बसंत का हृदय
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Updated: 17 hours ago

मूल कहानी : विलियम बटलर येट्स
अनुवाद : उपमा ऋचा
एक बहुत बूढ़ा व्यक्ति, जिसका चेहरा चिड़िया के पैरों जितना सूखा था, पहाड़ी-बादामों से घिरे टापू के शोर मचाते समतल किनारे पर ध्यानस्थ बैठा था। सत्रह-अठारह बरस का तांबई रंग का एक लड़का उसके क़रीब बैठा, शांत पानी में मक्खियाँ निगलने के लिए डुबकी लगाते पंछियों को देख रहा था। बूढ़ा आदमी पुराना, नीला वेलवेट सूट पहने था जबकि लड़के ने कोट और नीली टोपी पहन रखी थी। उसके गले में नीले मोतियों की जपमाला थी। उन दोनों के पीछे पेड़ों से आधी ढकी, मोनेस्ट्री खड़ी थी। यह मोनेस्ट्री बहुत पहले, क्वीन पार्टी के लोगों द्वारा जला दी गई थी। लेकिन लड़के ने उसकी छत पलट दी थी, ताकि अपने अंतिम दिनों में वहाँ शरण ले सके। उसने बगीचे में काफी समय से अपना फावड़ा इस्तेमाल नहीं किया, इसलिए एक-दूसरे से लिपटती लिली व गुलाब की टहनियां निर्द्वंद्व होकर किनारे खड़े सरकंडों और खरपतवार से मिलने पहुंच गई थीं। लिली और गुलाब के पार खड़े इन सरकंडों का विस्तार इतना बढ़ गया था कि आसानी से कोई बच्चा इनमें छिप सकता था। उनके भी पीछे पहाड़ी-बादाम और ओक के छोटे पेड़ों की कतारें थीं।
देर से चुप बैठे लड़के ने पहलू बदला और बोला, “मालिक इस लंबे उपवास और मछ्ली के कांटे के साथ रात भर की मेहनत, आपकी सेहत और ताकत के हिसाब से बहुत ज़्यादा है। थोड़ी देर के लिए आराम कर लीजिए। आपका हाथ मेरे कंधे से भी ज़्यादा भारी हो चला है और जहाँ तक मुझे मालूम हो रहा है, आज आपके पैर भी आपके कहे में नहीं है। लोग कहते हैं कि आप बाज से भी ज्यादा बूढ़े हैं, लेकिन आप अपनी उम्र के मुताबिक जरा आराम नहीं करते।”
वह भावुकता के साथ गुस्से में कहता जा रहा था, जैसे कि उसका हृदय शब्दों में ढल चुका हो और विचार उसकी मुद्राओं में.... उधर बूढ़े आदमी ने सुना, मगर धीरे-धीरे सोच-समझकर उत्तर दिया, जैसे उसका मन पुराने दिनों और पुराने कामों में खोया हो,
“पिछले पाँच साल से पूरी निष्ठा, लगन, ईमानदारी और लगाव के साथ मेरी देखभाल करते हुए तुम मुझे अकेलेपन के उस डर से थोड़ा-बहुत दूर ले आए हो, जो हमेशा विवेक अथवा बौद्धिकता के ऊपर झरता रहता था। अब जब अंत मेरी मुट्ठी में है, तब तुम्हारे लिए यह जान लेना बहुत जरूरी हो जाता है। इसलिए आज मैं तुम्हें बताउंगा कि क्यों मैं आराम नहीं करता या कहता रहता हूँ कि मैं आराम के लिए नहीं बना।”
“नहीं मालिक, आप यह मत सोचिए कि मैं आपसे सवाल कर रहा हूँ। मेरा काम केवल आग जलाना, बारिश से बचाने के लिए छप्पर की मरम्मत करना और उसे मजबूत बनाना है ताकि पेड़ों के बीच से होकर हवा चाहे जितनी भी तेज बहे, लेकिन छप्पर अपनी जगह बना रहे। अलमारी से भारी किताबों को निकालकर लाना और सिधे (आइरिश परी) का नाम लेकर कोनों से भारी तस्वीरों को उठाना भी मेरा ही काम है। मुझे अपने मन को जिज्ञासा व आदर से भरे रखना है क्योंकि ईश्वर ने हर प्राणवान वस्तु को भरपूर विवेक दिया है और मैं जानता हूँ कि मेरे विवेक के लिए ये तमाम काम....।”
“तुम डरते हो?” बूढ़े आदमी ने लड़के को बीच में टोकते हुए सवाल किया, तो उसकी आँखों में क्षणभर के लिए गुस्से के डोरे तैरे और फिर डूब गए।
“कभी-कभी रात में” लड़का बोला, “दरअसल जब आप अपने हाथ में लकड़ी की छड़ी लेकर पढ़ते हैं, मैं दरवाजे की ओर नजर उठाता हूँ और देखता हूँ कि एक विशालकाय आदमी पहाड़ी बादाम के पेड़ों के बीच से आकार ले रहा है। फिर अनगिनत छोटे इंसान उसके आगे नन्ही सफेद गायों को हाँकते चलते हैं। मुझे उन छोटे लोगों से उतना डर नहीं लगता, जितना कि उस विशालकाय छाया से। घर के नजदीक आकर वे गायों का दूध दुहते हैं, फौरन ही उस कच्चे दूध को पी लेते हैं और फिर नाचना शुरू कर देते हैं। मैं जानता हूँ कि जिस हृदय में नृत्य हो, वह कभी बुरा नहीं हो सकता फिर भी.... जानते हैं मालिक मुझे उनकी हर बात डराती है। वैसे मुझे सफेद लिबास में ढंकी उन सब लंबी औरतों से भी डर लगता है, जो हवा के साथ बाहर निकलती हैं और बेआवाज इधर-उधर डोलती हैं। गुलाब और लिली के पौधों के पास रेंगती हैं और अपने खुले बालों को झटककर पीछे करती हैं। मैंने कई बार उनको सिर से सिर जोड़े फुसफुसाते हुए भी सुना है। हालांकि वे देखने में कोमल और सुंदर हैं, लेकिन मुझे उनसे डर लगता है। इनके अलावा केवल मुझे फोरबिस के बेटे ऐंगुस से, सिधे के बंदों से और उस कला से डर लगता है, जो उन्हें गढ़ती है।”
“क्यों…?” बूढ़े आदमी ने कहा, “क्या तुम्हें प्रभु से डर लगता है जिसने तुम्हारे पिता के भी पिता के लिए युद्ध में ललकारने वाले हथियार बनाए या बौने लोग, जो समंदर से निकलकर रात में आते हैं और झींगुरों के साथ आत्मा की गहराइयों से निकालने वाला गीत गाते हैं? सच यह है कि हमारे बुरे दिन धरती का अकेलापन देख रहे हैं। मैं तुमसे एक बात जरूर कहूंगा कि जब दूसरे लोग उम्र की थपकियों में सिकुड़े पड़े हैं, मैं भूखा रहता हूँ, मेहनत करता हूँ। मगर एक बार मुझे तुम्हारी मदद के बिना, अपने दम पर भूखा रहकर मेहनत करनी है। सुनो तुम जाओ, एक झोंपड़ी बनाओ, खेतों को सींचो, शादी करो और प्रभु को भूल जाओ लेकिन क्या तुम मेरा एक आखिरी काम करोगे? मैंने बुरी नजर से राजा-महाराजाओं को बचाने और सिधे के बंदों से लोगों के पशुओं को सूखने व मक्खन को चूरन बनने से बचाए रखने के एवज में मिला ढ़ेर सारा सोना और चांदी जमा कर रखा है। मैंने यह सब उस दिन के लिए बचाया था जब मेरा काम समाप्त हो जाएगा और अब जबकि सब कुछ समाप्त होने के कगार पर है, तुम्हें किसी तरह की कोई कमी नहीं रहेगी। मैं पूरी उम्र जीवन का रहस्य जानने के लिए भटकता रहा। मैं अपने यौवन से खुश नहीं था क्योंकि मुझे पता था कि यह गुजर जाएगा। न मैं अपने पौरुष से खुश था, क्योंकि मुझे पता था कि जब समय आएगा, तब मुझे अपने यौवन, अपने पौरुष, अपनी उम्र सबको खुद ही त्याग देना होगा, एक बड़े सत्य की तलाश के लिए... मैं जानता हूँ कि इन सांसों का किराया सदियों से भरा जाता रहा है। एक दिन मैं भी अपने प्रभु जैसा हो सकता हूँ… नहीं-नहीं, मैं सचमुच वैसा हो जाउंगा।
लड़कपन में स्पेनिश मोनेस्ट्री से मिली एक हिब्रू पांडुलिपि में मैंने पढ़ा था कि सूरज निकलने के बाद एक क्षण आता है, जब कई आश्चर्यजनक घटनाएँ एक साथ घटित होती हैं। यहाँ वापस आकर मैंने जादूगर और गायों के डॉक्टर से पूछा कि शायद उन्हें मालूम हो कि ऐसा क्षण कब आता है। पर अफसोस, मेरे आस-पास किसी को उसके बारे में पता नहीं था। इसलिए मैंने खुद को ही जादू की किताबों के सुपुर्द कर दिया। मैंने अपनी पूरी जिंदगी भूखे रहते और मेहनत करते गुजार दी कि शायद मैं प्रभु या परियों को अपने पास ला सकूँ। और अब इन आखिरी सांसों के बीच लाल टोपी और दूध जैसे सफेद होठों ने मेरे कान में मुझसे कहा कि वह क्षण हाथ में है। मैं कल अलसभोर में उस क्षण को पा लूंगा। उसके बाद मैं सीधा दक्षिण चला जाऊंगा और अपने लिए संतरे के पेड़ों से सजा, सफेद संगमरमर का घर बनाउंगा। अपनी समस्त शक्ति और सुंदरता को फिर से इकट्ठा करके यौवन के आंतरिक साम्राज्य में प्रवेश करूंगा। लेकिन मुझे याद है, लाल टोपी और दूध जैसे सफ़ेद होठों ने मुझसे यह भी कहा था कि तुम मेरी खिड़की, दरवाजे और फर्श पर हरियाली रख देना, मेज को गुलाब और लिली से भर देना। तो प्लीज आज रात को तुम यह काम जरूर कर देना! और फिर कल भोर की पहली किरण के साथ आना, मुझे देखना। ठीक है?”
“क्या तब आप फिर से युवक बन जाओगे?” लड़के ने कहा।
““हम्म... आज रात के बाद मैं वैसा ही हो जाऊंगा जैसे कि तुम हो! हाँ, बिल्कुल ऐसा ही! लेकिन अभी मैं बूढ़ा और अशक्त हूँ। इसलिए इस वक्त किताब लाने या कुर्सी तक पहुँचने में तुम्हें मेरी मदद करनी होगी।”
बूढ़े को छोड़कर जब लड़का गया, तब उसके कमरे में लैम्प जला रहा था, जिसमें से किसी अनजाने फूल-सी महक उठ रही थी। लड़का जंगल में गया और पहाड़ी बादाम की हरी डालियों को काटने लगा। टापू के पश्चिमी छोर पर खूब सफाई कर डाली जहाँ छोटे पत्थरों ने मिट्टी और रेत को फिसलने की वजह दे रखी थी। रात होने से पहले उसने अपनी जरूरत भर की लकड़ी काट ली थी। आधी रात तक उन्हें ढोने के बाद वह गुलाब और लिली लाने के लिए वापस चल पड़ा। यह रात उन्हीं गुनगुनी और सुंदर रातों में से एक थी जब सब कुछ बहुमूल्य पत्थर में तराशा महसूस होता है। दक्षिण के वन ऐसे लग रहे थे जैसे उन्हें पन्ने (रत्न) से काटकर खड़ा कर दिया गया हो और उन्हें प्रतिबिंबित कर रहा पानी भी दूधिया रंगत लिए था। उसने जो गुलाब चुने, वे माणिक्य जैसे थे और लिली मोती के जैसी... उस क्षण आस-पास बिखरी हर चीज अनमोल लग रही थी सिवाय इधर-उधर उड़ते उन जुगुनुओं के, जिनका धुंधला प्रकाश छाया में फूटता था। इस निश्चल रात में केवल यही एक शै थी, जो जीवित प्रतीत हो रही थी और यही एक शै थी जो सांसारिक इच्छाओं के समान नश्वर लग रही थी।
लड़के ने बाहों भर गुलाब और लिली के फूल जमा कर लिए और तमाम मोती-माणिक्य के साथ जुगुनुओं को दौड़ाता हुआ अपने कमरे में ले आया जहाँ बूढ़ा आदमी आधी नींद में था। लड़के ने अंजुली भर-भरकर गुलाब और लिली के फूल मेज और फर्श पर फैला दिए। फिर हौले से दरवाजा बंद कर खुद को बिस्तर पर गिर पड़ा, पौरुष से भरे उस सपने को देखने के लिए जिसमें उसकी चुनी हुई दुल्हन उसके पास बैठी हो और बच्चो की किलकारी कानों में गूंजती हो। भोर के साथ वह जागा और अपने साथ थोड़ा खाना-पानी लेकर समंदर के किनारे पहुँच गया ताकि उसके मालिक को सफर में परेशानी न हो। वह इंतजार करने लगा और बहुत देर तक इंतजार ही करता रहा। भोर बीत गई। चिड़िया गाने लगी। जब रेत घड़ी में आखिरी कण भी झर गया तब अचानक हर चीज से एक संगीत छलकने लगा। यह लड़के के जीवन का सुंदरतम क्षण था। इस क्षण कोई भी अपने भीतर बसंत के हृदय को धड़कता महसूस कर सकता था।
वह उठा और अपने मालिक को ढूंढने लगा। पहाड़ी बादाम की हरी पत्तियों से कमरे का दरवाजा भरा हुआ था। उनके बीच से रास्ता बनाकर अंदर पहुँचना उसके लिए बहुत कठिन हो गया। जब वह अंदर पहुंचा, सूरज की किरणें फर्श पर उतर रही थीं। दीवारें, मेज, पूरा कमरा हरीतिमा के कोमल स्पर्श से भरा हुआ था। बूढ़ा आदमी गुलाब और लिली को कसकर अपनी बांहों में बांधे निश्चल, निस्पंद साथ बैठा था। उसके दाहिनी ओर, मेज पर (शायद सफर के लिए) सोने-चांदी के सिक्कों से भरी एक पोटली रखी थी, जबकि बाई ओर लंबी छड़ी टिकी हुई थी।
लड़के ने बूढ़े आदमी को छुआ, वह जा चुका था। लड़के ने उसके हाथ उठाए, पर वे भी बिल्कुल ठंडे थे। लड़के ने देखा कि बूढ़े आदमी के पुराने नीले वेलवेट सूट पर भी फूल महक रहे है। जब वह उसे देख रहा था, जाने कहाँ से खिड़की पर जमा पत्तियों में एक कस्तूरिका आकर बैठ गई और गाने लगी...।
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विलियम बटलर येट्स को आधुनिक आयरिश साहित्य का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। उनका जन्म 13 जून 1865 को डबलिन के निकट सैंडीमाउंट में हुआ था। येट्स आयरिश साहित्यिक पुनर्जागरण (Irish Literary Revival) के प्रमुख स्तंभ थे। उन्होंने आयरिश लोककथाओं, मिथकों और रहस्यवाद को अपनी कविता का आधार बनाया। उनकी प्रारंभिक कविताएँ रोमांटिक थीं जबकि बाद की रचनाएँ प्रतीकात्मक, दार्शनिक और राजनीतिक रूप से गहरी थीं। वे आयरिश राष्ट्रवाद से गहराई से जुड़े थे। उन्होंने लेडी ग्रेगरी के साथ मिलकर एबे थिएटर की स्थापना की जो आयरिश नाट्य परंपरा का केंद्र बना। 1923 में उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया। 28 जनवरी 1939 को फ्रांस में उनका निधन हो गया।
येट्स के छंदों की तरह ही उनका गद्य भी बेहद सशक्त है। कई बार लगता है कि उन्होंने किसी कविता को कहानी के शिल्प में कह दिया हो। प्रस्तुत कहानी इसी अनुभूति की बानगी है। जीवन के अर्थ और उद्देश्य को कहने में जब शब्द हार जाएं तब उन्हें केवल अनुभव के माध्यम से ही समझा और समझाया जा सकता है। इस कहानी का बूढ़ा प्रोटेगोनिस्ट हमारे लिए यही संदेश छोड़ जाता है।
उपमा ऋचा पिछले डेढ़ दशक से लेखन, संपादन व अनुवाद कार्य में सक्रिय हैं। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : उपमा ऋचा
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