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कल्पना मनोरमा की डायरी

  • 3 days ago
  • 17 min read


कल्पना मनोरमा की डायरी 

समय के एकांत में 

22 सितंबर 2020


अभी भोर होने में कुछ समय बाकी है। 


तीसरी मंजिल के सरकारी आवास की बालकनी में बैठी हूँ। चारों ओर अँधेरा है। सड़क के किनारे लगी स्ट्रीट लाइटें अब भी जल रही हैं। उनके पीले प्रकाश में सड़क कुछ और अधिक सूनी दिखाई देती है। ऐसा लगा कि पूरा महानगर अपनी साँसें रोककर बीमार समय के बीतने की प्रतीक्षा कर रहा हो।


उजाला होने में वक्त है। हवा भी ठिठकी हुई है। पेड़ों की डालियाँ स्थिर हैं। घोंसलों में दुबके पक्षियों की चहचहाहट आना बाकी है। इस गहरे सन्नाटे में मन बार-बार महामारी की ओर लौट जाता है। डर की ओर देखता है। क्योंकि हर सुबह समाचारों में संक्रमित लोगों की बढ़ती संख्या, अस्पतालों के बाहर लगी कतारें और अपनों को खोने वालों का विलाप एकांत में भी सुनाई देने लगा है। लगता है जैसे मृत्यु ने हमारे समय के दरवाज़े पर स्थाई डेरा डाल दिया है। पहले जीवन की योजनाएँ बनती थीं, अब दिन, केवल सुरक्षित बने रहने की प्रार्थना के साथ उगता-ढलता है।


अभी मन सन्नाटों से थरथरा ही रहा है कि इतने में पास खड़े नीम के ऊपर से एक हल्की-सी चिहुँक उठी। फिर दूसरी। देखते-देखते पक्षियों की आवाज़ें वातावरण में फैलने लगीं। पूर्व दिशा में उजास उतर आया। प्रकृति अलसाई पसरी थी। उसे न महामारी का भय है, न मनुष्य की घबराहट का…। सूरज उगने की तैयारी में है। धीरे-धीरे घरों की खिड़कियाँ खुलने लगीं। मास्क, सैनिटाइज़र और शारीरिक दूरी जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। किसी का चेहरा लंबे समय से पूरा दिखाई नहीं देता। मुस्कानें आँखों में सिमट आई हैं। लोग एक-दूसरे से मिलते नहीं, बचते हुए निकल जाते हैं। मनुष्य के बीच जो सहज निकटता थी, उस पर अदृश्य भय का कब्जा है।


कोरोना काल ने मेरी सारी यात्राएँ रोक दी हैं। विपश्यना के लिए भी घर से निकलना संभव नहीं हुआ। पहले लगा था कि यह ठहराव असह्य होगा, लेकिन धीरे-धीरे समझ में आया कि बाहर के बंद रास्तों के साथ भीतर के कई रास्ते खुल रहे हैं। एकांत, जिससे कभी-कभी बचना चाहती हूँ, वही अब मेरा सबसे विश्वसनीय साथी बन गया है। मन अपने भीतर उतरना सीख रहा है। इसी बीच मेरी दृष्टि सामने खड़े शहतूत के वृक्ष पर टिक जाती है। महीनों से अपनी जगह खड़ा है। न कहीं जाता है, न कोई शिकायत करता है। स्थिर रहना, पक्षियों को आश्रय देना। यही संतुलन मुझे भी सीखना है।


‘नदी के द्वीप’ मेरी पसंदीदा किताबों में से एक है। इन दिनों उसी को फिर पढ़ रही हूँ। पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि अज्ञेय केवल कथा नहीं लिखते, वे संवेदना का एक सूक्ष्म भूगोल रचते हैं। उनकी भाषा में संयम है, पर उसी संयम के भीतर गहरी भावुकता भी बहती रहती है। वातावरण निर्माण की उनकी क्षमता इतनी सशक्त है कि दृश्य, मनःस्थिति और विचार एक-दूसरे में इस तरह घुल जाते हैं कि पाठक स्वयं उस दुनिया का हिस्सा बनने लगता है। उनके यहाँ प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि पात्रों के अंतर्मन का विस्तार बन जाती है।


अज्ञेय का व्यक्तित्व भी उनके लेखन की तरह एक विशिष्ट अभिजात्य लिए हुए प्रतीत होता है। यह अभिजात्य बाहरी वैभव का नहीं, बल्कि बौद्धिक अनुशासन, सौंदर्यबोध और आत्मसंयम का है। वे पाठक से सहज भावुकता नहीं, बल्कि सजग सहभागिता की अपेक्षा करते हैं। शायद इसी कारण उनका साहित्य तुरंत आत्मसात नहीं होता, वह धीरे-धीरे खुलता है। मेरे जैसे स्लो रीडर के लिए और भी धीमा… और ये भी उनका लेखन हर पुनर्पाठ में मुझे कोई नया अर्थ दे जाता है। उनकी रचनाओं के साथ समय बिताना किसी शांत, गहरे जल में उतरने जैसा है—जहाँ सतह पर कम हलचल दिखती है, पर भीतर निरंतर जीवन और विचार की तरंगें चलती रहती हैं।


मेरा मन व्यष्टि से समष्टि की ओर जाने लगता है। मैंने गमले में लगे छोटे-से बरगद को देर तक देखती रही। सीमित मिट्टी में भी वह अपनी जड़ों को फैलाने का प्रयत्न कर रहा है। उसे देखकर लगा कि जीवन का विस्तार हमेशा बाहर नहीं होता,  कई बार सबसे बड़ा विस्तार भीतर होता है। कठिन समय मनुष्य से बहुत कुछ छीन लेता है, लेकिन यदि धैर्य, करुणा और आशा बची रहे तो जीवन फिर से अंकुरित होने लगता है।


महामारी एक दिन समाप्त हो जाएगी। सड़कें फिर भर जाएँगी। बच्चे फिर खेलेंगे। यात्राएँ फिर शुरू होंगी। लेकिन शायद हम पहले जैसे नहीं रहेंगे। यह समय हमें हमेशा याद दिलाता रहेगा कि मनुष्य शक्तिशाली होने का भ्रम पाल भले ले, अंततः उसे बचाए रखती है उसकी संवेदना, उसका धैर्य और एक-दूसरे के प्रति उसका विश्वास।



बुरे दिनों के बाद

18 अक्टूबर 2020


भय में हर दृश्य भय देता है। कई दिनों के बाद आज फिर लिखने का मन हुआ। लिखते हुए किसी घटना को दर्ज नहीं कर रही हूँ। बस एक प्रतीक्षा को शब्द दे रही हूँ। इन दिनों लगता है कि जीवन किसी लंबे विराम में अटका है। हर सुबह अख़बार एक नई चिंता लेकर आता है। संक्रमण बढ़ रहा है। अस्पताल भर रहे हैं। किसी परिचित के बीमार होने या किसी के चले जाने की खबर मन को देर तक उदास रखती है। फिर भी भीतर कहीं एक छोटा-सा विश्वास बचा हुआ है कि यह समय एक दिन बीत जाएगा।


इन दिनों एंबुलेंस की आवाज सुनते ही मन ठिठक जाता है। पहले यह केवल एक मरीज को त्वरित अस्पताल पहुँचाने वाला वाहन था। अब लगता है जैसे किसी घर का दुःख सड़क पर दौड़ रहा है। सायरन की आवाज़ दूर तक जाती है और उसके थम जाने के बाद भी मन देर तक शांत नहीं होता। लगता है, किस परिवार की साँसें अटकी होंगी। कौन अस्पताल के बाहर खड़ा प्रार्थना कर रहा होगा। अस्पतालों के बाहर लंबी कतारें हैं। पीपीई किट पहने डॉक्टरों और नर्सों के चेहरों पर थकान साफ दिखाई देती है। कई दिनों तक वे अपने घर नहीं जा पाए। अपने बच्चों को दूर से देखकर लौट आते हैं ताकि संक्रमण उनके घर तक न पहुँचे। कुछ डॉक्टर मरीजों को बचाते-बचाते स्वयं इस महामारी के शिकार हो गए। उनके बारे में पढ़ते हुए लगता है कि इस समय सबसे कठिन लड़ाई अस्पतालों के भीतर लड़ी जा रही है। सफेद एप्रन इन दिनों सेवा, साहस और त्याग का दूसरा नाम बन गया है। यह महामारी केवल शरीरों और साहस की नहीं, मनुष्यता की भी परीक्षा ले रही है।


मैं अक्सर सोचती हूँ कि जब ये बुरे दिन पीछे छूट जाएँगे तब क्या हम पहले जैसे हो पाएँगे। शायद नहीं। इतने दिनों का भय, इतनी दूरियाँ और इतने बिछोह मनुष्य को बदल देते हैं। लेकिन शायद हम थोड़ा अधिक धैर्यवान हो जाएँगे। थोड़ा अधिक विनम्र। और एक दूसरे के दुख को पहले से अधिक समझने वाले। लगता है हमारी वापसी किसी उत्सव की तरह नहीं होगी। हम चुपचाप अपने जीवन में लौटेंगे। जैसे कोई बहुत दूर की यात्रा से लौटकर पहले अपने ही कमरे में देर तक बैठा रहता है। हम भी अपने दिनों को फिर से पहचानेंगे। बिना किसी जल्दी के। बिना किसी प्रदर्शन के।


जब मन शांत होता है तो पानी की झिलमिल-झिलमिल सी होती है। याद आई नदी किनारे पड़ी नाव। महीनों पानी से दूर रहने पर उसकी देह सूख जाती होगी। फिर जब उसे दोबारा नदी में उतारा जाएगा तो वह भी एक पल के लिए ठिठकेगी। पानी धीरे-धीरे उसकी लकड़ी में उतरेगा और वह फिर से जी उठेगी। मनुष्य भी शायद ऐसा ही है। लंबे भय और अकेलेपन के बाद उसे भी जीवन में लौटने के लिए थोड़ा समय लगेगा। महामारी ने हमसे बहुत कुछ छीन लिया है। यात्राएँ। मेल-मिलाप। सहज स्पर्श। बेफ़िक्र हँसी। अब किसी से मिलते हैं तो सबसे पहले उसकी आँखें दिखाई देती हैं। चेहरा नहीं। मास्क के पीछे छिपी मुस्कान का केवल अनुमान लगाया जा सकता है। शायद यही समय हमें सिखा रहा है कि मनुष्य केवल चेहरे से नहीं, अपने व्यवहार और संवेदना से पहचाना जाता है।


मैं सोचती हूँ कि जब फिर कभी बिना डर के नदी किनारे बैठना होगा तब सबसे पहले पानी में किसी मछली को उछलते हुए देखूँगी और अपनी धड़कन सुनूँगी। जीवन की सबसे साधारण चीज़ें भी तब कितनी असाधारण लगेंगी।


शायद हम पहली बार सचमुच उन्हें देख पाएँगे।


अच्छे दिनों की मैं कोई बड़ी कल्पना नहीं करती। वे आम की नई पत्तियों की तरह भी आ सकते हैं। बरसात के बाद धुले हुए पेड़ की तरह भी। या माँ के माथे की लाल बिंदी की तरह। छोटी सी, लेकिन पूरे चेहरे को उजाला देने वाली। बुरे दिन जब चले जाएँगे तो कटहरी वन घूमने जाएँगे। पके हुए कटहल अपनी मिठास के भार से झुके होंगे। उनकी गंध हवा में घुली होगी। कौए फलों को चोंच से ठोंक रहे होंगे। हम बिना किसी संकोच के एक कोया माँग लेंगे। महामारी ने सिखाया है कि भूख केवल पेट की नहीं होती। जीवन भी अपने हिस्से की मिठास माँगता है।


आज बालकनी में रखे पत्थर के गमले में न जाने कैसे पथरचटा जम आया है। कितनी कम देखभाल में भी वह हरा है। प्रतिकूल समय में भी भीतर की हरियाली बचाए रखना ही सबसे बड़ा साहस है। शाम को जब अँधेरा उतरता है तो अब भी मन अनायास सतर्क हो जाता है। इन महीनों में रातों ने बहुत कुछ देखा है। चिंताएँ। बेचैनियाँ। अनगिनत प्रार्थनाएँ। कितनी ही रातें अस्पतालों की प्रतीक्षाओं में बीती होंगी। कितनी ही रातें ऑक्सीजन और दवाइयों की तलाश में भटकी होंगी। सोचती हूँ, जिस दिन मन से मृत्यु का भय उतर जाएगा, उस दिन किसी उत्सव से पहले अपनी रातों को सुलाऊँगी। बुरे दिनों ने सबसे अधिक यदि किसी को थकाया है तो वे हमारी रातें हैं।


और अच्छे दिन जब भी आएँगे, सबसे पहले मैं अपनी रातों को सुलाऊँगी।



यात्राएँ फिर होंगी

2 नवंबर 2020


आज यह लिखते हुए लगता है कि यह समय केवल एक बीमारी का समय नहीं है, यह मनुष्य के ठहर जाने का समय है। ऐसा ठहराव जिसमें बहुत कुछ चुपचाप बदल गया। जिन घरों में पुरुषों का मन बाहर की दुनिया में रमकर लौटता था, वही मन अब घर में रुकने लगा है। रसोई, बैठक और बालकनी भी उनके हिस्से का संसार बन गईं। यह कोई बड़ी क्रांति नहीं थी। बस जीवन ने अपनी चाल बदल ली और मनुष्य को उसके साथ चलना पड़ गया।


कोरोना ने घर का अर्थ भी बदल दिया। घर अब केवल रहने की जगह नहीं रहा। वह दफ्तर भी था। वह विद्यालय भी था। वह खेल का मैदान भी था। वह अस्पताल की चिंता का कमरा था। एक ही छत के नीचे काम, पढ़ाई, रसोई, थकान और प्रतीक्षा साथ-साथ रहने लगे हैं। घर की दीवारों ने इस समय जितनी बातचीत सुनी, शायद पहले कभी नहीं सुनी थी।


मुझे यह भी साफ दिखाई देने लगा कि यह केवल महामारी का संकट नहीं है। यह उस समय की शुरुआत है जिसमें मनुष्य मशीनों के और अधिक निकट जाएगा। लोग तेजी से कंप्यूटर की भाषा सीख रहे हैं। जिन हाथों ने बरसों झाड़ू और पोंछा संभाला था, वे अब माउस और कीबोर्ड चलाना सीख रहे हैं। दूसरी ओर खरीदी हुई डिग्रियों का अहंकार रखने वाले लोग अपने उच्चारण सुधारने में लगे हैं। सीखने की यह बेचैनी अच्छी थी, लेकिन कहीं न कहीं मन की कोमलता पर भी एक कठोर परत चढ़ती जा रही है। दुख इसका है।


छोटे परचूनी वाले बदल रहे हैं। वे अपनी दुकानों की तस्वीरें खींचकर इंटरनेट पर डालने लगे हैं। ग्राहक अब गली से कम, मोबाइल से अधिक आने लगे हैं। रोज़गार के नए रास्ते खुल रहे हैं, लेकिन पुराने उधारी वाले रास्ते चुपचाप बंद भी हो रहे हैं। जिन लोगों की पूरी दुनिया लोगों से मिलकर चलती थी, वे अब स्क्रीन पर सिमट गए दिखते हैं।


रिश्तेदारों को कभी यह डर रहता था कि ज्यादा बात करने से लोग सिर चढ़ जाते हैं, वही अब घंटों फोन पर हालचाल पूछ रहे हैं। दूरी ने बातचीत का महत्व बढ़ा दिया। विदेशों में बैठे बच्चे अपने बूढ़े माता-पिता को बार-बार समझाते कि अपना ध्यान रखिए और मोबाइल हमेशा चार्ज रखिए। एक छोटा-सा मोबाइल घर, दफ्तर, बैंक, विद्यालय और रिश्तों का पुल बन गया है। लेकिन इन सबके बीच एक भय हर समय मन के भीतर बैठा रहता है। दुनिया के अलग-अलग देशों से आती खबरें विचलित कर देती हैं। कहीं सामूहिक कब्रें खोदी जा रही हैं। कहीं श्मशानों में चिताओं की कतारें लगती जा रही हैं। कहीं अस्पतालों के बाहर एंबुलेंस में पड़े मरीज घंटों अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।


मनुष्य पहली बार अपनी असहायता को इतने बड़े पैमाने पर देख रहा है। विज्ञान, संपन्नता और विकास सब एक अदृश्य वायरस के सामने ठहरे खड़े हैं, इन्हीं खबरों के बीच कुछ दृश्य ऐसे भी हैं जो किसी सरकारी घोषणा में शामिल नहीं हो सकते। किसी सड़क के किनारे एकांत में जामुन टपक रहे हैं। भूखे मजदूर उन्हें उठाने के लिए ललचाते हैं, लेकिन झपटते नहीं। उन्हें लगता है कि कहीं उनमें भी बुरा वक्त चिपका न बैठा हो। यह भूख, संकोच और डर किसी आँकड़े में दर्ज नहीं होगा लेकिन पीढ़ियाँ याद करती रहेंगी।


इसी के साथ एक और बदलाव दिखाई दे रहा है। लोग एक दूसरे से बचकर चलने लगे हैं। ‘दूर रहिए’ जीवन का नया संस्कार बन गया है। समय जानता है कि हम पहले ही भीतर से एक-दूसरे से दूर हो चुके थे। महामारी ने उस दूरी को केवल दिखाई भर दिया है। पहले भी हम अपने-अपने घेरे में रहते थे। अब उन घेरों के चारों ओर एक और घेरा खिंच गया है। फिर भी मन हारना नहीं चाहता। वैक्सीन की खबरें उम्मीद की तरह दिखाई देने लगी हैं। लगता है जैसे अँधेरे क्षितिज पर कहीं एक छोटा-सा दीपक जल उठा हो। विश्वास होता है कि समय की यह गाँठ भी एक दिन खुलेगी। स्टेशन फिर आबाद होंगे। हवाई अड्डों पर चहल-पहल लौटेगी। बसें भरेंगी। रेल की खिड़कियों से खेत फिर पीछे भागेंगे। बच्चे यात्राओं में ऊबेंगे और बड़े रास्तों का आनंद लेंगे।


यात्राएँ फिर होंगी लेकिन वे पहले जैसी नहीं होंगी। वे केवल हमें एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं ले जाएँगी। वे हमारे भीतर भी उतरेंगी। वे सिखाएँगी कि जीवन की सबसे लंबी यात्राएँ पैरों से नहीं, अनुभवों से पूरी होती हैं। और शायद यह भी कि पूरी दुनिया घूम लेने के बाद मनुष्य को अंततः लौटना अपने ही भीतर होता है।



शब्द

18 नवंबर 2020


आज शब्दों के बारे में सोच रही हूँ। वे जितने दिखाई देते हैं, उससे कहीं अधिक छिपे रहते हैं। इन दिनों बार-बार लगता है कि दुनिया का रंग फीका पड़ गया है। फिर सोचती हूँ, क्या सचमुच दुनिया बेरंग हुई है, या मेरी दृष्टि पर किसी अदृश्य धूल की परत जम गई है। हवा अब भी चलती है। पेड़ों पर अब भी पत्तियाँ उगती हैं।


महामारी ने समय को दो आवाजों में बाँट दिया है।


एक ओर मनुष्य की दुनिया है। एंबुलेंस के सायरन हैं। अस्पतालों की बेचैनी है। अपनों को खो देने के बाद की पथराई चीखें हैं। अखबारों में छपी मृत्यु की खबरें दुःख का बड़ा सा संसार खोलती हैं। दूसरी ओर प्रकृति है। भोर होते ही चिड़ियाँ उसी उल्लास से चहचहाती हैं। हवा पत्तों से खेलती है। फूल चुपचाप खिलते हैं। आकाश बिना किसी शोक के अपना रंग बदलता रहता है। तब लगता है, मनुष्य का समय रो रहा है और प्रकृति अपने शाश्वत उत्सव में डूबी है।


पहले यह विरोध मुझे विचलित करता था। फिर धीरे-धीरे समझ में आया कि प्रकृति मनुष्य के दुख से विमुख नहीं है। वह केवल अपना धर्म निभाती है। यदि पक्षी भी चुप हो जाएँ, हवा भी बहना छोड़ दे, सूरज भी उगना भूल जाए, तब जीवन का भरोसा किस पर टिकेगा। शायद प्रकृति की किलकारियाँ ही मनुष्य की चीखों के बीच बचा हुआ सबसे बड़ा जीवन का आश्वासन हैं।


ऐसे समय में घबराना बहुत सहज है। स्त्री को तो जैसे पीढ़ियों से घबराना ही सिखाया गया है। घर काँपे तो सबसे पहले उसका मन काँपे। परिवार टूटे तो सबसे पहले उसकी नींद टूटे। लेकिन इन दिनों मुझे लगता है कि घबराहट से बड़ा भी एक प्रदेश है। वह है शब्दों का।


शब्द केवल भाषा नहीं, वे चेतना का घर हैं। जब मन अपने ही भीतर भटकने लगता है, तब वही उसे पुकारते हैं। वे रास्ता नहीं बताते। केवल इतना हौंसला देते हैं कि रास्ता अभी समाप्त नहीं हुआ है।


मैंने देखा है, शब्द मौन के शत्रु नहीं होते। वे उसी की कोख से जन्म लेते हैं। जितना गहरा मौन होता है, उतना ही सच्चा शब्द जन्म लेता है। शोर बहुत कुछ कह सकता है, लेकिन सत्य अक्सर धीमे स्वर में बोलता है। शब्दों को आजमाना आसान नहीं है। वे बाहर आते ही लेखक से उसका परिचय पूछते हैं। वे मुखौटों के साथ अधिक देर नहीं चलते। वे हमारे भीतर छिपे भय, छल और असत्य को पहचान लेते हैं। इसलिए सच्चे शब्द लिखना, स्वयं के सामने खड़े होने जैसा है। सुना है शब्द पत्थरों को पिघला देते हैं। मैं नहीं जानती कि पत्थर सचमुच पिघलते हैं या नहीं। इतना अवश्य जानती हूँ कि शब्द जमी हुई चेतना में दरार डाल देते हैं। जहाँ कोई संभावना दिखाई नहीं देती, वहाँ भी शब्द एक छोटी-सी खिड़की खोल देते हैं। 


हर परिवर्तन पहले शब्द में जन्म लेता है, फिर जीवन में उतरता है।


आज मैंने शब्दों को हथेली पर रखकर देखा। वे बहुत हल्के लगे। इतने हल्के कि हवा भी उन्हें उड़ा सकती है। फिर लगा, यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। प्रकाश, हवा, सुगंध और शब्द… इन्हें बाँधा नहीं जा सकता। ये अपना रास्ता स्वयं बना लेते हैं। इसी कारण मनुष्य बार-बार शब्दों की ओर लौटता है। जब दुनिया टूटती हुई दिखाई देती है, तब वह पहले अपने भीतर एक वाक्य बचाता है। वही वाक्य धीरे-धीरे विश्वास बन जाता है। आज इतना ही समझ पाई हूँ कि शब्द लिखे नहीं जाते, अर्जित किए जाते हैं। वे अनुभव की अग्नि से गुजरकर आते हैं। सच्चे शब्द कम होते हैं ऐसा कहना उचित नहीं, लेकिन जब वे किसी के हृदय में जन्म लेकर अवतरित होते हैं, तब मनुष्य के भीतर बुझती हुई रोशनी को फिर से जगा देते हैं।



पत्थर का ढोलना

14 फ़रवरी 2021


आज यह लिखते हुए स्वीकार करना पड़ रहा है कि हिंसा हमेशा बाहर से नहीं आती। कई बार वह घर की चौखट के भीतर जन्म लेती है। रिश्तों की ओट में पलती है। और सबसे अधिक तब बची रह जाती है, जब उसे जानने, पहचानने वाले ही आँखें फेर लेते हैं।


गैर‌ पुरुषों की क्रूरता दिखाई देती है। उसका चेहरा होता है। उसका अपराध दर्ज होता है। लेकिन एक दूसरी क्रूरता भी है। वह अक्सर धर्म, परंपरा, मर्यादा और परिवार की प्रतिष्ठा के वस्त्र पहनकर आती है। इसलिए देर तक क्रूरता दिखाई ही नहीं देती। कोई अपना बड़ी बेरहमी से स्त्री की देह को अपनी कुत्सित विचारों में ले आता है। मैं उन पुरुषों को देखती हूँ जो रिश्तों की गरिमा को तोड़कर स्त्रियों की देह और मन पर अधिकार जमाना चाहते हैं।


जो रात के अँधेरे या सुनसान दोपहरों में विश्वास का गला घोंट देते हैं। 


उनके लिए स्त्री से हर रिश्ता केवल अवसर बन जाता है। उनके कृत्यों पर घृणा होती है। लेकिन उससे भी अधिक बेचैनी तब होती है, जब वही पुरुष घर लौटता है और उनके लिए व्रत रखे जाते हैं। उनकी लंबी आयु की कामना की जाती है। उनके माथे पर तिलक लगाया जाता है। उनके हाथों में रक्षा के धागे बाँधे जाते हैं।


यहीं आकर मन दुःख में ठहर जाता है।


क्या प्रार्थना केवल जीवन की लंबाई के लिए होनी चाहिए, पुरुष के चरित्र के लिए नहीं?


बहनें, बेटियाँ, पत्नियाँ और माताएँ प्रेम से दीप जलाती हैं। ईश्वर से उनकी कुशलता माँगती हैं। लेकिन यदि वे पुरुष किसी दूसरी स्त्री के मन पर जीवन भर न भरने वाला घाव छोड़ आएं, तब क्या माँ द्वारा की गई प्रार्थना पहले जैसी पवित्र रह जाएगी?


सबसे कठिन प्रश्न उन स्त्रियों से है जो सच जानती हैं, फिर भी मौन चुनती हैं। जो अपराधी को समझ लेती हैं, लेकिन पीड़िता को समझने से पहले उसे चुप रहने की सलाह देती हैं। जो कहती हैं, "घर की बात घर में रहने दो।" 


ऐसा करते हुए वे कहती हैं कि वे किसी का पक्ष नहीं लेना चाहतीं, लेकिन उनका मौन अनजाने में अपराध का पक्षधर बन जाता है।


यहीं व्यवस्था अपनी सबसे मजबूत दीवार खड़ी करती है।


मैं उनसे पूछना चाहती हूँ, वे क्यों नहीं बँधवा देतीं उन कठोर हृदयों पर पत्थर का ढोलना? क्यों नहीं चाहतीं कि हर धड़कन उन्हें उनके अपराध की याद दिलाए? क्यों उनकी करुणा बार-बार अपराधी तक पहुँच जाती है और पीड़िता तक पहुँचते-पहुँचते समाप्त हो जाती है? सच स्वीकार करना सबसे कठिन होता है। क्योंकि सच केवल अपराधी को नहीं, दर्शक को भी कठघरे में खड़ा कर देता है। वह पूछता है कि जब अन्याय सामने था, तब तुम कहाँ थीं? तुमने क्या कहा? या तुमने कुछ भी नहीं कहा?


मैं जानती हूँ, हर स्त्री ऐसी नहीं होती। अनेक स्त्रियाँ अन्याय के विरुद्ध खड़ी भी होती हैं। वे अपने ही घरों में अकेली पड़ जाती हैं, फिर भी सच का साथ नहीं छोड़तीं। उन्हीं के कारण उम्मीद बची रहती है। लेकिन जहाँ मौन परंपरा बन जाता है, वहाँ हिंसा पीढ़ियों तक जीवित रहती है।


पुरुषों की निर्लज्जता दुख देती है। लेकिन उससे अधिक पीड़ा तब होती है, जब स्त्री की करुणा गलत दिशा में बहने लगती है। करुणा यदि पीड़ित तक न पहुँचे, तो वह करुणा नहीं रहती। वह व्यवस्था का औजार बन जाती है।


सबसे पीड़ादायक यह है कि इन अपराधों में टूटता केवल एक विश्वास नहीं होता। टूटती है वह साझा कोख, जिससे रिश्तों का पूरा संसार जन्म लेता है। माँ, दादी और नानी की स्मृतियों से बनी वह पारिवारिक मर्यादा, जिसे सुरक्षित रखना था, वही सबसे पहले घायल होती है।


आज यह डायरी यहीं रुकती है। इस स्वीकार के साथ कि हर अन्याय के पीछे केवल एक अपराधी नहीं होता। कभी-कभी उसके पीछे एक लंबा मौन खड़ा होता है। और मौन, यदि बार-बार अपराध के पक्ष में खड़ा हो जाए, तो वह भी हिंसा का ही एक रूप बन जाता है।



मुस्कराने के औजार 

6 मार्च 2021


आज बाज़ार तक जाना हुआ। वहाँ रामलाल मिला। उसे देखकर फिर लगा कि भाषा कभी केवल भाषा नहीं होती। वह आदमी की हैसियत भी बन जाती है। उसकी रोजी-रोटी भी। उसका वर्ग भी।


महामारी ने यह भेद और साफ कर दिया है। जिनके पास घर से काम करने की भाषा थी, वे घरों में सुरक्षित बैठे रहे। जिनके पास केवल हाथों की भाषा थी, उन्हें सड़कों पर उतरना ही पड़ा। किसी ने लैपटॉप खोला, किसी ने ठेला। किसी ने ऑनलाइन बैठक की, किसी ने मास्क के पीछे अपनी आवाज ऊँची करनी सीखी।


रामलाल ठेला लगाता है। इसलिए उसे भाषा का भूगोल समझ में आता है। वह जानता है कि कौन-सा शब्द ग्राहक को रोक लेगा। कौन-सी आवाज जेब तक पहुँचेगी। वह भाषा को व्याकरण से नहीं, पेट से समझता है। सुबह घर से निकलते समय वह अपनी बोली चौखट पर छोड़, बाजार पहुँचते-पहुँचते उसकी जबान बदल जाती है। टूटे-फूटे विदेशी शब्द उसके औजार बन जाते हैं। मैंने ध्यान से देखा, वे उसके लिए फैशन नहीं हैं। भूख के लिए रोटी हैं।


"येलो बनाना" कहते हुए उसे पता है कि केले नहीं बदले, मगर ग्राहक बदल जाएगा।


मैंने देखा, वह "भइया, इधर आना" की पुकार पर उतना नहीं ठहरता, जितना अंग्रेजी मिलाकर बोलने वाले ग्राहक पर। यह उसकी असंवेदनशीलता नहीं है। यह बाजार की निर्ममता है। उसकी आवाज में जो कृत्रिम मिठास है, वह अभिनय नहीं है, वह उसके बच्चों की फीस है। घर का राशन है। बूढ़ी माँ की दवा है। रामलाल अंग्रेजी के टूटे-फूटे शब्दों से खेलता है। मेरे चेहरे पर मुस्कान आकर ठहर गई। जिसे बहुत देर तक संभाला मैंने।


थोड़ा आगे चली तो देखा, एक औरत शरीफे की डलिया लगाए बैठी है। उसकी बोली में अब भी गाँव जमा बैठा है। वह चाहकर भी अपनी भाषा नहीं बदल पाती। इसलिए नहीं कि वह सीख नहीं सकती, बल्कि इसलिए कि हर नई भाषा की एक कीमत होती है। कोई उसे पैसे से चुकाता है, कोई अपनी पहचान से।


महामारी ने कितने ही घरों की रसोई बुझा दी। कितने बच्चे पढ़ाई छोड़कर काम पर निकल पड़े। कितने पिता बेरोज़गार होकर घर लौटे तो उनकी चुप्पी पूरे घर की भाषा बन गई। मंदिरों में ताले लगे हैं। मंदिर के सामने किसी पेड़ के नीचे बैठे हैं पंडित जी। माथे पर चंदन का टीका लगा है। वे यूँ ही बड़बड़ाते हैं- "अब संस्कृत से पेट नहीं भरता।" उनके स्वर में शिकायत नहीं, समय की स्वीकृति लगी। लगा, जब भाषा भी बाजार के सामने विवश हो जाए, तब संस्कृति कितनी अकेली पड़ जाती होगी।


मेरा हिंदी मन देर तक इन्हीं बातों में उलझा रहा। क्या भाषा भी मनुष्य की तरह विस्थापित होती है? क्या वह भी जीवित रहने के लिए अपना रूप बदलती है? क्या हर वर्ग की अपनी अलग भाषा होती है? या वर्ग ही धीरे-धीरे भाषा गढ़ने लगता है?


मैंने सोचा, आने वाली पीढ़ियाँ शायद शब्दों का अर्थ शब्दकोश से नहीं, बाजार से सीखेंगी। वे जानेंगी कि कौन-सा शब्द बिकता है और कौन-सा नहीं। लेकिन क्या वे यह भी जान पाएँगी कि भाषा केवल कमाने का साधन नहीं, मनुष्य बने रहने का आधार भी है?


आज डायरी यहीं बंद करती हूँ।


इस चिंता के साथ कि मुस्कराने के औजार जुटाते-जुटाते कहीं निम्न तबके के मनुष्य अपनी भाषा की आत्मा, अपने घरों की हँसी और अपने भीतर की मनुष्यता ही न खो दें।



रिक्तता

20 मार्च 2021


आज पूरे दिन लगता रहा कि मनुष्य जितना भरता है, उतना ही खाली होता जाता है।


पहले मुझे लगता था कि रिक्तता अभाव का दूसरा नाम है। अब समझ में आने लगा है कि वह एक जगह भी है। भीतर की वह जगह जहाँ कोई शोर टिक नहीं पाता। जहाँ स्मृतियाँ भी धीरे-धीरे अपने रंग छोड़ देती हैं। महामारी ने हमसे बहुत कुछ छीन लिया—लोग, रास्ते, आदतें, भरोसे…। लेकिन जो सबसे अधिक छिना, वह यह भ्रम था कि सब कुछ हमारे नियंत्रण में है। एक अदृश्य विषाणु ने मनुष्य की सारी निश्चिंतताओं को प्रश्न में बदल दिया।


तभी पहली बार लगा कि जीवन किसी उपलब्धि पर नहीं, एक अनदेखे संतुलन पर टिका है।


मैंने देखा है, पेड़ अपने सूखे पत्तों को पकड़े नहीं रहते। नदी अपने बीते हुए जल को याद नहीं करती। आकाश बादलों से कभी शिकायत नहीं करता कि वे ठहरे क्यों नहीं। केवल मनुष्य है, जो हर बीती हुई चीज़ को अपने भीतर जमा करता चलता है। शायद इसी कारण उसका मन सबसे जल्दी भर जाता है।


आज सोचती रही कि क्या स्मृति भी कभी बोझ बन जाती है। यदि हाँ, तो विस्मृति ईश्वर का सबसे करुण उपहार होगी। मौन के भीतर बैठी तो लगा, विचार भी पक्षियों की तरह होते हैं। उन्हें बाँधकर नहीं रखा जा सकता। जितना पकड़ना चाहो, उतनी दूर उड़ जाते हैं। केवल जो विचार स्वयं लौटकर आएँ, वही अपने होते हैं।


शायद सत्य भी ऐसा ही है। वह खोजने से कम और प्रतीक्षा करने से अधिक मिलता है।


मैंने आज अपने भीतर कोई उत्तर नहीं खोजा। केवल प्रश्नों के साथ बैठी रही। आश्चर्य हुआ कि प्रश्न भी संगति निभाते हैं। वे तुरंत समाधान नहीं देते, लेकिन मन को अकेला भी नहीं छोड़ते। जीवन का अर्थ उत्तरों में नहीं, प्रश्न पूछते रहने की क्षमता में छिपा है।


संध्या होते-होते कमरे में अँधेरा उतर आया। मैंने दीपक जलाया। उस छोटी-सी लौ को देर तक देखती रही। उसने अँधेरे से कोई लड़ाई नहीं की। बस अपना होना स्वीकार किया।


मनुष्य को भी इतना ही करना चाहिए।


पूरा संसार प्रकाशित करना वश में नहीं…‌ अपने हिस्से का प्रकाश बचाए रखना ही पर्याप्त है।


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कल्पना मनोरमा वरिष्ठ कवि-गद्यकार हैं। कविता संग्रह : कब तक सूरजमुखी बनें हम (2019), बाँस भर टोकरी (2023), नदी सपने में थी (2024), मौन के विरुद्ध (2026)‌‌। कहानी संग्रह : एक दिन का सफ़र (2025)। बाल कथा संग्रह : देखा एक सपना (2026)। पुरस्कार/सम्मान : साहित्य समर्था पुरस्कार (2022), धनपति देवी सम्मान कहानी (2023)।

ईमेल : kalpanamanorama@gmail.com



3 Comments


सुमन शेखर
3 days ago

कल्पना जी की में डायरी में शीर्षक अच्छा प्रयोग है। डायरी का बहुत सारा हिस्सा ठहराता है, गंभीर है, संग्रहणीय है।

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Vinita Badmera
3 days ago

कल्पना जी की डायरी जीवन दर्शन के साथ खुलती है। वे मौन को भी लिखती है और आवाज़ को भी।

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इला सिंह
3 days ago

डायरी में रोज़मर्रा की घटनाओं संग गूढ़ दर्शन की अत्यंत सहज प्रस्तुति आश्चर्य में डाल देती है। कल्पना मनोरमा जी की सशक्त भाषा, गहन विचार शक्ति डायरी विधा को नये आयाम देती है।महत्वपूर्ण और अत्यंत पठनीय!

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