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ईश्वर से अधिक मनुष्य

Sep 12
6 min read

Updated: 7 days ago



ईश्वर से अधिक मनुष्य 

रवि अहिरवार


मुझे उन लोगों को समझने में हमेशा कठिनाई हुई है जो इस संसार को केवल एक प्रतीक्षालय मानते हैं—एक ऐसा कमरा जहाँ कुछ समय बैठना है, अपनी बारी आने की प्रतीक्षा करनी है और फिर किसी दूसरे, अधिक महत्वपूर्ण लोक में चले जाना है। मुझे हमेशा लगता रहा है कि यदि यह संसार केवल प्रतीक्षालय है, तो यहाँ इतनी सुंदर खिड़कियाँ क्यों हैं? पेड़ों पर धूप इतनी देर क्यों ठहरती है? बारिश के बाद मिट्टी की गंध इतनी गहरी क्यों होती है? किसी बूढ़े पिता के चेहरे पर एक नई झुर्री देखकर भीतर कुछ टूटता क्यों है? और किसी अनजान मनुष्य की आँखों में आँसू देखकर हम बिना किसी धार्मिक शिक्षा के बेचैन क्यों हो जाते हैं?


मेरे लिए यह संसार प्रतीक्षालय नहीं है, यही गंतव्य है।


पेड़ों पर गिरती धूप, शाम को घर लौटते पक्षियों का शोर, प्रेम में पड़े लोगों की मूर्खताएँ, पिता के चेहरे पर बढ़ती झुर्रियाँ, माँ की चिंता, मित्रों की बेवकूफ़ियाँ, किसी पुराने गीत का अचानक भीतर उतर जाना, रात के सन्नाटे में उठने वाली बेचैनियाँ—यही मेरे धर्मग्रंथ हैं। इन्हें पढ़ते-पढ़ते ही मेरा अधिकांश जीवन निकल जाता है। मुझे किसी पवित्र पुस्तक के पन्ने पलटने से अधिक मनुष्य के चेहरे पढ़ने में रुचि रही है। शायद इसलिए मुझे कभी-कभी आश्चर्य होता है कि लोग ईश्वर के बारे में इतना निश्चित कैसे हो जाते हैं।


मैं नहीं जानता कि ईश्वर है या नहीं है। और सच कहूँ तो इस प्रश्न ने मुझे कभी बहुत अधिक व्याकुल भी नहीं किया। मुझे लगता है, मनुष्य ने ईश्वर के बारे में जितने उत्तर खोजे हैं, उनसे अधिक महत्वपूर्ण वे प्रश्न हैं जिन्हें उसने अभी तक पूछना नहीं छोड़ा है।


यदि ईश्वर है, तो मेरा विश्वास है कि वह पर्याप्त बुद्धिमान होगा। इतना बुद्धिमान कि उसे मेरी चापलूसी की आवश्यकता न हो। इतना प्रज्ञावान कि वह मेरे द्वारा दोहराए गए मंत्रों से अधिक मेरे कर्मों को देखे। इतना विवेकशील कि वह यह समझ सके कि किसी भूखे को भोजन देना, किसी टूटे हुए व्यक्ति को कुछ देर चुपचाप सुन लेना, किसी असहाय का हाथ पकड़ लेना—हजारों स्तुतियों से अधिक मूल्यवान हो सकता है।


मुझे हमेशा यह विचित्र लगा है कि हम ईश्वर को सर्वज्ञ कहते हैं, लेकिन फिर भी उसे अपने पक्ष में करने के लिए उसे लगातार मनाते रहते हैं। हम फूल चढ़ाते हैं, घंटियाँ बजाते हैं, प्रार्थनाएँ दोहराते हैं और फिर उसी मंदिर से बाहर निकलकर किसी कमज़ोर मनुष्य को अपमानित कर देते हैं। जैसे ईश्वर को प्रसन्न करने का रास्ता मनुष्य के भीतर से नहीं, उसके ऊपर से होकर जाता हो।


यदि ईश्वर वास्तव में सृष्टि का रचयिता है, तो उसने मुझे एक मस्तिष्क भी दिया होगा। प्रश्न करने की क्षमता दी होगी। तर्क दिया होगा। संशय दिया होगा। असहमति की संभावना दी होगी। फिर वह मुझसे इन सबका परित्याग करके केवल विश्वास की अपेक्षा क्यों करेगा?


मुझे संदेह श्रद्धा का विरोधी नहीं लगता। कई बार संदेह ही श्रद्धा का सबसे ईमानदार रूप होता है। जो व्यक्ति प्रश्न नहीं करता, वह शायद विश्वास करता हुआ दिखाई देता है; लेकिन जो प्रश्न करके भी सत्य की तलाश नहीं छोड़ता, उसके भीतर मुझे अधिक मनुष्यता दिखाई देती है।


और यदि ईश्वर नहीं है, तब भी कोई विशेष समस्या नहीं।


तब यह ब्रह्मांड एक विराट संयोग है। तब हमारा अस्तित्व समय की अनंत नदी में तैरते किसी क्षणिक बुलबुले जैसा है। हम आएँगे, कुछ देर हँसेंगे, प्रेम करेंगे, लड़ेंगे, अपने लिए घर बनाएँगे, बच्चों के नाम सोचेंगे, कुछ किताबें पढ़ेंगे, कुछ सपने अधूरे छोड़ेंगे और फिर एक दिन हमारी जगह किसी और की आवाज़ सुनाई देगी।

लेकिन इससे जीवन की सुंदरता कम नहीं हो जाती।


यदि फूल इसलिए सुंदर नहीं है कि उसे देखने वाला कोई ईश्वर है, तो भी वह सुंदर है। यदि किसी माँ का अपने बच्चे के लिए जागते रहना किसी स्वर्गीय पुरस्कार की आशा में नहीं है, तो भी वह प्रेम है। यदि किसी अजनबी की मदद करने के बाद कोई देवदूत उसका नाम नहीं लिख रहा, तब भी उस मदद से किसी मनुष्य का जीवन थोड़ा आसान हुआ है।


ईश्वर के न होने से जीवन अर्थहीन नहीं हो जाता बल्कि तब अर्थ गढ़ने की पूरी ज़िम्मेदारी मनुष्य पर आ जाती है। तब हमें अपने जीवन का अर्थ किसी आकाशीय आदेश से नहीं, अपने व्यवहार से बनाना पड़ता है। तब यह तय करना पड़ता है कि हम दूसरों के लिए कैसी दुनिया छोड़कर जाएँगे। तब एक ईमानदार काम, एक क्षमा, एक रोटी, एक किताब, एक स्पर्श और एक सच—सब अपने आप में महत्वपूर्ण हो जाते हैं।


और यदि—यह तीसरी संभावना है—ईश्वर है, किंतु वह इतना अहंकारी है कि उसे मनुष्यों के चरित्र से अधिक अपनी प्रशंसा प्रिय है; यदि वह न्याय से अधिक स्तुति को महत्व देता है; यदि वह करुणा से अधिक अनुष्ठान और विवेक से अधिक अंधसमर्पण चाहता है—तब मुझे स्वीकार करना होगा कि वह मेरी श्रद्धा के योग्य नहीं है क्योंकि मैं उस सत्ता का सम्मान नहीं कर सकता जो प्रश्नों से भयभीत हो।


मैं ऐसे ईश्वर की अपेक्षा किसी साधारण मनुष्य के साथ बैठना पसंद करूँगा जिसने जीवन को ईमानदारी से जिया हो। किसी बूढ़े किसान के साथ, जिसके पैरों में दरारें हों और जिसने पूरी उम्र मिट्टी में हाथ डालकर अनाज उगाया हो। किसी शिक्षक के साथ, जिसने अपनी मामूली तनख़्वाह के बावजूद पीढ़ियों के भीतर उजाला रखा हो। किसी मजदूर के साथ, जो दिन भर ईंटें उठाकर शाम को अपने बच्चे के लिए मिठाई लेकर लौटता हो। किसी प्रेमी के साथ, जिसने टूटने के बाद भी प्रेम करना नहीं छोड़ा हो।


मुझे वे लोग अधिक दिव्य प्रतीत होते हैं। शायद इसलिए कि मैं ईश्वर को मनुष्य से अलग करके देख ही नहीं पाता।


जब कोई व्यक्ति अपने भय के विरुद्ध जाकर सत्य बोलता है, तब मुझे उसमें किसी मंदिर से अधिक पवित्रता दिखाई देती है। जब कोई अपने स्वार्थ के विरुद्ध जाकर करुणा चुनता है, तब मुझे किसी प्रार्थना से अधिक अर्थ दिखाई देता है। जब कोई टूटने के बाद भी क्रूर नहीं होता, तब मुझे लगता है कि मनुष्य ने अपने भीतर किसी बहुत बड़ी चीज़ को बचा लिया है। जब कोई अकेलेपन में भी अपने भीतर की मनुष्यता को बचाए रखता है, तब लगता है जैसे अँधेरे कमरे में किसी ने बिना आवाज़ के एक दीपक जला दिया हो।


शायद ईश्वर यदि कहीं है, तो वह चमत्कारों में कम और इन छोटे-छोटे निर्णयों में अधिक उपस्थित होगा। किसी अस्पताल के गलियारे में किसी अनजान व्यक्ति के लिए पानी लेकर खड़ा आदमी। किसी वृद्ध माँ के पैरों में तेल लगाता बेटा। परीक्षा में असफल होकर भी अपने मित्र को बधाई देता हुआ युवक। धोखा खाकर भी अगली बार किसी पर विश्वास करने की हिम्मत जुटाता हुआ मनुष्य। भीड़ में किसी गिरते हुए व्यक्ति को उठाने के लिए एक क्षण को अपनी जल्दी भूल जाने वाला अजनबी।


ये दृश्य इतने साधारण हैं कि इतिहास इन्हें दर्ज नहीं करता। लेकिन शायद मनुष्य होने का सबसे बड़ा इतिहास इन्हीं अनलिखे क्षणों में छिपा है।


हमने आकाश की ओर बहुत देखा है। शायद अब थोड़ा नीचे देखने का समय है।


क्योंकि हमारे सामने जो मनुष्य खड़ा है, वह भी एक रहस्य है। उसकी हँसी के पीछे कितना दुःख है, उसकी चुप्पी के भीतर कितनी आवाज़ें हैं, उसके कठोर चेहरे के पीछे कितनी असुरक्षाएँ हैं—हम नहीं जानते। फिर भी हम उसे बहुत जल्दी अच्छा या बुरा घोषित कर देते हैं। शायद ईश्वर को समझने की हमारी जल्दबाज़ी ने हमें मनुष्य को समझने से रोक दिया है।


इसलिए मैं ईश्वर की खोज में नहीं हूँ।

कम-से-कम उस ईश्वर की नहीं, जिसे साबित करने के लिए मुझे अपनी बुद्धि गिरवी रखनी पड़े।


मैं मनुष्य की खोज में हूँ।


उस मनुष्य की, जो अपने हिस्से का अँधेरा लेकर भी किसी दूसरे के लिए थोड़ी रोशनी बचा लेता है। उस मनुष्य की, जो जानता है कि जीवन क्षणभंगुर है, फिर भी प्रेम करता है। जो जानता है कि सब कुछ समाप्त हो जाएगा, फिर भी किसी पौधे को पानी देता है। जो जानता है कि दुनिया उसे याद नहीं रखेगी, फिर भी अपना काम ईमानदारी से करता है।


और शायद यही पर्याप्त है। क्योंकि यदि ईश्वर है, तो वह ऐसी मनुष्यता से नाराज़ नहीं होगा। और यदि ईश्वर नहीं भी है, तब भी ऐसी मनुष्यता अपने आप में पर्याप्त है। शायद जीवन का अंतिम प्रश्न यह नहीं है कि हमने ईश्वर को पाया या नहीं। शायद प्रश्न इतना भर है—जब संसार ने हमें एक-दूसरे के सामने खड़ा किया, तब हमने एक-दूसरे के साथ क्या किया? मैं उसी उत्तर की तलाश में हूँ—ईश्वर की नहीं, मनुष्य की।


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रवि अहिरवार मध्यप्रदेश के गुना से हैं। पिछले पाँच-छह वर्षो से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

‘अन्तर्मन की त्रासदी’ (2024) उनकी लघुकथाओं की पुस्तक है। ईमेल : raviahirwar724@gmail.com






2 Comments


Saloni
Sep 12

तार्किक व सार्वजनिक योग्य, प्यारा लेखन है।

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Deepak
Sep 12

बहूत ही शानदार लिखा है, सटीक व समझदारी तरीके से

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