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प्रेमचंद से संवाद (यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते)
प्रेमचंद से संवाद (यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते) हिमांशु विश्वकर्मा यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते, तो वे भारत से क्या कहते और हम उनसे क्या पूछते? यदि सचमुच मुझे आज प्रेमचंद से मिलने का अवसर मिलता, तो शायद सबसे पहले मैं उनसे यही पूछता- “प्रेमचंद जी, आज का भारत देखकर आपको कैसा लगता है?” वे संभवतः मुस्कुराकर कहते- “भारत बदला है, और बहुत बदला है। विज्ञान आगे बढ़ा है, लोकतंत्र मजबूत हुआ है, शिक्षा का विस्तार हुआ है, तकनीक ने जीवन को नई गति दी है। इन उपलब्धियों पर प्रसन्न होना च


नींद
मूल कहानी : हारुकी मुराकामी अनुवाद : श्रीविलास सिंह बिना नींद के यह मेरा लगातार सत्रहवाँ दिन है। मैं अनिद्रा रोग के संबंध में बात नहीं कर रही हूँ। मैं जानती हूँ अनिद्रा रोग क्या होता है। मुझे इस तरह का कुछ काॅलेज के दिनों में हुआ था- ‘इस तरह का कुछ’ इसलिए क्योंकि मैं निश्चित नहीं हूँ कि तब जो हुआ था वह ठीक-ठीक वही था जिसे लोग अनिद्रा रोग कहते हैं। मैं सोचती हूँ कि एक डॉक्टर मुझे इस संबंध में बता सकता था। लेकिन मैं किसी डॉक्टर के पास नहीं गई। मैं जानती थी कि इससे कोई फायदा न


बिल्लियों का क़स्बा
कौवों का एक झुंड कांव-कांव करता हुआ आकाश के पार चला गया। टेंगो खड़ा हुआ, अपने पिता के पास गया और उनके कंधे पर अपना हाथ रख दिया। "विदा, पिता जी, मैं जल्दी ही फिर आऊंगा।"
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