मुझे एक और चाबी चाहिए

मुझे एक और चाबी चाहिए
कहानी : राहुल कुमार बोयल
एक बीमारी के सिलसिले में मेरा यहाँ आना हुआ है लेकिन कुछ कारणों से एक धर्मशाला में रुकना पड़ा। मुझे कुछ-कुछ याद है कि डॉक्टर ने कहा था―बातों को, चीज़ों को, जगहों को धीरे-धीरे याद रखना मुश्किल होगा। याद रखने के लिए मैं चीज़ों को नोट करने लगा हूँ। क्या करना है, क्या नहीं करना है। हालाँकि अभी तक इन नोट्स की ज़रूरत नहीं पड़ी है। मैं भूलने लगा हूँ कि जो नहीं हुआ, उसे भी याद करने लगा हूँ। एक कार दुर्घटना में सिर पर चोट लगने से मैं तीन माह अस्पताल में रहा, फिर दो माह घर के भीतर। आज बहुत दिनों बाद दूसरे शहर आया हूँ। मेरे साथ मेरा बेटा और धर्मपत्नी कल्याणी भी हैं। वो बगल में आराम कर रहे हैं। मैं अकेला बैठा कुछ लिखने की जुगत में लगा हूँ। जो बीमारी मुझे अभी लगी हुई है, डॉक्टर्स को तो चोट के बाद पता चली है जबकि मुझे पता है, यह बहुत पहले ही मेरे भीतर आ धमकी थी। एक स्मृति कौंध गई है। अचानक मैं खिलखिलाकर हँस पड़ा हूँ और मेरी धर्मपत्नी मुझे हतप्रभ हो देख रही है।
एक जलसे में शामिल होने को ऐसी ही एक धर्मशाला में कई बरस पहले भी रुका था मैं। जुलाई की एक उमस भरी रात थी। पंखा भी सुकून नहीं दे रहा था तो बरामदे में ही मेज खींच लाया। बैठकर अपनी डायरी में कुछ पंक्तियाँ उकेरने की कोशिश कर रहा था। बाहर झमाझम बारिश हो रही थी।
तभी, बरामदे की खिड़की से एक परछाईं अंदर दाखिल हुई। एक आदमी पूरी तरह भीगा हुआ था, था दुबला-पतला। उसके हाथ में एक छोटा सा बैग था। उसने मुझे देखा, फिर एक फीकी मुस्कान के साथ दीवार के सहारे बैठ गया।
उसने मेरी डायरी की तरफ इशारा करते हुए कहा, “क्या लिख रहे हैं?”
मैंने उसकी ओर देखा। वह हँसा, उसकी हँसी में कुछ भी विशेष नहीं था, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उसकी बेबाकी ने मुझे चौंका दिया था। मैं उस अज़नबी को जवाब नहीं देना चाहता था पर जाने क्यों मैं मुस्कुरा दिया। उसकी आँखें मेरी तरफ़ ऐसे टिकी थी जैसे उसे जवाब चाहिए था। मैंने कुछ ठहरकर कहा, “शायद आप जैसे किसी मुसाफिर के बारे में कुछ लिख रहा हूँ।”
“मुसाफिर तो हम सभी हैं ही,” उसने ठंडी साँस ली, “पर कुछ की मंजिल अंधेरों में होती है और कुछ की शायद रोशनी में। आपकी कहाँ है?”
मैंने उसे घूर कर देखा। वह अपनी उँगलियों को लगातार आपस में रगड़ने लगा। मैंने उसकी उँगलियों पर निगाह दौड़ाई तो वह जाने कैसे समझ गया। कहने लगा―“योग है योग। शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और फोकस बेहतर होता है।”
उस रात वह कहीं नहीं गया, वहीं बैठा रहा। एक ही जगह, उँगलियों को रगड़ता हुआ। उसका नाम क्या था, मालूम नहीं और मैंने पूछा भी नहीं। न ही उसने मेरा नाम जानने जैसी कोई उत्सुकता दिखाई। जैसा कि उसने बातों-बातों में बताया कि वह एक चोर था। वह शायद चोर था या नहीं भी था, लेकिन वह चोरी को भी एक कला मानता था और खुद को एक मँजा हुआ कलाकार।
“तुम्हारे इस बैग में क्या है?” मेरी उत्सुकता उसके पेशे में नहीं थी, उसके बैग में थी कि वह खुद को चोर कह रहा है तो क्या वाकई वह है।
उसने अपना बैग खोलकर दिखाया। उसमें कोई कीमती गहना नहीं था, बस लोहे के कुछ महीन औज़ार थे, जिन्हें उसने बड़ी सफाई से कपड़े में लपेट रखा था। कपड़ा खोलकर उसने एक तार निकाला, जो बहुत लचीला था। उसने तार को बड़ी ही नज़ाकत से छुआ। छुआ क्या, सहलाया।
“असली चोर वह है जो ताले के अंतस को महसूस कर ले।”
“लेकिन चोरी तो अपराध है न?”
“कम अज़ कम मेरी कला को अपराध तो न कहिए।”
उसने मुझे बताया कि लोग चोरी को जल्दबाज़ी का काम समझते हैं।
“ग़लत! चोरी सबसे धीमा काम है। आप जो कविता लिखते हैं, उसमें शब्दों को सजाने में घंटों लगते हैं न? मुझे भी ताले की पिन सेट करने में वही धैर्य चाहिए होता है।”
और हाँ, चोरी की बाबत उसने एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात बताई―“सबसे बड़ा चोर वह है जो लोगों की नज़रों में होकर भी ग़ायब हो जाता है। मैं बिल्कुल वैसा ही हूँ जैसे आपकी कविता में इस्तेमाल हुआ एक अदृश्य भाव।”
“कैसे? ज़रा विस्तार से बताएँगे,” मेरी उत्सुकता और जिज्ञासा चरम पर थी।
“सबसे बड़ी तकनीक ही है ग़ायब हो जाना। लोग अपनी आँखों से देखते हैं, जबकि देखना दिमाग से चाहिए। यदि तुम सही समय पर, सही लय में और बिना किसी हिचकिचाहट के चलते हो, तो तुम उनके सामने से भी गुज़र जाओगे, तो उन्हें दिखाई नहीं दोगे।”
मैं उसकी बातों से अंदर तक हिल गया था। मैंने उससे सीखा कि जीवन में किसी भी काम को अगर पूरी शिद्दत और बारीक़ी से किया जाए, तो वह कला बन जाता है।
मैंने पूछा, “क्या आपको कभी डर नहीं लगता?”
बारिश फिर से शुरू हो गई थी। वह खिड़की के बाहर गिरती बारिश को देखने लगा। “डर तो उसे लगता है जिसके पास खोने के लिए कुछ होता है। अपना सब कुछ चोरी का माल है।”
कुछ ही पलों में धीरे-धीरे एक अजीब-सी दोस्ती परवान चढ़ने लगी। मैं उसे दुनिया के फलसफे सुनाता, और वह मुझे अपनी दुनिया की सच्चाई बताता।
बारिश थम गई थी, उसने मुझे अपने काम की बारीकियों के बारे में बताया। उसकी बातें सुनकर मैं दंग रह गया। उसने कहा, “जब मैं ताला खोलता हूँ, तो मैं दुनिया से कट जाता हूँ। उस वक्त सिर्फ मैं, ताले की आवाज़ और मेरी साँसें होती हैं। हर ताले का एक संगीत होता है। अगर उसे प्यार से छुआ जाए, तो वह अपनी ज़ुबान खोल देता है।”
मैं सोच रहा था कि कैसे एक अपराधी, समाज की नज़रों में गिरकर भी, अपनी कला के प्रति इतना ईमानदार हो सकता है। उसने मुझे मेरी अपनी कविता में छिपे छिछलेपन का एहसास कराया। वह चोर था अथवा नहीं, इस बात को भूल जाते हैं लेकिन वह जीवन का एक बहुत बड़ा ऑब्जर्वर ज़रूर था।
“इस टुच्चागिरी में मज़ा आता है?”
“अरे साहब, जेब काटना या किसी की खुली दुकान से सामान उठाना टुच्चागिरी है। यह तो उचक्कों का काम है। मैं इसे एक खामोश इल्म मानता हूँ—एक ऐसा हुनर जिसमें न तो हिंसा की ज़रूरत होती है और न ही चीख-पुकार की, बस दिमाग और हाथों का ऐसा जादू चलता है कि बड़े-बड़े पहरेदार देखते रह जाते हैं।”
“विश्वासघात तो है ही?”
“इरादा मायने रखता है साहब, इरादा।”
वह फिर कहने लगा―“हर चोर की एक कहानी होती है, हर कहानी में एक प्रेम कहानी होती है। हर प्रेम कहानी में एक दर्द भी होता है।”
“मतलब?”
“माधवी को क्लेप्टोमेनिया था। बड़े-बड़े डॉक्टरों के चक्कर काटे, महँगे से महँगे इलाज करवाए, लेकिन उसकी लाचारी वक्त के साथ और गहरी होती चली गई। उसके हाथों हुई चोरियों का माल लौटाने और उसे बचाने के लिए सारी पूँजी...... माधवी के जाने के बाद......।”
“माधवी! .... ?”
“मेरी पत्नी। पाँच वर्ष पहले, ऐसी ही एक सुबह थी, जब माधवी ने अपने ही हाथों से अपने जीवन को समाप्त कर लिया।”
फिर वह फूटकर रोने लगा। मैंने चुप नहीं कराया।
फिर एकाएक वह सामान्य हो कहने लगा―“एक बेहतरीन सेंधमार चोर नहीं, बल्कि एक ऐसा बाज़ीगर होता है जो बंद दरवाजों और मजबूत दीवारों से भी अपनी मर्ज़ी का रास्ता बना लेता है। हमारी कारीगरी हमारे जिगर का इम्तिहान होता है।”
जब वह जाने लगा, तो उसने मुझे एक पुरानी चाबी दी। उसने कहा, “यह उस ताले की चाबी है जो मैं कभी खोलना नहीं चाहता, क्योंकि अब उसे खोलने की ज़रूरत नहीं है। शायद आपके काम आ जाए।”
वह चला गया। धर्मशाला में एक चहल-पहल के बावज़ूद वहाँ सन्नाटे जैसा लगा। वह चाबी मेरे पास होते हुए भी किसी काम की नहीं थी, क्योंकि मुझे नहीं पता था कि वह किस ताले की है। उसने मुझे एक ऐसी चीज़ दी जो अनुपयोगी थी। शायद उसने मुझे सिखाना चाहा हो कि जीवन में हर चीज का उपयोग ढूँढना ज़रूरी नहीं है; कुछ चीज़ें केवल महसूस करने के लिए होती हैं।
कई दिन तक वह चाबी मेरी डायरी के भीतर दबी रही। जब भी मैं थक जाता था, उसे हाथ में ले लेता था। उस चाबी की ठंडक में मुझे वह यथार्थ नज़र आता था जिसे हम समाज के नियमों के शोर में भूल जाते हैं। मैंने उस चोर पर पूरी एक शृंखला भी लिख दी थी और वह प्रकाशित भी हो गई थी। उस शृंखला के प्रकाशन के बाद एक अहंकार हावी हुआ। मेरा आत्मबल कमजोर पड़ने लगा, क्यों ऐसा हुआ, ठीक-ठीक नहीं कह सकता। मुझे लगने लगा कि मैं उस चोर की प्रतिलिपि बनने का प्रयास करने लगा हूँ। उस चोर का प्रभाव मेरे मानस पर इतना था कि कई-कई दिनों तक, मैं शहर की भीड़ में उसकी तरह छिपकर रहने लगा। हालाँकि मेरा उद्देश्य चोरी करना नहीं था, लेकिन मेरा तरीका शायद वही था। मैं चाय की दुकानों पर बैठता, लोग आते-जाते, बातें करते। मैं उनके चेहरों को नहीं, उनके हाव-भाव की पिन्स को नोट करता।
जैसा कि उसने कहा था कि हर चीज की एक आवाज़ होती है। मैंने महसूस किया कि हर इंसान के दुःख की एक लय होती है। एक आदमी जो जोर-जोर से हँसता है, उसके हँसने की लय में एक बारीक दरार होती है— यह वही जगह थी जहाँ मुझे चोरी करनी थी।
एक शाम, शहर के पार्क में एक बूढ़ा व्यक्ति घंटों से अपनी जेब में हाथ डाले बैठा था और आसमान को देख रहा था। मैं उसके पास जाकर बैठ गया। मैंने उससे कोई बात नहीं की, बस उसकी साँसों और उसकी खामोशी को महसूस करने का प्रयास करने लगा। किसी चोर की तरह मेरे कान सचेत थे। अचानक मुझे वह क्लिक सुनाई देने लगी। वह आदमी कुछ बड़बड़ा रहा था, ऐसे शब्द जो उसके पूरे जीवन का जैसे सार हो। बूढे आदमी की बड़बड़ाहट को सुन मैंने एक कविता लिखी जिसे शायद पहली चोरी की कविता भी आप कह सकते हैं। शब्द बूढे के थे, भाव तो मेरे हो भी कैसे सकते थे। मुझे वही रोमांच महसूस हुआ जो उस चोर को ताला खोलते वक्त होता होगा।
कवि और चोर के बीच की दूरी बहुत कम होती है। दोनों ही अदृश्य होकर दूसरों के जीवन के सबसे निजी हिस्सों में प्रवेश करते हैं। फ़र्क बस इतना है कि चोर भौतिक चीजों को ले जाता है, और कवि उन अमूर्त सत्यों को चुराता है, जिन्हें लोग खो चुके होते हैं अथवा खो देने का अभिनय करते हैं।
मेरी दिनचर्या पूरी तरह बदल चुकी थी। मेरे झोले में अब सिर्फ़ डायरी और कलम नहीं थी। वह चाबी भी होती थी और कुछ और भी लोहे के छोटे औज़ार, जैसे पेचकस, चिमटी, तार, हथौड़ा, जो जाने कब मैंने खरीद कर झोले में रख लिए थे। अब जब मैं किसी महफिल में या किसी के घर जाता, तो मेरा हाथ अनजाने ही अपने थैले की ओर जाता। मैं उन औजारों को छूता। वे ठंडे होते थे, लेकिन वे मुझे एक अजीब सी शक्ति देते थे। मुझे लगता था कि अगर कोई इंसान अपनी बात नहीं कह पा रहा है, तो मैं इन औजारों से उसकी खामोशी के ताले खोल सकता हूँ।
मुझे महसूस होने लगा कि शब्द केवल झूठ का आवरण हैं। समाज की खूबसूरती को शब्दों में कैद करना एक सजावट है। रात के सन्नाटे में, किसी अँधेरे कमरे के भीतर, किसी के निजी जीवन के सबसे गुप्त राज़ को महसूस करना ही असली सच है। मेरे सिर में अब बहुत अधिक दर्द रहने लगा था।
हाँ तो मैं चोर की बात कर रहा था। एक बार, एक रईस घर की दावत में मुझे जाना हुआ। वहाँ सब ऊपरी दिखावे में व्यस्त थे। कोई अपनी दौलत की नुमाइश कर रहा था, तो कोई अपने रसूख की। मेरे थैले में वे औजार रखे थे। मुझे महसूस हुआ कि यह पूरा घर एक बहुत बड़ा, जटिल ताला है। हर व्यक्ति अपने भीतर एक तिजोरी बंद किये बैठा है। मैंने चुपके से एक कोने में बैठकर अपने औज़ारों को निकाला—सिर्फ उन्हें छूने के लिए, लेकिन मेरी निगाह एक तिजोरी पर पड़ी।
मेरे भीतर अँधेरे का एक समुद्र भर गया। जैसे ही मैंने ताले में पेचकस घुमाया, वह क्लिक की आवाज़ आई। वह आवाज़ मेरे लिए कविता की उस अंतिम पंक्ति जैसी थी, जो पूरी रचना को मुकम्मल कर देती है। तिजोरी खोलना एक गणितीय पहेली जैसा था फिर भी मेरा दिल नहीं धड़क रहा था, क्योंकि मैं एक चोर की तरह उस तिजोरी को नहीं खोल रहा था। तिजोरी खुल तो गई थी पर बहुत हंगामा हुआ। कुछ लोग थे वहाँ, जो मुझे पसन्द करते थे, जिन्होंने मेरे हक़ में उन लोगों को समझाया भी किंतु रात भर मैं सलाखों के पीछे रहा। मुझे अपने आप पर एक अजीब सी घृणा महसूस हुई। अगले दिन मैं शहर भर के चर्चे में आ गया था। जेल से छूट जाने के बाद मेरे भीतर का कवि और उसकी पुरानी संवेदनाएँ कहाँ गईं, इसका कोई क्रमिक विकास मुझे बहुत सोचने पर भी दिखाई नहीं देता।
शहर की निगाह में अब मैं एक चोर बन गया था। मुझे लगने लगा कि मैं एक पेशेवर चोर हूँ और मेरी कोई भी कविता मेरी अपनी नहीं है। उस चोर ने मुझे एक ऐसे मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया जहाँ से वापस जाने का रास्ता नहीं था। एक अजीब सी आत्मसंतुष्टि भी थी कि अब मैं दुनिया को उसकी असली नग्नता में देख सकता हूँ—ठीक वैसे ही, जैसे एक चोर रात के अँधेरे में सब कुछ साफ-साफ देख लेता है। मेरे भीतर से चोरी की अनुभूति से चोरी के अभ्यास तक की अवधि मुझे गायब हुई प्रतीत होती है। मेरा चरित्र एक गहरे नैतिक संकट में होते हुए भी मुझे मथ नहीं रहा था। मैं जो पहले था, अब नहीं था। कई बरस ऐसे ही चला, कई थाने, कई चौकी, कई लॉकअप देखे। चोरी एक भी नहीं, सेंध सैंकड़ों की। कई बार पकड़ा गया, कई बार नहीं।
अब मैं बदलता रहता था—शहर, ठिकाने, नाम। मेरे थैले में अब कोई डायरी नहीं थी, केवल औज़ार थे। घरवाले हैरान थे और बार-बार थानों के चक्कर काटकर परेशान हो चुके थे। मुझे कई बार समझाया, कई बार ताने भी दिये, कई बार किसी मनोचिकित्सक को दिखाने की भी ज़िद की लेकिन.... लेकिन मुझे आनंद आ रहा था। जो भी था, जैसा भी था, कोई पछतावा नहीं हो रहा था।
चलिए, छोड़िए, फिर से धर्मशाला के अतीत पर आते हैं, पता नहीं, स्मृति का कौनसा टुकड़ा छूट जाएगा कहते-कहते। यूँ तो मेरी याददाश्त बहुत मजबूत है, अधिकतर बातें शब्दश: याद रहतीं हैं लेकिन वह अक्सर ठीक समय पर काम नहीं करती। चिकित्सकीय भाषा में पता नहीं क्या कहते हैं। कभी-कभी तो टिप ऑफ द टंग भी हो जाता है।
हाँ तो, धर्मशाला से निकलकर मैं जलसे में गया, जलसे के कुछ घण्टे बाद, मैं एक मकान के सामने खड़ा था। मैंने जीवन में अनगिनत ताले देखे थे—साधारण कुंडी, आधुनिक पैडलॉक, और रईस हवेलियों के जटिल नक्काशीदार लोहे के ताले। लेकिन इस दरवाजे पर लगे ताले की बनावट ही पूरी तरह भिन्न थी। यह किसी काले पत्थर जैसा कठोर और चिकना था, जिस पर नक्काशी भी की गई थी। उस ताले को देखते ही मेरे भीतर चोरी की ललक पूरी तरह उग्र हो गई। उस अजीब ताले को देखकर मुझे लगा कि मैं किसी के अंतर्मन के सबसे गहरे और वर्जित कक्ष में प्रवेश कर सकता हूँ। एक कवि के रूप में, मैंने हमेशा माना था कि हर दरवाज़े के पीछे एक दुनिया होती है।
उस वक़्त मुझे उस चोर की बेतहाशा याद आई। मैं सारे औज़ार भूल गया और अपने थैले में से वह चाबी ढूँढने लगा जो उसने मुझे दी थी। एक घंटे की मशक्कत के बाद मैं यह जान पाया कि चाबी कहाँ लगानी है। मैंने ताले में चाबी डाली। एक पल के लिए मुझे लगा कि ताला उसे स्वीकार नहीं करेगा, लेकिन जैसे ही मैंने चाबी घुमाई—एक ऐसी क्लिक सुनाई दी जो संगीत से भी मधुर थी। ताला ऐसे खुला जैसे उसे सालों से इसी चाबी का इंतज़ार था।
कमरे में दाखिल होते ही लगा कि कोई महीनों से यहाँ कोई नहीं आया। कमरा पूरी तरह से व्यवस्थित था। हर चीज़ अपनी जगह करीने से थी। एक डरावनी खामोशी थी लेकिन दीवारों पर कागज़ चिपके हुए थे—सैंकडों काग़ज़ात। दरवाज़ा खुलते ही वो फड़फड़ाने लगे, गौर से टॉर्च की रोशनी में देखा तो पाया उन पर कविताएँ ही कविताएँ थीं। मैंने बल्ब जलाया तो एक मेज़ पर एक डायरी भी दिखाई दी। मैंने काँपते हाथों से वह डायरी उठाई। मैं डायरी पढने में लग गया। डायरी के पन्ने पीले पड़ चुके थे, लेकिन लिखावट बहुत स्पष्ट थी।
डायरी को पढकर लगा कि लिखने वाला शब्दों का जादूगर था, किंतु अब एक ऐसे अँधेरे में था जहाँ कविताएँ भूख को शांत नहीं कर सकती थीं। हर पृष्ठ के पलटने पर मुझे लगता कि वह चोर मेरे पीछे ही खड़ा है। डायरी के पन्नों के बीच में एक तस्वीर थी, तस्वीर में वह आदमी था और एक औरत भी। शायद उसकी पत्नी। तस्वीर में औरत बहुत सुंदर लग रही थी, और आदमी बहुत बुझा हुआ।
हर दो-चार पृष्ठ के बाद एक औरत का ज़िक्र था। शायद उस तस्वीर वाली औरत का। डायरी क्या थी, एक अपराधबोध था। एक उलाहना था, एक मूक शिकायत थी। डायरी में कुछ भी अभिधा में नहीं था। पूरी रात आँखें काली की। मैं डायरी में खो गया। हर चौथी पंक्ति एक ठंडी छुरी की धार थी। हर अक्षर अपमान और ग्लानि में नहाया हुआ था।
मत सुन दुनिया को दिल मेरे
अपमान का गीत ही बजता है
मुँह म्यान से निकला खड्ग
फिसलता रीढ पे रहता है।
सुबह की पहली किरण भी
चुभती सी कोई सूई है
देह में केवल अस्थि है
जगह मांस के रूई है।
मर गया मैं तो पहले ही
घुटकर एक रौशनाई में
हथकड़ी लगी अँधेरे की
अब मेरी रूह कलाई में
मैं किसलिए ले आता हूँ
क्षितिज पार के तारे तक
कितना कुछ है जीवन में
जीते-जी मेरे हारे तक
पूरी रात गुज़र जाने के बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं अपनी ही डायरी पढ रहा हूँ। कितनी अजीब बात है कि मैंने अपने ही घर का दरवाज़ा खोलने के लिए चोर की दी हुई चाबी लगाने की मशक्कत की। मुझे ठीक से याद नहीं कि कब मैंने ताला बदल दिया था। मैंने कहा था न कि मेरी याददाश्त मजबूत है लेकिन बहुत बार ठीक समय पर भूल जाता हूँ। ताला कब बदला था, वह भी याद आएगा लेकिन कब, यह नहीं कह सकता।
ख़ैर!
पसीने में नहाया हुआ मैं अपने घर से बाहर निकला। मैंने ताला लगाया। वह चाबी अब भी मेरे हाथ में थी। मैंने उसे वहीं दरवाज़े के पास छोड़ देना चाहा, शायद मुझे अब उसकी ज़रूरत नहीं थी। सुबह की पहली किरण दरवाजे के ताले पर पड़ रही थी, ताला बेतहाशा चमक रहा था। मैं घर के अहाते से निकलने ही वाला था कि कल्याणी मुझे सामने से आती दिखाई पड़ी। मैं उसे देखकर ठिठक गया, और वह मुझे देखकर।
“आप कब आए? और दरवाज़ा कैसे खोला?”
मैं हतप्रभ। कुछ न कह सका।
थोड़ी देर बाद मैंने कहा, “मुझे एक और चाबी चाहिए।”
वह विस्मय से मेरी तरफ़ देखने लगी, आँसू पोंछे और कहा, “वो किस लिए?”
“मुझे ऐसा ही एक और ताला खोलना है।”
“किसका?”
“खुद का...!”
हम दोनों खिलखिलाकर हँसने लगे थे।
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राहुल कुमार बोयल युवा कवि-गद्यकार हैं।
कविता संग्रह : समय की नदी पर पुल नहीं होता, नष्ट नहीं होगा प्रेम, मैं चाबियों से नहीं खुलता।
कथेतर गद्य : हवेलियों के भीतर-बाहर (झुन्झुनूँ डायरी)।
उपन्यास : अजस्रा, वह जो तारीख़ में दर्ज न हुआ, सफ़ेद सोना, एक दिल अफ़रोज़ दास्तान : लाल जूँ।
सम्मान : आचार्य लक्ष्मीकान्त जोशी साहित्य सम्मान।
ईमेल : rahulzia23@gmail.com
ਖੰਡ ਮਿਸ਼ਰੀ, ਸੀ ਪਰਿਚਯ ਆਲਾ ਪੇਜ
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बहुत ही शानदार तरीके से शब्दों की गुत्थमगुती।
भावों को अदृश्य बताकर दृश्य करने की कला ।
पारदर्शी कांच की बंद बोतल को नदी के पानी में डुबाने पर ,बोतल के पानी और नदी के पानी में होने वाले भेद और दूरी का भाव शब्दों में व्यक्त करने की कला ।
अद्भुत,शानदार