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ख़्वाब के मज़बूत पंख (विश्व सिनेमा)
कला आने वाली नस्लों को मनोरंजन के साथ-साथ तमाचे और प्यार के निशान सौंपती है।


काफ़्का को यहूदी पहचान से आगे पढ़ने की कोशिश
पीएत्रो चिताती की काफ़्का मेरे लिए एक जीवनी से कहीं अधिक है। यह किताब काफ़्का की यहूदी पहचान का निषेध नहीं करती, बल्कि उसे अपनी व्याख्या का केंद्र भी नहीं बनाती। वह काफ़्का को सबसे पहले एक रचनाकार की तरह पढ़ती है—ऐसे रचनाकार की तरह, जिसकी कल्पना अपने समय, अपने समाज और अपनी सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण करके मनुष्य की सार्वभौमिक नियति को छूती है।


काफ़्का की कहानी ‘बांबी’ का अंतर्पाठ
दुर्ग गोदाम में राशन संग्रहण से वह किसी भी संभावित घेराबंदी से महीनों निश्चिन्त रह सकता है पर अपनी सुरक्षा को लेकर उसकी हालत ‘ईमां मुझे रोके है तो खेंचे है मुझे कुफ़्र’ वाली ही बनी रहती है।


ताकि स्मृति बची रहे (मंगलेश डबराल की कविता)
जो भी दिल्ली पहुँचता है, यह महानगर उसे बदल लेता है। कभी-कभी तो इस परिवर्तन का पता तक हमें नहीं लग पाता है। दिल्ली के जादू से विरले ही बच पाते हैं। मंगलेश इसके अपवाद नहीं थे।


शिम्बोर्स्का की कविता में मृत्यु का पैरहन
शिम्बोर्स्का कविताओं में मृत्यु पर प्रयोग करती हैं। वे इससे सम्बद्ध विडम्बनाओं को दिखाकर इसे विभिन्न कोणों से देखती-परखती हैं। वे मरने वाले के प्रति पर्याप्त करुणा बरतकर भी मृत्यु को वस्तुपरक नज़रिये से देखना चाहती हैं।


गैब्रियल मात्ज़नेफ़ : साहित्य का अपराध और वनेसा स्प्रिंगोरा का प्रतिरोध
प्रश्न यह है कि जब कोई लेखक खुले तौर पर बच्चों के साथ यौन संबंधों को महिमा के साथ प्रस्तुत करता है — और जब समाज उसे पुरस्कार, पेंशन और मंच देता है — तो क्या वह केवल लेखक रह जाता है? या फिर वह एक अपराधी बनकर भी समाज के विवेक की परीक्षा लेता है?


ली मिन-युंग का काव्य-संसार
यदि अनुवाद की सुविधा न होती तो संसार कितना निर्धन लगता! वह अनुवाद ही है जिसने भूमण्डलीकृत विश्व ग्राम के समानांतर एक सांस्कृतिक विश्वग्राम की रचना की है। भाषा और साहित्य का एक वैश्विक परिवार निर्मित किया है।


हिन्दी साहित्य में विकलांग विमर्श
समाज में और स्वयं में विमर्श की भाषा का विकास करना होगा तभी हम सही मायने में विकलांग-विमर्श में सक्षम हो पाएंगे।
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