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प्रेमचंद से संवाद (यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते)
प्रेमचंद से संवाद (यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते) हिमांशु विश्वकर्मा यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते, तो वे भारत से क्या कहते और हम उनसे क्या पूछते? यदि सचमुच मुझे आज प्रेमचंद से मिलने का अवसर मिलता, तो शायद सबसे पहले मैं उनसे यही पूछता- “प्रेमचंद जी, आज का भारत देखकर आपको कैसा लगता है?” वे संभवतः मुस्कुराकर कहते- “भारत बदला है, और बहुत बदला है। विज्ञान आगे बढ़ा है, लोकतंत्र मजबूत हुआ है, शिक्षा का विस्तार हुआ है, तकनीक ने जीवन को नई गति दी है। इन उपलब्धियों पर प्रसन्न होना च


दुनिया में एक शहर है, जिस शहर में पूरी दुनिया मिलती है।
मैच शुरू हुआ तो लगा जैसे इधर से उधर बॉल नहीं झूम रही बल्कि लोगों के दिल खिलाड़ियों के पैरों में अटके हुए हैं। बॉल जितनी बार उछलती, उतनी ही बार लोगों के दिल उछलते और गलों की आवाज़ें किसी कोरस में आसमान तक टप्पे खाने लगतीं। गेंद गोलपोस्ट के पास पहुँचती और पूरा इलाक़ा एक साथ साँस रोक लेता। गोल होने पर ऐसा शोर उठता कि लगता, इस शहर की गगनचुंबी इमारतें भी मुस्कुराने लगती होंगी।


कल्पना मनोरमा की डायरी
याद आई नदी किनारे पड़ी नाव। महीनों पानी से दूर रहने पर उसकी देह सूख जाती होगी। फिर जब उसे दोबारा नदी में उतारा जाएगा तो वह भी एक पल के लिए ठिठकेगी। पानी धीरे-धीरे उसकी लकड़ी में उतरेगा और वह फिर से जी उठेगी।


विनीता बाड़मेरा की डायरी
हर दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है। रात बीत रही है। जनवरी शुरू होती है और बारह महीने बीतते ही दिसंबर आ जाता है। एक साल पूरा खत्म हो जाता है। मन में रह जाती है कसक, बहुत कुछ छूटने की, बीतने की, रीतने की—न चाहते हुए भी।


बेटियाँ धान के पौधे की तरह होती हैं
जैसे ही दीवारों से बेटी की आवाज की प्रतिध्वनि गूंजती है उसका मन कलप उठता है। पिता को कंधे पर कोमल हथेलियों के स्पर्श का एहसास होता है, जैसे बेटी कह रही हो- "पापा, उदास नहीं होते, साल भर कहाँ रह पाता है बसंत।


काफ़्का को यहूदी पहचान से आगे पढ़ने की कोशिश
पीएत्रो चिताती की काफ़्का मेरे लिए एक जीवनी से कहीं अधिक है। यह किताब काफ़्का की यहूदी पहचान का निषेध नहीं करती, बल्कि उसे अपनी व्याख्या का केंद्र भी नहीं बनाती। वह काफ़्का को सबसे पहले एक रचनाकार की तरह पढ़ती है—ऐसे रचनाकार की तरह, जिसकी कल्पना अपने समय, अपने समाज और अपनी सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण करके मनुष्य की सार्वभौमिक नियति को छूती है।


काफ़्का की कहानी ‘बांबी’ का अंतर्पाठ
दुर्ग गोदाम में राशन संग्रहण से वह किसी भी संभावित घेराबंदी से महीनों निश्चिन्त रह सकता है पर अपनी सुरक्षा को लेकर उसकी हालत ‘ईमां मुझे रोके है तो खेंचे है मुझे कुफ़्र’ वाली ही बनी रहती है।


आशुतोष प्रसिद्ध की डायरी
दिनों बाद सुकून की कोई लय लगातार सुनता रहा। एक हँसी, एक छेड़ लगातार गूँजती रही। फिसलते रास्ते पर हम सम्भलकर चलते रहे और अन्ततः सही राह पा गए।
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