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दुनिया में एक शहर है, जिस शहर में पूरी दुनिया मिलती है।

  • 2 days ago
  • 9 min read


दुनिया में एक शहर है, जिस शहर में पूरी दुनिया मिलती है।
सुषमा गुप्ता

न्यूयॉर्क आए हुए अभी कुछ ही समय हुआ है पर जाने क्या बात है यहाँ की आबोहवा में, यहाँ के माहौल में कि लगता है जाने कब से यहीं रहती आई हूँ, जैसे इसी दुनिया का हिस्सा हूँ जिस दुनिया में पूरी दुनिया के लोग समाए हैं। 


बचपन से फ़िल्मों, किताबों और तस्वीरों में जिसे देखा, आज उन्हीं सड़कों पर चल रही हूँ। सोचा था, न्यूयॉर्क मुझे अपनी ऊँची-ऊँची इमारतों से चकित करेगा, पर ऐसी बहुत-सी इमारतें मेरे देश में भी हैं और उन बाक़ी देशों में भी जहाँ मैं इस से पहले गई हूँ‌। जो बात अलहदा है वह इसकी इमारतों में नहीं, इसके लोगों में है।


मेरे आने का समय भी क्या ही संयोग लेकर आया। पूरा शहर फुटबॉल विश्व कप के रंग में डूबा हुआ है। 14 जून को हवाई जहाज़ से उतरते ही इसका पहला दृश्य जॉन एफ कैनेडी एयरपोर्ट पर दिखाई दे गया। इमिग्रेशन की लंबी कतारों में लोग किसी साधारण यात्रा पर निकले हुए यात्री नहीं लग रहे थे। कोई अर्जेंटीना की जर्सी पहने था, कोई ब्राज़ील की, कोई मेक्सिको की, कोई फ्रांस की। इतने झंडे, इतने रंग और इतनी भाषाएँ एक साथ मैंने पहले कभी नहीं देखी थीं। तब पहली बार लगा कि विश्व कप केवल मैदान में नहीं खेला जा रहा, वह लोगों के दिल-दिमाग़-जुनून पर अपना मैदान सजाए हुए है। 


एयरपोर्ट से मैनहट्टन तक आते हुए रास्ते भर फुटबॉल की सजावट दिखाई देती रही। बड़े-बड़े डिजिटल बोर्ड, दुकानों की खिड़कियाँ, सड़कें, कैफ़े, सब जैसे इस उत्सव का हिस्सा बन गए हों। मुझे महसूस हुआ कि मैं किसी शहर में नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े उत्सव के बीच आ पहुँची हूँ।


आने के कुछ दिन बाद मैं एक वॉच पार्टी में गई, जीवन में पहली बार। मैनहट्टन के वेसल के पास सैकड़ों लोग एक साथ मैच देख रहे थे। ब्राज़ील और स्कॉटलैंड के बीच मैच चल रहा था। 

अधिकतर लोग ब्राज़ील की जर्सियाँ पहने हुए थे। मैच शुरू हुआ तो लगा जैसे इधर से उधर बॉल नहीं झूम रही बल्कि लोगों के दिल खिलाड़ियों के पैरों में अटके हुए हैं। बॉल जितनी बार उछलती, उतनी ही बार लोगों के दिल उछलते और गलों की आवाज़ें किसी कोरस में आसमान तक टप्पे खाने लगतीं। गेंद गोलपोस्ट के पास पहुँचती और पूरा इलाक़ा एक साथ साँस रोक लेता। गोल होने पर ऐसा शोर उठता कि लगता, इस शहर की गगनचुंबी इमारतें भी मुस्कुराने लगती होंगी।


मुझे खेल से अधिक उन लोगों को देखना अच्छा लग रहा था। कोई बच्चा अपने पिता के गले लगकर चिल्ला रहा था, कोई अजनबी के साथ हाई-फाइव कर रहा था। कोई प्रेमी ख़ुशी से एक-दूसरे को चूमने लगते और यार-दोस्तों की महफ़िलों का रंग तो क्या ही कहूँ! उनका तो हँसी-ठठ्ठा ऐसा, इतने सारे कहकहों के गुच्छे हवा में फेंके जाते कि आसपास सब महकने लगता। उस भीड़ में अधिकांश लोग एक-दूसरे के लिए अजनबी थे फिर भी सब एक-दूसरे की ख़ुशी में शामिल थे।


उस समय मुझे लगा कि इंसान की सबसे पहली सामूहिक अभिव्यक्ति उत्सव रही होगी।


मैच के बाद हम टाइम्स स्क्वायर पहुँचे। मैंने टाइम्स स्क्वायर की अनगिनत तस्वीरें देखी थीं, लेकिन तस्वीरें कभी किसी जगह की धड़कन नहीं दिखा सकतीं। रात हो चुकी थी, लेकिन यहाँ रात का अर्थ अँधेरा नहीं है। यहाँ रात रोशनी का दूसरा नाम है। जगमगाती लट्टुओं की पूरी बारात आपके स्वागत में जैसे आतुर खड़ी थी। विशाल स्क्रीनें और उन विशाल स्क्रीन्स पर चलते हुए दुनिया जहान की चीज़ों के विज्ञापन। एक से एक लग्ज़री ब्रांड और साथ-साथ हर देश के झंडे बार-बार फ्लैश होते। खिलाड़ियों के चेहरे, जर्सियों की रौनकें, सब कुछ उन बिल बोर्ड्स पर इस तरह छाया हुआ था जैसे एक साथ अनगिनत मैच चल रहे हैं और दो आँखों से आप निर्णय नहीं कर पा रहें कि इस अद्भुत नज़ारे में पहले किस तरफ़ देखें। 


हर तरफ संगीत था। कोई गिटार बजा रहा था, कोई ड्रम। कहीं लोग नाच रहे थे, कहीं कोई सड़क किनारे अपना छोटा-सा संगीत समारोह किए बैठा था। सब तरफ़ मजमा लगा था। लोग तालियाँ बजाकर हर कलाकार को उत्साहित कर रहे थे। 


उस पूरे माहौल में कई बार मुझे सचमुच लगा कि दुनिया में अगर कहीं सिर्फ़ खुशी रहती होगी, तो शायद उसका चेहरा ऐसा ही होगा। जैसे यहाँ न कोई नफ़रत है, न कोई दुख, न कोई विभाजन। मुझे पता है कि यह पूरी सच्चाई नहीं है। दुनिया इतनी सरल नहीं होती। लेकिन उन कुछ घंटों के लिए सचमुच ऐसा ही महसूस होता था।


और पता है सबसे दिलचस्प और सुंदर बात क्या थी! सबसे सुंदर बात थी कि अधिकांश लोगों को एक-दूसरे की भाषा समझ नहीं आ रही थी, फिर भी सब एक-दूसरे को समझ रहे थे।


अपनी बात करूँ तो ज़िंदगी में एक काम मैंने  पहली मर्तबा किया। जो शायद यहाँ और ऐसे माहौल में ही संभव था। एक जगह इक्वाडोर के कुछ लोग स्पेनिश गीतों पर नाच रहे थे। स्पेनिश संगीत मुझे हमेशा से बहुत प्रिय रहा है। नृत्य भी जाने कब से मेरी रगों में रहा है। मैंने कभी बाक़ायदा नृत्य नहीं सीखा। घर का माहौल वैसा नहीं था। लेकिन बंद कमरे में जाने कितनी बार घंटों नाची हूँ। कभी बहुत खुश होकर, कभी बहुत तनाव में। दोनों ही हालतों मे जब तक थककर बिल्कुल चूर न हो जाऊँ।


उस दिन भी संगीत बजा तो मेरे पैर अपने-आप थिरकने लगे। बेटे ने मेरी तरफ देखा। दोनों हाथ मेरी ओर बढ़ाए और मुस्कुराकर कहा, “Come on… let’s dance.”


मैंने हँसकर पूछा, “Really?”


उसने कहा, “Why not!”


और अगले ही पल हम दोनों उन अनजान लोगों के बीच स्पेनिश गीतों पर झूम रहे थे।


बेटे को स्पेनिश थोड़ी-बहुत समझ आती है। मुझे गिनती के चार शब्द भी नहीं आते। लेकिन संगीत तो पैरों को समझ आता है। मन को समझ आता है।


हम उन लोगों की बाँहों में बाँहें डालकर इतनी मस्ती से नाचे कि हँसते-हँसते मेरी आँखें भर आईं। मैंने ख़ुद को इससे पहले कभी इस तरह नहीं देखा था। जाने यह कौन थी मेरे अंदर जो अजनबी लोगों के बीच इस तरह खुलकर नाच रही थी! जैसे कोई किशोर लड़की अपनी झिझक के सारे आवरण उतारकर सरेआम सड़कों पर झूमने लगे। यह मेरे मन का कौन सा रूप था, मैं शायद कभी ख़ुद भी ना समझ पाऊँगी।


या यह कोई और थी, जो इतने वर्षों से मेरे भीतर चुप बैठी थी और उसे बाहर आने के लिए बस एक शहर, एक संगीत और कुछ अजनबी लोगों की मुस्कुराहट चाहिए थी?!


उस रात मुझे पहली बार लगा कि उम्र कभी-कभी सिर्फ़ कैलेंडर पर बढ़ती है। मन के भीतर कहीं एक लड़की हमेशा बची रहती है। उसे बस एक ऐसा क्षण चाहिए होता है, जहाँ कोई उसे यह कह दे,“Come on… let’s dance.”


इस एक महीने में कई बार टाइम्स स्क्वायर जाना हो गया है। जगह वही की वही है पर हर बार नई लगती है। नए लोग, नई जर्सियाँ, नए गीत, नई भाषाएँ। पर एक चीज़ हर रात वैसी ही रहती, लोगों का एक-दूसरे के लिए सहज सम्मान और उल्लास।


एक और बेहद कमाल की बात आपको न्यूयॉर्क के बारे में बताती हूँ। मैं कई बार भीड़ में रुककर इमारतें, बिलबोर्ड या नाचते गाते चेहरों को देखकर खो जाती और वहीं की वहीं खड़ी रह जाती। पर कोई मुझे धक्का देकर आगे नहीं निकला। कोई इस बात से परेशान नहीं हुआ कि मैं रास्ते में खड़ी हूँ। यहाँ लोग अपनी जगह भी जानते हैं और दूसरे की जगह भी। कोई किसी को अपने रास्ते का रोड़ा नहीं समझ रहा। वह आपकी बग़ल से चुपचाप निकल जाएगा या आपके हटने का इंतज़ार करेगा, या बहुत सम्मान के साथ 'एक्सक्यूज़ मी' बोलेगा, वह भी मुस्कुराते हुए। किसी के चेहरे पर आप कोई झल्लाहट या ग़ुस्सा नहीं देखेंगे।


यह छोटी-सी बात है, लेकिन शायद किसी शहर की असली पहचान ऐसी ही छोटी-छोटी बातों में छिपी होती है।


बेटा जो दो साल से यहाँ है उसने बताया कि टाइम्स स्क्वायर पर हमेशा भीड़ और रौनक रहती है, लेकिन विश्व कप के दिनों जैसी रौनक उसने भी पहले कभी नहीं देखी। सचमुच, ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया ने कुछ दिनों के लिए न्यूयॉर्क को अपना साझा घर बना लिया हो।


कहीं अर्जेंटीना के समर्थक गा रहे हैं। कहीं ब्राज़ील के। कहीं अफ़्रीकी देशों के ड्रम बज रहे हैं। कहीं यूरोप के लोग अपने पारंपरिक गीत गा रहे हैं। कोई हारकर भी अजनबियों को गले लगा रहा है। और जीतने वाले, हारने वालों को भी अपने साथ हँसा रहे हैं।


उन्हें देखते हुए न जाने कितनी बार मन में एक ही बात आई—दुनिया को लोगों ने नहीं बाँटा। उसे स्वार्थ ने बाँटा है। राजनीति ने बाँटा है। डर ने बाँटा है। लोगों के मन में एक-दूसरे के लिए शक और नफ़रत भर दी गई है।


क्योंकि यहाँ मैं रोज़ देख रही थी कि जब माहौल बदलता है, तो लोग भी बदल जाते हैं। जब सामने वाला सिर्फ़ किसी दूसरे देश का नागरिक नहीं, बल्कि आपके साथ हँसता हुआ एक इंसान रह जाता है, तब सीमाएँ पीछे छूटने लगती हैं। तभी पहली बार मुझे लगा कि शायद मनुष्यता की कोई सरहदें नहीं होती।


शायद इसी कारण न्यूयॉर्क मुझे किसी शहर से ज़्यादा एक जीवनशैली लगने लगा है। जहाँ हर व्यक्ति अपनी पहचान बचाए रखते हुए भी दूसरे के लिए जगह बना सकता है।


यहाँ कोई मुझे नहीं जानता। मैं भी किसी को नहीं जानती। फिर भी न जाने क्यों, इस भीड़ में चलते हुए कभी अकेलापन महसूस नहीं हुआ। शायद इसलिए कि यहाँ लगभग हर दूसरा व्यक्ति कहीं न कहीं से आया हुआ है। उसने कभी न कभी अपना घर छोड़ा है। वह अपने साथ अपनी भाषा, अपना संगीत, अपनी स्मृतियाँ और अपना अतीत लेकर आया है।


और हर शाम टाइम्स स्क्वायर पर लगता है, जैसे पूरी दुनिया थोड़ी देर के लिए खुद से मिलने चली आई हो।


इन्हीं रौनकों में दिन हवा के झोंकें की तरह उड़ते जा रहे थे, जब आया फीफा विश्व कप का आख़िरी दिन, फाइनल—19 जुलाई।  


सुबह से ही न्यूयॉर्क जैसे किसी एक धड़कन पर चल रहा था। हम पूरा दिन मैनहैटन में थे। फ़ेरी पर, सड़कों पर, बसों में, सबवे की बोगियों में, जहाँ नज़र जाती, वहाँ अर्जेंटीना की नीली-सफ़ेद जर्सियाँ दिखाई देतीं। स्पेन की जर्सियाँ भी थीं, लेकिन बहुत कम। ऐसा लग रहा था जैसे आज इस शहर पर अर्जेंटीना का रंग कुछ ज़्यादा ही चढ़ गया हो।


शाम होते-होते टाइम्स स्क्वायर और उसके आसपास की गलियाँ छोटी-छोटी वॉच पार्टियों में बदल गई थीं। कहीं बड़ी स्क्रीन के सामने भीड़ जमा थी, कहीं लोग अपने-अपने फ़ोन पर मैच चलाकर गोल घेरा बनाकर बैठे थे।


हर चेहरे पर एक इंतज़ार था। एक भरोसा था कि आज कप अर्जेंटीना ही उठाएगा। उनकी बेचैनी, उनकी उम्मीदें, उनकी आँखों की चमक दूर से भी दिखाई दे रही थी। स्पेन के समर्थक अपेक्षाकृत शांत थे। 


फिर एक्स्ट्रा टाइम में स्पेन ने गोल कर दिया।


एक पल पहले तक जो टाइम्स स्क्वेयर शोर से भरा हुआ था, वहाँ अचानक ऐसी चुप्पी उतर आई कि लगा जैसे हज़ारों लोगों ने एक साथ साँस रोक ली हो। बस कहीं-कहीं स्पेन के समर्थकों की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं।


और जब अंतिम सीटी बजी, तो पता नहीं कहाँ से उन गिने-चुने स्पेनिश समर्थकों में इतनी जान आ गई। उनकी ख़ुशी पूरे टाइम्स स्क्वायर में फैल गई। दूसरी तरफ अर्जेंटीना के समर्थकों के चेहरे उतर गए थे। हार का दुख साफ़ दिखाई दे रहा था।


लेकिन बस थोड़ी देर के लिए।


फिर वही लोग एक-दूसरे के साथ तस्वीरें खिंचवा रहे थे, नाच रहे थे, गा रहे थे। हार उनकी थी, लेकिन उत्सव किसी एक टीम का नहीं था। धीरे-धीरे पूरा माहौल फिर से रंगों, संगीत और मुस्कुराहटों से भर गया।


शायद यही न्यूयॉर्क की सबसे खूबसूरत बात है। यहाँ लोग अपनी-अपनी पहचान लेकर आते हैं, लेकिन खुशी साझा कर लेते हैं। यहाँ जीत किसी एक देश की हो सकती है, पर जश्न पूरी दुनिया का हो जाता है।


खेल हमें जीतना, जितना नहीं सिखाता, हारना उससे कहीं ज़्यादा सिखाता है।


दुनिया के सबसे बड़े फुटबॉल आयोजन का फाइनल उन सड़कों पर खड़े होकर देखना, जहाँ दुनिया के न जाने कितने देशों के लोग एक साथ साँस ले रहे हों, यह सिर्फ़ एक मैच देखना नहीं था। यह मनुष्यता का जश्न देखने जैसा था।


जब मैं वापस लौटूँगी, लोग शायद पूछेंगे, न्यूयॉर्क कैसा लगा?


मैं यक़ीनन एम्पायर स्टेट बिल्डिंग की ऊँचाई नहीं बताऊँगी, जहाँ अभी पिछले दिनों ही दो प्रेमियों ने अपनी मोहब्बत का इज़हार किया और एक संदेश झंडे पर लहराया। और न ही टाइम्स स्क्वायर की रोशनियों की संख्या याद रख पाऊँगी। पर मैं चहक-चहक कर बताऊँगी कि मैंने एक ऐसा शहर देखा, जहाँ हज़ारों लोग एक ही सड़क पर थे, सैकड़ों भाषाएँ एक साथ बोली जा रही थीं, दर्जनों देशों के झंडे हवा में थे फिर भी किसी को किसी से डर नहीं था। कोई मारपीट नहीं, गाली-गलौच नहीं, छेड़खानी,भीड़ में गंदे तरीके से छू दिए जाने का डर, कुछ भी नहीं था। 


आप समझते हैं किसी भी स्त्री के लिए कितनी बड़ी बात है कि वह भरी हुई भीड़ में है पर उसे बिल्कुल एक प्रतिशत भी ऐसा डर नहीं कि उसे कोई गंदे ढंग से भीड़ का फायदा उठाकर छू जाएगा! 


शायद बहुत-से लोग इसे पढ़कर समझ भी न पाएँ कि मैं क्या कहना चाह रही हूँ। लेकिन लगभग हर स्त्री समझ जाएगी।


इस यात्रा से यदि मैं कोई एक स्मृति अपने साथ ले जा रही हूँ, तो वह किसी इमारत की नहीं है।

वह है हज़ारों अपरिचित लोगों की वह साझा मुस्कान, जिसने मुझे फिर से मनुष्य पर भरोसा करना सिखाया। महसूस कराया कि दुनिया अपनी सारी टूटन के बावजूद अब भी पूरी तरह बिखरी नहीं है।


शायद इसी विश्वास का नाम न्यूयॉर्क है।


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सुषमा गुप्ता सुपरिचित लेखिका हैं।


कहानी संग्रह : तुम्हारी पीठ पर लिखा मेरा नाम (2020), मन विचित्र बुद्धि चरित्र (2025)।


उपन्यास : क़ितराह (2022), तलब (2026)।


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वर्तमान में साहित्य आजतक के साथ विश्व साहित्य पर एक सीरीज़।


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ईमेल : 327suumi@gmail.com


1 Comment


Gunjan
a day ago

Bahut sundar chitrankan

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