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घनश्याम की कविताएँ

  • 3 hours ago
  • 4 min read



लोकतंत्र की लाश

          

तुम्हारी घुन खाई कुर्सी 

बदबूदार लाशों पर रखी है

तुम नाक पर रूमाल भी 

नहीं रखे हुए हो

तुम्हें घिन नहीं आती है

तुम्हें सड़ांध बहुत पसंद है


तुम चांडाल हो,‌ जल्लाद हो 

मौत के ख़ूबसूरत रचयिता हो तुम


तुम्हें रोटी से खेलना अच्छा लगता है

तुम्हारी रक्तपिपासा 

अबूझ पहेली-सी लगती है


तुम्हारी बंदूक़ें तनती हैं उन्हीं पर

जिनकी वजह से तुम तुम हो

अपनी तमाम अंध आकांक्षाओं

अनंत कुटिल अपेक्षाओं के साथ


हक़ के बदले मौत की सौगात देते हो

निरीह निहत्थों को

जबकि पूँजीवादी हाथों की कठपुतली हो तुम

पूँजीवादी हरकतों से 

सकपकाए रहते हो हर हमेशा


तुम्हें आंदोलन पसंद नहीं है

इसलिये हमारी आवाज़ को 

रौंद डालते हो अक्सरहाँ

अपने लौहतंत्र के ख़ूनी पंजों से

तुम्हें रोशनी अच्छी नहीं लगती है

क्योंकि इंक़लाब से भय खाते हो


फ़ाशीवादी राष्ट्रवादी कतई हो नहीं सकता

दुनिया के सबसे ख़तरनाक आतंकी हो तुम

हमारी नज़रों में

यह धरती जिसे हम मातृभूमि कहते हैं

तुम्हारे लिए तो मात्र भूमि है

तुम तथाकथित हो, जहाँपनाह

सचमुच तथाकथित हो तुम…।



बाहुबली की बंदूक़


जहाँपनाह!

तुम बौखलाये से लग रहे हो

तुम्हारा डर 

तुम्हारे सियासी चहरे पर

साफ़-साफ़ झलक रहा है

हमारी अकूत ताक़त से

भीतर से बाहर तक 

बुरी तरह हिल गए से लगते हो


इसलिये तुमने बढ़ा दी है दबिश

खोल दिया है मोर्चा सरेआम

हमारी इंक़लाबी आवाज़ को

कुचलने के वास्ते

हमारी समूल ताकत को

चुनौती मानकर


इसलिये तुमने बढा लिए हैं

लौह सुरक्षा के अभेद्य घेरे

घेरे पर घेरे

वारप्रूफ घेरे

जिससे कि कोई भी परिंदा 

पर न मार सके

और मौत है कि डरा रही तुम्हें

तुम्हारा हमसाया बनकर 

पल-पल 


पहले से कहीं बहुत ज़्यादा 

चौकन्ने दिख रहे हो

लोकहन्ते!


यक़ीनन 

तुम्हारी सेवा-सुरक्षा में 

सुध-बुध बिसराए

अहर्निश लगे लोकतंत्र के 

सच्चे पहरुए की अंतःचेतना 

जिस क्षण जाग उठेगी

तुम बेनक़ाब हो जाओगे

तब तन जाएगी 

बाहुबली की बंदूक़

तुम्हारी कुटिल सियासी खोपड़ी की

बिल्कुल सीध में 


और तुम 

गिड़गिड़ाते 

दया की भीख माँगते 

नज़र आओगे

आख़िरी साँसों के 

चुक जाने से ठीक पहले तक...!



क्रांति लिख नहीं सकते


माना कि तुम्हारी कलम रेडिकल है

आग उगल सकती है

क्रांति के गीत लिख सकती है

आंदोलन को जन सकती है

तो क्या?


मुनादी करा दी गई है कि

तुम ऐसा कुछ नहीं कर सकते

तुम्हें लिखना ही है तो 

दरबार के गीत लिखो

बिरुदावली या क़सीदा

या राजा चालीसा


तुम आग को आग नहीं लिख सकते

न रोटी को रोटी लिख सकते हो 

न फूल को फूल ही

तुम्हें लिखना इतना ही पसंद है 

तो आग को पानी या बारिश लिखो

रोटी को पूनम का चाँद लिखो

और फूल को बाग या कुछ और


सत्ता की ग़ुलाम भाषा में

या फिर जुमले की भाषा में

कुछ का कुछ लिख सकते हो

कुछ को कुछ लिखना सख़्त मना है


जहाँ काग़ज़ के घोड़े दौड़ाए जाते हैं

जहाँ ज़ुबान से तीर छोड़े जाते हैं

जहाँ यंत्रणाओं के मायावी मृग दौड़ाये जाते हैं

वहाँ कलम को सहमे-सहमे रहना पड़ता है


अगर कलम से इतना ही मोह है

तो इसे या तो खोलो ही नहीं

या फिर रख छोड़ो इसे 

अपनी आलमारी के किसी अज्ञात कोने में

स्याही के सूख जाने तक...!



प्रेम कविता नहीं लिख सकता


अभी भी 

हाशिये की 

आग की

मनुवादी लपटें 

मेरी आँखों में

तांडव मचा रही हैं


अभी भी

शासन की बंदूक़ से छलनी 

भारत की आत्मा का आर्त स्वर

अंतर्मन को मथ रहा है


अभी भी

सीमा से साबुत 

लौट नहीं पाने की 

टीस से बेचैन

नवब्याहता की

हृदय विदारक दहाड़

मेरी भुजाओं को फड़का रही है


अभी भी

बहुत दिनों से लापता

मासूम के परिजनों की

सूनी मुरझाई आँखों से

झड़ते शब्द

भीतर से झकझोर रहे हैं


अभी भी 

तेजाब पीडिता की पीड़ा

मेरे मर्म को कचोट रही है


अभी भी

दहेज़ की चिता 

मेरे मन प्राण में 

लहक रही है


अभी भी

घोंट दिया गया

अजन्मा 

रुंध मादा क्रंदन

मेरे हृदय को साल रहा है


अभी भी

उन गेसुओं की 

बहकी-बहकी महक

और वे फ़रेबी अदाएँ

विचलित करने की 

नाहक कोशिश कर रही हैं

जबकि

अभी भी

प्रेम मेें मात खाई

बाहर और भीतर से 

बुरी तरह टूट चुकी

पंखे से झूलती भोली सूरत 

मेरी नज़रों से 

हटने का नाम नहीं ले रही है


ऐसे में

इस धुआँई धूसर शाम को

सुरमई लिख नहीं सकता

इस काली भयावह रात को

गुलाबी लिख नहीं सकता

इस सकुचाई अलसुबह को

मादक लिख नहीं सकता


माफ़ करना मेरे दोस्त

ऐसे जटिल कठिन समय में

मैं प्रेम कविता लिख नहीं सकता...!



दूध


दूध एक पूरक पेय है

दूध चाय की तरह

सियासी पेय नहीं है

जैसे गाय सियासी पशु है

और गंगा सियासी नदी


ख़ासकर गाय पर 

सियासी ज्वर 

चढने के साथ ही

दूध 

डरा-डरा 

सहमा-सहमा 

दिखने लगा है


जब से इसे 

पूँजीवाद का साँप

सूँघ गया है

बड़े आराम से

पानी के साथ मिल

अपनी सत्ता काफी मज़बूती से

क़ायम कर ली है इसने

ख़ुद में समाहित

पानी के वजूद को नकारते हुए


जैसे राजनीति

भ्रष्टाचार से संबंध गाँठ

अपनी प्रभुसत्ता का हरसू

अहसास कराती रही है 

बडी संजीदगी के साथ

स्वयं में रचे-बसे 

भ्रष्टाचार के अस्तित्व को झुठलाते


फ़िलवक़्त दूध की तरफ़ 

सियासत की वक्र दृष्टि नहीं पड़ी है

उसे पता चल गया है कि

सियासत पूँजीवाद की चेरी है...!


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घनश्याम कविता, आलोचना एवं अनुवाद के क्षेत्र में सक्रिय हैं। कविता संकलन : छाया मे पाँव जले। आलोचना : Dalit Discourse in Indian English Narrative‌. अनुवाद : Aesthetics of Dalit Literature (ओमप्रकाश वाल्मीकि की पुस्तक 'दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र' का अनुवाद)। ईमेल : ghanshyamballia4@gmail.com




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