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रवि राहगीर की कविता
माड़ की छोरियाँ
प्यार करने की तगड़ी सजा पाती हैं
कूटी जाती हैं
पीटी जाती हैं
उन्हें डाँट पिलाई जाती है :
“छोरी तू तो हमारा नाम डुबाकर छोड़ेगी
खानदान को कतई पैंदे में ले जाएगी।”


हर्षित मिश्र की कविताएँ
अक्टूबर जब जाता है,
तो वह केवल ऋतु नहीं ले जाता,
वह भावनाओं के तापमान को बदल जाता है।
धरती की नसों में,
पत्तों की धड़कनों में,
और मेरे भीतर, उस स्थान पर,
जहाँ तुम्हारा नाम अब भी
हल्की सिहरन बनकर धड़कता है।


हर्षित वर्मा की कविताएँ
सबसे भाग्यशाली थी वह दूब घास
जिसे ओस की बूँद ने ठहरने के लिए चुना था
जो दुछत्ती के ठीक कोने पर उग आई थी
जो मुँह उठाकर खुला आकाश देखती
और बदलते रंगों का हाल दुछत्ती को बताती थी


गौरव कुमार की कविताएँ
नाम लिखता हूँ तुम्हारा
काग़ज़ पर
बनाता हूँ हवाई जहाज़
और उड़ा देता हूँ उसे आसमान में
कुछ इस तरह निरंतर
मैं तुमसे दूरियों का अभ्यास करता हूँ।


गौरव अरण्य की कविताएँ
गणित इतना आसान भी नहीं
जितना दिखाई देता है
वह अक्सर
तपती धूप में
पड़े मोम की तरह
धीरे-धीरे पिघल जाता है


मोमिना रज़ा की कविताएँ
हमारे बीच एक ज़बान पैदा हुई थी,
ख़ामोशी और तड़प से
मगर मैं इसे अकेली ही बोलती हूँ




विशाल प्रभु की कविताएँ
चोलों की
सबसे बड़ी और
शानदार दुकान है
शहर,
जिसके तागों से
कभी रिहा ही
नहीं होता इन्सान


जतिन कुमार की कविताएँ
जब कभी चाय की दुकानें
अपनी जगह से हट जाएंगी
उधर बैठकी लगाते लोग भी
अपनी जगह से हट जाएंगे
वहाँ नहीं दिखेंगे, तो वे कहाँ जाएंगे?
कभी किसी ने सोचा है?


विधान गुंजन की कविताएँ
कुम्हार का घर चलाने में
उन पत्थरों का भी योगदान रहा,
जिनकी वजह से
अक्सर फूट जाया करते थे
मटके


हर्षवर्धन सिंह की कविताएँ
माया!
मुक्त जटिल कुंतल जाल, कंपित!
दुर्बोध—महामाया का भैरवी नृत्य
झम झमा झम झम.




हिमांशु विश्वकर्मा की कविताएँ
जान हथेलियों पर रख
पहाड़ पर अगर
बन्दूक़ से
भालू मार गिराना है
तो ढलान की तरफ़
भागना होगा


आदित्य चंद्रा की कविताएँ
कुछ दिन तक रहा दरख़्त
धीरे-धीरे शाम ढली
और होती गई वृद्ध
कलरव के इंतज़ार में लद गयी कई शामें,
दरख़्त की चीखों से


जनमेजय की कविताएँ
मेरे जन्म से पूर्व
ब्रह्माण्ड एक बिन्दु भर था
और बचपन में ही
गणित की पुस्तक में
मैंने पढ़ लिया था :
एक बिन्दु से अनंत रेखाएं गुज़र सकती हैं


शिवांगी पांडेय की कविताएँ
मकान यूँ ही गिरता रहा
मेरे अंग यूँ ही छिलते रहे
और मैं रक्त से पोस्त के बीज चुनकर
कराहती हुई
उन्हें अपने बग़ीचे में बोती रही


खेमकरण ‘सोमन’ की कविताएँ
हमेशा होश में लिख
कदम बढ़ाकर जोश में लिख
आँखों में आँखें डालकर लिख
ख़ुद को थोड़ा उबालकर लिख


हिमांशु जमदग्नि की कविताएँ
यहाँ हर रात काल गश्त लगाता है
खा जाता है उन सृपों के सर
जो कोतवाल के ख़िलाफ़ जाने वाले थे


सुधीर डोंगरे की कविताएँ
आज अचानक उसे स्मृत हो आयी स्नानागार की वह दीवार जहाँ वह रखकर भूल आयी थी अपने कुंवारेपन का झीना लिबास।


सुमन शेखर की कविताएँ
बहुत आसानी से गुम हो जाती है हँसी
हवा मे डूब जाती है कोई चीख
हमारी देह क़ब्र का स्पर्श लिए फिरती रहती है
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