नींद
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मूल कहानी : हारुकी मुराकामी
अनुवाद : श्रीविलास सिंह
बिना नींद के यह मेरा लगातार सत्रहवाँ दिन है।
मैं अनिद्रा रोग के संबंध में बात नहीं कर रही हूँ। मैं जानती हूँ अनिद्रा रोग क्या होता है। मुझे इस तरह का कुछ काॅलेज के दिनों में हुआ था- ‘इस तरह का कुछ’ इसलिए क्योंकि मैं निश्चित नहीं हूँ कि तब जो हुआ था वह ठीक-ठीक वही था जिसे लोग अनिद्रा रोग कहते हैं। मैं सोचती हूँ कि एक डॉक्टर मुझे इस संबंध में बता सकता था। लेकिन मैं किसी डॉक्टर के पास नहीं गई। मैं जानती थी कि इससे कोई फायदा नहीं होगा। इसलिए नहीं कि ऐसा सोचने का मेरे पास कोई खास कारण था। आप इसे एक स्त्री की सहज प्रवृति कह सकते हैं-- मुझे बस महसूस हुआ कि वे कोई मदद नहीं कर पाएंगे। इसलिए मैं किसी डॉक्टर के पास नहीं गयी और मैंने अपने माता-पिता और दोस्तों को भी कुछ नहीं बताया क्योंकि मैं ठीक-ठीक जानती थी कि वे क्या करने को कहेंगे।
फिर पीछे चलते हैं। मेरा 'अनिद्रा रोग जैसा कुछ' लगभग एक महीने तक चला। मैं उस पूरे समय बिलकुल नहीं सोई। मैं रोज बिस्तर पर जाती और स्वयं से कहती, "अच्छा ठीक है, अब थोड़ी देर सो लिया जाए।" यही पर्याप्त होता था मुझे जगाने के लिए। यह तात्कालिक था- किसी पुरानी प्रतिक्रिया की भांति। सोने का मैं जितना अधिक प्रयत्न करती, उतना ही अधिक मैं जागती रहती। मैंने एल्कोहल भी आजमाया, नींद की गोलियां भी, लेकिन उनका कुछ भी प्रभाव नहीं हुआ।
अंततः जब सुबह आकाश में प्रकाश बढ़ना प्रारंभ होता, मुझे अनुभूति होती मानों मैं बह-सी रही हूँ। किंतु वह नींद नहीं होती थी। मेरी उंगलियां नींद के एकदम बाहरी किनारों को मात्र सहलाती-सी रहतीं। और इस सारे समय मेरा मस्तिष्क पूरी तरह जागता होता। मैं हल्की उनींदी सी महसूस करती, किंतु मेरा मस्तिष्क वहाँ होता, अपने स्वयं के कक्ष में, पारदर्शी दीवार के दूसरी ओर, मुझे देखता हुआ। मेरा भौतिक अस्तित्व सुबह की मद्धिम रोशनी के साथ तैर रहा होता और इस पूरी अवधि में मेरा मस्तिष्क उसे ताकता रहता, उसके एकदम पास सांस लेता हुआ सा। यह एक साथ दोनों था- नींद की गोद में जाती हुई एक देह और उसे जगाए रखने को प्रतिबद्ध एक मस्तिष्क।
यह अपूर्ण उनींदापन पूरे दिन आता-जाता रहता। मेरा सिर हमेशा कुहरे की भांति अस्पष्ट रहता। मैं अपने आसपास की चीजों पर ठीक से ध्यान केंद्रित न कर पाती- उनकी दूरी, द्रव्यमान अथवा गुण किसी चीज पर। उनींदापन नियमित अंतराल पर लहरों की भांति मुझ पर कब्जा किये रहता- मेट्रो स्टेशन में, क्लासरूम में, डिनर टेबल पर, हर जगह। मेरा मस्तिष्क मेरी देह से दूर भटक जाता। दुनिया निःशब्द दूर होती चली जाती। मैं चीजों को गिरा देती। मेरी पेंसिल, मेरा पर्स अथवा मेरा फॉर्क फर्श पर टपक जाते। बस मैं इतना चाहती थी कि अपने को बिस्तर पर गिरा दूँ और सो जाऊं। लेकिन मैं ऐसा कर नहीं सकती थी। जागृत रहने का एहसास निरंतर मेरे साथ मौजूद रहता। मैं उसकी बर्फीली छाया को महसूस कर सकती थी। यह मेरी स्वयं की छवि थी। अजीब था, जब नींद मुझ पर छाने लगती, मैं सोचती, जैसे मैं अपनी स्वयं की छाया में हूँ। मैं अपने उनींदेपन के दौरान टहलती, खाना खाती और लोगों से बात भी करती। और सबसे विचित्र बात थी कि किसी ने इस बात को नोटिस नहीं किया। मेरा वजन उस महीने पंद्रह पौंड कम हुआ लेकिन किसी ने नोटिस नहीं किया। मेरे परिवार में किसी को, मेरे मित्रों और सहपाठियों को, किसी को भी इस बात का भान नहीं हुआ कि मैं सोए हुए जी रही थी।
यह शब्दशः सच था : मैं सोए हुए जी रही थी। मेरी देह में एक डूबे हुए शव से अधिक अनुभूतियां शेष नहीं थी। मेरा समूचा अस्तित्व, दुनिया में मेरा जीवन एक संभ्रम सा महसूस होता था। हवा का एक तेज झोंका मुझे यह सोचने को विवश कर देता कि वह मुझे धरती के अंत की ओर उड़ा ले जाएगा, एक ऐसी भूमि पर जिसे मैंने कभी नहीं देखा अथवा जिसके बारे में कुछ नहीं सुना, जहाँ मेरी देह और मस्तिष्क सदैव के लिए अलग हो जाएंगे। "कस कर पकड़ो" मैं स्वयं से कहती, लेकिन कुछ नहीं था जिसे मैं पकड़ सकती।
और फिर जब रात आती, सघन जागृति वापस लौट आती। इसका प्रतिरोध कर पाने में मैं स्वयं को अशक्त पाया करती। मैं इसके केंद्र में किसी विकट ताकत द्वारा स्वयं को आबद्ध पाती। मैं बस इतना भर कर पाती कि सुबह तक जागती रहती, अँधेरे में आंखें खोले हुए। मैं सोच तक नहीं पाती थी। मैं कुछ नहीं करती थी, सिवाय अँधेरे में ताकते रहने के जो धीरे-धीरे गहराता और फिर धीरे-धीरे मद्धम पड़ने लगता।
और फिर एक दिन यह खत्म हो गया, बिना किसी चेतावनी के, बिना किसी बाह्य कारण के। मैं नाश्ते की टेबल पर चेतना खोने लगी। मैं बिना कुछ कहे खड़ी रहती। मैं किसी चीज को टेबल से गिरा चुकी होती। मैं सोचती हूँ किसी ने मुझे टोका था। लेकिन मैं निश्चित नहीं हूँ। मैं लड़खड़ाती हुई अपने कमरे तक आयी, कपड़े पहने हुए ही बिस्तर में चली गयी, और शीघ्र ही गहरी नींद में सो गई। मैं उसी दशा में सत्ताइस घंटे पड़ी रही। मेरी माँ को चिंता हुई और उन्होंने मुझे झकझोर कर इससे बाहर निकालना चाहा। उन्होंने वास्तव में मेरे गाल पर थप्पड़ भी लगाया। लेकिन मैं सत्ताइस घंटे तक बिना व्यवधान के सोती रही। और अंत में जब मैं जागी, मैं पुनः वही पुरानी 'मैं' थी। संभवतः।
मुझे कुछ पता नहीं कि क्यों मैं एकाएक अनिद्रा का शिकार हो गयी थी और फिर क्यों एकाएक वह दशा ठीक भी हो गयी। यह एक घने, काले बादल की भांति था जो कहीं से हवा द्वारा लाया गया था, तमाम अपशकुनी चीजों से भरा हुआ एक बादल जिसके बारे में मुझे कोई ज्ञान नहीं है। कोई नहीं जानता कि कहाँ से ऐसी चीजें आती हैं और कहाँ चली जाती हैं। मैं निश्चय के साथ केवल इतना कह सकती हूँ कि कुछ समय के लिए यह मेरे ऊपर आयी थी फिर छोड़ कर चली गयी।
किसी भी दशा में, अब मैं जिस बात से ग्रस्त हूँ, वह उस अनिद्रा की भांति नहीं है। मैं बस सो नहीं सकती। एक क्षण के लिए भी नहीं। इस एकमात्र तथ्य के अतिरिक्त मैं पूरी तरह सामान्य हूँ। मैं उनींदी-सी नहीं महसूस करती। मेरा मस्तिष्क हमेशा की भांति साफ है। कुछ अधिक साफ, यदि कहा जाए तो। शारीरिक रूप से भी, मैं एकदम सामान्य हूँ : मेरी भूख एकदम ठीक है, मुझे थकान नहीं है। दिन-प्रतिदिन की वास्तविकता के हिसाब से, मेरे साथ कुछ भी गलत नहीं है। मैं बस सो नहीं सकती।
न तो मेरे पति ने, न मेरे बेटे ने ही नोटिस किया कि मैं सो नहीं रही हूँ। और मैंने भी उनसे इसकी चर्चा नहीं की। मैं नहीं चाहती कि मुझे डॉक्टर के पास जाने को कहा जाए। मैं जानती हूँ इससे कोई लाभ नहीं होगा। मैं बस जानती हूँ। पहले की ही भांति। यह मैं स्वयं हूँ।
इसलिए उन्हें कोई संदेह नहीं है। सतह पर हमारा जीवन अपरिवर्तित चल रहा है। शांत। सामान्य। सुबह अपने पति और बेटे को विदा करने के पश्चात, मैं अपनी कार लेती हूँ और शॉपिंग करने चली जाती हूँ। मेरे पति दंत चिकित्सक हैं। हमारे घर से उनका क्लीनिक 10 मिनट की दूरी पर है। वह और उनके कॉलेज के एक मित्र साझीदार के रूप में उसके मालिक हैं। ऐसा करके वे एक टेक्नीशियन और एक रिशेप्सनिस्ट रख सकते हैं। एक साझीदार दूसरे के अतिरिक्त मरीजों को देख सकता है। वे दोनों अच्छे हैं, इसलिए पांच वर्ष पूर्व बिना किसी विशेष संपर्क के खुला वह क्लीनिक बहुत अच्छे से काम कर रहा है। लगभग बहुत ही अच्छा। "मुझे उतनी अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती," मेरे पति कहते हैं, "लेकिन मैं शिकायत नही कर सकता।"
और मैं हमेशा कहती हूँ, “बिलकुल, तुम नहीं कर सकते।” यह सच भी है। हमें उस जगह के लिए बैंक से एक बड़ी राशि ऋण के रूप में लेनी पड़ी थी। और प्रतिस्पर्धा भी विकट है। मरीजों की भीड़ उसी समय नहीं आने लग जाती जब आप अपना क्लीनिक प्रारम्भ करते हैं। ढेरों डेंटल क्लीनिक मरीजों के अभाव में असफल हो चुके हैं।
पीछे चलें तो, हम गरीब थे और हमारा एक बिल्कुल छोटा बच्चा था। कोई गारंटी नहीं दे सकता था कि हम इस कठोर संसार में बने रहेंगे। लेकिन हम बने रहे, बस किसी तरह। पांच साल। नहीं, हम निश्चय ही शिकायत नहीं कर सकते। अभी हमें अपने ऋण का लगभग दो तिहाई चुकाना शेष है।
“मैं जानती हूँ तुम्हारे पास हमेशा इतने मरीज क्यों रहते हैं,” मैं उनसे हमेशा कहती हूँ, “क्योंकि तुम इतने सुदर्शन व्यक्ति हो।”
यह हमारा छोटा सा मजाक है। वह बिलकुल भी अच्छे नहीं दिखते। वास्तव में वह एक तरह से विचित्र-से दिखते हैं। मैं भी अब कभी-कभी आश्चर्य करती हूँ कि मैंने ऐसे विचित्र-से दिखने वाले व्यक्ति से विवाह क्यों किया। मेरे और भी ब्वायफ्रेंड्स थे जो कहीं अधिक सुदर्शन थे।
उनके चहरे को क्या चीज ऐसा विचित्र बनाती है? वास्तव में मैं बता नहीं सकती। यह एक सुदर्शन चेहरा नहीं है, लेकिन यह कुरूप भी नहीं है। वह इस तरह का भी नहीं है कि लोग कहें कि वह विशिष्ट है। ईमानदारी से कहूं तो जो भी कहा जा सकता है वह ‘विचित्र’ में समाहित है। या यह कहना अधिक सही होगा कि उसमें कोई खास विशेषता नहीं थी। तब भी ऐसा कोई तत्व होना चाहिए जो उनके चहरे को किसी खास विशेषता से रहित बनाता है। और यदि मैं इसे समझ पाती, चाहे यह जो भी हो, मैं उनके पूरे चेहरे की विचित्रता को समझ पाने में सक्षम हो सकती थी। मैं वहां कागज पर पेन्सिल रखकर बैठती और एक निशान न बना पाती थी। मैं भौंचक्की थी। आप कैसे किसी पुरुष के साथ इतने लम्बे समय से रहते हुए भी अपने मस्तिष्क में उसका चेहरा नहीं ला सकते? उसे कैसे पहचानना है, निश्चय ही मैं जानती थी। मैं यदा-कदा उनकी मानसिक छवि भी देखती थी। लेकिन जब उनका चित्र बनाने की बात होती, मुझे आभास होता कि मुझे उनके चहरे के बारे में कुछ भी स्मरण नहीं है। मैं क्या कर सकती थी? यह एक अदृश्य दीवार से टकराने जैसा था। बस एक बात जो मैं स्मरण कर सकती थी, वह थी कि उनका चेहरा विचित्र दिखता था।
उनकी स्मृति मुझे कभी-कभी नर्वस कर देती है।
फिर भी वह उन चुनिंदा पुरुषों में है जिसे हर कोई पसंद करता है। यह निश्चय ही उनके व्यवसाय में बहुत बड़ा गुण है, लेकिन मैं सोचती हूँ कि वह किसी भी काम में इसी भांति सफल रहते। लोग उनसे बात करने में सुरक्षित महसूस करते थे। मैं ऐसे किसी व्यक्ति से पहले कभी नहीं मिली थी। मेरी सभी सहेलियां उन्हें पसंद करती थीं। और मैं निश्चय ही उन्हें चाहती थी। मैं सोचती हूँ मैं उन्हें प्रेम भी करती हूँ। लेकिन साफ-साफ कहूँ तो मैं वास्तव में उन्हें पसंद नहीं करती।
जो भी हो, वह अपने स्वाभाविक, मासूम तरीके से, किसी बच्चे की भांति मुस्कुराते हैं। बहुत से वयस्क पुरुष ऐसा नहीं कर पाते। और मेरा अनुमान है कि आप एक दांतों के डॉक्टर से चमकीले दांतो की अपेक्षा करते हैं, जो कि उनके थे।
“यह मेरी गलती नहीं है कि मैं इतना सुदर्शन हूँ”, वह हमेशा कहते, जब हम अपना छोटा सा मजाक करते। केवल हम ही समझते थे कि इसका क्या मतलब था। यह वास्तविकता की स्वीकृति थी- एक तथ्य जिसे हमने जीने के लिए येन-केन प्रकारेण प्रबंधित कर रखा था- और यह हमारे लिए एक आवश्यक कर्मकांड जैसा था।
वे उस काॅम्प्लेक्स के गैरेज की पार्किंग से रोज आठ पंद्रह पर अपनी सेन्त्रा चला कर जाते हैं। हमारा बेटा उनकी सीट की बगल में बैठा होता है। प्राथमिक विद्यालय उनके क्लीनिक के रास्ते में है। “सावधानी से जाना” मैं कहती हूँ। “चिंता मत करो” वे जवाब देते हैं। हमेशा यही संक्षिप्त संवाद। मैं कुछ नहीं कर सकती। मुझे कहना ही है, “सावधानी से जाना।” और मेरे पति को जवाब देना है, “चिंता मत करो।” वे इंजन चालू करते हैं, कार के स्टीरिओ में हेडेन या मोजार्ट का कोई टेप लगाते हैं और उसी के साथ-साथ गुनगुनाने लगते हैं। मेरे दोनों ‘आदमी’ बाहर निकलते हुए मुझे हाथ हिलाते हैं। उनके हाथ एक ही तरह से चलते हैं। यह एकदम अप्रत्याशित है। उनके सिर एक ही कोण पर मुड़ते हैं और वे मेरी ओर अपनी हथेली घुमा लेते हैं, एक ही तरह से दाएं-बाएं हिलाते हुए, मानो किसी कोरियोग्राफर से प्रशिक्षित हों।
मेरी अपनी कार है, एक पुरानी हाॅण्डा सिविक। दो साल पहले इसे मेरी एक सहेली ने मुझे लगभग मुफ्त में बेचा था। एक बम्पर टूटा हुआ है और बनावट पुरानी है। जंग के दाग दिखने लगे हैं। ओडोमीटर एक लाख पचास हजार से ऊपर किलोमीटर दिखाता है। कभी-कभार—महीने में एक या दो बार—कार को चालू करना लगभग असंभव हो जाता है। बस इंजन में कोई हरकत नहीं होती। अभी भी वह इतनी खराब नहीं हुई है कि मरम्मत कराई जाए। यदि इसे दस मिनट के लिए एक-दो बार प्रयत्न कर के छोड़ दिया जाए तो इंजन शानदार आवाज के साथ चालू हो जाएगा। ओह ठीक है, महीने में एक-दो बार हर चीज, हर कोई, चोट खाता है। यही जीवन है। मेरे पति मेरी कार को “तुम्हारी गधी” कहते हैं। मुझे परवाह नहीं। यह मेरी है।
मैं अपनी सिविक से सुपर मार्केट जाती हूँ। खरीददारी के बाद मैं घर की सफाई करती हूँ और कपड़े धोती हूँ। फिर दोपहर का खाना बनाती हूँ। मैं अपने सुबह के काम तेजी से, कुशलता से करना सुनिश्चित करती हूँ। यदि संभव हुआ तो मैं रात के खाने की भी तैयारी सुबह ही पूरी कर लेना पसंद करती हूँ। फिर अपराह्न पूरा मेरा होता है।
मेरे पति लंच के लिए घर आते हैं। वह बाहर खाना पसंद नहीं करते। वह कहते हैं कि रेस्टोरेंट्स में बहुत भीड़ होती है, खाना भी अच्छा नहीं होता और तम्बाकू की महक उनके कपड़ों में भर जाती है। दूरी के बावजूद वे घर पर ही भोजन करना पसंद करते हैं। फिर भी मैं लंच में कुछ फैंसी नहीं पकाती। मैं बचे हुए खाने को माइक्रोवेव में गरम कर देती हूँ या फिर नूडल्स बना देती हूँ। इसमें बहुत कम समय लगता है। और निश्चय ही अपने पति के साथ लंच करना अधिक आनंददायक होता है बजाय अकेले खाने के जब कोई बात करने वाला भी न हो।
पहले जब क्लीनिक चालू ही हुआ था, अपराह्न के शुरुआती घंटों में कोई मरीज नहीं होता था। इसलिए हम दोनों लंच के बाद बिस्तर में चले जाते थे। वे दिन उनके साथ के सबसे प्यारे दिन थे। हर चीज शांत थी और अपराह्न की मुलायम धूप पर्दों से छन कर कमरे में आती थी। तब हम अब से अधिक जवान थे और खुश भी।
निश्चय ही, हम अब भी प्रसन्न हैं। मैं वास्तव में ऐसा सोचती हूँ। हमारे घर पर किसी घरेलू मुसीबत का साया नहीं पड़ा है। मैं उन्हें प्रेम करती हूँ और उन पर विश्वास करती हूँ। और मुझे विश्वास है कि वह भी मेरे बारे में ऐसा ही महसूस करते हैं। किंतु थोड़ा-थोड़ा करके, जैसे-जैसे महीने और साल गुजरते हैं, आपका जीवन परिवर्तित होता रहता है। यह ऐसा ही है। आपके बस में कुछ भी नहीं है। अब अपराह्न के सभी स्लॉट भर जाते हैं। जब हम खाना समाप्त करते हैं, मेरे पति दांतो को ब्रश करते हैं, अपनी कार की ओर भागते हैं और वापस अपने कार्यालय चले जाते हैं। तमाम बीमार दांत उनकी प्रतीक्षा में होते हैं। लेकिन यह सब ठीक है। हम दोनों जानते हैं कि आप हर चीज को अपने ही तरीके से नहीं चला सकते।
मेरे पति के कार्यालय चले जाने के पश्चात मैं एक बाथ-सूट और एक तौलिया लेती हूँ और कार लेकर पड़ोस के एथलेटिक्स क्लब चली जाती हूँ। मैं आधे घंटे तक तैरती हूँ। मैं कस कर तैरती हूँ। मैं स्वयं तैराकी के प्रति सनकी नहीं हूँ, बस मैं मोटापे को दूर रखने का प्रयत्न करती हूँ। मुझे सदैव से ही अपनी देहयष्टि पसंद रही है। वास्तव में मैंने कभी अपने चेहरे को पसंद नही किया। यह बुरा नहीं है। लेकिन मैंने कभी यह नही महसूस किया कि मैं इसे चाहती थी। मेरी देह की बात और है। मैं दर्पण के सामने नग्न खड़े रहना पसंद करती हूँ। मैं वहां दिखने वाली कोमल रूपरेखा का अध्ययन करना पसंद करती हूं। मैं वहाँ संतुलित जीवंतता देखती हूँ। मैं निश्चित नहीं हूँ कि यह क्या है लेकिन मैं महसूस करती हूँ कि वहाँ भीतर कुछ है जो मेरे लिए महत्वपूर्ण है। यह जो भी हो, मैं इसे खोना नहीं चाहती।
मैं तीस की हूँ। जब आप तीस के हो जाते हैं, आपको भान होता है कि यह दुनिया का अंत नहीं है। मैं बूढ़ी होने को लेकर विशेष प्रसन्न नहीं हूँ लेकिन यह कुछ चीजों को आसान बना देता है। यह मनोवृत्ति का प्रश्न है। यद्यपि एक बात मैं निश्चय के साथ जानती हूँ कि यदि तीस वर्ष की एक महिला अपनी देह को प्यार करती है और उसे उस प्रकार रखने हेतु गंभीर है जैसी वह दिखनी चाहिए तो उसे एक निश्चित मात्रा में प्रयत्न करना चाहिए। मैंने यह अपनी माँ से सीखा है। वह एक छरहरी, प्यारी महिला हुआ करती थीं किंतु अब वह वैसी नहीं हैं। मैं यही बात अपने साथ घटित नहीं होने देना चाहती।
तैरने के पश्चात, मैं अपराह्न का शेष समय विभिन्न तरीकों से बिताती हूँ। कभी-कभार मैं यूँ ही स्टेशन प्लाजा में भटकती रहूँगी और शो-केसेज में लगे सामान देखूंगी। कभी मैं घर जा कर सोफे पर गुड़ी-मुड़ी पड़ जाऊंगी और कोई किताब पढूंगी या किसी एफ एम स्टेशन से संगीत सुनूँगी अथवा बस आराम करूंगी। फिर मेरा बेटा स्कूल से घर आ जाता है। मैं उसे बदल कर खेलने के कपड़े पहनने में मदद करती हूँ और उसे कुछ हल्का-फुल्का खाने को देती हूँ। जब वह खा लेता है, वह अपने दोस्तों के साथ खेलने के लिए बाहर चला जाता है। अभी वह अपराह्न के हॉबी स्कूल्स में जाने के लिए बहुत छोटा है और हम भी उसे पियानो या कुछ और सीखने के लिए नहीं कह रहे हैं।
"उसे खेलने दो," मेरे पति कहते हैं, "उसे स्वाभाविक रूप से बड़ा होने दो।" मेरा बेटा जब घर से जाने लगता, हमारे बीच वही संवाद होता है जो मेरा मेरे पति के साथ होता है। "ध्यान रखना" मैं कहती हूँ, और वह जवाब देता है "चिंता मत करो।"
जैसे ही साँझ ढलने लगती है, मैं डिनर तैयार करना शुरू कर देती हूँ। मेरा बेटा हमेशा छः बजे तक वापस आ जाता है। वह टीवी पर कार्टून देखता है। यदि कोई आपातकालीन मरीज नहीं आता तो मेरे पति सात बजे से पहले घर आ जाते हैं। वे एक बूंद भी ड्रिंक नहीं करते और उन्हें अनावश्यक सोशलाइजिंग भी पसंद नहीं है। वे लगभग हमेशा ही अपने काम से सीधे घर ही आते हैं।
हम तीनों डिनर के दौरान बात करते हैं, अधिकांशतः हमने दिन में जो किया उसी के बारे में। मेरे बेटे के पास सदैव बताने के लिए सबसे अधिक होता है। उसके जीवन में जो कुछ भी घटित होता है, ताजा होता है और रहस्य से परिपूर्ण। वह बात करता है और हम अपनी टिप्पणी करते हैं। डिनर के बाद उसके मन में जो आए, वही करता है—टी वी देखता है, पढ़ता है अथवा मेरे पति के साथ कुछ खेलता है। जब उसके पास गृहकार्य होता है, वह अपने कमरे में बंद हो जाता है और अपना काम करता है। साढ़े आठ बजे वह अपने बिस्तर में चला जाता है। मैं उसे ठीक से ढंकती हूँ, उसके बाल सहलाती हूँ, उसे शुभरात्रि कहती हूँ और बत्तियाँ बुझा देती हूँ।
फिर बस हम पति-पत्नी साथ होते हैं। मेरे पति सोफे पर बैठ अखबार पढ़ते हुए मुझसे यदा-कदा अपने मरीजों या फिर अखबार की किसी खबर के संबंध में बात करते हैं। फिर वह हेडन या फिर मोजार्ट को सुनते हैं। मुझे संगीत सुनने में आपत्ति नहीं है लेकिन मुझे कभी नहीं लगा कि मैं उन दो संगीतज्ञों के बीच का अंतर बता पाऊंगी। उनके स्वर मुझे एक जैसे ही लगते हैं। जब मैं यह बात अपने पति से कहती हूँ तो वह कहते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। "यह सब कुछ खूबसूरत है, यही महत्वपूर्ण है।"
"बिलकुल तुम्हारे जैसा," मैं कहती हूँ।
"बिलकुल मेरे जैसा," वे एक बड़ी सी मुस्कान के साथ जवाब देते हैं। वह सचमुच खुश हो गए लगते हैं।
तो यह है मेरा जीवन—या नींद न आने के पहले का जीवन—प्रत्येक दिन पिछले दिन का दुहराव मात्र। मैं एक साधारण सी डायरी रखा करती थी, लेकिन उसे लिखना दो या तीन दिनों के लिए भूल जाती तो मैं यह भूल जाती थी कि किस दिन क्या हुआ था। कल, कल के पहले का एक दिन हो सकता था अथवा इसके विपरीत। मैं कभी-कभी आश्चर्य करती कि यह किस प्रकार का जीवन है। इसका यह अर्थ नहीं कि मैं इसे रिक्त पाती थी। मैं—साधारण शब्दों में—अचंभित थी। दिनों की सीमा रेखा के अभाव पर। इस तथ्य पर कि मैं ऐसे जीवन का हिस्सा हूँ, एक ऐसा जीवन जिसने मुझे पूरी तरह अपने में अंतर्भूत कर लिया है। तथ्य यह है कि मेरे पलट कर उन्हें देखने के अवसर के पूर्व ही मेरे पदचिह्न धूमिल पड़ते जा रहे है।
जब भी मैं इस तरह अनुभव करती, मैं बाथरूम में दर्पण में अपना चेहरा देखती—एक बार में पंद्रह मिनट, बस मैं केवल इसे देखती रहती। मैं अपने चेहरे को एक वस्तु की भांति ताकती रहती और शनैः-शनैः वह मेरे शेष अस्तित्व से असंपृक्त हो जाता—ऐसी वस्तु जो उसी समय अस्तित्वमान है, जब मैं हूँ। और मुझे यह भान होता कि : यह आज और अभी घटित हो रहा है। इसका पदचिह्नों से कुछ लेना-।देना नहीं है। वास्तविकता और मैं इस वर्तमान क्षण में एक साथ अस्तित्व में हैं। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है।
लेकिन अब मैं बिल्कुल सो नहीं सकती। जब मैंने सोना बंद किया, मैंने डायरी लिखना बंद कर दिया।
वह पहली रात जब मेरी सो पाने की क्षमता समाप्त हुई, मुझे पूरी स्पष्टता से स्मरण है। मुझे एक डरावना सपना आया था- एक अंधकारपूर्ण और घिनौना स्वप्न। यह किस बारे में था इतना तो मुझे स्मरण नहीं किंतु मुझे याद है कि यह कितनी अपशकुनी और भयावह अनुभूति थी। मैं इसके चरम क्षणों में जाग गयी थी—एकदम जागी हुई जैसे किसी चीज ने मुझे बिलकुल अंतिम क्षण में एक घातक मोड़ से वापस घसीट लिया हो। यदि मैं उस स्वप्न में एक और क्षण भी डूबी रहती तो मैं सदा के लिए खो जाती। मेरे जागने के पश्चात, कुछ समय तक मेरी सांसें दम फूलने जैसी आती-जाती रहीं। मेरे हाथ-पांव लकवे की-सी स्थिति में थे। मैं वहाँ गतिहीन पड़ी थी, अपनी ही सायास ली गयी सांसों की आवाज़ सुनती हुई, मानो मैं एक विशाल गुफा में पूरी लंबाई में पसरी हुई थी।
"यह बस एक स्वप्न था," मैंने स्वयं से कहा और अपनी सांसों के शांत होने की प्रतीक्षा करने लगी। अपनी पीठ के बल अकड़ी लेटी हुई। मैंने अपने हृदय को अत्यंत तीव्रता से काम करते महसूस किया, मेरे फेफड़े बड़े और धीमे, भाथी जैसे, संकुचन के साथ उस तक रक्त पहुँचा रहे थे। मैं आश्चर्य करने लगी कि उस वक्त क्या समय हुआ होगा। मैं अपने तकिए के पास रखी घड़ी देखना चाहती थी, लेकिन मैं अपना सिर पर्याप्त रूप से मोड़ नहीं पायी। उसी समय मुझे लगा कि मुझे अपने बिस्तर के पैताने किसी चीज की एक झलक मिली है, कुछ अस्पष्ट सी काली छाया। मेरी सांस अटक गई। मेरा हृदय, मेरे फेफड़े, मेरे भीतर की हर एक चीज एक क्षण में जम सी गयी महसूस हुई। मैंने काली छाया को देखने का प्रयास किया।
जिस क्षण मैंने उस पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयत्न किया, छाया ने एक निश्चित आकार ग्रहण करना प्रारंभ कर दिया मानो वह मेरे उस पर ध्यान देने की प्रतीक्षा कर रही थी। उसकी रूप-रेखा स्पष्ट हो गयी और उसका भौतिक आकार और विवरण दिखने लगे। वह एक कृशकाय वृद्ध था जो कसी हुई काली कमीज पहने हुए था। उसके बाल भूरे और छोटे थे और उसके गाल धंसे हुए थे। वह मेरे पैरों के पास पूर्णतः स्थिर खड़ा था। उसने कहा कुछ नहीं लेकिन उसकी भेदती हुई आँखें मुझे ही घूर रही थीं। वे काफी बड़ी आंखें थीं और मैं उनमें फैले नसों के रक्तिम जाल को देख सकती थी। वृद्ध व्यक्ति के चेहरे पर एकदम कोई भाव नहीं थे। उसने मुझसे कुछ नहीं कहा। वह अंधकार में किसी खुले विवर की भांति था।
अब वह स्वप्न नहीं रह गया था। मैं जानती थी, स्वप्न से तो मैं पहले ही जाग चुकी थी। और केवल हल्के से जागी हुई लेकिन अपनी आँखें पूरी तरह खोले हुए। यह वास्तविकता थी। और वास्तविकता में एक वृद्ध, जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था, मेरे बिस्तर के पैताने खड़ा था। मुझे कुछ करना था—बत्तियाँ जलाना, अपने पति को जगाना, चीखना। मैंने हिलना चाहा। मैंने अपने अंगों में गति के लिए संघर्ष किया किंतु इसका कुछ लाभ न हुआ। मैं एक उंगली भी न हिला सकी। जब मुझे यह स्पष्ट हो गया कि मैं कभी भी अपने अंगों को हिला पाने में समर्थ नहीं हो पाऊंगी, मैं एक निराशाजनक आतंक से घिर गई थी। एक आदिम भय जिसका अनुभव मुझे पहले कभी नहीं हुआ था, एक ठंडी लहर जो स्मृतियों के कुएं की अंतहीन गहराई से खामोशी से उठती है। मैंने चीखने का प्रयत्न किया, किंतु कोई आवाज उत्पन्न कर पाने में, अथवा अपनी जीभ तक हिला पाने में असफल रही। मैं केवल उस वृद्ध व्यक्ति को देख सकती थी।
अब मैंने देखा कि वह कोई चीज लिए हुए था—एक लंबी, संकरी, गोल सी चीज जो श्वेत चमक लिए थी। जैसे ही मैंने, आश्चर्य करते हुए कि यह वस्तु क्या हो सकती थी, उसे घूरना प्रारंभ किया, वह एक निश्चित आकार ग्रहण करने लगी, बिलकुल वैसे ही जैसे पहले छाया के संदर्भ में हुआ था। यह एक घड़ा था, एक पुराने ढंग का चीनी मिट्टी का घड़ा। कुछ समय पश्चात, आदमी ने घड़े को ऊंचा उठाया और उससे मेरे पैरों पर पानी उड़ेलने लगा। मैं पानी को महसूस नहीं कर पा रही थी। मैं इसे देख सकती थी और अपने पैरों पर गिरते हुए इसकी आवाज़ सुन सकती थी, मगर मुझे किसी चीज की अनुभूति नहीं हो पा रही थी।
वृद्ध व्यक्ति निरंतर मेरे पैरों पर पानी गिराता रहा। विचित्र बात यह थी कि वह चाहे जितना भी पानी गिराता लेकिन घड़ा कभी खाली नहीं हुआ। मुझे चिंता होने लगी कि अंत में मेरे पैर सड़ कर गल जाएंगे। हाँ, निश्चय ही, वे सड़ जाएंगे। जब इतना पानी उन पर पड़ेगा तो वे क्या करेंगे? जब मुझे ध्यान आया कि मेरे पैर सड़ कर गल जायेंगे, मुझ से और सहन कर पाना संभव नहीं हुआ।
मैंने अपनी आँखें बंद की और इतना जोर से चीखी कि इसमें मेरी शक्ति की एक-एक बूंद लग गयी। किन्तु वह चीख कभी भी मेरी देह से दूर नहीं गयी। यह बिना आवाज के मेरे भीतर प्रतिध्वनित होती रही, मुझे चीरती हुई-सी, मेरे ह्रदय को बंद करती हुई। ज्यों ही मेरी चीख ने मेरी एक-एक कोशिका में प्रवेश किया, मेरे मस्तिष्क में सब कुछ सफ़ेद हो गया। मेरे भीतर कुछ मर गया। एक कंपकपाता शून्य छोड़ कर कुछ पिघल गया। एक विस्फोटक लपट हर उस चीज को जलाने लगी जिस पर मेरा अस्तित्व निर्भर था।
जब मैंने अपनी आँखें खोली, वृद्ध व्यक्ति जा चुका था। घड़ा तिरोहित हो चुका था। बिस्तर की चादर सूखी हुई थी और इस बात के कोई चिह्न नहीं थे कि मेरे पैरों के पास की कोई चीज भीगी हुई थी। यद्यपि मेरी देह पसीने से भीगी हुई थी, पसीने की डरावनी मात्रा, उससे भी अधिक पसीना जितना मैंने कभी कल्पना भी की हो कि मानव शरीर से निकल सकता है। फिर भी, मैं इस बात से इनकार नहीं कर सकती कि यह पसीना ही था जो मेरे शरीर से निकल आया था।
मैंने एक उंगली हिलाई। फिर एक और, फिर एक और, और फिर बाकी सारी। फिर मैंने अपनी बांहें मोड़ी, फिर अपने पैर। मैंने अपने पैर घुमाए फिर अपनी कुहनियाँ। कुछ भी उस तरह नहीं गतिशील हुआ जैसे होना चाहिए लेकिन कम से कम हुआ तो। यह अच्छी तरह जांचने के पश्चात् कि मेरे शरीर के सभी अंग ठीक से काम कर रहे हैं, मैं आराम से बैठने की मुद्रा में आ गयी। नाइट लैम्प से निकलती मद्धिम रोशनी में मैंने एक कोने से दूसरे कोने तक पूरे कमरे का जायजा लिया। वृद्ध व्यक्ति निश्चय ही वहाँ नहीं था।
मेरे तकिए के पास की घड़ी के अनुसार बारह बज कर तीस मिनट हुए थे। मुझे सोए हुए मात्र डेढ़ घंटे हुए थे। मेरे पति अपने बिस्तर में गाढ़ी नींद में सोए हुए थे। उनका सांस लेना तक सुनाई नहीं पड़ रहा था। वे हमेशा ऐसे ही सोते हैं, जैसे उनकी सारी मानसिक क्रियाएं विलुप्त हो चुकी हों। लगभग कोई भी चीज उन्हें नहीं जगा सकती थी।
मैं बिस्तर से उठ कर बाथरूम गयी। मैंने अपना पसीने से भीगा हुआ नाइट गाउन वाशिंग मशीन में फेंक दिया और स्नान किया। दूसरा पजामा पहनने के बाद मैं ड्रॉइंग रूम में गयी, सोफे के पास का फ्लोर लैम्प जलाया और वहाँ बैठ कर ब्रांडी का पूरा ग्लास पीने लगी। यद्यपि मैं कभी-कभार ही पीती हूँ। इसलिए नहीं कि मुझे एल्कोहल से कोई शारीरिक असंगति है, जैसी कि मेरे पति को है। वास्तव में, मैं कभी काफी मात्रा में ड्रिंक किया करती थी, लेकिन उनसे विवाह करने के पश्चात मैंने पीना एकदम बंद कर दिया। कभी जब मुझे सोने में समस्या होती तब मैं ब्रांडी के एक दो घूंट ले लेती थी लेकिन उस रात को मुझे अपनी अत्यधिक तनावपूर्ण तंत्रिकाओं को शांत करने हेतु पूरे एक ग्लास ब्रांडी की जरूरत महसूस हुई।
घर में एल्कोहल के नाम पर मात्र रेमी मार्टिन की एक बोतल थी जिसे हम बगल वाली अलमारी में रखते थे। इसे किसी ने उपहार दिया था। यह इतनी पुरानी बात है कि मुझे यह भी स्मरण नहीं कि इसे किसने दिया था। बोतल पर धूल की एक हल्की परत जमी थी। हमारे पास ब्रांडी के सही सही ग्लास भी नहीं थे इसलिए मैंने इसे सामान्य ग्लास में उड़ेला और धीरे-धीरे घूँट भरने लगी।
मैं निश्चय ही सम्मोहन में रही थी, मैंने सोचा। मैंने ऐसी बात पहले कभी अनुभव नहीं की थी लेकिन मैंने कालेज की एक मित्र से, जो ऐसे ही एक दौर से गुजर चुकी थी, सम्मोहन के बारे में सुना था। उसने बताया था कि सब कुछ अविश्वसनीय रूप से स्पष्ट था। आप विश्वास नही कर सकते थे कि यह एक स्वप्न था। "मुझे विश्वास नहीं हुआ कि यह एक स्वप्न था, जब यह घटित हो रहा था। और अब भी मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि वह एक स्वप्न था।" बिलकुल ऐसा ही है जैसा मैंने महसूस किया। निश्चित रूप से यह एक स्वप्न होना चाहिए—इस प्रकार का स्वप्न जो स्वप्न जैसा नहीं महसूस होता।
यद्यपि मैं धीरे-धीरे भय से मुक्त हो रही थी लेकिन मेरी देह का कंपन नहीं रुक रहा था। यह मेरी त्वचा में था, भूकंप के पश्चात जल में उठती वृत्ताकार लहरों की भांति। मैं हल्का स्पंदन देख सकती थी। ऐसा चीख के कारण हुआ था। चीख, जिसे कभी कोई आवाज़ नहीं मिल पायी, मेरी देह में कैद थी और यह कंपन उसी के कारण था।
मैंने अपनी आँखें बंद की और ब्रांडी का एक और घूँट लिया। गर्माहट मेरे गले से पेट तक फैल गयी। यह सनसनी एकदम वास्तविक महसूस हुई।
प्रारंभ में मैंने अपने बेटे के बारे में सोचा। मेरा हृदय फिर जोर से धड़कने लगा। मैं सोफे पर से उसके कमरे की ओर भागी। वह गहरी नींद में सोया हुआ था, एक हाथ अपने मुंह पर रखे और दूसरा बगल में फैलाये हुए, नींद में उतना ही शांत और सुरक्षित दिखता हुआ जितना मेरे पति। मैंने उसका कंबल ठीक किया। यह जो भी था, जिसने मेरी नींद को इस प्रकार चूर चूर कर दिया, उसने केवल मुझे आक्रांत किया था। उन दोनों ने कुछ भी महसूस नहीं किया था।
मैं वापस ड्राइंगरूम में लौट आयी और यहाँ-वहाँ भटकती रही। मुझे बिलकुल नींद नहीं आ रही थी।
मैंने एक गिलास ब्रांडी और पीने के बारे में सोचा। मैं उससे भी अधिक एल्कोहल पीना चाह रही थी। मैं अपनी तंत्रिकाओं को शांत करने हेतु और मजबूत महसूस करने हेतु अपनी देह को ऊष्मा प्रदान करना चाह रही थी। कुछ हिचकिचाहट के पश्चात, मैंने इसके विरुद्ध निर्णय लिया। मैं अगला दिन पियक्कड़ों की भांति नहीं शुरू करना चाहती थी। मैंने ब्रांडी दराज में रख दी, ग्लास किचन सिंक में ले जाकर धो दिया। फ्रिज में कुछ स्ट्रॉबेरीज थी, मैं उन्हें खाती रही।
मैंने महसूस किया कि मेरी त्वचा से कंपकपी अब लगभग समाप्त हो चुकी थी।
काले कपड़ों में वह वृद्ध व्यक्ति क्या था।? मैंने खुद से पूछा। मैंने उसे अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा था। उसके काले कपड़े कितने विचित्र थे। जैसे कसे हुए तैराकी के वस्त्र हों, और वह भी पुराने फैशन के। मैंने उस जैसा कुछ पहले कभी नहीं देखा था। और वे आँखें—रक्तिम और पलकें न झपकाती हुईं। वह कौन था? उसने मेरे पैरों पर पानी क्यों डाला? वह इस तरह की बात क्यों कर रहा था ?
मेरे पास केवल प्रश्न थे, कोई उत्तर नहीं।
जिस समय मेरी मित्र सम्मोहन में गयी थी, वह अपने मंगेतर के घर रात बिता रही थी। जब वह बिस्तर में सो रही थी, एक क्रोधित-सा दिखता व्यक्ति, जिसकी उम्र पचास के आस-पास रही होगी, आया और उसे घर से बाहर निकल जाने का आदेश दिया। जिस समय यह घटित हो रहा था, वह भी अपनी एक भी मांसपेशी नहीं हिला सकी थी। और मेरी ही तरह वह भी पसीने से भीग गयी थी। उसे निश्चय था कि यह उसके मंगेतर के पिता का भूत था जो उसे अपने घर से बाहर चले जाने को कह रहा था। लेकिन जब अगले दिन उसने देखने के लिए उनकी एक तस्वीर मांगी, वह पूरी तरह एक अलग ही व्यक्ति निकला। “मैं तनाव महसूस कर रही होऊंगी,” उसने निष्कर्ष निकाला, “उसी के कारण ऐसा हुआ होगा।”
लेकिन मैं तनाव में नहीं थी। और यह मेरा अपना घर है। यहाँ ऐसी कोई चीज मुझे धमकाने के लिए नहीं हो सकती। फिर मैं क्यों सम्मोहन में गयी?
मैंने सर को झटका दिया, “सोचना बंद करो,” मैंने स्वयं से कहा। इससे कोई लाभ नहीं होगा। मुझे एक अधिक वास्तविक-सा स्वप्न आया था, और कुछ नहीं। मुझे संभवतः किसी प्रकार की थकान हो रही थी। दो दिन पहले मैंने जो टेनिस खेली थी, उसी से ऐसा हुआ होगा। तैरने के पश्चात् क्लब में मेरी भेंट एक मित्र से हो गयी और उसने मुझे टेनिस खेलने के लिए आमंत्रित किया। मैं कुछ ज्यादा ही देर तक खेलती रही थी। बस और कुछ नहीं। निश्चय ही—बाद में कुछ देर मेरी बांहें और पैर थके-थके और भारी महसूस होते रहे थे।
जब मैंने स्ट्रॉबेरीज़ समाप्त कर लीं, मैं सोफे पर लेट गयी और अपनी आँखें बंद करने का प्रयत्न किया।
मुझे बिलकुल नींद नहीं आ रही थी। “ओह, बहुत बढ़िया,” मैंने सोचा “मैं वाकई सोने जैसा नहीं महसूस कर रही हूँ।”
मैंने सोचा कि जब तक मैं फिर से थक नहीं जाती, मैं कोई किताब पढूंगी। मैं शयन कक्ष में गयी और बुक शेल्फ से एक उपन्यास छांटा। जब मैंने किताब खोजने के लिए बत्ती जलाई, मेरे पति हिले तक नहीं। मैंने ‘अन्ना कैरिनीना’ चुनी। मैं कोई बड़ा रशियन उपन्यास पढ़ने के मूड में थी और मैंने ‘अन्ना कैरिनीना’ मात्र एक बार पढ़ी थी, बहुत पहले, संभवतः जब हाईस्कूल में थी। मुझे इसके बारे में बस कुछ एक बातें ही स्मरण थी : पहली पंक्ति—“सभी खुश परिवार एक जैसे होते हैं, जबकि सभी दुखी परिवार अपने-अपने कारणों से दुखी होते हैं।” अंत में ट्रेन के नीचे कूद जाना। और यह भी कि उपन्यास के प्रारम्भ में ही आखिर में घटित होने वाली आत्महत्या का एक संकेत था। क्या एक ट्रेन ट्रैक का दृश्य नहीं था? या वह दृश्य किसी और उपन्यास में था?
जो भी रहा हो। मैं वापस सोफे पर गयी और किताब खोली। कितने वर्ष हो गए जब मैं इस तरह किसी पुस्तक के साथ आराम से बैठी थी। सच है कि मैं कभी-कभार एकाध घंटे का अपना अपराह्न का निजी समय किसी पुस्तक को खोले हुए बिताती थी। लेकिन आप उसे वास्तव में पढ़ना नहीं कह सकते। मैं स्वयं को अन्य बातें सोचता हुआ पाती थी—मेरा बेटा, खरीददारी, अथवा फ्रीजर की मरम्मत अथवा किसी रिश्तेदार के विवाह में पहनने हेतु कुछ तलाशने की बात, अथवा पिछले महीने हुआ मेरे पिता के पेट का ऑपरेशन। इसी तरह की बातें मेरे मस्तिष्क में आती रहतीं और फैल कर लाखों अलग-अलग दिशाओं में चली जातीं। कुछ समय बाद मैं देखती कि यदि कोई चीज हुई है तो यह कि समय भर बीता है, और मैंने मुश्किल से ही कोई पन्ना पलटा है।
बिना इस बात पर ध्यान दिए, मैं बिना पुस्तकों वाले इस जीवन की आदी हो गयी थी। जब मैं युवा थी, पढ़ना मेरे जीवन का केंद्र-बिंदु था। मैंने अपनी स्कूल के पुस्तकालय की हर किताब पढ़ी थी और लगभग अपना पूरा जेबखर्च किताबों पर खर्च करती थी। मैं जिन किताबों को पढ़ना चाहती थी उन्हें खरीदने हेतु कई बार लंच नहीं करती थी। और यह सिलसिला जूनियर स्कूल और हाई-स्कूल तक चलता रहा। कोई उतना नहीं पढ़ता था जितना मैं पढ़ती थी। मैं पांच बच्चों में बीच की थी और मेरे माता-पिता दोनों काम करते थे। इसलिए कोई मुझ पर बहुत ध्यान नहीं देता था। मैं अकेले जितना चाहती, पढ़ सकती थी। मैं हमेशा किताबों के लिए निबंध प्रतियोगिताओं में भाग लेती थी ताकि मैं और किताबों के लिए उपहार प्रमाण-पत्र जीत सकूँ। और मैं अक्सर विजयी होती थी। मैंने पढाई की थी और स्नातक स्तर पर कैथरीन मेंसफील्ड पर मेरे शोध को सर्वश्रेष्ठ सम्मान प्राप्त हुआ था और मेरे शोध विशेषज्ञ ने मुझे ग्रेजुएट स्कूल के लिए आवेदन करने को प्रेरित किया था। यद्यपि मैं बाहर की दुनिया में जाना चाहती थी और मैं जानती थी कि मैं कोई स्काॅलर नहीं हूँ। मुझे बस पुस्तकें पढ़ने में आनंद आता था। और यदि मैं आगे पढ़ना भी चाहती तो परिवार की आर्थिक हैसियत मुझे ग्रेजुएट स्कूल में भेजने की नहीं थी। हम किसी मायने में गरीब नहीं थे लेकिन मेरे बाद भी दो बहनें थी। इसलिए एक बार काॅलेज से स्नातक हो जाने के पश्चात् मुझे अपने लिए स्वयं काम करना था।
मैंने वास्तव में आखिरी पुस्तक कब पढ़ी थी? और वह क्या थी? मुझे कुछ भी स्मरण नहीं था। किसी व्यक्ति का जीवन क्यों ऐसे पूरी तरह बदल जाता है? पुरानी मैं कहाँ चली गयी जो इस तरह पुस्तकें पढ़ती थी मानों उनके वशीभूत हो? वे क्या दिन थे—और वह गहन जूनून—उसका मेरे लिए क्या अर्थ था?
उस रात मैंने अपने को पूरी एकाग्रता से ‘अन्ना कैरिनीना’ पढ़ पाने में सक्षम पाया। मैं एक के बाद एक पन्ने पलटती रही, मस्तिष्क में बिना किसी अन्य विचार के। एक ही बैठक में मैं उस दृश्य तक पढ़ गयी जहाँ अन्ना और व्रोन्स्की एक दूसरे को रेलवे स्टेशन पर पहली बार देखते हैं। उस बिंदु पर मैंने बुकमार्क लगाया और अपने लिए ग्लास में और ब्रांडी उड़ेली।
यद्यपि यह मुझे पहले नहीं लगा था, मैं अपने को यह सोचने से नहीं रोक पा रही थी कि यह कैसा विचित्र उपन्यास था। आप नायिका अन्ना को अध्याय 18 के पहले नहीं देखते हैं। मुझे आश्चर्य हुआ कि क्या यह टॉल्स्टोय के समय में पाठकों को असामान्य नहीं लगता था। वे क्या करते थे जब पुस्तक में लगातार एक अपेक्षाकृत छोटे चरित्र ओब्लोंस्की के जीवन के बारे में विस्तार से विवरण दिया जाता रहता था—केवल बैठे हुए खूबसूरत नायिका के प्रगट होने की प्रतीक्षा करते रहते थे? हो सकता है ऐसा ही रहा हो। हो सकता है, उस समय लोगों के पास ढेरों समय व्यर्थ बिताने के लिए रहता रहा हो—कम से कम समाज के उस हिस्से के पास जो उपन्यास पढ़ता था।
फिर मैंने ध्यान दिया कि उस समय तक कितनी देर हो चुकी थी। सुबह के तीन बजे थे ! और मेरी आँखों में नींद नहीं थी।
मुझे क्या करना चाहिए? मुझे नींद बिलकुल नहीं आ रही थी, मैंने सोचा। मैं यूँ ही पढ़ना जारी रख सकती हूँ। मुझे यह जानना अच्छा लगेगा कि कहानी में आगे क्या हुआ। लेकिन मुझे सोना था।
मुझे अनिद्रा रोग से अपना संघर्ष याद था और उस समय मेरा प्रत्येक दिन किस प्रकार बीता था यह एक बादल से ढंका हुआ था। नहीं, फिर कभी नहीं। उस समय मैं बस एक छात्रा थी। ऐसी किसी चीज से बच निकलना तब मेरे लिए संभव था। अब मैं एक पत्नी हूँ। एक माँ। मेरी जिम्मेदारियां हैं। मुझे अपने पति के लिए लंच बनाना है और अपने बेटे की देखभाल करनी है।
लेकिन यदि मैं अभी बिस्तर में जाऊं भी तो मैं जानती हूँ कि मैं एक क्षण भी सो पाने में सक्षम नहीं होऊंगी।
मैंने अपने सिर को झटका दिया।
“आओ अब इसका सामना करें, मुझे नींद नहीं आ रही है”, मैंने स्वयं से कहा। और मैं किताब का शेष हिस्सा पढ़ना चाह रही थी।
मैंने एक गहरी साँस ली और मेज पर रखी विशाल किताब पर एक नजर डाली। और बस फिर क्या था। मैं फिर ‘अन्ना कैरिनीना में छलांग लगा गयी और तब तक पढ़ती रही जब तक सूरज नहीं चढ़ आया। अन्ना और व्रोन्स्की ने नृत्य के समय एक-दूसरे की ओर देखा और अपने दुर्भाग्यपूर्ण प्रेम में पड़ गए। जब व्रोन्स्की का घोड़ा घुड़दौड़ के दौरान गिर गया, अन्ना का ह्रदय चूर-चूर हो गया (तो आखिरकार, घुड़दौड़ का भी एक दृश्य था!) और उसने अपने पति के समक्ष अपनी बेवफाई स्वीकार कर ली। मैं उस समय व्रोन्स्की के साथ थी जब उसने बाधा पार करने हेतु अपने घोड़े को एड़ लगायी थी। मैंने भीड़ को उसका उत्साहवर्धन करते हुए सुना। और वहाँ दर्शक-दीर्घा में खड़ी उसके घोड़े को गिरते हुए देख रही थी। जब सुबह के प्रकाश से खिड़कियां चमकने लगीं, मैंने किताब को नीचे रखा और एक कप कॉफी के लिए किचन में चली गयी। मेरा मस्तिष्क उपन्यास के दृश्यों और तीव्र भूख से भरा हुआ था, किसी भी अन्य विचार को आच्छादित करते हुए। मैंने ब्रेड के दो टुकड़े काटे और उन पर मक्खन और मस्टर्ड सॉस लगाई और एक चीज़ सैंडविच बना ली। मेरी भूख की पीड़ा लगभग असहनीय थी। मेरे लिए इस तरह की भूख का अनुभव नया-सा था। मुझे सांस लेने में मुश्किल हो रही थी, मैं इतनी भूखी थी। एक सैंडविच से मुश्किल से ही मेरा कुछ हो पाया इसलिए मैंने एक और सैंडविच बनाई और उसके साथ एक कप कॉफी भी।
अपने पति को मैंने अपने सम्मोहन अथवा रात भर बिना नींद के रहने के बारे में कुछ नहीं बताया। इसलिए नहीं कि मैं यह सब उनसे छिपा रही थी, बल्कि बस इसलिए कि मुझे लगा कि यह सब उन्हें बताने का कोई अर्थ नहीं है। इससे क्या फायदा हुआ होता? और मैं बस एक रात सोई ही तो नहीं थी। इतना तो सबके साथ अक्सर होता रहता है।
मैंने अपने पति के लिए सामान्य रूप से एक कप कॉफी बनाई और अपने बेटे को एक गिलास गर्म दूध दिया। मेरे पति ने टोस्ट खाया और मेरे बेटे ने एक कटोरी कॉर्न फ्लेक्स। मेरे पति ने अखबार पर एक सरसरी नजर डाली और मेरा बेटा एक नया गीत, जो उसने अपने स्कूल में सीखा था, गुनगुनाता रहा। वे दोनों सेन्त्रा में सवार हुए और चले गए। "ध्यान रखना" मैंने अपने पति से कहा। "चिंता मत करो," उन्होंने जवाब दिया। उन दोनों ने हाथ हिलाए। एक सामान्य सुबह।
उनके चले जाने के पश्चात मैं सोफे पर बैठ गयी और सोचने लगी कि बाकी दिन कैसे बिताया जाय। मुझे क्या करना चाहिए? मैं किचन में फ्रिज में क्या-क्या है, यह देखने गयी। बिना खरीदारी के मेरा काम चल सकता था। हमारे पास ब्रेड, दूध और अंडे थे और फ्रीजर में मांस भी था। ढेर सारी सब्जियां भी। कल के लंच तक मुझे जिन चीजों की जरूरत होगी, वह सब कुछ।
मुझे बैंक में कुछ काम था पर वह ऐसा कुछ नहीं था जिसे मुझे आज ही करना आवश्यक हो। इसे बिना किसी हानि के एक दिन आगे टाला जा सकता था।
मैं वापस सोफे पर आ गयी और "अन्ना कैरिनीना" का शेष भाग पढ़ने लगी। उस पाठ के पूर्व तक मुझे भान भी नहीं था कि पुस्तक में क्या कुछ होता है। इसका कितना कम अंश मुझे स्मरण था। मैंने वास्तव में लगभग किसी चीज को नहीं पहचाना—चरित्र, दृश्य, कुछ भी नहीं। मैं संभवतः एक नई पुस्तक भी पढ़ रही हो सकती थी। कितना विचित्र। उस समय मैं बहुत भावुक हो गयी हो सकती थी जब मैंने इसे पहली बार पढ़ा था, किंतु अब कुछ नही बचा था। बिना मेरे ध्यान दिए, कंपकपाने और भावनाओं के ज्वार की सारी स्मृतियाँ दूर जाकर विलुप्त हो चुकी थीं।
फिर विगत में मैंने समय की जो विपुल राशि किताबें पढ़ने में प्रयोग की, उसका क्या? उस सबका क्या अर्थ था?
मैंने पढ़ना बंद कर दिया और थोड़ी देर इस बारे में सोचती रही। लेकिन मेरे इस सबका मेरे लिए कोई अर्थ नहीं निकला और शीघ्र ही मैं किस बारे में सोच रही थी, यह भी भूल गयी। मैंने अपने को खिड़की के बाहर खड़े पेड़ों को देखते हुए पाया। मैंने अपने सिर को झटका दिया और वापस किताब पढ़ने लगी।
तीसरे खंड के तुरंत बाद, मैंने पन्नों के मध्य फंसे टूटते हुए चॉकलेट के कुछ टुकड़े पाए। मैं जब हाईस्कूल में थी तब "अन्ना कैरिनीना" पढ़ते हुए मैं जरूर चॉकलेट खा रही होऊंगी जैसा मैं उस समय किया करती थी। मुझे लगा मैं इसको पाए बिना एक क्षण भी नहीं रह सकती थी। मेरी देह की एक-एक कोशिका चॉकलेट की इस भूख से हाँफती-सी लग रही थी।
मैंने एक कार्डिगन अपने कंधों पर डाला और नीचे जाने को लिफ्ट में घुस गई। मैं सीधे पड़ोस की कैंडी शॉप में गयी और सबसे मीठी दिखती दो मिल्क चॉकलेट, जो उनके पास थी, खरीदी। जैसे ही मैं दुकान से बाहर आई, मैंने एक को खोल लिया और घर लौटते हुए उसे खाना शुरू कर दिया। मिल्क चॉकलेट का मधुर स्वाद मेरे मुंह में फैल गया। मैं अपने शरीर के हरेक भाग द्वारा सीधे उस मधुरता को ग्रहण करते हुये महसूस कर सकती थी। मैंने लिफ्ट में भी खाना जारी रखा, उस आश्चर्यजनक सुगंध में भीगते हुए जो उस छोटी सी जगह में भर गई थी।
सीधे सोफे पर जा कर, मैंने ‘अन्ना कैरिनीना’ पढ़ना और चॉकलेट खाना प्रारम्भ कर दिया। मुझे नींद आती बिलकुल नहीं महसूस हो रही थी। मुझे कोई शारीरिक थकान भी नहीं महसूस हो रही थी। मैं सदैव के लिए पढ़ना जारी रख सकती थी। जब मैंने पहला चॉकलेट समाप्त कर लिया, मैंने दूसरा चॉकलेट खोला और उसका भी आधा हिस्सा खा गयी। खंड तीन का लगभग दो तिहाई हिस्सा समाप्त कर लेने के पश्चात् मैंने घडी देखी। ग्यारह चालीस।
ग्यारह चालीस !
मेंरे पति जल्दी ही घर आ जाएंगे। मैंने किताब बंद की और किचन में चली गयी। मैंने एक बर्तन में पानी रखा और गैस चालू कर दी। मैंने थोड़े से हरे प्याज काटे और गेंहूं के नूडल्स को उबलने के लिए रख दिया। जब तक पानी गर्म हो रहा था, मैंने थोड़े सूखे समुद्री शैवाल भिगो दिए। उन्हें काटा और उन पर थोड़ा सा सिरका छिड़क दिया। मैंने रेफ्रीजरेटर से टोफू का एक टुकड़ा लिया और उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काट डाला। आखिर में मैं बाथरूम गयी और चॉकलेट की महक से मुक्ति पाने के लिए अपने दांतों को ब्रश किया।
बिलकुल उसी क्षण जब पानी में उबाल आया, मेरे पति भीतर आये। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपना काम सामान्य समय से थोड़ा पहले ही पूरा कर लिया था।
हमने साथ साथ सी वीड (शैवाल) नूडल्स खाये। मेरे पति ने एक नए तरह के दन्त उपकरण, जिसे वह अपने क्लिनिक में लेने के लिए सोच रहे थे, के बारे में बात की। यह मशीन लोगों के दांतों की गंदगी, मेरे पति द्वारा अब तक उपयोग किये गए किसी भी उपकरण के मुकाबले, अधिक बेहतर तरीके से साफ करती और वह भी कम समय में। इस तरह के अन्य उपकरणों की भांति, यह काफी महँगा था। किन्तु इस पर खर्च राशि जल्दी ही वसूल हो जाती क्योकि आजकल अधिकतर मरीज केवल दांतों की सफाई के लिए आ रहे थे।
“तुम क्या सोचती हो ?” उन्होंने मुझ से पूछा।
मैं लोगों के दांतो की गंदगी के सम्बन्ध में नहीं सोचना चाहती थी और विशेष रूप से मैं इसके बारे में उस समय नहीं सुनना चाह रही थी जब मैं खाना खा रही थी। मेरा मस्तिष्क व्रोन्स्की की घोड़े से गिरती हुई छवियों से ओत-प्रोत था। लेकिन निश्चय ही मैं अपने पति से नहीं कह सकती थी। वह उस उपकरण के सम्बन्ध में अत्यधिक गंभीर थे। मैंने उनसे इसकी कीमत के बारे में पूछा और इसके बारे में सोचने का अभिनय किया। “यदि तुम्हें इसकी आवश्यकता है तो खरीद क्यों नहीं लेते?” मैंने कहा, “पैसे का इंतजाम किसी न किसी तरह हो ही जायेगा। कोई तुम इसे मजे के लिए तो खर्च कर नहीं रहे हो।”
“यह सही है” उन्होंने कहा, “मैं इसे मजे के लिए खर्च नहीं करूँगा।” फिर उन्होंने चुपचाप नूडल्स खाना जारी रखा।
खिड़की के बाहर एक वृक्ष की डाल पर बैठे दो पक्षी चहचहा रहे थे। मैंने उन्हें अर्धचैतन्य अवस्था में देखा। मुझे नींद नहीं महसूस हो रही थी। मैं बिलकुल भी नींद नहीं महसूस कर रही थी। क्यों नहीं कर रही थी?
जब मैंने टेबल साफ की, मेरे पति सोफे पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। ‘अन्ना कैरिनीना’ उनकी बगल में पड़ी हुई थी लेकिन उन्होंने शायद उसे नोटिस नहीं किया। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि मैं कौनसी किताबे पढ़ती हूँ।
जब मैंने प्लेटें धोने का काम पूरा कर लिया, मेरे पति ने कहा “मेरे पास आज एक शानदार सरप्राइज है। तुम्हारे विचार से यह क्या हो सकता है?”
"मैं नहीं जानती,” मैंने कहा।
“अपराह्न के मेरे पहले मरीज ने एपॉइंमेंट रद्द करा दिया है मुझे डेढ़ बजे से पहले ऑफिस पहुंचने की जल्दी नहीं है।” वे मुस्कुराए।
मैं समझ नहीं पायी कि इस बात में सरप्राइज जैसी कौन सी बात है। मुझे आश्चर्य हुआ कि मैं ऐसा क्यों नहीं समझ पायी।
तब जब मेरे पति खड़े हो गए और मुझे बेडरूम की तरफ खींचने लगे तब मुझे इस बात का भान हुआ कि उनके दिमाग में क्या था। मेरा इसके लिए बिलकुल मूड नहीं था। मैं नहीं समझ पायी कि मुझे उस समय क्यों सेक्स करना चाहिए। मैं बस वापस अपनी किताब पढ़ने जाना चाहती थी। मैं वापस सोफे पर लेट कर ‘अन्ना कैरिनीना’ के पन्ने पलटते हुए चॉकलेट खाना चाह रही थी। पूरे समय जब मैं प्लेटें धो रही थी, मेरा ध्यान व्रोन्स्की और इस बात पर था कि टॉल्स्टोय जैसे लेखक ने कैसी कुशलता से अपने चरित्रों को नियंत्रित किया था। उन्होंने उनका वर्णन कितनी आश्चर्यजनक सूक्ष्मता से किया था। किन्तु उस सूक्ष्म विवरण ने उन्हें किसी प्रकार की मुक्ति से महरूम कर दिया था। और आखिर में—
मैंने अपनी ऑंखें बंद की और अपनी उंगलियों से कनपटी दबायी।
“माफ करो, आज मुझे पूरा दिन सिर में दर्द सा रहा है। इसे भी इसी समय होना था।”
मुझे कभी-कभी सचमुच बहुत तीव्र सिर दर्द होता था, इसलिए उन्होंने मेरा स्पष्टीकरण बिना कुछ कहे स्वीकार कर लिया।
“बेहतर है तुम लेट जाओ और थोड़ा आराम करो,” उन्होंने कहा, “तुम काफी अधिक काम करती रही हो।”
“यह उतना बुरा नहीं है,” मैंने कहा।
वे एक बजे तक सोफे पर, संगीत सुनते और अखबार पढ़ते हुए आराम करते रहे। वे फिर दांतों के उपकरण के बारे में बात करते रहे। आप नया हाई-टेक उपकरण खरीदते हैं और यह दो या तीन वर्ष में बेकार हो जाता है… इसलिए आपको हर चीज निरंतर बदलते रहनी पड़ती है। इससे किसी को लाभ होता है तो बस उपकरण निर्माताओं को—इसी तरह की बातें। मैंने एकाध बार हाँ हूँ की लेकिन मैं मुश्किल से ही सुन रही थी।
मेरे पति के वापस क्लीनिक जाने के पश्चात् मैंने सोफे को तब तक थपथपाया जब तक वह फिर से अपने पुराने आकार में नहीं आ गया। फिर मैं खिड़की पर झुक गयी और मैंने कमरे पर एक नजर डाली। मैं समझ नहीं पायी कि क्या हो रहा है। मुझे नींद क्यों नहीं आ रही है? पहले मैं कई बार सारी सारी रात नहीं सोई थी लेकिन मैं लगातार इतने समय तक पहले कभी जागती नहीं रही थी। साधारणतया इतने लंबे समय तक जागने के पश्चात् मैं गहरी नींद सो जाया करती थी अथवा न सो पाने पर बुरी तरह थकी होती थी। लेकिन मुझे बिलकुल नींद नहीं आ रही थी। मेरा मस्तिष्क एकदम साफ था।
मैं किचन में गयी और मैंने थोड़ी कॉफी गरम की। अब मुझे क्या करना चाहिए? निश्चय ही मैं ‘अन्ना कैरिनीना’ का शेष भाग पढ़ना चाहती थी लेकिन मैं तैरने के लिए स्वीमिंग पूल तक भी जाना चाहती थी। काफी दुखी होने के पश्चात् मैंने तैरने जाने का निर्णय लिया। मैं नहीं जानती कि मैं इसे कैसे व्याख्यायित करूँ लेकिन मैं कठोर व्यायाम द्वारा अपनी देह का किसी चीज से शुद्धिकरण करना चाहती थी। शुद्धिकरण—किस बात का? मैं कुछ समय तक इसी बात पर आश्चर्यचकित होती रही। किस चीज से शुद्धिकरण।
मैं नहीं जानती थी।
लेकिन यह चीज, यह चाहे जो भी हो, कुहासे जैसी कुछ, मेरी देह के भीतर एक प्रकार के तनाव जैसी लटकी हुई थी। मैं इसे एक नाम देना चाहती थी, लेकिन शब्द मेरे मस्तिष्क तक आने से इनकार कर रहा था। मैं चीजों के लिए सही शब्द खोज पाने में बहुत बुरी थी। मुझे निश्चय था कि टॉल्स्टोय होते तो बिलकुल सही शब्द का चुनाव कर लेते।
किसी तरह, मैंने अपना स्विमसूट बैग में रखा और, हमेशा की भांति, अपनी सिविक ले कर एथलेटिक्स क्लब चली गयी। पूल में मात्र दो व्यक्ति थे—एक युवा आदमी और एक अधेड़ महिला—और मैं उन दोनों में से किसी को नहीं जानती थी। एक बोरियत से भरा लाइफगार्ड ड्यूटी पर मौजूद था।
मैंने स्विमसूट पहना, चश्मा लगाया, और सदैव की तरह तीस मिनट तैरती रही। लेकिन तीस मिनट पर्याप्त नहीं थे। मैं और पंद्रह मिनट तैरती रही। अधिकतम गति से पूरे दो चक्कर जिनका अंत रेंगते हुए हुआ। मेरी साँस उखड़ी हुई थी लेकिन मैं अब भी अपने भीतर उमड़ती ऊर्जा के अतिरिक्त और कुछ नहीं महसूस कर रही थी। जब मैंने पूल छोड़ा, दूसरे लोग मुझे घूर रहे थे।
अभी भी तीन बजने में कुछ समय शेष था। इसलिए मैं बैंक गयी और वहां अपना काम पूरा किया। मैंने सुपर मार्केट से कुछ खरीदारी करने के बारे में सोचा, लेकिन फिर मैंने सीधे घर जाने का निर्णय लिया। वहाँ मैंने ‘अन्ना कैरिनीना’ को जहाँ छोड़ा था, वहाँ से आगे पढ़ना शुरू किया, बचा हुआ चॉकलेट खाते हुए। जब चार बजे मेरा बेटा घर आया, मैंने उसे जूस का एक ग्लास और थोड़ा फ्रूट जिलेटिन, जो मैंने बनाया था, उसे दिया। फिर मैंने डिनर बनाना शुरू किया। मैंने फ्रीजर से निकाल कर थोड़ा मांस डिफ्रॉस्ट किया और तलने के लिए थोड़ी सब्जियां काटी। मिसो सूप बनाया और चावल पकाया। इन सभी कामों को मैंने अत्यधिक तेज यांत्रिक सुगमता से किया।
मैं वापस ‘अन्ना कैरिनीना’ पढ़ने लगी।
मैं थकी हुई नहीं थी।
रात के दस बजे मैं अपने बिस्तर में गयी, मानो वहाँ मैं अपने पति के निकट सो जाऊंगी। वह तुरंत ही सो गए, बिलकुल उसी क्षण जिस क्षण बत्ती बुझी, मानो लैम्प और उनके मस्तिष्क के बीच कोई तार जुड़ा हो।
आश्चर्यजनक। इस तरह के लोग बहुत कम हैं। ऐसे लोग काफी अधिक हैं जिन्हें सोने में दिक्कत होती है। मेरे पिता ऐसे लोगों में से थे। वह हमेशा शिकायत करते थे कि उनकी नींद कितनी हलकी होती थी। उन्हें न केवल नींद आने में कठिनाई होती थी बल्कि जरा-सी आहट अथवा आवाज भर उन्हें शेष रात भर के लिए जगा देती थी।
यद्यपि मेरे पति ऐसे नहीं हैं। एक बार यदि वे सो जाये तो सुबह से पूर्व उन्हें कोई चीज नहीं जगा सकती थी। अभी हमारे विवाह को थोड़े ही दिन हुए थे जब इस बात की ओर मेरा ध्यान गया। मैंने तो प्रयोग भी किया कि कौन सी बात उन्हें जगा सकती है। मैंने उनके चहरे पर पानी छिड़का और उनकी नाक पर ब्रश से छेड़खानी जैसी तमाम चीजें कीं। लेकिन मैं उन्हें कभी भी जगा नहीं पायी। अगर मैं ऐसा करती ही रहती तो वे एकाध बार गुर्रा देते थे बस। और उन्हें कभी सपने नहीं आते। या फिर उन्हें स्मरण नहीं रहता कि उनके सपने किस बात के सम्बन्ध में थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि वे कभी अशक्त कर देने वाले सम्मोहन की अवस्था में नहीं गए। वे सोते रहते थे। वे सोते थे, कीचड़ में घुसे कछुए की भांति।
आश्चर्यजनक। लेकिन जल्दी ही बन गयी मेरी रात्रि की रूटीन में इससे मदद मिली।
उनके पास दस मिनट तक लेटे रहने के पश्चात मैं बिस्तर से उठ जाती। मैं लिविंग रूम में जाती, बत्ती जलाती, अपने लिए एक ग्लास ब्रांडी उड़ेलती। फिर मैं सोफे पर बैठ जाती और अपनी किताब पढ़ती, ब्रांडी के छोटे-छोटे घूँट लेते हुए और सुस्वादु द्रव को अपनी जीभ पर फिसलते महसूस करते हुए। जब मुझे इच्छा करती, मैं अलमारी में छिपा कर रखे कुकीज या चॉकलेट का एक टुकड़ा खाती। कुछ समय पश्चात् सुबह हो जाती। जब ऐसा होता, मैं अपनी किताब बंद कर देती और अपने लिए एक कप कॉफी बनाती। फिर मैं एक सैंडविच बनाती और उसे खाती।
मेरे दिन इस प्रकार नियमित हो गए थे।
मैं तेजी से घर के काम निपटाती और शेष सुबह पढ़ते हुए व्यतीत करती। दोपहर से ठीक पहले, मैं अपनी पुस्तक रख देती और अपने पति के लिए लंच तैयार करती। जब वे चले जाते, एक बजे से पहले, मैं क्लब जाती और तैराकी करती। मैं पूरा एक घंटा तैरती। जब से मैंने सोना बंद किया था, तीस मिनट कभी पर्याप्त नहीं लगे। जब मैं पानी में होती, मैं अपना पूरा ध्यान तैराकी पर केंद्रित रखती। मैं कुछ भी न सोचती सिवाय इस बात के कि किस तरह अपनी देह को सर्वाधिक क्षमता से गतिशील किया जाये और किस प्रकार एकदम नियमित तरीके से साँस ली और छोड़ी जाय। यदि मैं किसी ऐसे से मिलती जिसे मैं जानती होती, मैं मुश्किल से ही कुछ कहती—मात्र सामान्य शिष्टाचार के शब्द। मैंने सभी निमंत्रणों को अस्वीकार कर दिया, “खेद है,” मैं कहती, “आज मैं सीधे घर जा रही हूँ। मुझे कुछ काम है।” मैं किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहती थी। मैं कभी न समाप्त होने वाली गप्पबाजी में समय व्यर्थ नहीं करना चाहती थी। जब मैं अपनी पूरी क्षमता से तैराकी कर रही होती, जो कुछ भी मैं चाहती थी वह यह होता कि मैं जल्दी घर जाऊँ और पढूँ।
मैं इन क्रियाओं से गुजरती—खरीददारी, खाना बनाना, अपने बेटे के साथ खेलना, अपने पति के साथ सेक्स करना। एक बार यह व्यवस्थित हो जाने के पाश्चत सब कुछ आसान था। मुझे सिर्फ मेरी देह और मेरे मस्तिष्क के बीच कनेक्शन तोड़ना भर था। जब मेरा शरीर अपने कामों में लगा होता, मेरा मस्तिष्क अपने आतंरिक अंतरिक्ष में गोते लगा रहा होता। मैं बिना किसी विचार के घर चला रही थी, अपने बेटे को स्नैक्स खिलाते हुए, अपने पति से बात करते हुए।
जब से मैंने सोना छोड़ा, मुझे समझ में आया कि वास्तविकता कितनी सरल वस्तु है, और इसे क्रियाशील बनाना कितना आसान है। यह बस वास्तविकता है। बस घरेलू काम। बस घर पर होना। एक साधारण मशीन को चलाने की भांति, यह मात्र दुहराव की बात है। आप इस बटन को दबाइए, उस लीवर को खींचिए। आप तराजू को समायोजित कीजिये, ढक्कन लगाइये, टाइमर सेट कीजिये। वही एक जैसी चीजें बार-बार।
निश्चय ही, यदा-कदा कुछ भिन्नताएँ भी होती थीं। मेरी सास ने हमारे साथ डिनर लिया। रविवार को हम तीनों चिड़ियाघर गए। मेरे बेटे को एक बार जोर का डायरिया हुआ।
लेकिन इनमें से किसी घटना ने मेरे अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं डाला। वे हवा के एक झोंके की भांति मुझसे परे गुजर गईं। मैंने अपनी सास के साथ बात की, चारों के लिए डिनर तैयार किया, भालू के पिंजरे के सामने तस्वीर खींची, अपने बेटे के पेट पर गर्म पानी की बोतल रखी और उसे उसकी दवाएं दीं।
किसी ने नोटिस नहीं किया कि मैं परिवर्तित हो गयी हूँ—कि मैंने सोना पूरी तरह छोड़ दिया है, कि मैं अपना पूरा समय पढ़ते हुए बिताती हूँ, कि मेरा मस्तिष्क सैकड़ों वर्ष—और सैकड़ों मील दूर किसी स्थान पर है। चाहे जितना यांत्रिक तरीके से मैं काम करती, चाहे जितना कम प्रेम अथवा भावना मैं वास्तविकता को निभाने में लगाती, मेरे पति, मेरा बेटा और मेरी सास मुझ से उसी तरह जुड़ते जैसे वे हमेशा करते थे। अगर कुछ था तो यह कि वे लोग अब मेरे साथ अधिक आरामदायक महसूस करते थे।
और इस तरह एक सप्ताह बीत गया।
जब मेरी लगातार जागृत अवस्था दूसरे सप्ताह में पहुँची, मुझे इसकी चिंता होने लगी। सीधी बात, मैं सामान्य नहीं थी। लोगों से सोने की अपेक्षा की जाती है। सभी लोग सोते हैं। एक बार, कुछ साल पूर्व मैंने एक प्रकार की यातना के बारे में पढ़ा था जिसमें शिकार व्यक्ति को सोने नहीं दिया जाता। मेरे विचार में, कभी नाजियों ने ऐसा किया था। वे व्यक्ति को एक छोटे से कमरे में बंद कर देते थे, उसकी पलकों को खोल कर बांध देते थे, और उसके चेहरे पर लगातार चमकीली रोशनी डालते थे और बिना रूकावट के तेज शोर करते थे। अंततः व्यक्ति पागल हो जाता था और मर जाता था।
मुझे स्मरण नहीं कि उस आलेख के अनुसार पागलपन प्रारम्भ होने में कितने दिन लगते थे, लेकिन ये तीन अथवा चार दिन से अधिक नहीं हो सकते थे। मेरे मामले में पूरा एक सप्ताह बीत चुका है। यह सीधे-सीधे बहुत अधिक था। अब भी मेरे स्वास्थ्य को कोई नुकसान नहीं पहुचा था। इसके विपरीत, मुझ में पूर्व की तुलना में अधिक ऊर्जा थी।
एक दिन स्नान के पश्चात् मैं दर्पण के सामने नग्न खड़ी थी। मैं यह जान कर अचंभित रह गयी कि मेरी देह में जीवंतता लगभग उमड़ी पड़ रही थी। मैंने शिख से नख तक अपने आप का एक-एक इंच अध्ययन किया लेकिन मुझे अतिरिक्त मांस का थोड़ा सा भी चिह्न नहीं मिला, न ही एक भी झुर्री। यद्यपि अब मेरा शरीर निश्चय ही किसी युवा लड़की का नहीं रह गया था लेकिन मेरी त्वचा में पूर्व की अपेक्षा अधिक चमक, अधिक खिंचाव था। मैंने अपनी कमर के पास चिकोटी काटी और पाया कि यह लगभग ठोस थी, आशचर्यजनक लोच के साथ।
यह मुझ पर उद्घाटित हुआ कि मैं जितना सोचती थी, उसकी तुलना में अधिक सुन्दर हूँ। मैं पूर्व की तुलना में इतनी अधिक युवा दिख रही थी। यह लगभग स्तंभित कर देने वाला था। मुझे संभवतः चौबीस का समझा जा सकता था। मेरी त्वचा चिकनी थी। मेरी आँखें चमकदार थी और होंठ नम। मेरी गालों की उभरी हुई हड्डियों (मेरे चहरे की एक विशेषता जिससे मुझे घृणा थी) के नीचे की झाइयाँ अब बिलकुल नहीं दिखाई दे रही थीं। मैं बैठ गई और अपने चहरे को दर्पण में अच्छे खासे आधे घंटे तक देखती रही। मैंने हर कोण से इसका वस्तुनिष्ठ तरीके से अध्ययन किया। नहीं, मुझसे गलती नहीं हुई थी : मैं सचमुच ही सुन्दर थी।
मुझे क्या हो रहा था ?
मैंने किसी चिकित्सक के पास जाने के सम्बन्ध में सोचा।
मैं एक ऐसे चिकित्सक को जानती थी जो जब मैं बच्ची थी तब से मेरा इलाज करते आ रहे थे और मैं उनसे नजदीकी भी महसूस करती थी। लेकिन जितना ही मैं इस बारे में सोचती कि मेरी कहानी सुन कर वे किस तरह की प्रतिक्रिया देंगे, उतना ही उन्हें बताने के प्रति मेरा झुकाव कम होता जाता। क्या वह मेरी बात शब्दश: मान लेंगे? मेरे यह बताने पर कि मैं एक सप्ताह से सोई नहीं हूँ, हो सकता है वे मुझे पागल समझें। अथवा वे इसे एक प्रकार का तंत्रिका तंत्र सम्बन्धी अनिद्रा रोग मान कर खारिज कर दें। लेकिन यदि उन्होंने यह विश्वास कर लिया कि जो मैं कह रही हूँ वह सच है तो वे मुझे जाँच के लिए किसी बड़े शोध अस्पताल में भेज सकते थे।
और फिर क्या होगा ?
मैं कमरे में बंद कर दी जाउंगी और एक प्रयोगशाला से दूसरी प्रयोगशाला में मुझ पर प्रयोग होंगे। वे EEG और EKG और मूत्र की जाँच, रक्त की जाँच, मनोवैज्ञानिक स्क्रीनिंग और न जाने क्या, क्या जाँचें करेंगे।
मैं यह सब नहीं बर्दाश्त कर सकती थी। मैं केवल अपने आप में रहना और शांति से अपनी किताबें पढ़ना चाहती थी। मैं रोज एक घंटे तैराकी करना चाहती थी। मैं अपनी स्वतंत्रता चाहती थी—यही वह चीज थी, जिसे मैं और किसी भी चीज से अधिक चाहती थी। मैं किसी अस्पताल में नहीं जाना चाहती थी। और यदि वे मुझे किसी अस्पताल में ले भी जायेंगे, उन्हें क्या मिलेगा? वे जाँचों का एक पहाड़ खड़ा कर देंगे और परिकल्पनाओं का एक ढेर निर्मित करेंगे। और इसका अंत क्या होगा? मैं उस तरह के किसी स्थान में कैद नहीं होना चाहती थी।
एक अपराह्न मैं पुस्तकालय गई और नींद के सम्बन्ध में कुछ किताबें पढ़ीं। कुछ किताबें जो मैं पा सकी, उनसे कुछ खास पता नहीं चला। वास्तव में उन सब में एक ही बात कही गयी थी : कि नींद आराम है। एक कार के इंजन को बंद कर देने की भांति। यदि आप किसी मोटर को लगातार चालू रखेंगे तो देर-सबेर वह खराब हो जाएगी। एक चलता हुआ इंजन गर्मी उत्पन्न करता है और इकट्ठी हुई ऊष्मा मशीन को ही थका देती है। इसी कारण आपको इंजन को आराम देना पड़ता है। ठंडा होने के लिए। इंजन को बंद करना, आखिर वही तो नींद है। मनुष्यों में नींद शरीर और आत्मा दोनों को विश्राम देती है। जब कोई व्यक्ति लेटता है वह अपनी मांसपेशियों को आराम देता है, साथ ही जब वह आँखें बंद करता है, विचार प्रक्रिया को विश्राम देता है। और विचारों का अतिरेक स्वप्नों के रूप में विद्युत प्रवाह छोड़ता है।
एक पुस्तक में बहुत आकर्षक बात कही गयी थी। लेखक का विश्वास था कि मनुष्य मात्र, स्वभावतः कुछ सनकी प्रवृतियों से पलायन कर पाने में सक्षम नहीं हो पाता, अपनी विचार प्रक्रिया में भी और अपने शारीरिक क्रियाकलापों में भी। लोग अनजाने ही अपने क्रियाकलाप और वैचारिक 'आवेग' में लिप्त रहते हैं जो सामान्य परिस्थितियों में कभी भी अदृश्य नहीं होता। दूसरे शब्दों में, मनुष्य अपने आवेग के पिंजरे में कैद रहता है। कौन सी चीज इन आवेगों को निर्देशित और नियंत्रित में रखती है—ताकि प्राणी उसी तरह घिस न जाए जैसे जूते की एड़ी एक निश्चित कोण पर घिस जाती है—यह और कुछ नहीं, नींद ही है। नींद चिकित्सकीय रूप से इस प्रवृत्ति के विरुद्ध काम करती है। नींद में लोग प्राकृतिक रूप से अपनी पेशियों को आराम देते हैं जो एक ही दिशा में लगातार प्रयोग की जाती रहीं हैं; नींद उन्हें शांत भी करती है। विचारों के तंत्र को, जो निरंतर एक ही दिशा में प्रयोग किए गए हैं, मुक्त होने हेतु प्रवाह भी देती है। इसी प्रकार लोग शीतल होते हैं। नींद लेना एक ऐसी क्रिया है जो ‘कर्म’ की अवश्यंभाव्यता के साथ मनुष्य के सिस्टम में प्रोग्राम की गई है और कोई इससे विचलित नहीं हो सकता। यदि कोई व्यक्ति इससे विचलित होता है तो उस व्यक्ति का ‘जीवन का आधार’ ही खतरे में पड़ जाता है।
“आवेग?” मैंने स्वयं से पूछा।
मेरा एक मात्र आवेग, जिसके बारे में मैं सोच सकती थी, वह घरेलू काम थे—वे काम जो मैं रोज-रोज किसी अनुभूतिविहीन यंत्र की भांति किया करती थी। खाना बनाना और खरीदारी करना और कपडे धोना और बेटे की देखभाल करना : वह सब क्या था यदि ‘आवेग’ नहीं था। मैं उन्हें अपनी आँखें बंद किए हुए भी कर सकती थी। बटन दबाओ, लीवर खींचो। बहुत शीघ्र ही वास्तविकता दूर चली जाती है। वही शारीरिक क्रियाएँ पुनः-पुनः। आवेग। वे मुझे क्षय कर रही थी, एक ही तरफ को घिस रही थीं, जूते की एड़ी की भांति। मुझे अपने आप को समायोजित करने और शीतल करने के लिए रोज नींद की आवश्यकता थी।
क्या ऐसा था?
मैंने उस अंश को एक बार फिर पढ़ा, गहन एकाग्रता के साथ। और मैंने सहमति में सिर हिलाया। हाँ, लगभग निश्चित रूप से, ऐसा ही था।
तब फिर, मेरा यह जीवन क्या है ? मैं अपने आवेग के द्वारा क्षय होती जा रही थी और फिर मरम्मत हेतु सोया करती थी। मेरा जीवन कुछ नहीं था सिवाय इस दुहराव मात्र के। यह कहीं नहीं जा रहा था।
पुस्तकालय की मेज पर बैठे हुए, मैंने अपना सिर हिलाया।
मैं नींद से गुजर चुकी! ऐसे में यदि मैं पागल भी हो जाऊँ तो क्या? क्या होगा यदि मैं ‘अपने अस्तित्व का आधार’ ही खो दूँ? मैं अपने 'आवेग' द्वारा क्षय नहीं होऊँगी। यदि नींद मात्र मेरे उन हिस्सों की मरम्मत मात्र है जो घिस रहे हैं, मैं अब और इसे नहीं चाहती। मेरी देह भले क्षय हो जाये लेकिन मेरा मस्तिष्क मेरा है। मैं इसे अपने लिए रखती हूँ। मैं इसे किसी अन्य को नहीं सौपूंगी। मैं ‘मरम्मत की हुई' नहीं होना चाहती। मैं नहीं सोऊंगी।
मैं एक नए दृढ निश्चय से भरी हुई पुस्तकालय से बाहर आयी।
अब मेरी सो न पाने की अक्षमता का मुझे डराना बंद हो गया। अब डरने को क्या था? फायदों के बारे में सोचो। अब दस बजे रात्रि से छः बजे सुबह तक के घंटे मेरे थे। अब के पहले तक दिन का एक तिहाई भाग नींद में खर्च हो जाता था। किन्तु अब नहीं। अब नहीं। मैं इस समय का उपयोग किसी भी तरह कर सकती थी, जैसे भी मैं चाहूँ। कोई मेरे रास्ते में नहीं आएगा। एकदम ऐसा ही था। मैंने अपने जीवन का विस्तार कर दिया था। मैंने इसे एक तिहाई से बढ़ा दिया था।
आप संभवतः मुझसे यह कहने जा रहे हैं कि यह जैव वैज्ञानिक रूप से असामान्य है। और आप सही भी हो सकते हैं। और हो सकता है कभी भविष्य में मुझे यह ऋण, जो मैं निरंतर जैव वैज्ञानिक रूप से असामान्य बात कर के सृजित कर रही हूँ, चुकाना भी पड़े। हो सकता है जीवन यह विस्तारित भाग वापस माँगने लगे—यह अग्रिम जो वह अभी मुझे भुगतान कर रहा है। यह एक आधारहीन परिकल्पना है लेकिन इसे नकारने का भी कोई आधार नहीं है। और यह किसी तरह मुझे सही प्रतीत होता है। जिसका अर्थ है अंत में उधार लिए गए समय का तुलना-पत्र संतुलित हो जायेगा।
ईमानदारी से कहूँ तो मुझे कोई परवाह नहीं थी। यदि मुझे युवावस्था में ही मरना पड़ता, तब भी नहीं। किसी परिकल्पना के साथ सबसे बेहतर यही काम है कि उसे अपनी राह चलने दिया जाए। अभी कम से कम मैं अपने जीवन का विस्तार कर रही थी और यह आश्चर्यजनक था। मेरे हाथ अब खाली नहीं थे। यहाँ मैं थी—जीवित, और मैं यह महसूस भी कर सकती थी। यह वास्तविक था। अब मेरा क्षरण नहीं हो रहा था। अथवा कम से कम मेरा एक हिस्सा ऐसा था जिसका क्षरण नहीं हो रहा था और यही वह चीज थी जो मुझे जीवित होने की गहन वास्तविक अनुभूति दे रही थी। इस अनुभूति के बिना जीवन हमेशा भले चलता रहे किन्तु उसका कोई अर्थ नहीं होता। इसे अब मैं एकदम स्पष्टता से देख रही थी।
यह जाँच लेने के पश्चात् कि मेरे पति सो गए हैं, मैं लिविंग रूम में जा कर सोफे पर बैठती, अकेले ब्रांडी पीती, और अपनी किताब खोल लेती। मैंने ‘अन्ना कैरिनीना’ तीन बार पढ़ी। हर बार मुझे नई चीजें पता लगीं। यह विशाल उपन्यास नए रहस्योद्घाटनों और पहेलियों से भरा है। एक चाइनीज बॉक्स की भांति उपन्यास की दुनिया में कई लघुतर संसार भी हैं और उनके भीतर और भी छोटे-छोटे। एक साथ मिल कर ये संसार एक ब्रह्माण्ड निर्मित करते हैं। और यह ब्रह्माण्ड पुस्तक में पाठक द्वारा खोजे जाने की प्रतीक्षा करता है। पुरानी 'मैं' इसके बस लघुतम टुकड़े को ही समझ पाई थी लेकिन इस नयी ‘मैं’ की दृष्टि पूरी समझ के साथ इसके मर्म तक जा सकती थी। मैं ठीक-ठीक जान गई थी कि महान टॉलस्टॉय क्या कहना चाहते थे, वह क्या चाहते थे जिसे पाठक इस पुस्तक से प्राप्त करें। मैं देख सकती थी कि किस प्रकार उनका संदेश इस उपन्यास के रूप में कायिक रूप से घनीभूत हुआ और उपन्यास में किस बात ने स्वयं लेखक का भी अतिक्रमण कर दिया।
चाहे जितना भी मैं एकाग्र हुई लेकिन मैं कभी भी थकी नहीं। जितनी बार मैं पढ़ सकती थी, उतनी बार ‘अन्ना कैरिनीना’ पढ़ने के पश्चात् मैंने दोस्तयोवस्की को पढ़ा। मैं पुस्तक के पश्चात् पुस्तक गहन एकाग्रता के साथ पढ़ सकती थी और कभी थकती नहीं थी। मैं सबसे कठिन अंश भी बिना परेशानी के समझ सकती थी। और मैं गहन भावनात्मकता से प्रतिक्रिया देती थी। मैंने महसूस किया कि मैं हमेशा से ऐसी ही होने के लिए बनी थी। नींद का त्याग करके मैंने अपना विस्तार कर लिया था। एकाग्र रहने की शक्ति सबसे महत्वपूर्ण थी। इस शक्ति के बिना जीना, बिना किसी चीज को देखे आँखें खोले रहने जैसा होता।
अंततः मेरी ब्रांडी की बोतल समाप्त हो गई। इसे लगभग पूरा का पूरा मैंने ही पिया था। मैं एक और रेमी मार्टिन की बोतल लेने के लिए एक स्टोर तक गई। जब तक मैं वहाँ थी, मैंने निर्णय लिया कि मुझे रेड वाइन की भी एक बोतल खरीदनी चाहिए। और एक अच्छा क्रिस्टल का ब्रांडी का ग्लास भी और चॉकलेट और कुकीज भी।
कभी-कभी पढ़ते हुए मैं अत्यधिक उत्तेजित हो जाती थी। जब ऐसा होता, मैं अपनी किताब रख देती और व्यायाम करती—हल्का व्यायाम या कमरे में इधर-उधर टहलना। यह मेरे मूड पर था। कभी-कभी मैं रात में कार लेकर भी निकल जाती। मैं कपडे बदलती, अपनी सिविक में बैठती और निरुद्देश पड़ोस में इधर-उधर घूमती। कभी-कभार मैं किसी रात भर खुले रहने वाले फास्ट-फूड रेस्टोरेंट में जा कर एक कॉफी लेती लेकिन दूसरे लोगों से निपटना इतना झंझट का काम था। तो मैं अक्सर कार में ही रहती। मैं किसी सुरक्षित से लगने वाले स्थान पर रुक जाती और यूँ ही अपने मस्तिष्क को भटकने देती। अथवा मैं सीधे बंदरगाह पर चली जाती और नावों को देखती रहती।
हालांकि एक बार मुझे एक पुलिस वाले ने रोक कर पूछताछ की थी। मैं एक तटबंध के पास लैम्प पोस्ट के नीचे कार खड़ी कर के कार के स्टीरियो से संगीत सुन रही थी और उधर से गुजरती जहाजों की रोशनियाँ देख रही थी। उसने मेरी खिड़की खटखटाई। वह युवा और सुदर्शन था और बहुत विनम्र भी। मैंने उसे स्पष्ट किया कि मैं सो नहीं पाती। उसने मेरे लाइसेंस के बारे में पूछा और कुछ देर उसे देखता रहा। “पिछले महीने यहाँ एक हत्या हो गयी थी,” उसने कहा, “तीन युवकों ने एक दम्पत्ति पर हमला किया। आदमी को मार डाला और औरत के साथ बलात्कार किया।” मुझे उस घटना के बारे में पढ़ा हुआ समाचार स्मरण हो आया। मैंने सिर हिलाया। “यदि यहाँ आपका कोई काम न हो मैडम तो आप यहाँ रात में न रुकें।” मैंने उसको धन्यवाद दिया और कहा कि मैं जा रही हूँ। उसने मेरा लाइसेंस वापस कर दिया। मैं वहाँ से चली आई।
वही एकमात्र अवसर था जब किसी ने मुझसे बात की थी। सामान्यतः मैं रात में एक घंटे से अधिक गलियों में नहीं भटकती थी और कोई मुझे परेशान नहीं करता था। फिर मैं अपने भूमिगत गैरेज में गाड़ी खड़ी कर देती थी। ठीक पति की सफेद सेन्त्रा की बगल में, वे ऊपर अँधेरे में गहरी निद्रा में सो रहे होते थे। मैं गर्म इंजन के ठंडे होने पर आने वाली आवाज सुनती रहती और जब आवाजें समाप्त हो जातीं, मैं ऊपर चली जाती।
भीतर जाने पर सबसे पहले मैं यह सुनिश्चित करती कि मेरे पति सो रहे हैं और वे हमेशा सो रहे होते। फिर मैं अपने बेटे को देखती। वह भी गहरी नींद में सो रहा होता। वे एक भी बात नहीं जानते थे। वे विश्वास करते थे कि दुनिया वैसी ही है, जैसी यह हमेशा से थी, अपरिवर्तित। लेकिन वे गलत थे। यह उस तरह से परिवर्तित हो रही थी जिसका वे अनुमान नहीं कर सकते थे। अत्यधिक परिवर्तित होती हुई। तेजी से परिवर्तित होती हुई। यह फिर से वैसी ही नहीं रहने वाली थी।
एक बार मैं बिस्तर के पास खड़ी थी और अपने सोते हुए पति को देख रही थी। मैंने बेडरूम में किसी चीज के गिरने की आवाज सुनी और मैं भाग कर आई। अलार्म क्लॉक फर्श पर गिरी हुई थी। शायद उन्होंने उसे नींद में नीचे गिरा दिया था। लेकिन वह हमेशा की भांति गहरी निद्रा में सो रहे थे, इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ कि उन्होंने क्या किया है। यह आदमी किस बात से जाग सकता है? मैंने घड़ी उठाई और उसे नाइट टेबल पर रख दिया। फिर मैंने अपनी बाँहें मोड़ीं और अपने पति को देखने लगी। इस बात को कितना समय हो गया था—वर्षों? जब मैंने उनके सोते हुए उनके चहरे का अध्ययन किया था।
जब हमारा नया नया विवाह हुआ था, मैंने ऐसा बहुत बार किया था। इस बात से मैं सहज हो शांत मानसिक अवस्था में पहुँच जाती थी। “मैं सुरक्षित रहूंगी, जब तक वह इतनी शांति से सो रहे हैं,” मैं स्वयं से कहती। इसी कारण मैं ढेर सारा समय उन्हें सोता हुआ देखने में खर्च करती।
लेकिन कहीं बीच में मैंने यह आदत त्याग दी। यह कब हुआ? मैंने स्मरण करने का प्रयत्न किया। यह संभवतः तब हुआ जब मैं और मेरी सास मेरे बेटे का क्या नाम हो, इस बात के लिए झगड़ रहे थे। वे किसी धार्मिक संप्रदाय से प्रभावित थीं और उन्होंने अपने पुजारी को मेरे बेटे को एक नाम ‘प्रदान’ करने को कहा था। मुझे ठीक-ठीक स्मरण नहीं कि उन्होंने क्या नाम रखा था लेकिन मेरी कोई मंशा नहीं थी कि किसी पुजारी को मेरे बेटे को नाम प्रदान करने दिया जाए। हमारे बीच निश्चय ही कुछ भारी विवाद हुआ था लेकिन मेरे पति ने हम दोनों से कुछ नहीं कहा। वह बस खड़े रहे और हमें शांत करने की कोशिश करते रहे।
उसके पश्चात मेरी यह अनुभूति समाप्त हो गई कि मेरे पति मेरे रक्षक हैं। मैंने सोचा कि बस एक चीज जो मैं उनसे चाहती थी, वह वही देने में असफल रहे। वह बस इतना कर पाए कि मुझे और क्रोधित कर दिया। यह सब काफी समय पूर्व घटित हुआ था। मेरे और मेरी सास के बीच सुलह हो चुकी थी। मैंने अपने बेटे का वह नाम रखा जो नाम मैं रखना चाहती थी। मेरे पति और मुझ में भी तभी सुलह हो गई थी।
लेकिन मुझे पक्का विश्वास है कि वह मेरा उन्हें सोते हुए नींद में देखने का अंत था।
तो वहाँ मैं खड़ी उन्हें सोते हुए देख रही थी, हमेशा की भांति गहरी नींद में। एक नंगा पैर चादर से विचित्र कोण पर बाहर निकला हुआ हुआ था—इतना विचित्र कि पैर किसी और का भी हो सकता था। यह एक बड़ा, गठीला पैर था। मेरे पति का मुँह खुला हुआ था और नीचे के होंठ लटके हुए थे। थोड़ी-थोड़ी देर में उनके नथुने फड़कते थे। उनकी आँख के नीचे एक मस्सा था जो मुझे खराब लगता था। यह काफी बड़ा था और गंदा दिखता था। उनकी आँखें जिस तरह बंद थीं, वह मुझे गंदा लग रहा था, जैसे वे ढीले-ढाले ढक्कन हों, बदरंग मानव मांस के बने हुए ढक्कन। वह एकदम बेवकूफ लग रहे थे। इसी को लोग कहते थे, "दुनिया के लिए मरा हुआ।" अविश्वसनीय रूप से कुरूप। वह इतने गंदे रूप में सोते थे। यह बस भयानक था। मैंने सोचा। वे पुराने दिनों में ऐसे नहीं हो सकते थे। मैंने सोचा उनका चेहरा उस समय बेहतर रहा होगा जब हमारा विवाह हुआ था, वह चेहरा जो कसा हुआ और सतर्क था। गहरी नींद में सोए हो कर भी वे इस तरह का गोला नहीं हो सकते थे।
मैंने स्मरण करने का प्रयत्न किया कि पहले उनका सोता हुआ चेहरा कैसा दिखता था, लेकिन मैं ऐसा न कर सकी। मैंने काफी प्रयत्न किया। एक बात जिसे मैं निश्चित रूप से कह सकती थी, वह यह थी कि उनका चेहरा इतना भयानक नहीं रहा हो सकता था। अथवा मैं बस स्वयं को धोखा दे रही थी। हो सकता है वह हमेशा ही अपनी नींद में ऐसे दिखते रहें हों और मैं किसी प्रकार के भावनात्मक प्रक्षेपण में रत रहती रही होऊँ। मुझे विश्वास है मेरी माँ यही कहेंगी। इस तरह की चीज मुर्गियों की विशेषता थी। "ये सब प्यारी-प्यारी चीजें बस दो साल चलती हैं—अधिक से अधिक तीन साल।" वह सदैव कहा करती थीं, "तुम एक नई दुल्हन थीं।" मुझे यकीन है कि माँ कहती, "तुम्हारा नन्हा पति निश्चय ही अपनी नींद में बहुत प्यारा लगता रहा होगा।"
मुझे विश्वास है वह कुछ ऐसा ही कहती लेकिन मुझे उतना ही विश्वास है कि वह गलत होती। वह वर्षों में बढ़ते हुए कुरूप लगने लगे हैं। उनके चेहरे से कसाव समाप्त हो गया है। बुढ़ापे की ओर बढ़ने का यही अर्थ होता है। वह अब बूढ़े हो रहे हैं और थके हुए भी। क्षरित हो गए हैं। वह आने वाले वर्षों में और कुरूप लगने लगेंगे, इतना निश्चित था। और मेरे पास इसी के साथ चलने के अतिरिक्त, इसे स्वीकार करने के अतिरिक्त, स्वयं को इससे विरक्त कर लेने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था।
मैंने वहाँ खड़े उन्हें देखते हुए एक आह भरी। यह एक गहरी आह थी, शोर करती हुई-सी आह। लेकिन निश्चय ही उनमें कोई हरकत नहीं हुई। दुनिया की सबसे तीव्र आह भी उन्हें कभी नहीं जगा सकती थी।
मैं बेडरूम छोड़ कर वापस लिविंग रूम में आ गई। मैंने अपने लिए एक ब्रांडी उड़ेली और पढ़ने लगी। लेकिन किसी चीज ने मुझे एकाग्र नहीं होने दिया। मैंने किताब नीचे रखी और अपने बेटे के कमरे में आ गई। मैंने हाॅल में से आ रही रोशनी में उसके चेहरे की ओर देखा। वह भी बिलकुल उसी तरह गहरी नींद में सो रहा था जैसे मेरे पति। जैसा वह हमेशा करता था। मैंने उसे नींद में देखा, उसके सपाट, लगभग विशेषता विहीन चेहरे को। यह मेरे पति के चेहरे से बहुत भिन्न था। आखिर सब के बाद यह अभी एक बच्चे का चेहरा था। त्वचा अभी भी चमक रही थी। अभी इसमें कुछ भी कुरूप नहीं था।
फिर भी मेरे बेटे के चेहरे की किसी बात ने मुझे अप्रसन्न कर दिया। मैंने उसके संबंध में पहले कभी इस तरह का कुछ महसूस नहीं किया था। क्या चीज मुझे इस तरह की अनुभूति हेतु प्रेरित कर रही थी? मैं वहाँ अपने हाथ बाँधे, उसे देखते हुए खड़ी रही। निश्चय ही, मैं अपने बेटे को प्यार करती थी, बहुत-बहुत प्यार करती थी। लेकिन फिर भी, बिना इनकार के, वह कोई चीज मुझे परेशान कर रही थी, मेरे धैर्य को आजमा रही थी।
मैंने अपना सिर हिलाया।
मैंने अपनी आँखें बंद की और उन्हें बंद किए रही। फिर मैंने आँखें खोलीं और पुनः अपने बेटे के चेहरे की ओर देखा। जो बात मुझे मेरे बेटे के चेहरे के बारे में परेशान कर रही थी, वह यह थी कि उसका चेहरा बिलकुल मेरे पति जैसा था। और बिलकुल मेरी सास जैसा। यह बात उनके रक्त में थी—एक प्रकार की अहंमन्यता, जिसके कारण मैं अपने पति के परिवार से घृणा करती थी। सच है कि मेरे पति मेरे प्रति बहुत अच्छे हैं। वह मधुर और सज्जन हैं और मेरी भावनाओं का ध्यान रखने के प्रति सावधान हैं। वह कभी दूसरी औरतों के चक्कर में नहीं पड़े और वह कड़ा परिश्रम करते हैं। वह गंभीर हैं और हरेक के प्रति दयालु हैं। मेरी सभी सहेलियाँ कहती हैं कि मैं कितनी भाग्यवान हूँ उन्हें पा कर। और मैं भी उनमें कोई गलती नहीं निकाल सकती। जिसे लेकर कभी-कभी मुझे क्षोभ भी होता है। उनमें कमियों का न होना विचित्र-सी कठोरता उत्पन्न करता है जिसमे कल्पनाशीलता का अभाव होता है। यह मुझे परेशान करता है।
और बिलकुल इसी प्रकार के भाव थे जो सोते समय मेरे बेटे के चेहरे पर थे।
मैंने फिर अपना सिर हिलाया। यह छोटा बच्चा अंततः मेरे लिए एक अजनबी है। बड़ा हो जाने के पश्चात भी वह कभी भी मुझे नहीं समझ पाएगा जैसे कि मेरे पति मुश्किल ही समझ पाते हैं कि मैं अब क्या महसूस करती हूँ।
मैं अपने बेटे को बिला शक प्यार करती हूँ। लेकिन मुझे लगा कि कोई दिन आएगा जब मैं इस बच्चे को इसी गहनता से प्यार करने में अपने को सक्षम नहीं पाऊँगी। यह बहुत ममत्व वाला विचार नहीं है। अधिकांश माँओं के मन में ऐसा विचार कभी नहीं आया होगा। लेकिन जैसे वहाँ खड़े हुए मैं उसको सोते हुए देख रही थी, मैं एकदम निश्चित रूप से जानती थी कि एक दिन मैं उससे घृणा करने लगूँगी।
इस विचार ने मुझे भयानक रूप से दुखी कर दिया। मैंने उसका दरवाजा बंद किया और हाॅल की बत्तियाँ बुझा दीं। मैं लिविंग रूम के सोफे के पास आ गई, बैठ गई, और अपनी किताब खोल ली। कुछ पन्ने पढ़ने के पश्चात मैंने फिर उसे बंद कर दिया। मैंने घड़ी की ओर देखा। तीन बजने में थोड़ा समय बाकी था।
मुझे आश्चर्य हुआ कि कितना समय हो गया जब से मैंने सोना बंद किया है। अनिद्रा की अवस्था पिछले के पिछले मंगलवार को शुरू हुई थी। अब यह सत्रहवाँ दिन था। सत्रह दिन में नींद की एक झपकी भी नहीं। सत्रह दिन और सत्रह रातें। एक लंबा, लंबा समय। मैं यह भी नहीं स्मरण कर पा रही थी कि नींद कैसी होती है।
मैंने अपनी आँखें बंद की और नींद की अनुभूति को महसूस करना चाहा लेकिन जो कुछ भी मेरे लिए भीतर था वह एक जागृत अंधेरा मात्र था। एक जागृत अंधेरा : इससे मस्तिष्क में जो बात आती थी, वह थी मृत्यु।
क्या मैं मरने जा रही हूँ?
और यदि मैं अभी मरती हूँ तो मेरे जीवन का क्या मोल था?
कोई तरीका नहीं था जिससे मैं इसका उत्तर दे पाती।
ठीक है फिर, कैसी मृत्यु?
अभी तक मैंने मृत्यु की परिकल्पना नींद के रूप में की थी। मैंने मृत्यु की कल्पना नींद के विस्तार जैसे ही की थी। सामान्य नींद से काफी अधिक गहरी नींद। एक नींद जिसमें सभी तरह की चेतना का अभाव हो। अनन्त विश्राम। एक पूर्ण प्रकाशविहीनता।
लेकिन अब मुझे आश्चर्य हो रहा था कि क्या मैं गलत थी। संभवतः मृत्यु एक ऐसी अवस्था थी जो नींद से सर्वथा भिन्न थी, कोई ऐसी चीज जो एक पूरी तरह से भिन्न श्रेणी की थी—गहन, अंतहीन, जागृत अंधकार। जैसा मैं अभी देख रही थी।
नहीं, यह तो बहुत भयानक होगी। यदि मृत्यु की अवस्था हमारे लिए एक विश्राम नहीं होगी, फिर कौन सी चीज थकान से त्रस्त हमारे अपूर्ण जीवन को मुक्ति दिलाएगी? आखिरकार, कोई नहीं जानता कि मृत्यु क्या है। किसने इसे सचमुच में देखा है? कोई भी जीवित प्राणी नहीं जानता कि मृत्यु कैसी है। वे केवल अनुमान लगा सकते हैं। और बेहतर से बेहतर अनुमान भी बस अनुमान ही है। हो सकता है मृत्यु एक तरह का विश्राम हो, यह बात तर्किकता हमें नहीं बता सकती। मृत्यु क्या है यह जानने का एकमात्र तरीका मरना ही है। मृत्यु कुछ भी हो सकती है।
इस विचार से मुझ पर एक गहन भय छा गया। एक अकड़ा देने वाली ठंडक मेरी रीढ़ में दौड़ गयी। मेरी आँखें अब भी कस कर मुँदी हुई थीं। उन्हें खोल पाने की मेरी शक्ति समाप्त हो गयी थी। मैंने अपने आगे पसरी गहन कालिमा को देखा, एक अंधकार उतना ही गहरा और निराशापूर्ण जितना कि स्वयं ब्रह्मांड। मैं एकदम एकाकी थी। मेरा मस्तिष्क गहन एकाग्रता में था और विस्तारित हो रहा था। यदि मैंने चाहा होता तो मैं ब्रह्मांड की अंतिम गहराइयों तक देख सकती थी। लेकिन मैंने न देखने का निर्णय लिया। यह अभी उसके लिए बहुत शीघ्रता होती।
यदि मृत्यु इसी तरह की थी, यदि मरने का अर्थ अनंत तक जागते रहना और इस प्रकार अँधेरे में देखते रहना था, तो मुझे क्या करना चाहिए?
आखिर में, मैं अपनी आँखें खोलने में सफल रही। मैंने अपनी ग्लास में बची ब्रांडी का घूँट भरा।
मैं अपना पाजामा उतार कर जींस पहन रही थी। टी-शर्ट और विंड ब्रेकर। मैंने अपने बालों को चोटी की शक्ल में पीछे की ओर बांधा, उसे विंड ब्रेकर के नीचे घुसेड़ा और अपने पति की बेसबाल की कैप लगा ली। दर्पण में मैं एक लड़के जैसी लग रही थी। बढ़िया। मैंने स्नीकर पहने और नीचे गैराज की ओर चल दी।
मैं स्टीयरिंग व्हील के पीछे सरक गई, चाबी घुमाई, और इंजन की घरघराहट सुनी। इसकी आवाज सामान्य थी। स्टीयरिंग पर हाथ रखे हुए मैंने कई गहरी सांसें लीं। फिर मैंने गियर बदला और बिल्डिंग के बाहर निकल गई। कार सामान्य से बेहतर चल रही थी। यह बर्फ की चादर पर फिसलती हुई सी लग रही थी। मैंने ऊँचा गियर लगाया, पड़ोस से बाहर निकल आई और याकोहामा के लिए राजमार्ग पर प्रवेश कर गयी।
अभी सुबह के तीन ही बजे थे, लेकिन रास्ते में कारों की संख्या किसी तरह कम नहीं थी। बड़ी कारें जमीन कँपाती, पूरब की ओर जाते हुए तेजी से आगे निकल रही थीं। ये लोग रात को नहीं सोया करते। वे अधिक क्षमता के लिए दिन में सोते और रात को काम करते हैं।
क्या बर्बादी है। मैं दिन-रात काम कर सकती थी। मुझे सोने की जरूरत नहीं है।
यह जैव वैज्ञानिक रूप से अस्वाभाविक है, मैं समझती हूँ, लेकिन वास्तव में कौन जानता है कि क्या स्वाभाविक है? वे सिर्फ आंतरिक रूप से निष्कर्ष निकाल लेते हैं। एक विकास संबंधी छलाँग। एक स्त्री जो कभी नहीं सोती। चेतना का एक विस्तार।
मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई। प्रथम। विकास सम्बंधी छलाँग।
अपनी कार का रेडियो सुनते हुए, मैं बंदरगाह की ओर चल दी। मैं शास्त्रीय संगीत सुनना चाहती थी लेकिन मुझे ऐसा कोई स्टेशन नहीं मिला जो रात्रि के समय इसे प्रसारित करता हो। जापान का मूर्खतापूर्ण रॉक संगीत। प्रेम गीत इतने मीठे कि आपके दाँत सड़ा दें। मैंने तलाशना बंद कर दिया और उन्हें ही सुनने लगी। उससे मुझे यह अनुभव होने लगा मानो मैं किसी दूर की जगह पर हूँ- मोजार्ट और हेडेन से बहुत दूर।
मैंने विशाल पार्किंग स्थल पर एक सफेद लाइन से चिह्नित खाली जगह में गाड़ी खड़ी कर दी और इंजन बंद कर दिया। यह इस जगह का सबसे प्रकाशित स्थान था और चारों ओर से खुला हुआ था। वहाँ मात्र एक और कार खड़ी थी—एक पुरानी, सफेद टू सीटर जिस तरह की युवा लोग चलाना पसंद करते हैं। संभवतः वहाँ प्रेम करता कोई जोड़ा होगा—होटल के कमरे के लिए पैसे नहीं होंगे। किसी मुसीबत को टालने हेतु मैंने अपना हैट नीचे खींच लिया, एक, स्त्री की तरह न दिखने का प्रयत्न करते हुए। मैंने चेक किया कि मेरे दरवाज़े लॉक हैं।
बेध्यानी में मैंने अपनी आँखें आसपास के अंधेरे में घुमाई, तभी एकाएक मुझे कालेज के समय जब मैं नई छात्रा थी, अपने ब्वायफ्रेंड के साथ की गई एक कार यात्रा याद आ गई। हमने कार खड़ी की थी और जोर से प्यार करने लग गए थे। वह रुक नहीं पाया और वह मेरे भीतर प्रवेश करने देने के लिए मेरे सामने गिड़गिड़ाया। लेकिन मैंने इनकार कर दिया। हाथ स्टीयरिंग पर रखे हुए, संगीत सुनते हुए मैंने उस दृश्य को वापस याद करने का प्रयत्न किया। लेकिन मैं उसका चेहरा नहीं स्मरण कर पाई। यह सब अविश्वसनीय रूप से काफी समय पूर्व घटित हुआ-सा लग रहा था।
मेरी सोना बंद कर देने के पूर्व की सभी स्मृतियाँ अत्यंत तीव्रता से मुझसे दूर जाती-सी प्रतीत हो रही थीं। यह कितना अजीब अनुभव था मानो मैं जो रोज रात को सोने जाती थी, वास्तविक 'मैं' नहीं थी और उस काल की स्मृतियाँ वास्तव में मेरी नहीं थीं। लेकिन इस बात का भान किसी को नहीं हुआ। किसी ने ध्यान नहीं दिया। क्या होता है, यह केवल मैं जानती हूँ। मैं उन्हें बताने का प्रयत्न कर सकती थी लेकिन वे न समझते। वे मेरा विश्वास न करते, उन्हें इस बात का कोई अंदाजा तक न होता कि मैं क्या महसूस कर रही हूँ। वे मुझे अपने अनुगमित संसार हेतु मात्र एक खतरे के रूप में देखते।
लेकिन मैं परिवर्तित हो रही थी। वास्तव में परिवर्तित।
मैं कितनी देर से यहाँ बैठी हुई थी? स्टीयरिंग व्हील पर हाथ रखे। आँखें बंद किए। निद्रा विहीन अंधकार में ताकते हुए।
एकाएक मैं मानव उपस्थिति के प्रति सचेत हुई और अपने आप में लौट आई। बाहर कोई था। मैंने आँखें खोली और बाहर देखा। कोई कार के बाहर था। दरवाजा खोलने का प्रयत्न करता हुआ। लेकिन दरवाज़े लॉक थे। कार के दोनों ओर काली छायाएँ, एक दरवाजे पर एक। मैं उनके चेहरे नहीं देख सकती थी। उनके कपड़े क्या थे नहीं जान सकती थी। केवल दो काली छायाएँ, वहाँ खड़ी हुई।
उनके बीच फंसी मेरी सिविक कार बहुत छोटी लग रही थी—किसी पेस्ट्री बॉक्स की भाँति। एक मुट्ठी दाईं ओर के दरवाज़े को पीट रही थी। मैं जानती हूँ यह पुलिस नहीं है। एक पुलिस वाला कभी इस तरह शीशे पर नहीं पीटेगा और मेरी कार को नहीं हिलाएगा। मैंने अपनी साँस रोकी। मुझे क्या करना चाहिए? मैं सीधे नहीं सोच पा रही थी। मेरी अंडरआर्म्स पसीने से भीग गई थीं। मुझे यहाँ से निकल जाना चाहिए। चाबी। चाबी घुमाओ। मैंने चाबी पकड़ी और उसे दाहिने घुमाया। स्टार्टर में घरघराहट हुई।
लेकिन इंजन नहीं चालू हुआ। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने आँखें बंद कीं और फिर चाबी घुमाई। कुछ नहीं हुआ। ऐसी आवाज आई जैसे कोई नाखून से दीवार खुरच रहा हो, बस। मोटर बार-बार बस घूमती रही। वे आदमी—काली छायाएँ—मेरी कार को झकझोरते रहे। झटके बढ़ते ही जा रहे थे। वे मुझे उलट देने वाले थे।
कुछ गलत है। शांत हो जाओ और सोचो, फिर सब ठीक हो जाएगा। सोचो, बस सोचो। आहिस्ते से। ध्यान से। कुछ गलत है।
कुछ ग़लत है।
लेकिन क्या? मैं नहीं कह सकती। मेरा मस्तिष्क गहन अंधकार से भरा हुआ था। और मुझे कोई मदद नहीं कर पा रहा था। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने चाबी को बाहर निकाल कर फिर से लगाना चाहा। लेकिन मेरे काँपते हाथों को छेद नहीं मिला। मैंने फिर प्रयत्न किया लेकिन चाबी ही गिरा दी। मैंने टेढ़े हो कर उसे उठाना चाहा लेकिन उसे नहीं पा सकी। कार आगे पीछे हिल रही थी। मेरा माथा स्टीयरिंग व्हील से टकराया।
मुझे चाबी कभी नहीं मिलेगी। मैं सीट पर गिर पड़ी और हाथों से अपना चेहरा ढंक लिया। मैं रो रही थी। बस मैं रो ही सकती थी। आँसू बहते रहे। इस नन्हे बक्से में बंद मैं कहीं नहीं जा सकती थी। यह रात का समय था। आदमी कार को हिलाए जा रहे थे। वे उसे उलट देने वाले थे।
(जे रूबिन के अँग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित)
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श्रीविलास सिंह वरिष्ठ कवि, गद्यकार एवं अनुवादक हैं। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : श्रीविलास सिंह
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