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काफ़्का की कहानी ‘बांबी’ का अंतर्पाठ

  • 3 days ago
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काफ़्का की कहानी ‘बांबी’ का अंतर्पाठ 
संजय व्यास 

       

फ्रैंज काफ़्का के जीवन काल में उनकी केवल कुछ ही कहानियाँ प्रकाशित हुई थीं। और उन्होंने अपने मित्र मैक्स ब्रॉड को यह स्पष्ट कह दिया था कि उनकी मौत के बाद उनका सारा अप्रकाशित काम नष्ट कर दिया जाए। मैक्स ने अपने दोस्त के आदेश की साफ़ अवहेलना की और उनके बहुत सारे अप्रकाशित काम को दुनिया के सामने ले आए।       


क्या तासीर थी उनके काम में कि कहानियों, उपन्यासों और डायरियों की शक़्ल में उनका रचनाकर्म आज तक पढ़ा जा रहा है। पढ़ा जाना तो एक छोटा स्टेटमेंट होगा, काफ़्का ने अपने बाद के लेखकों और पाठकों को जिस तरह प्रभावित किया, वैसा उदाहरण शायद कोई और नहीं। मार्केज़, काल्विनो, मुराकामी समेत हाल में नोबेल विजेता हंगरी के लास्लो क्रास्नाहोरकाई गर्व के साथ स्वीकार करते हैं कि काफ़्का उनके प्रिय लेखक हैं। 


एक साक्षात्कार में मुराकामी से जब उनके लेखन पर काफ़्का के प्रभाव के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि बेशक काफ़्का उनकी पसंद के लेखक हैं पर उनका गल्प लेखन अपने आप में एक पूरी दुनिया है, कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ता। इसलिए उनका अनुसरण, उनके जैसा लिखना अनावश्यक ही होगा। 


यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि काफ़्का की अधिकांश कहानियाँ और उपन्यास प्रचलित परिभाषा के अनुसार अधूरे हैं, जिनमें अलगाव, बेचैनी, छटपटाहट, अस्तित्व और उसके संकट, घेर लिए जाने और आसन्न घात से भयग्रस्तता जैसे तत्व नुमाया हैं। इन सबमें मुख्य पात्र या नायक ही सबसे अनायक है—वह कोई हीरो नहीं बल्कि किसी ख़तरे के सामने सदा अनावृत्त, सतत बेचैनी से भरा, निरीह, असम्पृक्त और भयार्त्त पात्र है। 


अधूरी कहानियों का उनका कथा संसार अपने आप में पूरी दुनिया है—काफ़्का की अपनी विशिष्ट सृष्टि।  


काफ़्का की कहानियों में से मेटामॉर्फोसिस का ज़िक्र अक्सर आता है, हंगर आर्टिस्ट, द जजमेंट और कुछ दीगर कहानियों का भी,  पर उनकी ‘बरो’ कहानी हिंदी पाठकों के बीच शायद उतनी चर्चा में नहीं आयी। 


‘कम्पलीट स्टोरीज़’ में अरसा पहले इस कहानी को भी पढ़ा था और यह कहानी मस्तिष्क में अलग तरह से दर्ज रही। 


यह काफ़्का की बाद के दिनों की कहानी है—उनकी मृत्यु से कुछ समय पहले लिखी गयी कहानी। 


एक छछूंदर जैसा जानवर ज़मीन में बांबी बना कर रहता है और अपनी सुरक्षा के लिए सारे इंतज़ाम कर लेने के बाद भी उसे लगता रहता है कि कहीं से भी कुछ भी हो सकता है। वह फिर से कुछ कोशिशें करता है और तसल्ली करने के बाद अचानक फिर से बेचैन हो उठता है। उसकी कल्पना में दुश्मन का थूथन हमेशा शिकार की टोह में सूंघता रहता है।  


जब वह जानवर अपनी बांबी बना लेता है तो तनिक संतोष का भाव उसके चेहरे पर आता है। यहाँ कहानी का मुख्य पात्र—यही जंतु, पाठकों से मुख़ातिब है। 


“मैंने अपनी बांबी बनाने का काम कर लिया है और लगता है यह कामयाब रहा।”


कहानी की शुरुआत ज़मीन में रहने वाले एक जानवर के ख़ुद को इस तरह तसल्ली के अंदाज़ में होती है। इस कहानी में हम आगे देखते हैं कि यह बांबी ज़मीन में केवल हाथ, दो हाथ गहरे खड्डे जितनी नहीं है बल्कि यह सुरंगों की पूरी जटिल प्रणाली है। ज़ाहिर है इसकी ऐसी संरचना उसे किसी भी हालत में एक सुरक्षित आवास देने के लिए की गयी है। 


कहानी में वह अपने परिश्रम और कौशल से निर्मित इस बांबी के बारे में विस्तार से बताता है। किसी पैकेज टूर की तरह वह बिलकुल बाहर से, जहाँ से बांबी शुरू होती है, वहाँ से आरम्भ करता है। 


“बाहर से सिर्फ़ एक मुँह या खड्डा दिखेगा जो नक़ली है, यह भीतर कहीं नहीं ले जाता। मेरा कोई दावा नहीं कि यह युक्ति मैंने शिकारी को छलने के लिए बनाई है, असल में यह मेरे ही शुरुआती विफल प्रयासों में से है जिसे मैंने बाद में ऐसे ही खुला छोड़ दिया था। इस खुले गड्डे से कुछ हज़ार क़दम आगे बांबी में घुसने का असली रास्ता है जो घासफूस से ढंका है।”


बांबी का असली रास्ता बाहर से दिखता नहीं पर थोड़ी घास हटाकर इसमें से भीतर एक अलग ही दुनिया में, जो इस प्राणी का घर है, जाया जा सकता है। घास के छलावरण के बारे में केवल यह प्राणी, जो अपनी बांबी का शिल्पकार है, जानता है। 


जब यह बात आती है कि क्यों उसने घुसने के रास्ते को पक्का बंद नहीं किया तो वह कहता है- “ज़रूरत यह मांग करती है कि वह शीघ्रता से उस जगह को छोड़कर बाहर आ सके। ज़रूरत की मांग अक्सर अपनी ज़िन्दगी को ख़तरे में डालना भी होती है।”


इस प्राणी ने जो भूमिगत सुरंगों की जटिल संरचना बनाई है, उससे उसे अपने जीवन और आहार को लेकर निश्चिंत हो जाना चाहिए था लेकिन हर पल उसके मन में किसी संभावित घात की आशंका बनी रहती है। वह सपनों में भी किसी ‘लालची थूथन को निरंतर सूंघता’ हुआ देखता है। 


सब कुछ और उससे भी ज़्यादा कर देने के बाद भी चैन उसे नसीब नहीं। ख़तरा कही से भी प्रकट हो सकता है। भीतर, उसकी लगभग अभेद्य क़िलेबंदी के बावजूद वह कहता है- “दुश्मन धरती की आँतों में हो सकते हैं। भीतर ऐसे ऐसे प्राणी संभव हो सकते हैं जिनके बारे में कहानियाँ भी नहीं जानतीं। इसलिए इस बात पर क्या दिलासा देना कि आप अपने ही घर में हैं।”


उसका निरंतर भय उसे किसी क्षण आराम से रहने नहीं देता। हालांकि वह मानता है कि उसके घर का सबसे सुन्दर पहलू वहाँ पसरी शांति है। लेकिन वह साथ में यह भी जोड़ता है कि—यह शांति भी एक धोखा ही है। 


उसकी शरणगाह घेरेबंदी की स्थिति में है—बांबी संकुल में स्थित मुख्य कक्ष—‘कासल कीप’—एक तरह का दुर्ग गोदाम। छह महीनो से ज़्यादा का राशन वहाँ स्टोर किया जा सकता था। 


जहाँ पूरा संकुल मुख्यतः उसके बौद्धिक चातुर्य से बनाया गया है वहीं दुर्ग गोदाम उसकी भीषण मेहनत का परिणाम है। उसकी दीवारों को सख़्त बनाने के लिए उसने  पहले की ढीली मिट्टी को भागते हुए आकर अपने माथे से ठोक-ठोक कर मज़बूत किया। उसके अनुसार, इस प्रक्रिया में उसके माथे से जब ख़ून बहने लगा तब उसे ख़ुशी हुई कि अब जाकर चीज़ इतनी कठोर हुई है।   


सुरक्षा के इतने चाक चौबंद बंदोबस्त के बावजूद यह प्राणी अपने रक्षात्मक उपायों को लेकर निरंतर आग्रह की स्थिति में रहता है जिसके कारण वह अपनी क़िलेबंदी में निरंतर परिवर्तन करता रहता है। कभी कुछ मज़बूत करना, कभी राशन को एक जगह संग्रहीत करने को लेकर संशय या ख़तरे को पहले से भांपने में आगे रहने की आवश्यकता महसूस करते रहना। हर समय आसन्न संकट की गणनाएं, अपनी स्थिति सुरक्षित रखने की चिंता, अभेद्यतर बना देने की कल्पनाएं।  वह कितना ही अपने को अभेद्य स्थिति में मान ले, अगले ही पल कहीं न कहीं अपने बख़्तर में दरार उसको नज़र आने लग जाती। 


दुर्ग गोदाम में राशन संग्रहण से वह किसी भी संभावित घेराबंदी से महीनों निश्चिन्त रह सकता है पर अपनी सुरक्षा को लेकर उसकी हालत ‘ईमां मुझे रोके है तो खेंचे है मुझे कुफ़्र’ वाली ही बनी रहती है। उसे लगता है इतना दाना-पानी एक जगह ठीक नहीं। अपने खाद्य संग्रह को उसे अलग-अलग जगहों पर रखना चाहिए। उसकी भागदौड़ फिर शुरू हो जाती है। मिनट भर का उसे चैन नहीं। थक कर पस्त हो जाने पर वह थोड़ा शांत होता है और उसे लगने लगता है इतनी जल्दबाज़ी की कहाँ आवश्यकता है। 


और तो और, कुछ समय बाद उसे लगता है कि यह पूरी कसरत ठीक नहीं थी। राशन को इस तरह बिखेर कर जमा करना घातक हो सकता है! बांबी की सुरंगों में आपातकालीन निकास इससे अवरुद्ध हो सकते हैं। आखिर उसका पूरा घर भूमिगत नलियों से ही तो बना है—वही नलियां कहीं-कहीं छोटे अवकाशों में खुलती हैं और वहीं से दूसरी ओर जाती हैं। अलग-अलग जगह पड़ा राशन ख़तरे की स्थिति में उसके भागने के रास्ते में आ सकता है। वह अलग-अलग जगहों पर पड़े भोजन को फिर से मुख्य गोदाम में लाने के काम में जुट जाता है। 


पूरी कहानी उसके भय और उससे उत्पन्न बेचैनी को अलग-अलग आयामों में दिखाती है। कहानी में इतने कोण, शेड्स, तर्क और प्रतितर्क हैं कि यह डर और बेचैनी का एक त्रि-आयामी चलचित्र ही लगता है। सच कहा जाए तो इसे त्रि-आयामी कहना भी इसके प्रति अधूरा न्याय होगा। बांबी के भीतर का सघन और सीला अँधेरा, कासल कीप में भोजन का किण्वन और मिट्टी की गंध, इन सबके समवेत से जो अब तक अपरिभाषित गंध पूरी कहानी में आपको महसूस होती रहती है, उससे लगता है कहानी आपके सामने ही घटित हो रही है। आप किसी बांबी के मुँह पर ही बैठे हैं। 


यह प्राणी एक अरसे बाद अपनी बांबी से बाहर आता है। उसे लगा उसे बाहर आकर देखना चाहिए। वह किंचित दूरी से अपने प्रवेश द्वार की ओर बड़ी हसरत भरी नज़रों से देख रहा है। 


बांबी की भूल-भुलैया वक़्त-बेवक़्त जो बेचैनी उसमें पैदा करती है और उसके समूचे अभियांत्रिकीय कौशल को संदेह के घेरे में ले आती है, उससे बाहर खुली दुनिया में आने पर एक प्रेक्षक के तौर पर उसे गहरे संतोष और गर्व से भर देती है। दूर से बांबी के मुंह को देखकर वह कल्पना करता है कि अगर इस समय वह अंदर होता तो असीम शांति से सो रहा होता। इस विचार से वह इतना आनंदित हो उठता है कि वह अचानक एक बाल अभिलाषा कर बैठता है कि वह कभी वापस अपनी बांबी में जाए ही न और इसी तरह उसके प्रवेश द्वार को दूर से देखता रहे और सोचे कि अगर इस वक़्त वह भीतर होता तो ये बांबी उसे कितनी सुरक्षित लगती। 


पर वह तुरंत इस बाल स्वप्न से जाग उठता है और उसके मन में फिर से सवाल उठते हैं। वही कि बांबी के भीतर कितने ख़तरे हो सकते हैं। दुश्मन बांबी के आसपास ही हो सकते हैं और अभी दरवाज़ा इसलिए छू नहीं पाए हैं क्योंकि वे जानते है कि बांबी का मालिक बाहर है, समीप ही कहीं छिपा देख रहा है।   


उसके सोचे हुए हर तर्क का एक प्रतितर्क था बल्कि एक से अधिक प्रतितर्क थे जो उसकी स्थिति को बहुत दयनीय बना रहे थे। 


अब उसके सामने सवाल उठा कि वह पुनः अपनी बांबी में कैसे जाए? कोई भी उसे ऐसा करते हुए देख सकता था और ऐसा होता तो उसकी सलामती को गंभीर ख़तरा था। उसने सोचा, पहले वह किसी को पहरेदार नियुक्त करे और फिर अंदर जाए। पर इस बात के विरुद्ध उसके सामने फिर नया ख़तरा था—वह नवनियुक्त दरबान स्वयं एक दुश्मन में बदल सकता था। उसकी ऐसी कोई सेवा बिना शुल्क के हो नहीं सकती थी और शुल्क के रूप में वह उसकी सलामती का सौदा कर सकता था। 


कहानी के अंतिम भाग में वह प्राणी अपनी बांबी में एक ऐसा शोर सुनता है जो किसी नामालूम स्रोत से आया हो सकता था। इसका पता लगाने और अपने आवास को और दृढ करने की कोशिशें उसकी बेचैनी को और बढ़ाती रहती हैं। 


काफ़्का की दूसरी कहानियों की तरह यह कहानी भी चरम पार्थक्य, बेचारगी, ओटविहीनता और सतत भय को उनकी समस्त सीमाओं से इतना आगे ले जाती है कि आपसे वह अपने प्रति किसी सहानुभूति या करुणा की मांग ही नहीं करती बल्कि आपके भीतर विडम्बनात्मक रूप से एक कॉमिक भाव पैदा करती है। 


कुल मिलाकर हत्यारे समय में उपायों के ठीक बीच कैसे मारे जा सकते हैं, इसकी बेचैन कथा है ‘बांबी’।


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फ्रैंज काफ़्का का जन्म 03 जुलाई 1883 को प्राग के जर्मन भाषी यहूदी परिवार में हुआ। उन्हें बीसवीं सदी के महानतम लेखकों में से एक माना जाता है। अपनी तरह के अकेले लेखक जिनके लेखन ने बाद की पीढ़ी के अनेक महान लेखकों को प्रभावित किया और बहुत हद तक आधुनिक साहित्य की दिशा और अंतर्वस्तु को तय किया। मेटामॉर्फोसिस सहित कई कहानियों और ट्रायल, कैसल और अमेरिका जैसे असमाप्त किंतु अप्रतिम उपन्यासों के रचनाकार काफ़्का की 1924 में अल्पायु में ही मृत्य हो गयी। 


संजय व्यास के दो गद्य संग्रह ‘टिम टिम रास्तों के अक्स (2014)’ और ‘मिट्टी की परात (2021)’ प्रकाशित हैं। गोल चक्कर पर इनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : संजय व्यास





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