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ख़बरों से बाहर ग़ज़ा (पुस्तक समीक्षा)

  • 15 hours ago
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ख़बरों से बाहर ग़ज़ा (पुस्तक समीक्षा)
समीक्षक : सौरभ कुमार

कैमरा जब किसी हिंसा की जगह पर पहुँचता है तो सबसे पहले दृश्य दर्ज करता है—टूटी हुई इमारतें, धुआँ, घायल शरीर, भागते हुए लोग, किसी बच्चे का चेहरा। फिर संख्याएँ आती हैं। कितने लोग मारे गए, कितने घायल हुए, कितने घर नष्ट हुए। समाचार के लिए यह सब ज़रूरी है। दस्तावेज़ के लिए भी। लेकिन हिंसा को दर्ज करने की सबसे बड़ी मुश्किल शायद यह है कि कुछ समय बाद मनुष्य संख्या में बदलने लगता है।


एक डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार के रूप में मुझे यह प्रश्न लगातार परेशान करता है कि किसी त्रासदी को इस तरह कैसे दर्ज किया जाए कि उसे देखने वाला केवल घटना न देखे, बल्कि उस घटना के भीतर जी रहे व्यक्ति को भी देख पाए। उसकी छोटी इच्छाएँ, उसके रिश्ते, उसकी शर्म, उसका ग़ुस्सा, उसका डर, उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी।


ग़स्सान कनफ़ानी की ‘ग़ज़ा से ख़त और अन्य कहानियाँ’ पढ़ते हुए मुझे बार-बार लगा कि साहित्य शायद इसी जगह वह कर सकता है जो समाचार और कैमरा कई बार नहीं कर पाते। वह घटना के भीतर छूट गए जीवन को वापस ले आता है।


आज ग़ज़ा की तस्वीरों से बचना लगभग असंभव है। लेकिन किसी जगह को लगातार देखना और उसे जानना एक ही बात नहीं है। पिछले वर्षों की तस्वीरों ने ग़ज़ा को हमारे सामने मलबे, धुएँ, अस्पतालों, मृतकों और विस्थापित लोगों के एक अंतहीन दृश्य में बदल दिया है। कनफ़ानी को पढ़ते हुए एहसास होता है कि तस्वीर के फ्रेम के बाहर भी एक ग़ज़ा है—वह ग़ज़ा जहाँ कोई पिता अपने बच्चे के लिए नई क़मीज़ चाहता है, कोई लड़की अपने छोटे भाई-बहनों को बचाते हुए घायल होती है, कोई आदमी नौकरी खोजते-खोजते अपनी गरिमा बचाने की कोशिश कर रहा है, और कोई युवक कहीं दूर बेहतर जीवन की संभावना और अपनी मिट्टी के प्रति जिम्मेदारी के बीच फँसा हुआ है। ग़ज़ा से ख़त के हिंदी संस्करण में कनफ़ानी की ऐसी ही कहानियाँ सामने आती हैं।


यह फ़िलिस्तीन को एक ‘मुद्दा’ बनने से रोकती है। यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी ताक़त है।


हम दूर बैठे लोगों के लिए फ़िलिस्तीन बहुत आसानी से विचारधारा बन सकता है। नक़्शा बन सकता है। बहस बन सकता है। सोशल मीडिया की टाइमलाइन बन सकता है। पक्ष और विपक्ष में बाँटा गया एक राजनीतिक प्रश्न बन सकता है। लेकिन कनफ़ानी बार-बार हमें उस व्यक्ति के पास वापस ले जाते हैं जिसके लिए फ़िलिस्तीन इन तमाम चीज़ों से पहले घर है।


घर—जो था।


घर—जो छूट गया।


और घर—जिसकी स्मृति अभी भी साथ चल रही है।


कनफ़ानी स्वयं विस्थापन की इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया से निकले लेखक थे। वे लेखक होने के साथ पत्रकार, राजनीतिक विचारक और फ़िलिस्तीनी मुक्ति आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े व्यक्ति थे। 1972 में बेरूत में एक कार बम विस्फोट में उनकी हत्या कर दी गई; वे केवल छत्तीस वर्ष के थे। उनके लिए साहित्य और राजनीतिक जीवन दो अलग-अलग दुनियाएँ नहीं थे।


लेकिन उन्हें केवल ‘क्रांतिकारी लेखक’ कह देना भी उनके साहित्य के साथ अन्याय होगा।


उनकी कहानियों की राजनीति नारों से कम और मनुष्य की परिस्थितियों से अधिक पैदा होती है।


संग्रह की पहली कहानी ‘चुराई हुई क़मीज़’ इसका बहुत अच्छा उदाहरण है। कहानी का आरंभ किसी युद्धभूमि से नहीं होता। न कोई गोली चल रही है, न कोई भाषण दिया जा रहा है। एक आदमी बारिश में अपने ख़ेमे के चारों ओर नाली खोद रहा है ताकि गंदा पानी भीतर न घुसे। वह ठंड से काँप रहा है। उसकी पत्नी भीतर है। उसका बेटा अब्दुल रहमान बीमार पड़ा है। और वह ख़ेमे में जाने से इसलिए डरता है क्योंकि उसे पता है कि पत्नी की आँखें उससे वही सवाल पूछेंगी जिसका जवाब उसके पास नहीं है—काम मिला? खाएँगे क्या?


यहीं से कनफ़ानी हमें शरणार्थी जीवन का अर्थ समझाना शुरू करते हैं। शरणार्थी होना केवल अपना भूगोल खो देना नहीं है। यह धीरे-धीरे अपनी रोज़मर्रा की स्वायत्तता खो देना भी है। खाना कब मिलेगा, राशन कब बँटेगा, काम मिलेगा या नहीं, बच्चे के लिए कपड़ा आएगा या नहीं—जीवन के सबसे साधारण निर्णय भी किसी दूसरी व्यवस्था की अनुमति पर टिक जाते हैं।


‘चुराई हुई क़मीज़’ में आटे की एक बोरी लगभग राजनीतिक वस्तु बन जाती है।


इंटरनेशनल एड एजेंसी का गोदाम पास है। परिवार भूखा है। अबू अब्द सोचता है कि क्या वह वहाँ से आटा चुरा सकता है। धीरे-धीरे उसे पता चलता है कि जिन लोगों पर राहत पहुँचाने की ज़िम्मेदारी है, उन्हीं के बीच राशन की चोरी और बिक्री का खेल चल रहा है। उसके सामने अपराध का एक विचित्र नैतिक संसार खुलता है—भूखा व्यक्ति चोरी करे तो चोर, लेकिन भूखों के लिए आया अनाज व्यवस्था के भीतर से ग़ायब कर दिया जाए तो वह प्रशासन है।


कनफ़ानी यहाँ किसी पात्र को सरल नैतिक प्रतीक में नहीं बदलते। अबू अब्द कोई आदर्श क्रांतिकारी नहीं है। वह थका हुआ पिता है। कुछ क्षणों के लिए वह स्वयं इस चोरी में शामिल होकर पैसे कमाने की कल्पना करता है। उसे अपनी पत्नी के लिए चीज़ें खरीदने और बेटे के लिए नई क़मीज़ लाने का सपना दिखाई देता है। यही छोटी-सी क़मीज़ कहानी का सबसे बड़ा दृश्य बन जाती है।


युद्ध और विस्थापन पर लिखते समय बड़ी राजनीतिक भाषा बहुत आसानी से सामने आ जाती है—राष्ट्र, सीमा, कब्ज़ा, साम्राज्यवाद, प्रतिरोध। कनफ़ानी इन सबको जानते हैं, लेकिन कहानी में वह हमें एक बच्चे की क़मीज़ दिखाते हैं। क्योंकि शायद किसी व्यवस्था की हिंसा को समझने के लिए यह देखना भी ज़रूरी है कि उसने किसी पिता के लिए अपने बच्चे को नई क़मीज़ दिलाना कितना मुश्किल बना दिया है।


एक फ़िल्मकार की दृष्टि से देखें तो कनफ़ानी का लेखन बेहद दृश्यात्मक है। वे हमेशा किसी विशाल ऐतिहासिक दृश्य से शुरुआत नहीं करते। उनका कैमरा जैसे पहले किसी छोटी चीज़ पर टिकता है—कीचड़ में धँसा पैर, ख़ाली बोरी, ठंडी उँगलियाँ, ख़ेमे के भीतर बैठा बच्चा, चेहरे पर उभरती शर्म। फिर धीरे-धीरे उस क्लोज़-अप के पीछे पूरी राजनीतिक संरचना दिखाई देने लगती है।


अच्छे वृत्तचित्र में भी कई बार यही होता है।


आप पूरी व्यवस्था को एक साथ नहीं दिखा सकते। लेकिन किसी मज़दूर के हाथ, किसी विस्थापित परिवार के कमरे या किसी घायल व्यक्ति की चुप्पी को पर्याप्त देर तक देखें, तो व्यवस्था स्वयं उस फ्रेम में प्रवेश करने लगती है।


कनफ़ानी की कहानियाँ इसी अर्थ में दस्तावेज़ भी हैं, लेकिन वे दस्तावेज़ से कहीं अधिक हैं। दस्तावेज़ हमें बता सकता है कि लोग विस्थापित हुए। कहानी बताती है कि विस्थापन शरीर और रिश्तों के भीतर क्या करता है।


आँकड़ा बता सकता है कि कोई बच्चा घायल हुआ। शीर्षक कहानी ‘ग़ज़ा से ख़त’ में नादिया का घायल शरीर उस पूरी राजनीतिक वास्तविकता को हमारे सामने रख देता है जिसे संख्याएँ कभी पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकतीं। कहानी में एक युवक अपने दोस्त को लिख रहा है। विदेश चले जाने का रास्ता उसके सामने भी है। लेकिन अपनी भतीजी नादिया को देखने के बाद वह नहीं जाता। नादिया अपने छोटे भाई-बहनों को बचाते हुए बमबारी में अपनी टाँग खो चुकी है। दोस्त को वापस बुलाने वाली उसकी चिट्ठी इस प्रश्न में बदल जाती है कि ऐसी जगह को छोड़ देने का अर्थ क्या है जहाँ आपका अपना इतिहास घायल अवस्था में आपके सामने पड़ा हो।


यहाँ प्रतिरोध किसी रोमांटिक वीरता से पैदा नहीं होता, वह संबंध से पैदा होता है।


आप किसी जगह के लिए इसलिए नहीं रुकते कि नक़्शे में उस पर आपका अधिकार लिखा है। आप इसलिए रुकते हैं क्योंकि वहाँ कोई नादिया है जिससे आपका रिश्ता है।


कनफ़ानी के यहाँ फ़िलिस्तीन इसी तरह भूमि से मनुष्य और मनुष्य से स्मृति में बदलता रहता है।


और शायद इसीलिए उनकी कहानियाँ आज इतनी बेचैन करती हैं। उन्हें पढ़ते हुए यह दूरी बनाए रखना कठिन हो जाता है कि यह किसी दूर देश का संघर्ष है। उनकी कहानी में भूख, भूख ही है। अपने बच्चे के लिए कुछ न कर पाने की शर्म वही है। घर खोने का अर्थ वही है। किसी सत्ता द्वारा आपके जीवन के निर्णयों पर नियंत्रण कर लेने का अनुभव भी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग रूपों में पहचाना जा सकता है। यही वह बिंदु है जहाँ प्रतिरोध का साहित्य सफल या असफल होता है।


यदि साहित्य केवल हमें यह बता रहा है कि किसका पक्ष सही है, तो वह बहुत जल्दी पर्चा बन सकता है। पर्चे की अपनी भूमिका होती है, लेकिन कहानी की भूमिका उससे अलग है। कहानी को मनुष्य के अंतर्विरोध को बचाना पड़ता है।


कनफ़ानी यह करते हैं।


उनके पात्र भूखे हैं, लेकिन हमेशा महान नहीं। वे डरते हैं। भागना चाहते हैं। लालच में आते हैं। ग़ुस्सा करते हैं। कभी परिस्थितियों के सामने टूटते हैं और कभी अचानक उसका प्रतिरोध करते हैं। इसलिए वे प्रतीक बनने से पहले मनुष्य बने रहते हैं।


आज की दृश्य-संस्कृति में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हम दुःख की तस्वीरों से लगातार घिरे हुए हैं। सोशल मीडिया ने हमें ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया है जहाँ एक अत्यंत भयावह तस्वीर देखने के कुछ सेकंड बाद हम उँगली ऊपर कर अगला वीडियो देख सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हम असंवेदनशील लोग हैं। शायद इसका अर्थ यह है कि हमारी संवेदना पर दृश्य सामग्री का भार इतना अधिक हो गया है कि उसे बचाने के लिए हम स्वयं दूरी बनाने लगते हैं।


कनफ़ानी की कहानी उस ‘स्क्रोल’ को रोक देती है।


किसी तस्वीर को आप दो सेकंड देख सकते हैं। लेकिन किसी पिता के साथ कई पन्नों तक बारिश में खड़े रहने के बाद उससे उतनी आसानी से बाहर नहीं निकला जा सकता। यह साहित्य की राजनीतिक शक्ति है और यह हमें दस्तावेज़ीकरण के बारे में भी कुछ सिखाती है।


किसी समुदाय की पीड़ा को दर्ज करने का अर्थ केवल उसका सबसे हिंसक क्षण दर्ज करना नहीं है। अगर हम केवल घायल शरीर दिखाते हैं तो अनजाने में उस व्यक्ति की पूरी पहचान को उसके घाव तक सीमित कर सकते हैं। कनफ़ानी इसके विपरीत अपने लोगों को खाना खाते, नौकरी ढूँढ़ते, प्यार करते, झगड़ते, सपने देखते, शर्म महसूस करते और उम्मीद करते हुए लिखते हैं।


यानी कब्ज़ा उनके जीवन की निर्णायक वास्तविकता है, लेकिन वह उनके अस्तित्व की सम्पूर्ण परिभाषा नहीं है।


पीड़ित को मनुष्य बने रहने देना स्वयं एक राजनीतिक काम है। मेरे लिए इस संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण सीख शायद यही है।


हिंदी में इस पुस्तक का आना महत्त्वपूर्ण है। आस प्रकाशन का यह संस्करण कनफ़ानी की कहानियों को हिंदी पाठक तक लाता है; उपलब्ध पुस्तक-सूचना के अनुसार इन कहानियों का अरबी से उर्दू अनुवाद इनाम नदीम ने किया और उर्दू से हिंदी रूपांतरण शहादत ने किया है। प्रकाशक भी कनफ़ानी के लेखन को शरणार्थी जीवन, सामूहिक पीड़ा और प्रतिरोध की आवाज़ के रूप में प्रस्तुत करता है।


अनुवाद यहाँ केवल भाषा बदलने का काम नहीं करता। वह दूरी घटाता है।


‘रिफ्यूजी’, ‘ऑक्युपेशन’, ‘डिस्प्लेसमेंट’ जैसे शब्द अंतरराष्ट्रीय राजनीति की भाषा में कई बार अमूर्त हो जाते हैं। लेकिन जब वही जीवन हिंदी-हिंदुस्तानी में हमारे सामने बोलता है—रोटी, ख़ेमा, बेटा, क़मीज़, बारिश, घर—तो फ़िलिस्तीन अचानक केवल पश्चिम एशिया के नक़्शे पर मौजूद जगह नहीं रहता। वह हमारे भाषाई संसार में प्रवेश कर जाता है।


इस पुस्तक को पढ़ने के बाद मेरे लिए ग़ज़ा का प्रश्न शायद पहले से अधिक राजनीतिक है, लेकिन उससे भी अधिक मानवीय है। और ‘मानवीय’ से मेरा आशय राजनीति से दूर किसी उदार करुणा से नहीं है। बल्कि ठीक उल्टा। कनफ़ानी हमें दिखाते हैं कि मनुष्य की सामान्य ज़िंदगी—घर होना, खाना मिलना, बच्चे को कपड़ा दिला पाना, अपने भविष्य का निर्णय स्वयं कर पाना—कितनी गहरी राजनीतिक चीज़ें हैं।


जब किसी समुदाय से ये साधारण अधिकार छीन लिए जाते हैं, तो रोज़मर्रा की ज़िंदगी स्वयं प्रतिरोध का क्षेत्र बन जाती है।


कनफ़ानी की हत्या की जा सकी। उनकी कहानियाँ बची रहीं। आज आधी सदी से अधिक समय बाद, वे हिंदी में हमारे सामने हैं।


शायद साहित्य की सबसे बड़ी ज़िद यही है।


एक सत्ता घर नष्ट कर सकती है। किसी व्यक्ति को विस्थापित कर सकती है। शरीर को घायल कर सकती है। लेखक को भी मार सकती है। लेकिन अगर कहानी बची रहती है, तो वह मनुष्य को केवल आँकड़ा बन जाने से बचाती रहती है।


‘ग़ज़ा से ख़त’ को आज पढ़ना इसलिए केवल फ़िलिस्तीन के बारे में जानना नहीं है।


यह उन लोगों को फिर से मनुष्य की तरह देखने की कोशिश है जिन्हें हमारी स्क्रीन बहुत लंबे समय से संख्या और तस्वीरों में बदलती रही है। कनफ़ानी को पढ़ने की शुरुआत यहीं से होनी चाहिए।


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लेखक: ग़स्सान कनफ़ानी

अनुवाद: इनाम नदीम;

हिंदी रूपांतरण: शहादत

प्रकाशक: आस पब्लिशर्स, जयपुर 


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सौरभ कुमार सामाजिक न्याय, शिक्षा तथा जन-सरोकारों से जुड़े विषयों पर दृश्य-कथाएँ बनाते हैं। उनका लेखन‌ समकालीन जनमत, जन चौक और आर्टिकल 14 आदि वेबसाइट्स पर प्रकाशित हुआ है। ईमेल : saurabhverma4592@gmail.com 




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