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काफ़्का को यहूदी पहचान से आगे पढ़ने की कोशिश

  • 24 hours ago
  • 8 min read


काफ़्का को यहूदी पहचान से आगे पढ़ने की कोशिश
गुलफ़तेह सोज़ 

पीएत्रो चिताती की काफ़्का जीवनी पर सबसे बड़ा एतराज़ यही किया गया है कि उन्होंने काफ़्का के यहूदी सांस्कृतिक परिवेश को वह अहमियत नहीं दी जिसकी उम्मीद की जाती है। कई आलोचकों का मानना है कि काफ़्का की रचनाओं को उसकी यहूदी परंपरा, प्राग के यहूदी समाज और मध्य यूरोप की बौद्धिक विरासत से अलग करके नहीं समझा जा सकता। यह आपत्ति अपनी जगह महत्वपूर्ण है। लेकिन मुझे हमेशा लगता रहा है कि चिताती की किताब की सबसे बड़ी ताक़त शायद इसी बात में छिपी है।


किसी भी लेखक का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिवेश उसकी रचनाओं को समझने में निस्संदेह मदद करता है। कोई लेखक शून्य में पैदा नहीं होता। उसकी भाषा, उसकी स्मृतियाँ, उसके मिथक और उसकी संवेदना उसके समाज से ही निर्मित होते हैं। लेकिन क्या किसी लेखक को केवल उसके सांस्कृतिक संदर्भों के भीतर रखकर पढ़ लेना ही उसकी सबसे सही व्याख्या है? मुझे लगता है कि यहीं आलोचना की सबसे बड़ी चुनौती शुरू होती है।


जब आलोचना किसी लेखक को उसकी क़ौम, मज़हब, जाति या तहज़ीब की सीमाओं में ही बाँध देती है, तब वह अनजाने में उसकी रचनात्मक उड़ान को भी सीमित कर देती है। एक बड़ा लेखक अपनी जड़ों से जन्म तो लेता है, लेकिन उसकी रचना केवल उन्हीं जड़ों की व्याख्या बनकर नहीं रह जाती। वह अपने समय, अपने समाज और अपनी पहचान का अतिक्रमण करते हुए मनुष्य के ऐसे अनुभवों तक पहुँचती है जिन्हें हर दौर और हर समाज का पाठक पहचान सकता है।


चिताती की सबसे बड़ी ख़ूबी यही है कि वे काफ़्का को सबसे पहले एक ऐसे इंसान की तरह पढ़ते हैं जिसकी रचनात्मक दुनिया ख़ौफ़, गुनाह के एहसास, तन्हाई, इंतज़ार, इंसाफ़ और मुक्ति की बेचैन तलाश से बनी है। उनके लिए द ट्रायल, द कैसल और मेटामॉर्फ़ोसिस किसी ख़ास सांस्कृतिक दस्तावेज़ से ज़्यादा आधुनिक मनुष्य की नियति के आख्यान हैं। काफ़्का उनके यहाँ किसी एक तहज़ीब या मज़हबी पहचान के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि आधुनिक मनुष्य की उस बेचैनी की आवाज़ हैं जिसे दुनिया की लगभग हर संस्कृति ने अपने-अपने ढंग से महसूस किया है।


यही वजह है कि जहाँ बहुत-से आलोचक इस दृष्टि को चिताती की सीमा मानते हैं, वहीं मुझे यही उनकी सबसे बड़ी ताक़त लगती है। ख़ुद George Steiner ने भी इस बात की ओर ध्यान दिलाया था कि चिताती ने काफ़्का की यहूदी परंपरा और उसके बौद्धिक तथा आध्यात्मिक संदर्भों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। स्टाइनर का आग्रह था कि काफ़्का को Gershom Scholem और यूरोप की यहूदी बौद्धिक परंपरा की रोशनी में भी पढ़ा जाना चाहिए। इस आपत्ति का अपना महत्व है क्योंकि काफ़्का की भाषा और उनकी संवेदना पर उस विरासत की छाप से इनकार नहीं किया जा सकता।


लेकिन शायद हर बड़ी आलोचना किसी लेखक को अलग-अलग कोणों से पढ़ने की संभावना भी खोलती है। यदि स्टाइनर हमें काफ़्का की सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरित करते हैं, तो चिताती हमें यह देखने के लिए आमंत्रित करते हैं कि उन्हीं जड़ों से उठकर काफ़्का किस तरह पूरी मानवता के लेखक बन जाते हैं। उनकी रचनाओं में जो बेचैनी है, वह किसी एक धर्म, एक समाज या एक इतिहास की नहीं रह जाती; वह आधुनिक मनुष्य की साझा नियति बन जाती है।


मेरे लिए आलोचना का उद्देश्य लेखक को उसके संदर्भों से अलग कर देना नहीं, बल्कि यह समझना है कि उसकी रचना उन संदर्भों का अतिक्रमण कैसे करती है। सांस्कृतिक पहचान किसी लेखक की बुनियाद है, लेकिन महान साहित्य की पहचान केवल उसकी बुनियाद से नहीं होती। वह वहाँ शुरू होता है जहाँ एक स्थानीय अनुभव पूरी मानवता के अनुभव में बदल जाता है।


शायद इसी वजह से पीएत्रो चिताती की काफ़्का मेरे लिए एक जीवनी से कहीं अधिक है। यह किताब काफ़्का की यहूदी पहचान का निषेध नहीं करती, बल्कि उसे अपनी व्याख्या का केंद्र भी नहीं बनाती। वह काफ़्का को सबसे पहले एक रचनाकार की तरह पढ़ती है—ऐसे रचनाकार की तरह, जिसकी कल्पना अपने समय, अपने समाज और अपनी सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण करके मनुष्य की सार्वभौमिक नियति को छूती है। यही कारण है कि चिताती की यह जीवनी मुझे आज भी काफ़्का पर लिखी गई सबसे असाधारण पुस्तकों में से एक लगती है।


अब पढ़ते हैं किताब का एक अंश : 


काफ़्का के जीवन में कई अविस्मरणीय दिन थे—जैसा लुईस कैरोल ने कहा था उन पर सफ़ेद पत्थरों के निशान लगे हुए थे या कहा जाए जिन पर दुर्भाग्य के काले पत्थरों के निशान थे। उसकी स्मृति में बचपन के कुछ दिन अपने अकथनीय भय के साथ सुरक्षित बचे हुए थे—वह रात जब उसके पिता ने उसे बैडरूम की बालकनी में छोड़ दिया था; वे सुबहें जब उसे स्कूल ले जाती हुई आया शिक्षकों से शिकायत करने की धमकी दिया करती थी; वह इतवार जब वह एक लड़का ही था और उसने एक उपन्यास लिखना शुरू किया था जिसके लिए उसके चाचा ने उसे डांट लगाई थी; वह दिन जब उसने क्लाइनेर रिंग में एक भिखारिन को बीस सेंट का तोहफ़ा दिया था। उसके बाक़ी जीवन से बिल्कुल अलग ये दिन अपनी विराटता के साथ अलग खड़े रहा करते थे। लेकिन सबसे अविस्मरणीय 13 अगस्त 1912 की वह शाम थी जब उसकी मुलाक़ात फ़ेलीस बाउएर से हुई थी। तमाम सूक्ष्मतम विवरणों के साथ वह उसे हमेशा याद रहती थी। प्रेम की उसकी स्मृति को चिंता से भरपूर और पूर्ण संपूर्णता की दरकार थी—बेहद ईर्ष्या के साथ वह बीते हुए समय पर, उस शाम के हर सेकेण्ड पर अपना हक़ चाहता था  और वह बार-बार उस दृश्य में लौटा करता था। अपने दिमाग़ के दरवाज़ों पर दस्तक देता हुआ वह तमाम सवालात किया करता था—फिर कभी कोई भंगिमा या कोई शब्द उस तक लौट कर आया करते जिन्हें वह समझता था वह भूल चुका था, जैसे कि बीता हुआ वक़्त समय के सलेटी समुद्र के भीतर से सतह पर आता हुआ कोई द्वीप हो। वह चीज़़ों को छांटता नहीं था। उसे ज़रूरी और साधारण के बीच फ़र्क़ करने की कोई इच्छा नहीं थी। लेकिन वह अपनी भंगिमाओं और शब्दों में उपस्थित-अनुपस्थित का संतुलन बना कर चलता था क्योंकि क्या मालूम किस चीज़़ के पीछे उसकी नियति छिपी हो। वह कभी संतुष्ट नहीं होता था। उसे लगता था उसकी स्मृति ने कुछ खो दिया है; सो वह फ़ेलीस की स्मृति का सहारा लेता था—जो शायद उसकी ही स्मृति जितनी पैनी थी—ताकि वह एक आख़िरी रंग भर सके, दृश्य में एक आख़िरी छाया को ला सके। ढाई महीने बाद उसने फ़ेलीस को लिखा—


इस किताब को पूरा करके मुझे उससे कहीं ज़्यादा ख़ुशी मिलेगी जितनी तुम्हें तब मिली थी जब मैंने तुम्हें इसके शुरुआती विवरण दिए थे।


उस शाम काफ़्का को मैक्स ब्राॅड से मिलने नं. 1 शालेनगासे में उसके माता-पिता के घर जाना था। काफ़्का ने मैक्स के साथ मिलकर ‘मैडिटेशन’ के गद्य के कुछ टुकड़ों को दुरुस्त करना था जिन्हें रोवोल्ट प्रकाशन जल्द ही छापने वाला था। काफ़्का ने आठ बजे आना था। आदतन वह देर से पहुँचा, शायद नौ के बाद। काफ़्का के शाम को आने का मतलब ब्राॅड के परिवार के लिए एक संकट जैसा होता था क्योंकि समय बीतने के साथ साथ काफ़्का और जीवन्त होता जाता था और अक्सर इसका मतलब होता था मैक्स के भाई ओटो की नींद में ख़लल क्योंकि वह समय पर सोने वाला आदमी था। सारा परिवार बड़े लाड़ के साथ काफ़्का को घर से बाहर धकेलता था मानो वह शान्ति भंग करने वाला हो। जब वह पहुँचा काफ़्का ने वहाँ एक लड़की देखी— एक अजनबी लड़की जो लिविंग रूम में बैठी हुई थी; उसे बाद में पता लगा कि उसका नाम फ़ेलीस बाउएर था और वह बर्लिन में रहती थी और कि वह पच्चीस साल की थी और डिक्टाफ़ोन के प्रतिद्वंद्वी के तौर पर पार्लोग्राफ़ बनाने वाली लिंडस्ट्राम कम्पनी में डिपार्टमेन्ट मैनेजर की हैसियत से काम करती थी। उसने एक अनौपचारिक सा दिखने वाला सफ़ेद ब्लाउज़ पहना हुआ था और श्रीमती ब्राॅड की चप्पलें (बाहर बारिश हो रही थी और उसके गीले जूते कहीं और सूखने को रखे हुए थे); उसकी निगाह शालीन लेकिन अधिकारपूर्ण थी। परिचय कराए जाने से पहले ही काफ़्का ने उसे अपना हाथ प्रस्तुत किया था और वह अपनी जगह से उठी भी नहीं क्योंकि अपना हाथ बढ़ाने की उसकी कोई इच्छा नहीं थी। फिर काफ़्का बैठा और बहुत ग़ौर से उसे देखता रहा— अपनी उस तीखी निगाह से जो चीज़़ों को स्मृति में जड़ कर उन्हें पत्थर की तरह गतिहीन मृत और असंगत बना देती थी। वह किसी परिचारिका जैसी दिखती थी। उसका चेहरा ‘‘हड्डीदार और ख़ाली था जिस पर उसका ख़ालीपन साफ़ लिखा हुआ था;’’ उसकी नाक क़रीब-क़रीब टूटी हुई थी; बाल सुनहरे थे और उसकी ठोड़ी ज़रा सी ठस्स और अनाकर्षक थी। उसकी त्वचा सूखी दागदार और क़रीब-क़रीब नापसन्द आने वाली थी, उसके बहुत से दाँत सोने के थे जो उसके भरे हुए दाँतों की सलेटी पीली रंगत को बाधित करते थे। उनकी आगदार चमक ने उसे यहाँ तक डराया कि वह बार-बार उन्हें ही देखता रहा मानो वे वास्तविक न हों। लेकिन उस ख़ाली चेहरे का क्या अर्थ था? क्या फ़ेलीस के भीतर आत्मा नहीं थी? या क्या उसने कभी पाप नहीं किया था? तो भी उस ख़ाली अनुपस्थित चेहरे ने काफ़्का की कल्पना को इस क़दर सुलगाया जैसा पहले किसी ने नहीं किया था।


बातचीत शुरू हुई। मैक्स ब्राॅड और काफ़्का ने फैलीस को पिछले महीने की अपनी वेईमार यात्रा के फ़ोटो देखने को दिए; फ़ेलीस ने उन्हें बहुत गंभीरता से देखा, उसका सिर झुका हुआ था और वह बार-बार अपने माथे पर आ गए बालों को हटाती थी। इस बीच टेलीफ़ोन बजा और वह उन्हें एक आपेरेटा—गर्ल विद द कार के शुरुआती दृश्य के बारे में बताती रही जिसमें पन्द्रह पात्र गलियारे में बज रहे फ़ोन की तरफ़ एक-दूसरे के पीछे भागते हैं। बाद में वार्तालाप भाइयों के बीच विवाद के विषय पर आया; फ़ेलीस ने बताया कि उसने हिब्रू सीख रखी है और वह ज़ियोनिस्ट है। ब्राॅड की माँ ने फ़ेलीस की कम्पनी के बनाए पार्लोग्राफ़ की खूबियों के बारे में बोलना शुरू किया और यह भी बताया कि फ़ेलीस ने अपनी बहन की शादी में हिस्सा लेने बुडापेस्ट जाना है और जिसके लिए उसने अपने लिए एक सुन्दर गाउन बनवा रखा है। जब बातचीत ख़त्म हुई वे सारे जल्दी-जल्दी एक-दूसरे कमरे में गए जहाँ उन्हें कुछ संगीत सुनना था। काफ़्का फ़ेलीस के साथ गया जिसने अब भी चप्पलें पहनी हुई थीं। वे एक अँधेरे में डूबे कमरे से होकर गुज़रे और फ़ेलीस बोली पता नहीं क्यों वह हील वाली चप्पलें पहनती है। जब कोई पियानो बजा रहा था काफ़्का उस के पीछे बैठा; एक तरफ़ को मुँह करके—फ़ेलीस ने अपनी टांगें एक के ऊपर एक रखी हुई थीं और वह बार-बार आदतन अपने कड़े रूखे बालों को छू रही थी। छोटी संगीतसभा के बाद काफ़्का अपनी पाण्डुलिपि के बारे में बताने लगा; किसी ने उसे राय दी कि पाण्डुलिपि को डाक से कैसे भेजा जाय; फ़ेलीस ने कहा कि उसे पाण्डुलिपियाँ टाइप करना अच्छा लगता है और यह कि वह ख़ुशी-ख़ुशी मैक्स ब्राॅड की पाण्डुलिपि को टाइप कर सकती थी। फिर फ़िलिस्तीन यात्रा की चर्चा निकल पड़ी। काफ़्का ने उसे अपने साथ चलने के लिए कहा और फ़ेलीस ने हाथ मिलाकर बाकायदा इस वादे पर मोहर लगाई। बाद में महफिल उखड़ गई—ब्राॅड की माँ सोफ़े पर सो गई; उन्होंने मैक्स की किताबों आर्नोल्ड बीयर और द कासल आफ नार्नेपिगे के बारे में बात करना शुरू किया जिन्हें फ़ेलीस आख़िर तक नहीं पढ़ पाई थी। ब्राॅड के पिता गुइटे का एक सचित्र संस्करण कहीं से निकाल लाए और घोषणा करते हुए बोले कि यह गुइटे को उसके अंतर्वस्त्रों में प्रस्तुत करने जा रहा है। इस बात पर एक विख्यात वाक्य का उद्धरण देते हुए फ़ेलीसे ने कहा—‘‘अंतर्वस्त्रों में भी वह शहंशाह था।’’ फ़ेलीसे का सिर्फ़ यही वाक्य काफ़्का को पसन्द नहीं आया। दुनिया भर में बिताई जाने वाली ऐसी तमाम शामों में से एक इस शान्त बूज़्व्रा शाम के बारे में हमें बस एक ही बात मालूम नहीं है कि काफ़्का ने किस जगह द मैडिटेशन के गद्य के बारे में आख़िरी फ़ैसला लिया। क्या यह लिविंग रूम में हुआ या म्यूज़िक रूम में, शुरू में या बिल्कुल आख़िर में? सब कुछ फ़ेलीसे की चैकस निगाहों के सामने जल्दी-जल्दी हुआ। और आख़िर में ‘मैक्स ब्राॅड के लिए’ के साथ समर्पण जो ‘एम. बी. के लिए’ छप कर आया ताकि कम-से-कम फ़ेलीसे बाउएर के बाउएर का बी. तो उस में आ ही जाए।


किताब : काफ़्का

लेखक : पीएत्रो चिताती 

अनुवादक : अशोक पाण्डे 

पृष्ठ संख्या : 244

मूल्य : 350 रुपये


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गुलफ़तेह सोज़ साहित्य और वैश्विक संबंधों के अध्ययन में गहरी रुचि रखती हैं।


काफ़्का की जीवनी पढ़ने के लिए देखिए : काफ़्का


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