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दहकते इश्तिहार

  • Jun 28
  • 11 min read


दहकते इश्तिहार
कहानी : नितिन यादव 

उसने वापस से बंडल में बीड़ियों को गिना। मायूसी से वापस गिना। हां, पांच ही थीं। उसका अनुमान था कि शायद छः-सात होंगी। उसने बीड़ी के बंडल को दोनों हाथों से रगड़ा। फिर उसे याद आया कहीं इस चक्कर में कोई बीड़ी टूट न जाए। उसने चुपचाप बीड़ी के बंडल को पेंट की जेब में मोबाइल के पास खिसका दिया। मोबाइल निकालकर समय देखा। छ: बज चुके थे। मोबाइल वैसे भी पिछले तीन दिनों से समय देखने के ही काम आ रहा था। बैटरी बचाने के चक्कर में पिछले दिनों से वह मोबाइल को जेब से कम ही निकाल रहा था। मोबाइल चार्ज किए उसे चार दिन हो चुके थे। पड़ोस की जिस दुकान पर वह मोबाइल चार्ज करता था, वह कर्फ्यू में बंद थी।


सर्दी से उसे शुरू से ही चिढ़ थी। भीषण गर्मी में रात ठीक से कट जाती थी। बरसात में जींद-जिनावर की चिंता सालती थी। पन्द्रह बरस पहले जब वह चार साल का था, तबसे उसका कस्बे के इस फ्लाईओवर के नीचे जीवन कट रहा था। उसे दीवारों के साथ नहीं, वाहनों के शोरगुल के साथ रहने की आदत थी।


दिन में इस फ्लाईओवर के नीचे पूरा एक बाजार सजता था। ‌शाम की वीरानी में इस फ्लाईओवर के खंभे ज्यादा बड़े और छोटे नजर आते थे। लेकिन पिछले तीन रोज से दिन भी वीरान थे। दिन में उसने ऐसा सन्नाटा कभी नहीं देखा था। दिन भर की तनहाई और उदासी मिटाने के लिए उसके पिता ने शाम होते ही रोटियां बना ली थीं। खाना खाने के बाद बर्तन धोते हुए उसने अपने पिता से कहा “आज तो सर्दी ने कड (कमर) ही तोड़ दी है! तू रोज लकड़ियों की कमी का बहाना बनाकर अलाव नहीं जलाने देता पर आज की सर्दी में बिना अलाव पार नहीं पड़ेगी। अलाव जलाने के लिए कुछ लकड़ियां दे दे। मैं सुबह तेरे को चूल्हे के लिए लकड़ियां ला दूंगा।”


उसके पिता ने बीड़ी पीते हुए धीमें से कहा, “सुबह लकड़ी कहां से ला देगा? तुझे पता है ये कर्फ्यू कितने दिन चलेगा? वैसे भी एक दिन की लकड़ियां ही और बची हैं…”


“तो फिर क्या करूं इस जोर के जाड़े से बचने के लिए? और जाडा़ क्या मेरे अकेले को लग रहा है? तेरे को भी लग रहा है, पर तू चुप है। चुप्पी से जाड़ा ना मिटने वाला। मैं ही करता हूं कोई सिस्टम सेट।” उसने हाथ में माचिस की डिबिया को हिलाते हुए कहा। वहां फ्लाईओवर के नीचे तीन-चार परिवार और रहते थे। सिस्टम सेट होने के नाम से उनकी भी दिलचस्पी बढ़ गयी।


उसने लंबा चाकू उठाया और फ्लाईओवर के खंभों पर लगे पोस्टर काट-काट के हटाने लगा। उसका पिता बीड़ी पीते हुए चुपचाप उसे देखता रहा। कुछ देर बात वह जब पोस्टरों को उठा कर ला रहा था तब उसने नंगी दीवार की तरफ देखा। सबसे पुराना पोस्टर एक धार्मिक धर्मगुरु का था उसने अपने पिता से कहा “पहले कितना पतला था यह बाबा! मेरे तो यह पहचान में ही नहीं आ रहा।”


उसके पिता ने तेरह-चौदह साल पुराने पोस्टर को ध्यान से देखते हुए कहा “सच में उस समय बाबा की हालत पतली ही थी। तब यह नया-नया उभरा था। एक बड़ा सत्संग उसने इस कस्बे में किया था। जब यह फ्लाईओवर बना तो नगरपालिका ने यहां लिखवाया था –‘यहां पोस्टर लगाना मना है। जुर्माना इक्यावन सौ रुपए।’”


उसने पिता की अंगुली के इशारे का पीछा किया। दीवार पर ऊपर पोस्टर चिपके हुए थे। नगरपालिका की लिखावट कहीं नहीं दिखी। उसके पिता ने आगे कहा “तब किसी की हिम्मत नहीं हुई यहां पोस्टर लगाने की और आज जहां नगरपालिका ने यह लिखा था ने, वहां भी पोस्टर चिपक गए हैं। बाबा ने पूरे कस्बे में सत्संग के पोस्टर लगवाए और यहां भी सबसे पहले बाबा के ही पोस्टर लगे। अब भला बाबा का कौन चालान काटे।”


अलाव की ताप में हाथ मलते हुए उसने कहा, “मतलब बाबा ने ही सबके लिए रास्ता खोला।” उसके पिता ने माचिस की तिल्ली से कान साफ करते हुए कहा, “पता नहीं औरों का रास्ता तो खुला या नहीं, पर बाबा का जरूर खुल गया। आजकल तो बाबा टीवी और अखबार में भी खूब नजर आता बताया। तेरे मोबाइल में भी तो दिखता होगा वह।”


पुरानी पोस्टरों में से जब वह एक पोस्टर उठाकर आग में डालने लगा तो उसने अपने बाप से पूछा यह नेता कौन है? उसके बाप ने हंसते हुए कहा “अरे ! यह तो पुराना विधायक है। बाबा के बाद इसी के पोस्टर लगे थे यहां। उसी के बाद तो इसे यहां की टिकट मिली थी। बाबा के यहां खूब धोक मारी थी इसने। अब इसकी शक्ल-सूरत काफी बदल गई है, इसी वजह से तू पहचान नहीं पा रहा। इसका लड़का आजकल जब रैलियां करता है तो तू जाता तो है बस में बैठकर वहां।”


उसने चहकते हुए कहा, “हां, लड़का इसका अच्छा है। खुले दिल का है। पैसे खर्चने में झिझकता नहीं। उसने अपने पुराने, टूटे हुए मोबाइल को सहलाते हुए कहा टाइम टू टाइम रिचार्ज भी करा देता है।”


उसके पिता ने आग की स्वर्णिम लपटों की ओर देखते हुए कहा, “इसका बाप खर्चीला नहीं था। खर्चता भी कहां से? गरीब परिवार से था। अब तो सुनते हैं कि वह आधा समय विदेश ही रहता है। आग लगे तेरे इस फोन को इसी के चक्कर में तो कस्बे में कर्फ्यू लगा है। पता नहीं कौनसा वीडियो-फीडियो फैला दिया इस मोबाइल से।”


पिता को यादों में खोते देख उसने कुछ और पोस्टर आग के हवाले किए। आग में दमकते हुए पूर्व छात्र नेता और वर्तमान विधायक इन वेटिंग के चेहरे को देखते हुए उसने उत्साह से कहा, “काका इस छोरे की रगड़ाई देख। एक बार इसको विधायक बनने दे। सारा माहौल बदल देगा यह।”


उसके पिता ने बरसों पुरानी  छात्र नेता की तस्वीर देखते हुए कहा, “मैंने इसे लड़कपन में मोटरसाइकिल पर यहां चौराहे पर चक्कर काटते हुए देखा है। इसे माहौल बनाना आता है, बदलना नहीं। झूठ और गरीब परिवार में पैदा होने की सहानुभूति के साथ कब तक इसकी पार पड़ेगी।”


तब तक और परिवारों के लोग भी खाना खा-पीकर अलाव के पास आ गए। फ्लाईओवर के नीचे रहने वाले ये चारों परिवार रिश्तेदार ही थे। खानाबदोश और घुमंतू इतिहास के साथ वे पन्द्रह साल पहले इस कस्बे में आए थे। तब यह फ्लाईओवर नया-नया बना ही था। कस्बे की जन्म कुंडली में जबसे यह नेशनल हाई-वे आया था, तब से कस्बे की सेहत और आकार दोनों में वृद्धि हो रही थी। दिन भर इस फ्लाईओवर के नीचे चौराहे पर रेलमपेल रहती थी। ये परिवार भी अपनी पुश्तैनी कारीगरी से लोहे का काम करके पेट भर रहे थे। कस्बा भले ही उनके लिए नया हो लेकिन फ्लाईओवर के खंभों पर लगने वाले इश्तिहार उन्हें कस्बे की उथल-पुथल की जानकारी देते रहते थे।


आग में क्रिकेट प्रतियोगिता का पोस्टर डालते हुए उसने हैरानी से कहा “बरसों पहले भी इनामी राशि इक्यावन हजार थी! मतलब तब भी टूर्नामेंट में बहुत पैसा खर्च होता था।”


उसका चाचा (जो अभी आकर बैठा ही था) ने समझाते हुए कहा “पूरा बाजार चंदा देता था। नेता-नांगले और बाबाओं से अलग पैसा मिलता रहा है शुरू से। तो टूर्नामेंट में पैसे की कैसी दिक्कत होती?”


उसने जिज्ञासा से पूछा “तो फिर सोनू! वह तो बहुत बढ़िया क्रिकेट खेलता था, मैंने सुना है। वह क्यों यहां चौराहे पर समोसे का ठेला लगाता है?”


उसके चाचा ने उसकी मूर्खता पर हंसते हुए कहा “इनाम क्लब को मिलता था, ना कि सोनू को। सोनू को तो वो जगह-जगह टूर्नामेंटों में खिलाने ले जाते थे। मैच खत्म पैसा हजम।”


कुछ पलों के मौन के बाद मंदिम पड़ती आग में उसने भव्य प्राइवेट हॉस्पिटल के विज्ञापन का पोस्टर डाला। हॉस्पिटल के मालिक डॉक्टर को वो सभी जानते थे। कस्बे का पहला प्राइवेट बड़ा हॉस्पिटल था वो। उसकी मां जब बीमार हुई थी, तब यही डॉक्टर सरकारी हॉस्पिटल का हेड था। उस समय उसका सारा ध्यान अपनी प्रैक्टिस और निजी हॉस्पिटल खोलने के ऊपर था। सरकारी हॉस्पिटल की हालत बदहाल थी और डॉक्टर के पास उन जैसों के लिए समय नहीं था। उसे लगा जैसे हॉस्पिटल के विज्ञापन के ऊपर उसकी मां की लाश की परछाई तैर रही हो। माहौल में पसरी ठंड को धकेलते हुए उसने कहा, “काका, अब तो खूब प्राइवेट हॉस्पिटल हो गए हैं कस्बे में। यह पहला हॉस्पिटल था। अब तो उसके अस्पताल की हालत खस्ता है।”


उसके रिश्ते में लगने वाले बड़े भाई ने सर के मफलर को वापस से बांधते हुए कहा “उस समय तो डॉक्टर ने जमकर रुपए कूटे। उसका छोरा विदेश से डॉक्टरी कर रहा है मामला जमा लेगा वह फिर से।”


उसने बात बदलते हुए कहा “चाचा कितने दिन और यह कर्फ्यू रहेगा?”


उसके रिश्ते के बड़े भाई ने ने हंसते हुए कहा “तुझे कर्फ्यू से पेट पर पड़ने वाली लात से मतलब नहीं है। तुझे तो मोबाइल में आने वाले इंटरनेट की बंदी हटने से मतलब है।”


उसने शर्माते हुए पैर के नाखून रगड़ते हुए कहा “नहीं भाई कर्फ्यू के चक्कर में चलने वाले साधन कितने कम हो गए हैं। मुझे तो इस शांति में नींद ही नहीं आती।” जबकि वह अंदर ही अंदर सोच रहा था कि वह दिन में कितनी बार मोबाइल चेक करता है कि इंटरनेट आ गया क्या।


उसके चाचा ने गुस्से से कहा “सारी फसाद की जड़ यह मोबाइल ही है। पता नहीं आजकल के बच्चे इसमें क्या करते रहते हैं। इनके चक्कर में हमारे पेट पर लात पड़ जाती है।”


उसने चाचा को समझाते हुए कहा “चाचा तेरे को पता है, हम जो लोहे की चीजें बनाते हैं, वैसी ही चीजें इंटरनेट पर खूब महंगी-महंगी भी बिकती हैं। जो लोग हमारे साथ दस-बीस के लिए मोल भाव करते हैं वही लोग ऑनलाइन सौ-दौ सौ फालतू देकर चाव से चीज मंगाते हैं। अंतर तो सिर्फ बाहर के डिब्बे का होता है।”


“सजावट का ही तो पूरा खेल है बेटा” उसके पिता ने विज्ञापनों के पोस्टरों की ओर देखते हुए कहा।


उसने अलाव में नया पोस्टर डालते हुए पोस्टर को गौर से देखा। बरसों पुराना यह पोस्टर शहर के पहले बड़े पब्लिक स्कूल का था। जिसका मालिक आजकल अगले विधानसभा चुनाव के लिए जोर-शोर से तैयारी कर रहा था और उसके नए पोस्टर भी फ्लाईओवर के खंभों पर लगे हुए थे। उसने अपने चाचा से पूछा “चाचा यह ज्यादा पढ़ा-लिखा तो नहीं लगता। स्कूल खोलने का इसका जुगाड कैसे बैठा?”


चाचा ने याद करते हुए बताया “पहले इसका यहां होटल था। हाईवे से आते जाते बड़े-बड़े नेता वहीं रुकते थे। धीरे-धीरे यह उनकी दलाली करने लगा। कुछ पैसा गांठ का था। कुछ इन नेताओं का। जमीन एक शराबी की थी। उसको महीनों शराब पिलाकर औने-पौने दामों पर जमीन इसने हड़प ली।”


उसके चाचा के लड़के ने कहा “काका तुम्हें यह सब बात कैसे पता रहती है ?”


उसके चाचा ने कहा “बेटा इस कस्बे की सारी बातें तो घूम फिर कर इस चौराहे पर ही टहलती रहती हैं।”


उसे अचानक से चौराहे के पास का ही सरकारी स्कूल याद आया जहां वह दो-तीन साल गया था। इसलिए थोड़ा बहुत पढ़ना-लिखना सीख गया। कागज पत्तर थे नहीं मां बाप के पास लेकिन फिर भी उन्होंने दो-तीन साल बिठा दिया स्कूल में, यह क्या कम है। नहीं तो वह इश्तिहार भी नहीं पढ़ पाता। लेकिन उसने कभी इश्तिहारों पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि उसे पता था कि ये इश्तिहार उसके लिए नहीं हैं। न तो उसका मतदाता पहचान पत्र है और न ही जेब में रुपये।


आदत से मजबूर होकर उसका हाथ फिर अपने मोबाइल पर चला गया। हाथ को धीमे से बाहर लाते हुए उसने अपने चचेरे छोटे भाई से लेने के लिए पुराने इश्तिहारों के पोस्टर की ओर हाथ बढ़ाया। पोस्टर कस्बे के पुराने मॉल का था। उसने पोस्टर को गौर से देखते हुए कहा “काका अब तो यह काफी बड़ा हो गया है उस समय तो यह इतना बड़ा नहीं था।”


उसके चचेरे बड़े भाई ने झपटकर कहा, “इससे भी बड़ा मॉल खुलने वाला है कुछ दिनों में। चिंता मत कर। ये तेरे चौराहे की दुकानें थोड़े दिन में पानी मांगेगीं। जनता को अब मॉल में ही मजा आता है‌।”


उसके चचेरे छोटे भाई ने खुश होते हुए कहा, “मैं वहां मोमोज की दुकान लगाऊंगा। कस्बे में मोमोज की बहुत खपत है।”


उसने व्यंग्य में कहा “मोमोज बनाएगा कौन बेटा?”


चचेरे भाई ने इत्मीनान से कहा “वह तो मैं तेरे मोबाइल में वीडियो देखकर सीख लूंगा। इसमें क्या बड़ी बात है।”


“हां तेरे लिए तो कोई बड़ी बात नहीं है” उसने हंसते हुए कहा और पोस्टर आग में डाल दिया। मोमोज से ध्यान हटाने के लिए उसने आग में जलते पोस्टर पर निगाह डाली। पोस्टर एक पुरानी गौशाला का था। उसके मन में सवाल आया– पहले गोशाला के इतने पोस्टर नहीं थे। आजकल तो हर दूसरा पोस्टर गोशाला का है। पर उसने सवाल को अंदर ही कहीं दबा लिया। उसे पिछले बरस की घटना याद आई जब इसी चौराहे पर गौ-तस्करी के शक में दो लोगों की जमकर पिटाई हुई थी‌। बाद में पुलिस भी आई थी और उन्हें धमका गई थी कि कोई भी फालतू बयान नहीं देगा। पुलिस के डंडे को अपनी कमर पर महसूस करते हुए उसने एक पोस्टर को बेरहमी से आग की तरफ फेंका। आग के बीच हंसता वह विज्ञापन एक होटल का था जिसके बारे में कस्बे में तरह-तरह की अफवाह थी। उसने अपने चचेरे भाई से पूछा, “यह होटल क्या शुरू से ही ऐसा है?” उसके चचेरे भाई ने शरारतपूर्ण ढंग से हंसते हुए धीरे से कहा, “जुआ, सट्टा और रांडबाजी तो वहां शुरू से ही होती है।” 


पुराने विज्ञापनों के बंडल में से अंतिम पोस्टर आग में फेंकते हुए उसने राहत की सांस ली। विज्ञापन किसी चिटफंड कंपनी का था। जिसका नाम उसने नहीं सुना था। विज्ञापन को जलते देख उसका चचेरा बड़ा भाई बोला “हाय लगेगी इसके मालिक को। गरीब गुरबों का पैसा खा गया। अब अखबारों में समाजसेवी बना घूमता है।” उसके चाचा ने कहा “पहले विज्ञापन के पोस्टर कई दिन तक टिक जाते थे। अब तो एक ही दिन में एक विज्ञापन पर दूसरा और उस पर कोई तीसरा पोस्टर चिपका जाता है। बहुत तेजी आ गई है मार्केट में। अब टिकना इतना आसान नहीं है।”


 वह अपने चचेरे छोटे भाई को और पुराने इश्तिहार खंभे से काटकर लाने के लिए भेजने वाला ही था, तभी पुलिस का सायरन सुनाई दिया। वे अलाव की आग को जल्दी-जल्दी बुझाने लगे। पुलिस जीप की रफ्तार धीमी हो गयी। जीप से आवाज आई, “सो जाओ बहन...  कर्फ्यू में भी चैन नहीं है भोंसड़ी के।”


सोने से पहले उसने बीड़ी फिर गिनी। दो बीड़ी बची थी। कर्फ्यू में यदि कल भी दुकान नहीं खुली तो चौराहे पर पड़ी पुरानी बीडीयों के डूंठ ही पीने पड़ेंगे। लकड़ी तो फिर भी वह छिप-छिपा कर बटोर आएगा लेकिन राशन भी तो दो दिन का ही बचा है। एक तो वैसे ही धंधा नहीं है ऊपर से यह कर्फ्यू। उसने पिता की चारपाई की तरफ देखा। उसे पता था, पिता को भी नींद नहीं आ रही। उसे लगा कि वे सब रजाई ओढ़ कर नहीं विज्ञापनों के बंडल के नीचे दब कर लेटे हुए हैं। उसे मां की याद आयी। बिना दीवारों के इस घर में मां दूर खड़ी उसे देख रही है लेकिन इश्तिहारों की दीवारें उसे पास नहीं आने दे रहीं। यह सब सोचते हुए वह नींद की दहलीज तक पहुंच गया।


वह एक मेटाडोर में बंद है। उस मेटाडोर पर बाबा टीका निकाल रहा है। विधायक के लाल झंडी दिखाते ही मेटाडोर तेजी से चल पड़ती है। पीछे-पीछे मोटरसाइकिल पर पूर्व विधायक का लड़का चल रहा है। मेटाडोर में उसके जैसे कई लोग बंद हैं। सांस लेने में घुटन हो रही है। वे जोर-जोर से खिड़की और दरवाजे पीट रहे हैं। तभी मेटाडोर में तेज आवाज में देशभक्ति के गाने गूंजने लगते हैं। मेटाडोर एक बड़े भव्य पब्लिक स्कूल में घुस जाती है जहां उनके सारे शब्द और भाषा को छीन कर छोटे-छोटे सुनहरे बस्तों में बंद कर दिया जाता है। वह आगे की खिड़की से देखता है। ड्राइवर को वह पहचान नहीं पाता। ड्राइवर की बगल में पब्लिक स्कूल का मालिक बैठा है। उसकी बगल में मॉल का मालिक। मेटाडोर तेजी से मॉल में कूद जाती है। मॉल का सारा सामान मेटाडोर की छत पर गिर पड़ता है। उनके सारे कपड़े और जूते गायब हो जाते हैं। छत पिचक कर उनके सर से टकराती है और उसकी चीख निकलती है। सामने डॉक्टर का बड़ा-सा क्लीनिक है। डॉक्टर उन सबके नंगे जिस्म की तरफ देखता है। छोटी सी चिमटी से बड़ी कुशलता से डॉक्टर खुरच-खुरच कर उनकी शिरा और धमनियों से रक्त निकाल कर एक बड़े से प्लास्टिक के टैंक में भर देता है और लापरवाही से मेटाडोर के आगे की तरफ मॉल के मालिक की बगल में बैठ जाता है। मेटाडोर की स्पीड और तेज हो जाती है वह होटल के सामने से गुजरती है जहां कॉल गर्ल उन्हें देखकर हंसती हैं और जुआरी उन पर पैसों की गड्डियां फेंकते हैं। तेजी से उछलकर होटल का मालिक डॉक्टर का हाथ पकड़कर उसकी बगल में बैठ जाता है। मेटाडोर की स्पीड बढ़ती जाती है तभी अचानक से जोर के ब्रेक लगते हैं। मेटाडोर पलट जाती है। सामने सड़क पर एक गाय खड़ी है और वे सभी सड़क पर लहूलुहान पड़े हैं। भीड़ की अफसोस भरी आवाज आती है– “बच गए साले।”


जबर सर्दी में भी मफलर से अपना पसीना पोंछते वह उनींदी आंखों से पहचानने की कोशिश करता है कि जो अभी उसने देखा वह सपना था या फिर जो अब सामने दिख रहे हैं, ये इश्तिहार सपने हैं। वह मेटाडोर के ड्राइवर का चेहरा खंभों पर चिपके इश्तिहारों में ढूंढने लगा।


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नितिन यादव का एक कहानी संग्रह  ‘ऑक्सीयाना और अन्य कहानियां’ (2022) प्रकाशित है। कलमकार राष्ट्रीय पुरस्कार में कहानी वर्ग में प्रथम पुरस्कार। ‘मीमांसा’ पत्रिका के संपादन से संबद्ध रहे। ईमेल : nitinyadav044@gmail.com

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thoitiethomnayorg
Aug 05

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