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पैमाना सिर्फ़ एक है कि लिखाई अच्छी होनी चाहिए
मैं नहीं मानती कि स्त्रीवाद कभी भी ‛पूँजीवाद’ जैसी किसी भी दूसरों के दमन और शोषण पर आधारित व्यवस्था का समर्थक हो सकता है।


जेन-ज़ी का तोता
एक पोस्ट की सुबह से शाम तक की उम्र का एक मामूली-सा लेखक अपने फालोवर्स के साथ आपको गाली बकता और अपने पोस्ट की उम्र को दो-चार दिनों के लिए बढ़ाता बेदाग निकल सकता है। क्योंकि उसकी इस हरकत से उसके उस पोस्ट की वह सुबह से शाम की सीमित उम्र कुछ दिनों के लिए आगे बढ़ जाएगी।


घनश्याम की कविताएँ
तुम आग को आग नहीं लिख सकते
न रोटी को रोटी लिख सकते हो
न फूल को फूल ही
तुम्हें लिखना इतना ही पसंद है


प्रेमचंद से संवाद (यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते)
प्रेमचंद से संवाद (यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते) हिमांशु विश्वकर्मा यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते, तो वे भारत से क्या कहते और हम उनसे क्या पूछते? यदि सचमुच मुझे आज प्रेमचंद से मिलने का अवसर मिलता, तो शायद सबसे पहले मैं उनसे यही पूछता- “प्रेमचंद जी, आज का भारत देखकर आपको कैसा लगता है?” वे संभवतः मुस्कुराकर कहते- “भारत बदला है, और बहुत बदला है। विज्ञान आगे बढ़ा है, लोकतंत्र मजबूत हुआ है, शिक्षा का विस्तार हुआ है, तकनीक ने जीवन को नई गति दी है। इन उपलब्धियों पर प्रसन्न होना च


कल्पना मनोरमा की डायरी
याद आई नदी किनारे पड़ी नाव। महीनों पानी से दूर रहने पर उसकी देह सूख जाती होगी। फिर जब उसे दोबारा नदी में उतारा जाएगा तो वह भी एक पल के लिए ठिठकेगी। पानी धीरे-धीरे उसकी लकड़ी में उतरेगा और वह फिर से जी उठेगी।


दहकते इश्तिहार
उसे पता था कि ये इश्तिहार उसके लिए नहीं हैं। न तो उसका मतदाता पहचान पत्र है और न ही जेब में रुपये।


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