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टर्निंग पॉइंट क्या है पार्टनर!

  • 10 hours ago
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Updated: 5 hours ago



टर्निंग पॉइंट क्या है पार्टनर!
कहानी : अजय गोयल

"लाल परी की उड़ान जैसी है क्रिकेट की सनक।" यह बात गोविंद ने एक प्राइवेट अस्पताल के बाहर खड़े होकर कही थी।

लग रहा था, जैसे पूरी बस्ती असलम के साथ अस्पताल में उमड़ आई हो। तभी गोविंद ने राजेश नाई को अस्पताल परिसर से खिसक जाने का इशारा किया, क्योंकि भीड़ में कुछ लोग उसे सबक सिखाने की तैयारी में थे। वे सभी दिन की शुरुआत अक्सर लाल परी के स्वागत के साथ करते। एक पव्वा गटककर अंगड़ाई लेते, इसके बाद हाथापाई से लेकर किसी की कुटाई तक, सब कुछ संभव था।


"दाढ़ी बनाता है या दुनिया-जहान की लोरियाँ गाता है! इसकी क्रिकेट की बकवास कभी पूरी नहीं होती," भीड़ में से किसी ने राजेश नाई के बारे में कहा था।


सबका मानना था कि असलम को राजेश ने कोई घुट्टी पिलाई होगी। तभी असलम ने अपनी तीनों भैंसें क्रिकेट के सट्टे पर चढ़ा दीं और हार गया।


कल दोपहर असलम, राजेश, नत्थू और पड़ोस के गाँव का सट्टेबाज़ शाहबाज़ चाय की गुमटी पर देखे गए थे। उनके हाथों में लाल परी का एक-एक पव्वा था। शाम आईपीएल का मैच भी था। पूरी पटकथा सबके सामने थी। तभी गोविंद ने क्रिकेट की सनक की तुलना लाल परी की उड़ान से की थी।


गोविंद न जाने कहाँ की बात कहाँ जोड़ देता। बातों की मानो रेलगाड़ी बना देता।

अस्पताल में भर्ती होने से पहले असलम ने भी कहा था, "राजेश ने कल शाम मुझसे कहा था—ग़ज़ब करेगा यह नया-नया लड़का सूर्या। गेंदबाज़ों को पीटेगा और चौके-छक्कों की बारिश करेगा। गुजराती टीम इस बार आईपीएल का ताज पहनेगी। देखना, अगले साल मुंबई का सेठ इस लड़के को गटक लेगा।"


अस्पताल के भीतर सल्फ़ास खाया असलम ज़िंदगी के लिए जूझ रहा था। उसकी उम्मीद बस मुट्ठी में अटके पानी से ज़्यादा नहीं थी।

बस्ती के लोग अपने-आप से पूछ रहे थे, "सल्फ़ास खाकर कौन बचा है?" सब जानते थे कि साँस के साथ आस का बंधन है।

इलाज शुरू करने से पहले डॉक्टर ने लिखवा लिया था। वीडियो भी बना ली थी। उन्होंने साफ़ कहा था, "इलाज तो केवल कोशिश भर है। वह भी आपके कहने पर। जान बचने की कोई गारंटी नहीं है।


"आप कोशिश शुरू करें। न जाने कब ऊपर वाले की रहमत हो जाए।" अस्पताल में असलम की उखड़ती साँसें देखकर उसके बड़े भाई अमजद ने कहा। वह भी जानता था कि सल्फ़ास खाने का इलाज कोई डॉक्टर आसानी से हाथ में नहीं लेता। अधिकांश डॉक्टर सरकारी अस्पताल का रास्ता दिखाकर दरवाज़ा बंद कर लेते हैं। सरकारी अस्पताल जाने का सीधा मतलब था—कोर्ट-कचहरी के झंझट में उलझना।


“पहले इतनी लिखापढ़ी की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। अब नया ज़माना है। दंगा-पंगा एक मिनट में खड़ा हो जाता है। ऊपर से रिश्तेदार और प्रेस वाले भी बेमतलब नाक में दम किए रहते हैं। इंटरनेट अब सबकी जेब में विराजा है। उसने हर किसी को नीम-हकीम बना दिया है।” दवाइयों की लंबी सूची थमाते हुए डॉक्टर साहब ने कहा था।


"बंदर के हाथ उस्तरे जैसा है एक जाहिल के लिए इंटरनेट।" गोविंद कहता। “इंटरनेट की सीढ़ी चढ़े, स्मार्टफ़ोन हाथ में लिए एक आम आदमी अपने-आप को राजा से कम नहीं समझता। अब भूसे के ढेर में सुई ढूँढ़ना मुमकिन है। मोबाइल फ़ोन जादू है। इंटरनेट जाल है। आम आदमी रीलों में अटककर अपना वक़्त तबाह कर रहा है। सट्टेबाज़ी में पासा फेंककर भाग्यरेखा बदलने में उलझा है।” यह कहकर गोविंद अपनी बात पूरी करता।


असलम की हालत देख गोविंद को कंपनी के कंप्यूटर ऑपरेटर नारायण का ध्यान बार-बार आ रहा था, जिसका भाई आईपीएल की जीत का जश्न मनाती हुई भीड़ में कुचल गया था।


पिछले एक-डेढ़ साल में एक ग़ज़ब और हुआ। देखते-देखते बस्ती के बाहर मुख्य सड़क पर तेज़ रफ़्तार के लिए एक फ्लाईओवर आँधी की तरह बन गया।

गोविंद को महसूस हुआ, जैसे ज़िंदगी उन्हें लाँघकर आगे निकल गई है और बस्ती एक गड्ढा भर रह गई है।


फ्लाईओवर बनने से गोविंद का सड़क किनारे तिरपाल की छत के नीचे फलता-फूलता 'पाँच सितारा पराठा' होटल उजड़ गया। उसका परिवार जीवन-यापन के लिए भैंसें और बकरियाँ पालता। कुछ अलग करने की नीयत से उसने होटल की नींव रखी थी और 'पाँच सितारा पराठा' नाम दिया था।


सड़क से आती-जाती कारों में बैठे लोग होटल का नाम पढ़कर मुस्कुराते, रुक जाते। पराठों से उठती लौनी घी की महक उनके नथुनों को महकाती और जीभ स्वाद से तृप्त हो जाती।


वहाँ ग्राहकों के लिए तख्ती पर एक चुनौती भी लिखी थी—"एक बार में एक व्यक्ति पाँच पराठे खा ले, तो उससे कोई पैसा नहीं लिया जाएगा।"


यह पढ़कर ग्राहक अचंभित रह जाते। यदि कोई चुनौती स्वीकार भी करता, तो ज़्यादा से ज़्यादा तीन पराठे खाकर "हरिओम... हरिओम..." कहता हुआ उठ जाता।


होटल के साथ राजेश नाई का खोखा भी, अनेक खोखों के साथ, फ्लाईओवर की धमक में दब-कुचल गया। इस स्थिति में गोविंद ने अपने इंटर पास पर्चे के सहारे शहर का रुख किया। वहाँ उसे एक डिलीवरी बॉय के रूप में पनाह मिली। एक ऑर्डर को दस से पंद्रह मिनट के भीतर ग्राहक तक पहुँचाने का लक्ष्य मिलता। चाहे झुलसा देने वाली जलती-तपती सड़क हो या हाड़ चीरने वाली ठंड हो, कंपनी डिलीवरी बॉय को एक पार्सल देती, उसके साथ मोबाइल पर ग्राहक का फ़ोन नंबर और लोकेशन भेज देती, और मोटरसाइकिल से दौड़ शुरू हो जाती।

पार्सल में पूजा के सामान से लेकर चिकन या बिरयानी तक कुछ भी हो सकता था। दौड़ के लिए कंपनी के द्वार पर लड़कों की फ़ौज खड़ी रहती। एक-एक पार्सल के लिए वे हुंकार भरते। यह सब देखकर गोविंद का मन छिल जाता।


गोविंद सोचता, लोनी घी के पराठों की महक और उनका स्वाद भला डीप फ़्रीज़ में कब तक ताज़ा रह सकता है? उसे समझ नहीं आता था कि न जाने कब से डीप फ़्रीज़ में पड़ी चिकन करी या दाल कब तक ताज़ी रह सकती है। वह कब बासी हो जाती होगी? क्योंकि दो-तीन दिन के बासी चारे को देख-सूँघ पशु भी अनमना हो जाता है।

राजेश और गोविंद हमउम्र थे। दोनों ने साथ-साथ इंटर तक पढ़ाई की थी। इसके बाद दोनों ने अपने-अपने पुश्तैनी धंधे अपना लिए। गोविंद ने भैंसों की सेवा संभाली, तो राजेश ने उस्तरा थाम लिया।


गोविंद का मन पढ़ाई में नहीं लगता था। लेकिन स्कूल छोड़ना राजेश के लिए एक सपना टूटने जैसा था। वह अपने दम पर अपने स्कूल की टीम को मंडल-स्तरीय क्रिकेट टूर्नामेंट जिताकर लाया था। सियानों को उसकी बल्लेबाज़ी में धमक महसूस हुई थी। वह भी बल्ले के साथ सपना बुनने लगा था।


राजेश चाहता था कि एक दिन लोग उसे गेंदबाज़ों के लिए बुलडोज़र कहें, रन बनाने की उसकी रफ़्तार की तुलना फ़रारी कार से करें और उसके स्ट्राइक रेट के लिए बुलेट ट्रेन की रफ़्तार को याद करें। वह क्रिकेट का पेले बनना चाहता था। पेले की तरह ही उसका जीवन घोर गरीबी से घिरा था। जैसे पेले ने पुरानी जुराबों से भरे थैले को फुटबॉल बनाकर खुद को तैयार किया था, वैसे ही वह क्रिकेट के बैट की जगह कपड़े धोने वाली थपकी से खुद को तैयार करता।

लेकिन पिता के अचानक गुज़र जाने से, शुरू होने से पहले ही उसकी पारी का अंत हो गया। उसके लिए यह आसमान गिरने जैसा था।


“मुझे ही बैल बनना पड़ गया था। ज़िंदगी फ़र्ज़ी टिकट की तरह झूठी लगने लगी है। कैसा टर्निंग पॉइंट है, पार्टनर!" गोविंद के कंधे पर सिर रखकर सिसकते हुए राजेश बोल रहा था, “पिता के बिना पेले के लिए पेले बनना मुमकिन न था। ईश्वर ने तो मुझसे मेरे पिता ही ले लिए, फिर कैसे मुमकिन होता मेरे लिए पेले बनना!”


'टर्निंग पॉइंट' जैसा जुमला उन्होंने मास्टरजी से सीखा था, जो पढ़ाते कम और दिखावा ज़्यादा करते थे।


अब क्रिकेट साल भर चलता रहता है। एक के बाद एक टूर्नामेंट। अकेले आईपीएल का ही साल में दो महीने तक मजमा लगा रहता है। उन दिनों में सिनेमा भी हाँफने लगता है। नई फ़िल्मों की रिलीज़ तक ठिठक जाती है।

इस जुनून में राजेश भी बह रहा था। वह ग्राहकों की दाढ़ी बनाते या बाल काटते समय उनके कानों में क्रिकेट के नए-पुराने किस्से डालता रहता। जितना जानता था, उतना ग्राहकों को सुनाता और कई बार उन्हें उलझा भी देता। जैसे—स्टील के बल्ले से कब और कहाँ क्रिकेट खेली गई, या तीन गेंदों में चार विकेट कैसे आउट हो सकते हैं।

बस्ती के लोग अफ़वाहों और किस्सों के साथ क्रिकेट का मुफ़्त रसपान करते। सुनने वाले अचंभित रह जाते, जब वह बताता कि कैसे सूरमा खिलाड़ी भी टोने-टोटकों के मारे होते हैं। कोई महारथी हमेशा दाएँ पैर में पैड पहले बाँधना शुभ मानता है, तो कोई नामचीन विदेशी खिलाड़ी अपनी जेब में फटा लाल रुमाल रखता है। यहाँ तक कि स्टेडियम में दर्शक खिलाड़ियों को आउट कराने के लिए काला जादू करने से भी पीछे नहीं रहते। वे सीटों पर खड़े होकर नींबू निचोड़ते हैं।


खेल का एक अलग इंद्रधनुष राजेश बस्ती के लोगों के सामने खोल देता था।


पिछले साल पशुपालक नत्थू ने सट्टेबाज़ी में एक भैंस जीत ली थी। राजेश ने इशारा किया था, "देखना, बेंगलुरु और गुजरात की टीमें ही आईपीएल का फ़ाइनल खेलेंगी।"

भैंस पहली बार बस्ती में सट्टेबाज़ी पर चढ़ी थी। इससे पहले सट्टेबाज़ी बकरियों या कुछ रुपयों तक ही सिमटी रहती थी। एक ओवर में कितने रन बनेंगे, मैच कौन जीतेगा, गेंदबाज़ कितने विकेट लेगा और बल्लेबाज़ कितने रन बनाएगा—इन्हीं बातों पर सट्टा लगता था। इसकी तैयारी वे अक्सर सुस्ताती दुपहरी में करते, रीलें देखते, देशी-विदेशी खिलाड़ियों को तौलते, बहस करते।

लेकिन पिछली बार नत्थू और कल्याण आमने-सामने थे। दोनों के पास पाँच-पाँच भैंसें थीं।


असलम ने कहा, "फ़ाइनल की शर्त बड़ी होनी चाहिए।"


"कितनी?"


"कम-से-कम एक भैंस की," असलम ने कहा।


नत्थू ने राजेश की तरफ़ देखा। राजेश ने हाँ में इशारा कर दिया।


बेंगलुरु की टीम फ़ाइनल में पहुँच चुकी थी। दूसरी टीम के लिए गुजरात और कोलकाता के बीच मैच था। सूर्या का वह डेब्यू मैच था। नया-नया किशोर, वह भी ओपनिंग में बल्ला संभाले क्रीज़ पर डटा था। कोलकाता के तेज़ गेंदबाज़ों के सामने वह मेमना-सा लग रहा था। लेकिन पहले ही ओवर में रुख बदल गया। उसने लगातार दो छक्के जड़ दिए। स्टेडियम से उठती हुंकार टीवी के स्पीकरों से निकलकर दर्शकों के दिलों को उछालने लगी। पच्चीस गेंदों पर साठ रन ठोककर उसने गुजरात की जीत लगभग पक्की कर दी थी।


नत्थू जीत गया था। इसके साथ ही राजेश की साख को भी खाद-पानी मिल गया। नत्थू ने अपनी जीत का जश्न ढोल बजवाकर मनाया और दोस्तों को लाल परी की दावत दी।


"जिंदाबाद... जिंदाबाद... आईपीएल जिंदाबाद!"


लाल परी के सुरूर में नत्थू ढोल की थाप पर गाता और थक जाने तक झूमता रहा था।

फ़ाइनल के दिन गोविंद शहर से कुछ पहले ही वापस आ गया। मैच शुरू होने में अभी कुछ समय था।


"आज का टर्निंग पॉइंट क्या है, पार्टनर?" गोविंद ने राजेश से पूछा।


चाय की गुमटी पर राजेश पूरे मूड में बैठा था।


"टर्निंग पॉइंट? सेंचुरी मार दी मैंने! पंद्रह गेंदों पर। और टायर कंपनी के सेठ के पास अल्टीमेटम भिजवा दिया है। फ़ाइनल जीता दिया है मैंने। मैन ऑफ़ द टूर्नामेंट हूँ। अब अपने बल्ले पर कंपनी का लोगो लगाने के लिए फ़ीस चार गुनी कर दी है। मुंबई वाले सेठ का फ़ोन आया था, उठाया ही नहीं। वह तड़पेगा, उसे तड़पाना चाहता हूँ। मैं उसकी टीम में जाने के लिए एक जेट से कम क्या लूँगा, जैसे फुटबॉल के महारथी ने अरब के अमीर से लिया है। और यूट्यूबर्स को तो देखो! मेरे साथ एक हज़ार करोड़ के कॉन्ट्रैक्ट की फ़र्ज़ी रील चला रहे हैं और अपने फ़ॉलोअर्स बढ़ाने का खेल खेल रहे हैं। मेरी उम्र के लड़के अपने बाप से भीख माँगकर ऐश करते हैं, और मैं? मैं हूँ न, इस जेनरेशन का अकेला मर्द!"


इस अनर्गल के बाद राजेश रुका। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा और मुँह फाड़-फाड़कर हँसते हुए अपने दुर्भाग्य का जश्न मनाने लगे।


इस बेतुकी मस्ती में राजेश ने अपने बक्से से कैंची और उस्तरा निकाल लिया।


"पार्टनर, टर्निंग पॉइंट! हम इसी बस्ती में रहेंगे। हमने सबको काट-छाँटकर देख लिया है। हम इतने भी टुच्चे नहीं कि दो पैसे कमाकर या सौ-पचास शतक मारकर, कहने लगें कि यहाँ दम घुटता है। हमने अपना आसमान नहीं भुलाया।"


फलता-फूलता इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल ब्रांड नए-नए शिखर चूम रहा था, जबकि इंडिया ब्रांड को लहराने के लिए उसकी बैसाखी की ज़रूरत महसूस होती। दूसरे खेल धूल ही फाँकते नज़र आते।

आयोजन के दिनों में आईपीएल की धमक हर तरफ़ महसूस होती। आमतौर पर सूरज ढलते ही सिमट जाने वाले गाँवों और बस्तियों की चाय-गुमटियाँ भी आईपीएल मैच की आख़िरी गेंद तक जगी रहतीं। क्रिकेट के दीवाने देसी लाल परी के सुरूर में क्रिकेट की मस्ती में गोते लगाते। चाय की गुमटी वाला भी हर शाम आदतन टीवी स्क्रीन पर एक बार कपड़ा मारता और दिन भर ऊँघते रहने वाले टीवी सेट से जैसे कहता—"उठ बैठ, अब तेरे असली काम का वक़्त आ गया।"


आईपीएल क्रिकेट मैच की शुरुआत में सबसे पहले टीवी स्क्रीन पर स्टूडियो झाँकता, जिसके फ़र्श पर पिच की तस्वीर बनी होती। इस आहट के साथ पुराने घिसे-पिटे खिलाड़ी मैदानी पिच का मिज़ाज परोसते—वह तेज़ गेंदबाज़ों को कितना और कैसे सपोर्ट करेगी, या स्पिनरों के लिए कितनी मददगार होगी। चार-पाँच घंटे के बीस-बीस ओवरों का मैच किस करवट बैठेगा, इस पर वे अपने-अपने अनुमान का तड़का लगाते। उतर चुके बल्लेबाज़ आती गेंदों की पिटाई का नुस्खा पेश करते, पुराने मैचों की समीक्षा करते और समय की गुल्लक से उदाहरणों का ख़ज़ाना सुनाकर अपनी क्रिकेट-समझ का दावा ठोकते।


मैच शुरू होते-होते पक्षियों के झुंड की तरह क्रिकेट के दीवाने चाय की गुमटियों के पास मंडराने लगते। उनके दिलों में विज्ञापनों की पंक्तियाँ गूँज रही होतीं—"प्रणाम करो, पेड़ लगाओ। मर्द बनो, शर्त लगाओ।"


इन पंक्तियों में गोविंद अपनी ओर से जोड़ देता—"ठगे जाओ, लूटो और मुक्ति पाओ।"

असलम, रौनक, कल्याण और नत्थू जैसे पशुपालक सब संगी-साथी थे। सबके यहाँ भैंसें और बकरियाँ थीं। वे सुबह मुँह-अँधेरे उठते, पशुओं की सानी करते, उनका दूध दुहते और गाँव की सरकारी डेयरी पर जमा कर आते। यही क्रम शाम को भी दोहराया जाता।


उनकी ज़िंदगी में आईपीएल किसी भूकंप की तरह आता। टीवी पर्दे की चमक-दमक उनके सपनों का आकाश बन जाती, जिसमें गाड़ी, नौकर-चाकर और एक बड़ा-सा घर मुस्कुराता दिखाई देता।


लीग मैचों के दिनों में उनके फ़ोन लगातार टर्र-टर्र करते रहते, जिनमें आसपास के इलाक़े के सट्टों की ख़बरें होतीं। गोविंद आकर उनमें शहर का रंग मिला देता। जो ख़बरें करोड़ों की होतीं, उनकी धसक से उनके चेहरों का रंग उड़ जाता। लेकिन इन सबमें अफ़वाह और सच्चाई को निथारना मुश्किल होता।


देसी-विदेशी खिलाड़ियों से बनी टीमें चमकदार ड्रेस पहनकर स्टेडियम में उतरतीं, तो टीवी स्क्रीन का धूम-धड़ाका चरम पर पहुँच जाता। इतनी चमक-दमक और जोश की हिलोर में दर्शक मानो मुक्ति का मार्ग ढूँढ़ने लगते।


रविवार था। हर साल की तरह इस बार भी आईपीएल फ़ाइनल मैच की महफ़िल परवान चढ़ने लगी थी। चाय की गुमटी में बैठे असलम की नज़रें टीवी पर टिकी थीं। लेकिन उसकी साँस अटकी हुई थी। कल्याण, नत्थू और राजेश भी परेशान थे। सूर्या दूसरे ही ओवर में आउट हो गया था। वातावरण बोझिल था।


गोविंद चुपचाप आकर उनके बीच बैठ गया। इस साल वह पहली बार कोई आईपीएल मैच देखने आया था। उसकी अरुचि राजेश की समझ से बाहर थी।


"पार्टनर, टर्निंग पॉइंट?" गोविंद ने धीरे से राजेश से पूछा।


"असलम ने अपनी तीनों भैंसें लगा दी हैं।" राजेश ने कहा।


"तुमने कुछ इशारा किया था क्या?"


"दोपहर में मैंने उसकी शेविंग की थी। सूर्या के बारे में बात हुई थी। मैंने कहा था, सूर्या ने इस बार आईपीएल के रिकॉर्ड उखाड़ फेंके हैं।" उसने शाहबाज़ को बुलाया। चाय की गुमटी पर नत्थू और कल्याण गवाह बने और शर्त की वीडियो भी बनी।


गुमटी से दोनों बाहर निकल आए थे।


घर लौटने से पहले राजेश ने पूछा, "आज फ़ाइनल मैच क्यों नहीं देखा?"


"आज नारायण आया था। पूरे छह माह बाद।"


“तुम्हारी कंपनी का कंप्यूटर ऑपरेटर, जिसका भाई पिछले साल स्टेडियम की भगदड़ में कुचल गया था।" राजेश ने याद करते हुए कहा।


"हाँ, चालीस हज़ार लोगों की क्षमता वाले स्टेडियम में चार लाख लोग पहुँच गए थे। आईपीएल में बेंगलुरु की टीम की जीत के जश्न में शामिल होने। नारायण बता रहा था, टीम की मुँह दिखाई की कीमत दस लोगों ने कुचलकर चुकाई, जिसमें उसका भाई भी था। अब माँ बड़बड़ाती रहती है, बाप दीवारों से पूछताछ करता रहता है। यह सब सुनकर मैच कहाँ देखा जाता!" गोविंद ने कहा।

रोशनी ने अभी आँखें भी नहीं खोली थीं कि बस्ती उठ बैठ गई थी। शाहबाज़ अपने लठैतों के साथ आकर असलम की तीनों भैंसें खींच ले गया था। सदमे में असलम ने सल्फ़ास खा लिया। इलाज के लिए उसे अस्पताल ले जाया गया।


"तुमने असलम को रोका क्यों नहीं?" 

अस्पताल से लौटते हुए गोविंद ने राजेश से पूछा।


"मैंने कहा था—'क्या कर रहा है तू? भले ही सूर्या तूफ़ान है, पर हर बार हिट हो जाएगा, इसकी क्या गारंटी है?' लेकिन असलम बोला—मेरे पास तीन भैंसें हैं, गुज़ारा नहीं हो पा रहा है। अब आर है या पार है।"


“ज़्यादा के लालच में जो थोड़ा था, उसे भी उसने दाँव पर लगा दिया। अब न तीन हैं, न पाँच। ज़रूर लाल परी चढ़ा रखी होगी।" गोविंद ने कहा।


चुप रहा, राजेश।


“पिछले मैच में सूर्या की कोहनी में चोट लगी थी। शायद तुझे यह पता नहीं है। आईपीएल के खिलाड़ी रेस के घोड़ों जैसे हैं। टीमों के मालिक उन्हें खरीदते हैं और उन्हें पालते हैं। बता, रणजी मैच में कोई झाँकने जाता है क्या? पाँच दिनों के टेस्ट मैच का भी दम निकल रहा है। इतना हंगामा क्यों बरपा है। नई-नई आयरलैंड की टीम से टी-20 सीरीज़ में पिटकर लौटी है हमारी शेर क्रिकेट टीम। पैसा कब चीज़ों को बदरंग कर देता है, यह समझना मुश्किल है। कुछ लाख रुपये देने से कुचलने की जवाबदेही से नहीं बचा जा सकता।”


दोनों चुप बैठे रहे।


“आईपीएल के मैच में जब भी कोई गेंदबाज़ गेंद फेंकता है, तो हर गेंद पर 25-30 तोले सोने के बराबर रकम खेल कराने वाले आयोजकों की जेब में आ जाती है। पूरे आईपीएल में लगभग अठारह हज़ार गेंदें फेंकी जाती हैं। यही टर्निंग पॉइंट है, पार्टनर। नटराज शतरंज अच्छा खेलता है। वह कहता है... सारा खेल राजा का है... उसकी सलामती का है। प्यादा तो बर्बादी के लिए, ज़िबह के लिए बना है।" शहर लौटते हुए गोविंद ने कहा।


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कथाकार अजय गोयल हापुड़ में रहते हैं। उपन्यास‌ : एक और मनोहर; कहानी संग्रह : कंपनी बहादुर, काला ताज, गिनीपिग। ईमेल : a.ajaygoyal@rediffmail.com 



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