है।” उन्होंने बुझे स्वर में कहा।


उनकी बात सुनकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। कुछ अंडे खरीदने के लिए मैं माँ को मनाना चाहती थी, लेकिन अस्त होते सूर्य की रोशनी में उनका तमतमाया हुआ चेहरा देखकर मैं हताश हो गई। अंकल की दी गई गुड़िया के कान के पास अपना मुँह ले जाकर मैं फुसफुसाते हुए उससे बोली :


“सुना तुमने! अम्मी भी बहुत झूठ बोलती हैं। वह जानती हैं कि मुझे अंडे पसंद हैं, परंतु उन्होंने बुढ़िया से कहा कि यहाँ अब अंडे खाने वाला कोई नहीं है। मैं भी उनसे झूठ बोलना चाहती हूँ, लेकिन अम्मी का चेहरा तो देखो। देखो किस कदर निस्तेज लग रहा है। मुझे नहीं लगता कि अम्मी की तबीयत ठीक है।”


किम चांग -उन और ब्रूस फुल्टन द्वारा किये गए अँग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित 

(प्रकाशन वर्ष : 1935)


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चु यो-सप (1902-1972) आधुनिक कोरिया के बहुमुखी प्रतिभा वाले साहित्यकार थे। उनकी ख्याति कवि, कथाकार और निबंधकार के रूप में है। उन्होंने शिन्दोंगा पत्रिका का संपादन किया और बाद में कोरियाई साहित्यिक अनुवादक एसोसिएशन के प्रमुख रहे। उनका जन्म 1902 में प्योंगयांग (अब उत्तर कोरिया में) में हुआ था। उन्होंने कुछ समय तक जापान में अध्ययन किया और फिर 1919 के कोरियाई स्वतंत्रता आंदोलन के समय कोरिया लौट आए। 1921 में साहित्य-सृजन के क्षेत्र में पदार्पण करने के बाद उन्होंने कई वर्ष चीन में बिताए और 1927 में शंघाई विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त की। 1920 के दशक की चु की अधिकांश कहानियाँ शंघाई के निम्न श्रेणी के लोगों के जीवन को आधार बना कर लिखी गई हैं जिनमें 1925 में प्रकाशित उनकी कहानी "रिक्शावाला" बहुत मशहूर हुई। इस कहानी के बाद दस वर्षों तक वे साहित्यिक गतिविधियों से दूर रहे। फिर 1935 में चु मूल रूप से चोगवांग पत्रिका में प्रकाशित अपनी कालजयी कहानी "सारंग सोनिम क्वाओमोनी" (अम्मी और अतिथि) के साथ साहित्यिक क्षेत्र में लौट आए। यह कहानी एक दशक पूर्व की उनकी यथार्थवादी कहानियों से अलग होने का प्रस्थान-बिन्दु है। जापान से मुक्ति और कोरियाई युद्ध के बाद चु दक्षिण कोरिया में रहकर निरंतर साहित्यिक साधना में लगे रहे। उनकी अंतिम कहानी 1972 में उनकी मृत्यु से ठीक पूर्व प्रकाशित हुई थी।


विजय कुमार यादव लेखक एवं अनुवादक हैं। गोल चक्कर पर इनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : विजय कुमार यादव




4 Comments


Anisha Yadav
a day ago

समाज का ये कैसा डर है, जो लोग जीना भूल जाते हैं... खुदकी खुशियों को चुनना भी उन्हें सही नहीं लगता?

बहुत खूबसूरत कहानी थी।

अधूरी सी लगी, पर शायद असलियत में कुछ कहानियां ऐसे ही अधूरी रह जाती हैं!

Edited
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संजय व्यास
2 days ago

बहुत सहजता, सरलता से गहन अभिव्यक्ति।

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Guest
2 days ago

शानदार

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रमेश शर्मा
3 days ago

बहुत सुंदर और प्यारी सी कहानी। स्त्री की भीतरी दुनिया के द्वंद को सामने रखने वाली यह कहानी कई स्तरों पर मन को स्पर्श करती है। प्रेम अव्यक्त होकर भीतर बचा रह जाता है किसी के लिए, यह कहानी उसे बखूबी बयाँ कर जाती है।

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