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ईश्वर से अधिक मनुष्य
यदि यह संसार केवल प्रतीक्षालय है, तो यहाँ इतनी सुंदर खिड़कियाँ क्यों हैं? पेड़ों पर धूप इतनी देर क्यों ठहरती है? बारिश के बाद मिट्टी की गंध इतनी गहरी क्यों होती है? किसी बूढ़े पिता के चेहरे पर एक नई झुर्री देखकर भीतर कुछ टूटता क्यों है?


कल्पना मनोरमा की डायरी
याद आई नदी किनारे पड़ी नाव। महीनों पानी से दूर रहने पर उसकी देह सूख जाती होगी। फिर जब उसे दोबारा नदी में उतारा जाएगा तो वह भी एक पल के लिए ठिठकेगी। पानी धीरे-धीरे उसकी लकड़ी में उतरेगा और वह फिर से जी उठेगी।


विनीता बाड़मेरा की डायरी
हर दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है। रात बीत रही है। जनवरी शुरू होती है और बारह महीने बीतते ही दिसंबर आ जाता है। एक साल पूरा खत्म हो जाता है। मन में रह जाती है कसक, बहुत कुछ छूटने की, बीतने की, रीतने की—न चाहते हुए भी।


आशुतोष प्रसिद्ध की डायरी
दिनों बाद सुकून की कोई लय लगातार सुनता रहा। एक हँसी, एक छेड़ लगातार गूँजती रही। फिसलते रास्ते पर हम सम्भलकर चलते रहे और अन्ततः सही राह पा गए।
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