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गायब होती दुनिया

  • 21 hours ago
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गायब होती दुनिया
कहानी : आनंद हर्षुल

उसके पास अब वह दुनिया है जो उसके लिए अब ज्यादा बची नहीं है। जितनी है, उससे भी वह कम होती जाती है : जब-तब कम होती दुनिया। जब वह अपने घर में रहती है, तब उसकी दुनिया का विस्तार उसके घर के कमरों तक रहता है। रहता है खिड़कियों और घर के छज्जों से जा सकती दृष्टि तक। दृष्टि की सीमा है। उसके चलने-फिरने की सीमा है। उसके उठने-बैठने की सीमा है। उसके रहने-खाने-सोने की सीमा है। उसकी साँसों के अंदर-बाहर-ऊपर-नीचे होने की सीमा है।


अब तो वह घर में भी बिना ऑक्सीजन के साँस नहीं ले पाती है। इसे एक सिकुड़ी हुई दुनिया कहा जा सकता है। इस दुनिया की सीमा, ऑक्सीजन सिलेंडर के पाइप की लंबाई जितनी है, जिसे बस ऑक्सीजन-सिलेंडर को अपने साथ घसीटते हुए ही बढ़ाया जा सकता है। यह जो सीमा है, आती-जाती रही है उसके जीवन में। पिछले सात साल से वह इस आती-जाती ऑक्सीजन की सीमा के भीतर रह रही है। अब यह ऑक्सीजन की सीमा उसके साथ चिपक गई है किसी जोंक-सी।


यह दुनिया जो उसके घर में उसके लिए बनती है, तब और सिकुड़ जाती है, जब उसे अस्पताल जाना पड़ता है। तब वह दुनिया यहाँ आकर टिक जाती है, जहाँ अभी वह है। यह बार-बार होता है कि वह घर से नहीं चाहकर भी इस दुनिया में आ जाती है। यह दुनिया कितनी छोटी है! इस दुनिया का आकार कुल आठ बाई बारह का है। यह दुनिया इस अस्पताल की इमारत की तीसरी मंजिल पर है। यह अच्छा है कि उसके बायीं और दायीं ओर की दीवार काँच की है। काँच की इन दीवारों से यह दुनिया आठ बाई बारह से बड़ी हो जाती है। अगर काँच की इन दीवारों की जगह, ईंट की दीवारें होतीं तो यह पूरी कैद होती। अभी यह अधूरी कैद है।


बायीं ओर की काँच की दीवार से उसे आसमान दिखता है। आसमान को पता नहीं है कि वह कहाँ है और क्यों है? पता होता तो वह बार-बार काँच से भीतर, उसके इस आठ बाई बारह के कमरे में आने की कोशिश नहीं करता! काँच की पारदर्शिता से लटके नहीं रहते, आसमान के रंग, बादल, सूरज, चंद्रमा, तारे, जो लगातार बदलते रहते हैं उसके लिए। सुबह का आसमान वैसा कभी नहीं रहता है, जैसा दोपहर का रहता है। दोपहर का आसमान वैसा कभी नहीं रहता है, जैसा शाम का रहता है। शाम का आसमान वैसा कभी नहीं रहता है, जैसा रात का रहता है...! आसमान समुद्र-सा ही होता है, उसमें बादलों की लहर रहती है। चंद्रमा, सूरज, तारे आसमान के जीव-जंतु हैं!


अगर वह काँच की इस बायीं दीवार तक जा सकती तो नीचे देखने पर उसे वे पेड़ दिखते जो इस अस्पताल की बाउंडरी से लगे-खड़े, तीसरी मंजिल के मरीजों के देखे जाने का इंतजार करते रहते हैं। जबकि सारे पेड़ जानते हैं कि तीसरी मंजिल से सिर्फ उनका घना-हरा सिर दिखेगा। उनकी शाखाओं और तनों को देखना तो मुश्किल होगा। गुलमोहर के पेड़ों के लाल-पीले फूल तो दिख ही जाएंगे। दिख ही जाएंगी नीम की पत्तियों के बीच छिपी हरी-पकी निबोलियाँ। नीलगिरी के पेड़ अपनी ऊँचाई के कारण, सबसे पहले दिखेंगे। अशोक के पेड़, नीलगिरी के बच्चों-से दिखेंगे।


वह काँच की बायीं दीवार के पास जाकर नीचे नहीं देख सकती है, जो पास जाने पर काँच की खिड़की में बदल जाती थी। जब तक वह ठीक ना हो जाए और घर जाने की जल्दी के बावजूद उसे यह याद रहे कि काँच की दीवार से नीचे, इस कमरे से निकलने से पहले उसे देखना है। अभी तक हुआ यही है कि अस्पताल के बिस्तर पर लेटे-लेटे ही उसने यह सोचा है कि इस बार वह काँच की उस बायीं दीवार के नीचे घर जाने से पहले झाँकेगी जरूर। वह यह सोचती थी और यहाँ कई बार आने के बावजूद कभी झाँक नहीं पाती थी। अच्छी होते ही उसे हमेशा घर लौटने की जल्दी रहती थी। उसने सोचा कि अगर अस्पताल ने उसकी सामान्य साँसें लौटा दीं तो इस बार वह झाँकना बिल्कुल नहीं भूलेगी। देखेगी कि बायीं खिड़की के नीचे क्या-क्या दिखता है!


देखना हो जितना भी... दिखे जितना भी… कम दिखने की सीमा के भीतर रहने के कारण, हमेशा ज्यादा हो जाता है! यह वही जान सकता है जो कम दिखने की सीमा के भीतर जीता रहता है… जो रहता है पीड़ा की उठती-गिरती लहरों के भीतर… जो अपने पीठ और कमर में उग आए फफोलों पर सोता है… जो जानता है कि सोचूँगा उठाना हाथ या पैर तो उठा नहीं पाऊँगा… सोचूँगा उठ कर बैठना तो उठकर बैठ नहीं पाऊँगा... हाथ या पैर उठाने के लिए या उठकर बैठने के लिए-- इनका स्वप्न देखना पड़ता है… स्वप्न में वह चलती-फिरती है, उठती-बैठती है… स्वप्न में वह दौड़ती है… उड़ती है आसमान में वह बादलों के संग… और पृथ्वी पर सूरज, चंद्रमा, तारों को बटोर कर ले आती है... कर देती है पूरा आसमान खाली यहाँ तक कि बादलों को भी ले आती है पृथ्वी पर।


उसकी दायीं ओर की काँच की दीवार में, एक काँच का ही दरवाजा भी है, जिससे होकर इस अस्पताल के नर्स, डॉक्टर और किसिम-किसिम की दवाइयाँ और उपकरण इस आठ बाई दस के कमरे में आते हैं। इस कमरे को आईसीयू कहते हैं। सच कहें तो उसे इस कमरे की इस दाहिनी ओर की काँच की दीवार को देखना पसंद नहीं है। विशेषकर उसमें बने दरवाजे को। पर उसे देखना पड़ता है उस दरवाजे को बार-बार। बार-बार उस दरवाजे को सुनना पड़ता है। मानना पड़ता है उस दरवाजे को बार-बार। उसी दरवाजे से वह इस कमरे के भीतर अपनी उखड़ती साँसें लेकर आती है और अपनी लयबद्ध साँसें लेकर वापस घर जाती है। वह भी इसलिए कि अपनी उखड़ती साँसों को लेकर इस कमरे में फिर वापस आ सके।


हाँ, उसकी सामने की दीवार पर, एक पेंटिंग लगी है। यह पेंटिंग जिसमें समुद्र की लहरों के बीच एक डोलती नाव है। यह उसके लिए, काँच की बायीं दीवार के अलावा इस आईसीयू में देखने की दूसरी चीज है। वह उसे देखती और अपने को उस समुद्र में उस अकेली डोलती नाव में पाती है। ना नाव को पता रहता कि वह उसे कहाँ ले जा रही है और ना उसे पता रहता कि वह अनंत समुद्र में पता नहीं कहाँ और किस दिशा में जा रही है!


वैसे यह निजी अस्पताल है और इनमें होटलों की तरह सुविधाएँ हैं। सुइट-रूम या डीलक्स-रूम में तो टीवी भी है, जहाँ इस आईसीयू से बाहर आने के बाद, कभी-कभी एक दो दिन के लिए उसे रखा जाता है। उसे यह पता है कि इस आईसीयू का खर्च बहुत अधिक है। आईसीयू में मरीज अगर वेंटीलेटर में हो तो यह खर्च तो जैसे अपना मुँह फाड़ देता है! उसे बस यह पता नहीं है कि उसका पति इस खर्च के कारण अब उसकी मृत्यु की कामना करने लगा है! यह कामना वह इस वाक्य की आड़ में करता है कि हे भगवान, मेरी पत्नी को उसके कष्ट से मुक्ति दिला!


इन सात सालों में, वह बस मुश्किल से दो साल ही थोड़ा ठीक रही है। जिसे लगभग सामान्य जीवन कहा जा सकता हो तो कह सकते हैं! यह सामान्य जीवन, बीमारी के पता लगते ही एक बड़े ऑपरेशन और कई कीमो के बाद उसे हासिल हुआ था और उसे लगा था कि अब वह ठीक हो गई है। पर ठीक होना एक धोखा निकला। मर्ज दो साल बाद, उसके भीतर फिर उभर आया। वह फिर घर और अस्पताल और फिर घर और फिर अस्पताल की होकर रह गई।


आईसीयू के इस कमरे में अनिश्चितता ज्यादा घेरती है। उसे लगता रहता है यह कि उन दो वर्षों को उसे अपने मन से जीना था। बस मन से। दो वर्षों के एक-एक दिन को अंतिम दिन समझ कर जीना था। जैसा मन चाहे बस वैसा करना था। पर वह यह सोच ही नहीं पायी थी कि उसका वह ठीक-ठाक समय, बस दो बरस उसके पास है! यह कौन सोच सकता है? सोचती भी कैसे? यह कैसे मालूम होता कि बीमारी दो बरस बाद फिर पलट कर आ जाएगी?


यह सोचना हमेशा मुश्किल होता है कि तुम्हारे लिए दुनिया अब खत्म होने वाली है। यह सोच पाओ तो बचे दिनों को तुम मन से जी पाओ! पर लगता तो यही रहता है कि इस पृथ्वी पर तुम अनंतकाल तक रहोगे! यह सब सोच पाती तो मन का सुनती। मन का मानती। मन का कहती।


****


आईसीयू में अकेले पड़े-पड़े उसके दिमाग में यह ही ज्यादा घूमता रहता है कि वह उन दो बरसों को उसने व्यर्थ ही खो दिया है । उसने अपना समय उन्हें खुश करने में जाया कर दिया था, जिन्हें उसकी बिल्कुल परवाह नहीं थी। इन बेपरवाह लोगों में उसकी सगी बड़ी बहन, उसके सास-ससुर-देवर, यहाँ तक उसका वह लड़का भी शामिल था, जिसे वह छोटा समझती थी और जो अब ‘ड्रग्स’ ले-लेकर पागल-सा हो चुका था। एक ही लड़का था और वह देख रही थी कि वह उसे खोती जा रही है। दुख अलग-अलग तरीके से उसके पास आ रहे थे। कभी-कभी वे सुख के भ्रम लेकर आ रहे थे। वह उन्हें सुख मानकर छूती और उसके छूते ही वे दुख में बदल जाते।


उन दो वर्षों में भी वह दुखों को सुख में बदलने की कोशिश करती रही। वह इन्हें सुनती और सहेजती रही और अपने जीवन का समय जाया करती रही। करना यह था कि उसे दुखों को उनकी हालत में छोड़, आगे निकल जाना था सुखों की खोज में, उन जगहों की ओर, जहाँ वे उसका इंतजार करते पड़े हुए थे। पर वह अटकी रह गई थी, अपनी बड़ी बहन, सास-ससुर-देवर और अपने पागलों-सी हरकत करते बेटे के पास।


अब वह सोचती है कि वह उनकी तरफ से लापरवाह बनी रही जो उसे चाहते थे। इसमें उसका सबसे बड़ा भाई था जो उसे बेटी-सा चाहता था, जिससे वह इस तरह बिल्कुल नहीं डरती थी, जैसे कभी वह अपने पिता से डरती थी! बड़े भाई से छोटा जो भाई था, उसे वह ज्यादा कुछ नहीं समझती थी कि दरअसल वह जीवन में लगभग असफल आदमी था और असफल आदमी पर भरोसा करना हमेशा कठिन होता है और थी उसकी मँझली बहन जो आमतौर पर अपनी उसी बड़ी बहन के प्रभाव में रहती थी, जिसके प्रभाव में वह खुद भी रही थी, पर इसके बावजूद वह उसकी ओर बार-बार लौटकर आती थी। यह तीनों अपनी छोटी बहन से बहुत प्रेम करते थे। पर उन दो वर्षों में, वह इनके प्रेम को ठीक से अपने भीतर जगह नहीं दे पायी थी। इन्हें छोड़, उन्हें पाने की कोशिश करती रही थी, जिन्हें पा लेना उसके लिए मुश्किल होता गया था।


वह यहाँ पड़े-पड़े, वेंटीलेटर से सहेजी जा रही साँसों के बीच भी, अपने पिता के चेहरे को याद करने की कोशिश करती है और ठीक से याद नहीं कर पाती है। उसके पिता, जब वह छोटी थी, तब ही गुजर गए थे और तब उसके बड़े भाई को महज इक्कीस बरस की उम्र में उन लोगों के लिए पिता की भूमिका में आना पड़ा था। बड़े भाई के बाल जल्दी पक गए थे। पके बालों के कारण अपनी बहनों की शादी की बात करना उसके लिए थोड़ा आसान हो गया था। वे जाति से ब्राह्मण थे। ब्राह्मण दहेज-लोभी थे। फिर भी बड़े भाई ने किसी तरह, ठीक-ठाक घरों में अपनी बहनों को ब्याह दिया था। दोनों भाइयों की शादी, बहनों के ब्याह के बाद ही हो पायी थी, क्योंकि बड़े भाई को भय था कि पत्नी आने के बाद वह यह सब कर पाएगा या नहीं!

माँ का चेहरा उसे याद है। वह आँखें मूँदती है, उन्हें सोचती है और वे दिखने लगती हैं। वह उनके साथ रही लंबे समय तक। लंबे समय तक वह अपनी माँ, बड़े भाई और भाभी के साथ रही। बड़े भाई को अपनी शादी के बाद पता चला कि अपनी पत्नी को लेकर उसके भीतर जो भय था, उसमें कोई दम नहीं था और सब-कुछ ठीक चलता रहा। उसकी भाभी उसकी सबसे अच्छी सहेली है। उसके अपने ब्याह के पहले तक, वह अपने बड़े भाई, भाभी और माँ के साथ रही है। माँ उसकी, उसके ब्याह के ग्यारह बरस बाद नहीं रहीं थीं। माँ के जाने के बाद भी बड़े भाई का घर उसके लिए वैसा ही बचा रहा। बाकी भाई-बहनों के लिए उनके ब्याह के बाद, बड़े भाई का घर, उनके लिए उस तरह नहीं बच पाया था, जिस तरह उसके लिए बचा रह गया था। इस बचे रहने में उसके स्वभाव का वह गुण था कि जब वह बतियाती किसी से तो किसी को भी लगता कि कोई अपना बतिया रहा है। उसके पास अंतहीन सहज-बातें थीं। पर उसकी इन अंतहीन सहज-बातों से कोई थकता नहीं था। कोई ऊबता नहीं था। उसकी बातें रंग-बिरंगी तितलियों-सी थीं जो उड़ती तो उनके पंखों से धूप झरती थी और उसे सुनने वाला उस झरती धूप से नहा जाता था।


वह अपनी सबसे बड़ी बहन का चेहरा भी अब यहाँ आँखें मूँद कर रच नहीं पाती है। वह उससे फिसल जाता है। सोचने से पहले ही वह तनाव में आ जाती है। उसके भीतर लगातार सुगबुगाती पीड़ा तेजी से उभर आती है। अब वह यह मानती है कि उसने अपनी सबसे बड़ी बहन की बात सुन और उसे खुश रखने की कोशिश में, अपने जीवन के बहुमूल्य दो बरस का ज्यादातर हिस्सा बर्बाद कर दिया था। उसने अपने जीवन में, अपनी बड़ी बहन को हस्तक्षेप करने दिया था। यह उसकी बड़ी भूल और नासमझी थी। उसकी बड़ी बहन आर्थिक रूप से बहुत सक्षम थी। यह इसी से समझा जा सकता है कि उसका पति एक विश्वविद्यालय का कुलपति था और वह उसी विद्यालय में वह प्रोफेसर थी। धन और भव्यता खींचती है। बहन की भव्यता उसके बड़े भाई को छोड़, बाकी सभी भाई-बहनों को खींचती थी। वह उस बहन को समझ नहीं पायी थी और वह उसके झूठ और मक्कारी में फँसती चली गई थी। उस बहन का लक्ष्य था—परिवार का केंद्र बनना। बड़े भाई को नीचा दिखाना। यह लक्ष्य क्यों था, यह कोई नहीं जानता था। पर बड़ी बहन ने इस लक्ष्य को पाने के लिए, उसे अपनी मँझली बहन और यहाँ तक अपने मँझले भाई तक को हथियार की तरह इस्तेमाल किया था। उसके इन सब हथियारों का लक्ष्य सबसे बड़ा भाई रहता। परिवार का वर्चस्व बड़े भाई के पास था। अब वह उस वर्चस्व को अपने पास चाहती थी।


अब वह उन दो बरसों को खो चुकी है और उसकी वह बड़ी बहन अब उसके आसपास तक नहीं है। उस बहन को भय है कि एक बीमार बहन के लिए बहुत-कुछ करना पड़ सकता है, वह भी अनंत कठिन बीमारी। उसने उस बीमारी के लिए, कभी अपनी सबसे छोटी बहन को यह भरोसा दिया था कि अर्थ और मन से वह उसके साथ है। जब अर्थ और मन से करने का समय आया तो करने से बेहतर, किसी छोटी-सी बात को बहाना बनाते हुए उसने, उससे संबंध तोड़ लेना ठीक समझा है। उसने यह सब सोचा तो उसकी आँखों के कोरों पर आँसू उभर आए, जिन्हे वह खुद पोंछ भी नहीं सकती थी।


अब उसके पास बिन बुलाए, बिना उम्मीद उसके पास वही हैं—उसके वह दो भाई और मँझली बहन, जिनके लिए उन दो वर्षों में, वह लापरवाह बनी रही थी या कहें कि एक तरह से जिनसे उसने दूरी बना ली थी। वह सबसे छोटी थी। वे उससे प्रेम करते थे। वे उसकी चिंता करते थे। जैसे ही वे सुनते कि वह ज्यादा तकलीफ में है—वे भागे-भागे आते। उनके शहर जो उसके रहने की जगह से, अगर ट्रेन में चलो तो सत्रह घंटे की दूरी पर था और हवाई जहाज से दस घंटे की दूरी पर कि दोनों शहरों के बीच कोई सीधी फ्लाइट नहीं थी। पर वे आते। वह उन्हें देख खुश होती। वे उसे देख दुखी होते, पर उसे तसल्ली देते रहते कि वह बिल्कुल ठीक हो जाएगी। सच यही था कि अपने भाई-बहनों से मिल उसका जीवन थोड़ा बढ़ जाता था। वे तीनों एक साथ उसे खड़े दिखते अपने पास और उसे मिलाकर वे चार हो जाते। चार भाई-बहन एक साथ। वह अपनी तकलीफ में भी उनसे बतियाती रहती कि उसे उनसे बतियाना अच्छा लगता। सच यह है कि वह अब भी अपनी उस बड़ी बहन को याद करती है, जिसने पता नहीं क्यों उसे छोड़ दिया दिया है! वह उससे भी बतियाना चाहती है।


अब उसे लगता है कि जो लोग हमारे नजदीक होते हैं, हम उनके बहुत नजदीक होने के कारण उन्हें ठीक से देख नहीं पाते हैं। यह वैसा ही है कि किसी वस्तु को अपनी आँख के बहुत करीब ले आओ तो वह दिखना बंद हो जाती है। दिखना बंद होती है तो समझ में आना भी बंद हो जाती है! इस नहीं देख पाने के दो छोर होते हैं, एक छोर पर घृणा होती है और दूसरे छोर पर प्रेम होता है। जितना यह उसके लिए सच है, उतना ही उसकी उस बड़ी बहन के लिए सच है कि वह उसके इतने नजदीक चली गई थी कि उसे उसका दिखना बंद हो गया था, पर वह नहीं दिखने के प्रेम के छोर पर खड़ी है और बड़ी बहन नहीं दिखने के घृणा के छोर पर खड़ी है।


वह जीना चाहती है। जीना कौन नहीं चाहेगा और उसे क्यों नहीं चाहना चाहिए जीना? उसका बेटा अभी छोटा है और उसे अपने बेटे को उसकी लत से बाहर करना है। बड़ी बहन को समझा-बुझा कर फिर मनाना है। बड़े भाई के घर जाकर आराम से रहना है। छोटे भाई से अपना व्यवहार बदलना है। बड़ी बहन से चुपचाप हटकर, मँझली बहन से अपनी जोड़ी बनानी है। यानि वह सब करना है जो इस बीमारी से बाहर, दो साल मिले अच्छे दिनों में वह नहीं कर पायी है। वह अभी छोटी है। ऐसी कोई बहुत ज्यादा उम्र नहीं है उसकी! अपने पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटी है वह। पति उसके सीधे-साधे आदमी ही हैं। वे बहुत खराब आदमी होते तो उनसे मुक्ति के लिए वह मरना चाह सकती थी। इस तरह वह अपने मरने का कारण अपने मन में खोजती रहती है और वह उसे कभी अपने मन के भीतर मिलता नहीं है।


वह जीना चाहती है, पर कब तक जिएगी उसे पता नहीं है। वह बार-बार मृत्यु के पास तक जाती है और बार-बार वापस जीवन में लौटती है।


****


चमकीली धूप काँच की बायीं दीवार पर टँगी हुई थी। कोई और होता तो शायद धूप की यह चमक उसे खटकती। पर उसे धूप अच्छी लग रही थी। नहीं अच्छी लगती तो वह अपने पति से कह सकती थी जो उसके पैरों के पास स्टूल पर बैठा, शायद रात भर जागे रहने के कारण ऊँघ रहा था। वह इशारे से कह सकती थी कि परदे खींच दो! वह धूप की चमक भीतर आने से रोक सकती थी। पति नहीं रहता तो वह उस घंटी को बजा सकती थी जो उसकी ड्रिप लगे बाएं हाथ के पास थी। आती कोई नर्स तो वह उसे इशारे से यह बता सकती थी। वह बोल नहीं सकती थी मुँह में उसके वेंटीलेटर की पाइप थी। वह कृत्रिम-साँस पर थी। उसे बिल्कुल पता नहीं था कि आज तीन दिन बाद, उसने अपनी आँखें खोली हैं और बायीं दीवार से भीतर आती धूप को देखा है।


धूप की एक लंबी पट्टी उसके पैरों पर गिर रही थी। उसकी इच्छा हुई कि वह पैरों को ऊपर-नीचे कर देखे उस पट्टी को कि वह टूटती है या नहीं। उसने पैर उठाने की कोशिश की और उठा नहीं पायी। उसे लगा उसके पास उसके पैर नहीं हैं। वह उठ नहीं सकती थी, नहीं तो पैरों को टटोल कर देखती अपने हाथों से कि वे है या नहीं। उसने लेटे-लेटे ही देखा—नीची नजर कर। उसकी ओढ़ी अस्पताल की चादर में उसके पैरों का उभार था। पंजों का उभार सबसे स्पष्ट था। पैर थे। पैरों के नहीं रहने की गुंजाइश बहुत कम थी, फिर भी उसने ऐसा सोचा था। उसके शरीर का मर्ज ‘पेनक्रियास’ में था। उसके निकाल देने के बावजूद वह फैलता गया था। वह ऊपर फैल रहा था। वह उसके फेफड़ों तक पहुँच गया था। पर वह उसके पैरों तक नहीं जा सकता था। वह जानती थी यह बात, फिर भी उसे पैरों के गायब होने का भ्रम हुआ था।


वह जानती थी कि उसके सिर पर अब एक भी बाल नहीं बचा है, पर जब वह आईना नहीं देखती तो अपने घने बालों को महसूस करती थी। वह कभी उन्हें अपनी अंगुलियों से सँवारने की कोशिश नहीं करती थी कि वह देर तक अपने घने बालों को महसूस कर सके!


वह अपना चेहरा अभी आईने में नहीं देख सकती थी। उसे थोड़ी बेचैनी हुई कि वह अपने चेहरे की कल्पना नहीं कर पा रही है। वह आँखें बंद किए, अपने चेहरे को खोजते-खोजते अपने बचपन के चेहरे पर चली गई थी। वहाँ बस समीज़ पहने एक भरे-भरे गालों की, गोल चेहरे वाली सुंदर लड़की थी जो अपने घर के सामने बह रहे बरसाती नाले के उस पार, कूद कर जाना चाह रही थी। नाला बहुत चौड़ा नहीं था, पर सँकरा भी नहीं था इतना कि वह नन्ही बच्ची उसे पार कर कूद जाए। वह कूदने-कूदने को थी कि तभी बड़े भाई के हाथों ने उसे उठा लिया था और अपने भाई के साथ, भाई के हाथों में लटकी-लटकी वह नाले के उस पार थी। अब ठीक है—भाई ने उसकी ओर मुस्कुराते हुए देख कर कहा था--कहाँ चलना है? उस पार—बच्ची ने वापस नाले को कूदने का इशारा करते कहा था। वह नाले को इस पार से उस पार और उस पार से इस पार कूदने का खेल खेलना चाह रही थी। माँ की पीछे चिल्लाती आवाज थी—यह लड़की पागल है… इसे कोई नहीं सम्हाल सकता! उसने अपने बचपन को याद करते हुए, अपनी पीड़ा की उन लहरों को भूलने की कोशिश करने लगी जो थोड़ी-थोड़ी देर में उसके भीतर उठ रही थीं।


वह जब-तब नींद या बेहोशी के भीतर चली जाती है। नींद और बेहोशी में वह पीड़ा से बाहर रहती है। बाकी समय रहती है पीड़ा के भीतर। खाना उसे आहार नली से दिया जाता है। कैथेटर लगा हुआ है तो ना उसे खाने के लिए उठना है और ना पेशाब के लिए। जब वह बाहर आती है नींद या बेहोशी से तो दोपहर के बाद उसे अचानक शाम मिलती है या रात। कभी-कभी तो दोपहर के बाद दोपहर ही मिलती है और उसे लगता है कि वह वही दोपहर है, जिसमें वह नींद में गई थी और बस थोड़ी देर बाद अभी जागी है! बायीं काँच की दीवार से भीतर आती नयी दोपहर की उसके पास कोई पहचान नहीं रहती है। बेहोशी से पहले अगर उसने अपने पति के कपड़े ध्यान से देखे हों तो उसके बदले कपड़ों से वह बदली दोपहर को पहचान सकती है। पर बीच-बीच में उठती पीड़ा की लहरें, उसे चीजों को देखने से रोकती भी जाती हैं।


वेंटीलेटर से दी जा रही साँसों से जुड़ा, यह ऐसा जीवन है जो आता जाता रहता है। अभी है और बस अभी ही नहीं है। चला गया है गहरी नीद में या कहें कि नीम-बेहोशी में। वह इस जाने-आने से बाहर होने का इंतजार कर रही है।


****


उस आठ बाई बारह के आईसीयू-कमरे में, वह जुलाई का कोई दिन था। महीने को वह अपने पति से पूछकर अपने पास बचाए रखती थी। सच तो यह है कि उसके पास से महीना भी कभी-कभी खो जाता था। उसके पास दिन और तारीख नहीं रहती थीं। तारीख और दिन को पूछना उसने अब बंद कर दिया था। वह जुलाई के किसी दिन की कोई तारीख थी। साल को वह सोचती ही नहीं थी। एक साल, सोचने में उसे बहुत लंबा लगता था, इसलिए महीने के भीतर, उसने अपने को सिकोड़ लिया था : महीने के पेट में, जैसे कोई गर्भस्थ शिशु।


जुलाई की इस दोपहर में, जब उसकी आँख खुली तो कमरे की बायीं काँच की दीवार पर बारिश फिसल रही थी। बारिश इतनी तेज थी कि काँच की दीवार झरने-सी दिख रही थी। ओह बारिश, उसे लगा! वह इस बरसात, उसे पहली बार देख रही थी। उसके लिए अपने सिर को बाएँ हल्का घुमाना भी इतना आसान नहीं था। नाक के दोनों छिद्रों में नलियाँ थीं। वेन्टीलेटर की दो मोटी नलियाँ मुँह में थीं। तो सिर को धीरे-धीरे बाएँ ले जाना पड़ा था। पर होता यही था कि होश आते ही वह सबसे पहले बायीं दीवार की ओर देखने की कोशिश करती जो उसके सामने हमेशा किसी नयी किताब-सी खुल जाती थी, जिसके पन्ने दृष्टि से पलटे जा सकते थे।


बारिश, इससे पहले जब हुई थी या तो वह नींद के भीतर थी या बेहोशी के भीतर। उसने बारिश को अब तक नहीं देखा था। वह देर तक उसे देखती रही। बारिश काँच की दीवार पर फिसल रही थी। बारिश के पीछे छुप गए थे सारे दृश्य। आसमान बारिश में डूबा हुआ था। कोई निकालो आसमान को बारिश से, नहीं तो वह बह जाएगा! उसने मन ही मन सोचा और मन ही मन मुस्कुराई। सच तो यह था कि वह इतनी पीड़ा में भी मुस्कुराने की कोशिश करती थी, पर वेन्टीलेटर का पाइप उसकी मुस्कुराहट को खा लेता था। उसने उस बारिश को जो जुलाई की उन्नीस तारीख को, दोपहर को गायब कर और आसमान को डुबाते हुए हो रही थी, मौसम की पहली बारिश माना। उसके लिए यह मौसम की पहली बारिश ही थी!


अभी पति नहीं थे। यहाँ आईसीयू में कोई रुक नहीं सकता था। उसके होश में आने की खबर जाती बाहर तो वे आते थे। कल जब उसने होश में आने पर घंटी बजाई थी तो नर्स ने बाहर खबर कर दी थी। तब उसके पति आए थे। आए थे उसके दोनों भाई, बड़ी भाभी और मंझली बहन। एक के बाद एक। एक साथ वे यहाँ आ नहीं सकते थे।


वे जब सब आ जाते थे तो उसे खुशी होती थी, पर डर भी लगता था कि शायद उसका आखिरी समय आ गया है, इसलिए सब इकट्ठा हैं उसके पास।


उसने सोचा। सोचा अभी-अभी कि आखिरी समय जब आएगा तो क्या उसे पता चल जाएगा? और पता नहीं चला तो? उसे बार-बार लगता था कि उसका आखिरी समय आज ही है और बार-बार वह बढ़ जाता था कभी और आखिरी-समय होने की ओर चला जाता था। उसने अभी भी सोचा कि भाई-बहन सब इकट्ठा हैं तो यही उसका आखिरी समय है। उसने नर्स को बुलाने कि घंटी दबाई। नर्स उसकी दाहिनी ओर थी काँच के उस पार--एक पीले काउन्टर के पीछे बैठी और कुछ लिखती हुई। उसकी घंटी जब उसने सुनी तो सिर उठाकर उसकी ओर देखा। उसका सिर नर्स को काँच पार देखते हुए दाहिनी ओर झुका हुआ था-- उसके भीतर आने का इंतजार करता। उसकी आँखों में आँसू थे और कोई नहीं जानता था कि ये आँसू शरीर से उपजी पीड़ा के हैं या हैं यह सोचने के कारण कि यह उसका अंतिम समय है!


नर्स आयी। उसने इशारे से लिखने के लिए कागज-पेन माँगा। नर्स बाहर गई। जब लौटी तो उसके हाथ में कॉपी-पेन था। नर्स ने कॉपी और पेन पकड़ने में उसकी सहायता की। कॉपी और पेन एक-दो बार उसकी अंगुलियों से फिसले। फिर उसने उन्हें ठीक से थाम लिया।


उसने लिखा : उन्हें बुलाओ। फिर पेन पकड़े हाथ से बुलाने का इशारा भी किया। उसका इशारा लेकर नर्स चली गई बाहर।

थोड़ी देर बाद उसका पति भीतर आया। उसने कातर निगाहों से पति की ओर देखा। उसके पति को पता नहीं था कि वह अपनी मृत्यु सोच रही है। वह उसकी निगाहों से परेशान हुआ। वह उसके सिर पर हाथ फेरने लगा, उसने कहा, “ठीक हो जाओगी तुम जल्दी...चिंता मत करो!”

उसने अपने पति को सुना। उसकी कातर निगाहें कातर ही बनी रहीं। अब उसके आँखों के दोनों कोरों से आँसू ढलक रहे थे। पति उसकी हथेली सहला रहा था। पति ने उसकी दो अंगुलियों के बीच से पेन निकालने कोशिश की कि वह उसे उस भार से मुक्त कर दे। उसने पेन को और जोर से पकड़ लिया और अपनी हथेली पति की हथेली से बाहर खींच ली।


उसने कॉपी पर लिखा : सब ठीक से रहना...


वह लहराते, तिरछे, पीड़ा से भरे चार अक्षर थे—जिन्हें पति ने मुश्किल से पढ़ा था। वह अब घबड़ाया हुआ था। हम इस समय कितने निरीह होते हैं कि हम बहुत कुछ करना चाहते हैं और हमारे हाथ में कुछ नहीं होता है और कुछ नहीं कर पाते हैं।


अब पेन और कॉपी उसकी अंगुलियों ने छोड़ दिया था। पति ने उसे उठाकर उसके पलंग के पैताने पर रखे ऊँचे रैकनुमा टेबल पर रख दिया--दवाइयों और सेनेटाइज़र की बोतल के बीच। पति को समझ नहीं आ रहा था—वह क्या करे...कैसे उसे तसल्ली दे! पति उसकी दाहिनी हथेली को सहलाने लगा। उसकी आँखों के दोनों कोरों से, आँसू अब भी बह रहे थे। क्या अब वह जाने वाली है—पति ने सोचा। ऐसा समय पहले भी आ चुका था, जब उसे लगा था कि वह जाने वाली है। उसने आज भी यही सोचा था। पर वह हर बार लौट आती थी। उसे आज भी उम्मीद थी कि वह जाते-जाते लौट आएगी।


उसने काँच की बायीं दीवार की ओर देखा। वहाँ अब झरना नहीं था। बारिश बंद हो चुकी थी। काँच पर वह बस बूंदों में ठहरी हुई थी। बाहर धूप का आना-जाना था। धूप ठहरी हुई नहीं थी। धूप के आने जाने के बीच ही, अचानक उसे आसमान में तोतों का एक पूरा झुंड दिखाई दिया। तोते इधर ही आ रहे थे—काँच की बायीं दीवार की ओर--उसके पास। थोड़ी ही देर में तोतों से वह पूरी दीवार भर गई। अब वह तोतों की हरी देह और लाल चोंच से बनी, लाल बुँदकियों वाली हरी दीवार थी : फड़फड़ाता हरा और लाल रंग। उसने ध्यान से देखा तो देखा कि सभी तोते एक साथ उसे बुला रहे हैं! उसे लगा तोतों की फड़फड़ाहट उसके लिए ही है! वह उनकी फड़फड़ाहट को देखती रही। महसूस करती रही। तोतों के पंखों की फड़फड़ाहट रुकने का नाम नहीं ले रही थी। उसे लगा सभी तोते काँच की दीवार को पार कर, आ जाएंगे उस तक। तभी उसे अचानक लगा कि वह तोते में बदल गई है। वह उड़ी और पंख फड़फड़ाते तोतों के बीच पहुँच गई। अब वह भी थी तोतों के साथ फड़फड़ाते पंखों पर एक तोता। काँच की दीवार, जैसे पानी की दीवार थी। उसके आते ही तोतों ने काँच की दीवार छोड़ दी। तोते उसे लेकर आसमान की ओर उड़ गए...


तोतों के साथ, उसकी इस उड़ान से, उसकी अपनी दुनिया, दूर और दूर होती जा रही थी। उस गायब होती दुनिया में, उसने अपने को ही अस्पताल के बिस्तर पर देखा। देखा कि अस्पताल के उस बिस्तर पर वह कितनी दयनीय दिख रही है। उसे खुद को देख कर खुद पर दया आयी। उसका पति उसको उसकी हथेली सहलाते बैठा दिखा। उसे अपने पति पर भी दया आयी। उस गायब होती दुनिया में उसे वह काँच की दीवार बाहर से दिखी, जिसे वह हमेशा अस्पताल के कमरे के भीतर से देखती थी और जो थोड़ी देर पहले ही फड़फड़ाते तोतों से भर गयी थी। उस गायब होती दुनिया में, उसे वह पूरा अस्पताल दिखा--पूरा का पूरा दूर होता हुआ। ठीक इसी समय उसे अस्पताल की बाउंड्री से लगे खड़े पेड़ भी दिखे जो उसके देखने का इंतजार करते थे और जिन्हें वह अब तक देख नहीं पायी थी। पता नहीं क्यों, पर अस्पताल उससे जितना दूर हो रहा था, उसे उतनी खुशी हो रही थी। गायब होती इस दुनिया में, उसका फिर वापस आना अब मुमकिन नहीं था। पर यह दुनिया जब उसके पास से गायब हो रही थी, तब उसे यह पता नहीं था कि दुनिया उसके पास से गायब हो रही है।


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आनंद हर्षुल (जन्म: 23 जनवरी’ 1959) की चर्चा अक्सर उनके अनूठे कथा-शिल्प और संवेदनशील कथा-भाषा को लेकर की जाती है। कथा-प्रविधि के प्रति अतिरिक्त सजगता और भाषा के सौष्ठवपूर्ण सौन्दर्य-लोक में कथ्य को ढालने की कलात्मक दक्षता उनके यहाँ अनिवार्य गुणधर्म की तरह मौजूद है। उनके पांच  कहानी संग्रह—‘बैठे हुए हाथी के भीतर लड़का’, पृथ्वी को चंद्रमा’, ‘रेगिस्तान में झील’, ‘अधखाया फल’, ‘चिड़िया और मुस्कराहट  तथा   चार उपन्यास—‘ चिड़िया बहनों का भाई’, देखना,  ‘रेतीला’ ‘एक पुरानी आवाज़’ एवं एक संपादित  पुस्तक, ‘अनगिन से निकलकर एक’ अब तक प्रकाशित हैं ‘। वे ‘सुभद्रा   कुमारी चौहान पुरस्कार’ (1997)  ‘विजय वर्मा अखिल भारतीय कथा सम्मान (2003), वनमाली कथा सम्मान (2014) तथा ‘संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की सीनियर फलोशिप’ (2020-21) से सम्मानित हैं। ईमेल :  anand.harshul@gmail.com




1 Comment


रमेश शर्मा
17 hours ago

आज सुबह सुबह गोल चक्कर वेब पोर्टल पर वरिष्ठ कथाकार आनंद हर्षुल की कहानी 'गायब होती दुनिया'

पढ़ी। कुछ अरसा पहले संगत पर कथाकार प्रियंवद जी का एक इंटरव्यू सुना था। उसमें मृत्यु को लेकर एक प्रसंग था। इस पर प्रियंवद जी कह रहे थे.."मृत्यु जरूर एक सुंदर प्रसंग होगी, मृत्यु के बाद आदमी लौटकर सुना नहीं पाता ये अलग बात है। जन्म और मृत्यु जीवन के दो छोर हैं। अगर जन्म सुंदर है तो मृत्यु भी जरूर सुंदर होगी। मृत्यु डेस्टिनेशन पॉइंट है। जिस डेस्टिनेशन पॉइंट तक एक खूबसूरत जीवन बिताकर हम पहुंचते हैं वह भला कैसे असुंदर हो सकती है। मृत्यु , मुक्ति है, जीवन से भी और जीवन के अच्छे बुरे अनुभवों से भी"


आनन्द जी की…


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