विनीता बाड़मेरा की डायरी
- 2 days ago
- 14 min read

विनीता बाड़मेरा की डायरी
3 दिसम्बर 2024
साल का आख़िरी महीना भी आख़िर आ ही गया। साल के शुरू में कितनी ही योजनाएँ बनती रहीं, हालांकि शुरुआत में उन योजनाओं कर काम भी करती, फिर पता नहीं बीच में कैसे काम रुक जाता। दिमाग जिद्दी नहीं हो पाता। अब तो कुछ भी योजनाएँ बनानी ज़रूरी नहीं लगती। जो हो जाए, वह ठीक है। न हो पाए तो भी मलाल नहीं।
यह साल भी नया होते-होते पुराना हो ही गया। ऐसे कितने ही नए साल आए और गए। चौथी या पांचवीं में थी तब से नया साल कुछ-कुछ समझ आता था इसलिए यदि देखूं तो कितने ही नये साल तो देखे ही हैं।
उम्र धीरे-धीरे बीत ही रही है, जैसे-जैसे दिन, सप्ताह, महीने और साल बीतते चले जा रहे हैं, वैसे-वैसे लगता है कि मुझे मेरा बचपन और दादा-दादी याद आते हैं। मुझे याद है कि मेरे दादाजी जिन्हें हम 'बा’ बोलते थे, वे जब बूढ़े होने लगे और अपना काम करना भी उनके लिए मुश्किल होता गया तो दो जन मिलकर उन्हें कमरे की बालकनी में कुर्सी लगा कर बिठा देते थे। उस बालकनी में बैठे उनका मन लग जाता था। टाइम पास हो जाता था। कभी-कभी वे सड़क से गुजरते आइसक्रीम वाले को देख मुझे इशारा कर एक कुल्फी, एक चॉकलेट लेकर आने के लिए जैसे गुजारिश करते थे। मैं उस समय सोचती थी, "बच्चे के मानिद कुल्फी के लिए कैसा बेचारगी वाला चेहरा बना रहे हैं!" अब इस उम्र में धीरे-धीरे उनकी बेचारगी और लाचारी के मायने समझ आने लगे हैं। उनके हाथों में पकड़ा चाय का हिलते कप का मतलब जान पा रही हूँ।
छोटी थी तो लगता था कि हम बूढ़े थोड़े ना होंगे। लेकिन बुढ़ापे से कौन बचा रह सकता है। हमारे दादा-दादी जो बूढ़े थे, कभी वे जवान रहे थे। उनके हमारे जैसे शौक नहीं थे लेकिन वे बताते थे कि उन्हें फिल्म देखने का शौक था। रात का शो देखने बाईजी और बा जाते थे। वे जो कभी ठसक के साथ रहते थे, फिर लाचार होने लगे। एक रोज़ उनके शरीर ने साथ देना बंद कर दिया। अब बस हमें तस्वीरों में ही दिखते हैं। इन दिनों मम्मी और सासू माँ को देखती हूँ तो लगता है कि ये भी धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं। शरीर से भी और मन से भी।
सब कहते हैं, जीवन बहुत बड़ा है पर मुझे तो लगता है कि जीवन बहुत छोटा है। कल तक स्कूल में थे। फिर कॉलेज और फिर शादियां। फिर बच्चे और उनकी स्कूल। धीरे-धीरे नई जिम्मेदारियाँ। आधी से अधिक जिंदगी खत्म हो रही है। कितनी बची नहीं पता! लेकिन इतना पता है कि जितना जी सकी, उतना तो नहीं जी सकूंगी। जितनी जिंदगी बची है, उसमें जो नहीं कर पाई, वो कर लूँ, यही ख्वाहिश है। हर दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है। रात बीत रही है। जनवरी शुरू होती है और बारह महीने बीतते ही दिसंबर आ जाता है। एक साल पूरा खत्म हो जाता है। मन में रह जाती है कसक, बहुत कुछ छूटने की, बीतने की, रीतने की—न चाहते हुए भी।
1 फरवरी 2025
आज सुबह से याद आ रही है मेरी सहेली वीना सोनी की, जो कहती थी “जाने लोग आत्महत्या कैसे कर लेते हैं?" उसी वीना ने फांसी लगा ली थी। बिना जिंदगी जिए, खत्म कर दिया सब कुछ। उम्र ही क्या थी उसकी! 20 साल। उसके पापा उसकी शादी बहुत धूमधाम से करना चाहते थे लेकिन उसने तो..! जिंदगी तो वैसे भी छोटी है फिर ईश्वर ने जब जन्म होना खुद के हाथ में रखा तो मृत्यु भी उसी के हाथ में रहने देते। जीकर ही देख लेते कि जिंदगी कैसी थी!
वीना के अलावा और भी मेरे बहुत करीबी लोगों ने जिंदगी से अधिक मौत को तवज्जो दी। एक ही झटके में सब कुछ खत्म हो गया। ऐसा नहीं है कि जिंदगी की तकलीफ झेल बहुत लोगों का मन नहीं होता है, खुद को खत्म करने का। लेकिन कुछ लोग उस कठिन पल को टाल देते हैं और कुछ नहीं टाल पाते। जो इस तरह चले गए, शायद उन्हें कोई समझ नहीं पाया या उनकी बात किसी ने ठीक ढंग से सुनी नहीं। सुनने का धैर्य भी किस के पास है?
एक दूर की जेठानी का बेटा मुझसे मैसेज पर कभी-कभार बात करता। मैं उससे अधिक बात नहीं कर पाती। इसका कारण उसका शराब पीना भी था। पता नहीं क्यों पर ‘हाँ-हूँ’ कह जल्दी ही बात बंद कर देती। एक रोज वह लड़का भी फांसी पर लटक गया। मुझे खुद पर कई दिनों तक गुस्सा आता रहा। लगा जैसे उसके चले जाने के पीछे एक कारण मैं भी थी। हालांकि वह ‘काकीसा’ कह कर बात करता। कभी कुछ गलत नहीं कहा। पर मैं क्यों उससे बात करने से कतराती थी, यह ग्लानि मेरा पीछा नहीं छोड़ती।
पता नहीं मैं भी क्या-कुछ सोचने लग रही हूँ। इस तरह की बातों में ही मन उलझा रहा तो नींद नहीं आएगी।
18 अप्रेल 2025
आज सुबह वंदे भारत से दिल्ली जा रही हूँ। ट्रेन सुबह 6:10 की है, जल्दी पहुंचा देगी, लगभग 11:30 तक। इस ट्रेन में पहली बार बैठी हूँ, इसलिए खुश हूँ। बच्चे तो कई बार बैठे हैं इस ट्रेन में। बैठी तो मैं प्लेन में भी नहीं हूँ। प्लेन में न बैठने का कोई दुख नहीं है। लेकिन बैठने की ख्वाहिश ज़रुर है। खैर इस ट्रेन में चाय नाश्ता और खाना भी फ्री में मिलेगा। देखते है कैसा है नाश्ता, खाना।
बिना पढ़े रह नहीं सकती। इसलिए बहुत दिनों बाद निर्मल जी को साथ लाई। 'अंतिम अरण्य' है मेरे हाथ में। यह किताब मैंने चार वर्ष पहले भी पढ़ी। गोपाल दादा ने दी थी इस हिदायत के साथ कि इसे संभाल कर रखना। मुझे उन दिनों यह किताब समझ ही नहीं आई। शायद मैं इसे पढ़ने के योग्य नहीं थी। इस बार मैंने इसे कानोता ‘हिन्दी कथा-कहन’ में लगी बुक स्टॉल से खरीदा था।
जब निर्मल जी को पढ़ती हूँ और कभी जयशंकर जी को तो लगता है कितना गहरा लिखा हैं उन्होंने। मैं तो ऐसा लिखने का सोच भी नहीं सकती। साहित्य भी तो साधना है, हर कोई यह साधना कर सके, संभव नहीं। लिखने के लिए पढ़ना ज्यादा जरूरी है यह समझ में देरी से आया। खैर देर आए, दुरस्त आए।
निर्मल जी ने इस किताब के पेज नंबर 20 पर लिखा है कि "मृत्यु कोई समस्या नहीं है, अगर तुमने अपनी जिंदगी शुरू न की हो। लगता है, तुम कितनी आसानी से वहाँ लौट सकते हो, जहाँ से तुम आए हो। तुमने देखा होगा, जितनी आसानी से युवा लोग आत्महत्या कर लेते हैं, बूढ़े लोग नहीं..... वे जीने के इतने अभ्यस्त हो चुके होते हैं कि उससे बाहर निकलना दूभर जान पड़ता। "
समझ रही हूँ कि सबकी दुनिया में कुछ न कुछ ऐसा होता ही है जिसे तकलीफ कहा जा सकता है। कुछ कह देते हैं। कुछ सह लेते हैं। और कुछ दोनों नहीं करते तो अलग रास्ता अपना लेते हैं।
खैर इसी किताब में यह भी लिखा है- “विश्वास तभी होता है जब कोई अपने बारे में बताता है(और तब भी पूरा नहीं)।”
मैं इस लाइन को चार बार पढ़ चुकी हूँ। वाकई अद्भुत सत्य है यह। निर्मल जी बहुत बारीक सी बात को अलग अंदाज में कह देते हैं। सोच रही हूँ, दिल्ली से लौट कर इस किताब के बारे में लिखूँ।
दिल्ली में अनुराग अन्वेषी जी ने 'डी एन ए हिन्दी’ पर अपने पॉडकास्ट ‘वुमन की बात’ श्रृंखला में साक्षात्कार के लिए बुलाया है। हालांकि मैं जानती हूँ कि मैं इतनी बड़ी शख्सियत नहीं हूँ। क्या कहूंगी अपने बारे में! खैर, मना नहीं कर सकी। पर डर तो लग ही रहा है फिर पहले कभी ऐसा अनुभव हुआ नहीं। अब ओखली में सिर दे ही दिया है तो मूसल से क्या डरना। लेकिन डर...!
25 मई 2025
कभी-कभी मन ही नहीं होता, किसी से बात करने का। फ़ोन बजता रहता है और मैं अवाक होकर उसे देखती रहती हूँ। फिर खुद से पूछती हूँ— क्या यह मेरे लिए ही है या यह जिसने किया उसने खुद के लिए लगाया है। क्या यह अपने हाल-चाल बताने के लिए किया गया फ़ोन कॉल है या यह मेरे हाल-चाल जानने, सुनने के लिए है। और यदि अपनी पीड़ा कहने के लिए फ़ोन है तो क्या मैं उस तरह सुन पाऊंगी जैसे मैं किसी को बताते हुए सोचती हूँ कि अमुक व्यक्ति मुझे सुन रहा है। मैं 'हाँ-हूँ’ कहूंगी तो! और यदि मेरी पीड़ा सुनते उसने 'हाँ-हूँ' कहा तो ग्लानि का घड़ा भर जाएगा। फिर एक नया दुःख होगा जो उस दुःख से बड़ा होगा। यह सोचकर फ़ोन को बजते रहने देती हूँ। आख़िर थक कर फ़ोन बजना बंद हो जाता है और मैं बंद फोन को बस टुकुर-टुकुर देखती रहती हूँ।
आज दिन में दो-तीन दफ़ा ऐसा हुआ। दो दिन पहले सत्यनारायण जी का माधव राठौड़ द्वारा लिया साक्षात्कार देख रही थी तो वे भी कह रहे थे, "कोई ऐसा दुःख है जिसे मैं बताना चाहता हूँ और जिस व्यक्ति को बताना चाहता हूँ, उसकी तलाश है। "
मैं सोचती हूँ, हम सब के अजीब दुःख हैं और यही विडंबना है कि हमारी तलाश खत्म नहीं होती। मैं एक बार उनकी किताब 'दुःख किस कांधे' पर उठा लेती हूँ लेकिन मुझे लगता है उसका भार भी मेरे हाथ नहीं उठा पा रहे हैं और मन तो पहले से थक गया ही था। बिस्तर के सिरहाने किताब रख मैं देख रही हूँ, छत की ओर। नींद भी कमबख्त, न जाने क्यों दुश्मनी निभाने लगी है। सोचती हूँ, इस नींद से थोड़ा मिलाप रखूं, नहीं तो यह शत्रुता मुझे ही भारी पड़ेगी। पर जबरन किससे मिलाप रखा जाता है? जो एक बार साथ छोड़कर चले जाते हैं क्या वे लौटते हैं? और जो लौटते हैं तो क्या पहले की तरह ही? पता नहीं।
17 जुलाई 2025
यह उम्र का कौन-सा पड़ाव है जब सुंदर-असुंदर का भेद खत्म हो गया है। किसी की खूबसूरती मन को नहीं मोहती और किसी की बदसूरती देख कंठ से उफ का कोई शब्द नहीं फूटता। न सुख का कोई पल उल्लास देता है और न दुःख में जार-जार होकर रोने को जी चाहता है। न किसी को खास जानने की इच्छा पनपती है और न, न जानने का कोई रंज ही रहता है। न किसी को प्रभावित करने का मन होता है न किसी से जल्द प्रभावित होती हूँ।
पहले कभी सासू माँ को देखती थी तो सोचती कि कैसी है यह औरत! खुशी की बात पर बहुत अधिक खुश नहीं होतीं और न कभी इनको रोते देखा, चाहे कितना ही बड़ा दुख हो। मुझे विस्मय होता कि ऐसे लोग भी होते हैं लेकिन अब लग रहा है जिंदगी जीते-जीते, वक्त के थपेड़े खाते-खाते लोगों में इस तरह का ठहराव आ जाता है। मन शांत हो जाता है। किसी को अधिक कहने की आदत छूटती जाती है। चुप रहना ज्यादा अच्छा लगता है।
इन दिनों मेरे साथ भी ऐसा ही हो रहा है। क्या मैं परिपक्व हो रही हूँ? अब किसी के साथ से अधिक मुझे किताबें पसंद हैं। बस मैं और मेरा कोना।
2 सितम्बर 2025
मेहमान चले गए। घर पूरा अस्त-व्यस्त है। अगस्त में बाड़मेरा जी का रिटायरमेंट था। जोधपुर से मायके वाले भी आए थे। कितने दिनों बाद घर भरा-भरा लगा। सुख सबके साथ बाँटना आनंद देता है और दुख बाँटना शायद दुख ही देता है।
अब जब सब चले गए तो थोड़ी थकान के साथ बैठी सोच रही हूँ कि बाडमेरा जी कि इतने सालों की नौकरी के साथ एक रुटीन था। मेल-मुलाकाते थीं। अब उन्हें कुछ दिन अजीब तो लगेगा ही। कहीं जाने की हड़बड़ाहट नहीं होगी। हर काम तसल्ली से करेगें। जानती हूँ, ऑफिस को नहीं भूल सकेगें। पर क्या ऑफिस वाले उन्हें उसी तरह याद करेंगे भी! सच तो यह है, सब कुर्सी के कारण है। व्यक्ति जब तक साथ है, तब तक ही लोग स्नेह दिखाते हैं। इस जमाने में "मुँह देखी प्रीत है।"
आज सुबह जल्दी शेव करने लगे तो मैंने छेड़ दिया, "अब, इतनी जल्दी कहाँ जाना है?" वे मुस्कुराए। जानती हूँ उनकी आदत, चुप रहेंगे। मैंने फिर कुछ नहीं कहा।
याद हैं मुझे वे दिन जब मैंने स्कूल छोड़ी थी। शुरु-शुरु में तो बहुत तकलीफ हुई। स्कूल और बच्चो में जिंदगी इस तरह घुली थी कि उससे बाहर कुछ भी नहीं सुहाता था।
खैर बाडमेरा जी भी धीरे-धीरे समझ जाएंगे कि आखिर मोह-मोह के धागे टूट ही जाते हैं। वैसे भी वह मेरी तरह इतने भावुक आदमी हैं भी नहीं। अच्छा है। व्यवहारिक होना ही जीवन में सबसे जरूरी है।
रिटायरमेंट का कार्यक्रम खूब अच्छी तरह सम्पन्न हुआ। बस बेटा नहीं आ सका। मर्चेंट नेवी की नौकरी ही ऐसी है। मन नहीं करता उसके बिना कुछ भी खास आयोजन घर में करने का। पर कितना कुछ होता है जो इस मन के न करने पर भी करना होता है। जानती हूँ वह भी तो बेचैन होगा पर किससे कहे। यहाँ तो हम सब है लेकिन वह तो...। जीवन ऐसा ही है।
7 जनवरी 2026
कितने ही धोखे मिलने के बाद मन कहता है कि भरोसे के लायक नहीं है यह दुनिया। पर जाने कैसे, कोई, किसी वक्त आता है और कहता है,”कौन है, जिसे किसी रोज ऐसा नहीं लगा होगा किन्तु फिर भी दुनिया में अविश्वास से पहले विश्वास शब्द बना। भरोसे ने लोगो को इस दुनिया से प्रेम करना सिखाया होगा।”
आज की ही बात है। सर्दियों के छोटे दिन शाम से पहले रात आने का समय था कि वे आए। उम्र लगभग सत्तर के आस-पास। बाल सफेद। चाल धीमी। किसी से पूछते-पूछते मेरी दुकान तक पहुँचे।
“कोणार्क?”
“जी हाँ। ”
“आप?”
“मैं उसकी मम्मी। ”
“उसे बुलाइए। ”
“वह तो कहीं गया है। ”
“कब तक लौटेगा?”
जानती थी कि मेरे चेहरे पर घबराहट के भाव साफ दिखाई दे रहे होंगे। फिर ऐसी पूछताछ! दो चेहरे कभी पहले भी रखना नहीं आया तो अब आता कैसे? इसलिए घबराहट कैसे न नजर आती!
“क्या हुआ सर? मुझे बता दीजिए।” मै लगभग हकलाते हुए बोल पड़ी।
“उसका बटुआ है उसके पास? जरा फोन लगा कर पूछिए। ”
तत्काल बेटे को फोन लगाया।
“कहाँ है?”
“मार्केट। ”
“कब तक आएगा?”
“ क्यों, क्या हुआ?”
“तेरा बटुआ?”
“कहीं गिर गया है।” अब उसकी आवाज थोड़ी धीमी थी।
“लेकिन आपने बटुए के बारे में क्यों पूछा? बताओ।” वह कुछ और भी पूछता, उससे पहले ही मैने कॉल कट कर दी।
“ये लीजिए।” कहते के साथ उन्होंने बेटे का बटुआ मुझे पकड़ाया।
मैंने बटुआ पकड़ते हुए उनकी तरफ कृतज्ञता से देखा।
“चेक कर लीजिए।”
मैंने बटुआ चेक किया। बेटे के सारे जरूरी डाॅक्यूमेंट उसमे थे। आधार कार्ड, पेन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और भी कई जरूरी कागज। साथ ही दो दजार रुपए।
“बेटे को फोन लगा कर पूछिए कितने रूपए थे?”
मैंने दुबारा फोन लगाया।
“ सुन, बटुए में कितने रूपए थे?”
“यही कोई दो हजार रुपए। “
“हुआ क्या? बटुआ मिल गया क्या?”
“हाँ। बाद में बात करती हूँ।” इतना कह फिर कॉल कट कर दी।
“मैं बैंक में था। आपका बेटा भी बैंक में था। दोनों बैंक से साथ निकले। और मैंने देखा कि उसका बटुआ सड़क पर गिरा था। मैं आवाज लगाता, तब तक यह नई पीढ़ी बहुत तेजी से स्कूटर भगा कर चली गई। बटुआ खोला तो आधार कार्ड में उसका नाम और एड्रेस देख यहाँ तक पहुँचा।” एक सांस में सारा घटनाक्रम सुना बैठे।
मै उनको एक बार फिर कृतज्ञता से देख रही थी।
“आपका नाम?”
“नाम का क्या करना? बटुआ आपको मिल गया ना! अब मै जाऊंगा। पत्नी इंतजार कर रही होगी।”
मैं कुछ और कहती, तब तक वे अपना स्कूटर स्टार्ट कर चुके थे। मैने अभिवादन में सिर झुकाया। उन्होनें भी गर्दन हिलाई।
छुट्टियों पर आए बेटे को अपनी नौकरी पर लौटना था। अगर ये जरूरी कागज नहीं मिलते तो कितनी परेशानी उठानी पड़ सकती थी। मेरा दिल फिर घबराया।
मन ने कहा, "जीवन में ऐसे लोग भी है जो किसी की इस तरह मदद कर सकते हैं। ईश्वर कहीं तो हैं और वह दुनिया पर भरोसा रखने के लिए ऐसे लोगों से समय-समय पर मिलाता भी है इसलिए निराश होने की जरूरत नहीं है।"
"पर कुछ लोग...!" आधा-अधूरा वाक्य मैने फिर कहा।
"दुनिया में सामानों की तरह आदमियों की भी कितनी ही किस्में होती हैं। उन किस्मों में से दस जने विश्वास तोड़ दें लेकिन दो जन भी ऐसे मिल जाएं तो यकीन शब्द का अर्थ समझना कठिन नहीं लगता।" इस विचार से धीर बंधा।
“सुन, घर आ जल्दी।” बेटे को फिर फोन लगा कर कहा।
वह घर आया। मैने उसको कुछ देर गुस्से से देखा। थोड़ी देर तक वह अनमना बैठा रहा। मेरी चुप्पी से नाराजगी झलक रही थी। उसने गर्म कॉफी का मग सामने रख मना लिया। मैंने कॉफी का घूंट लेते हुए उसके सामने बटुआ रखा और शुरु से अंत तक घटना की जानकारी दी।
बटुआ उठा वह बोला, "कम होते हैं ऐसे लोग। अंकल चाहते तो दो हजार रख सकते थे। पर नहीं रखे। आप उनका नंबर दो, मैं उन्हें थैंक्यू तो कहूँ। "
मेरे पास फोन नंबर कहाँ था?
16 फरवरी 2026
दिन गुजर जाता है कुछ खास किए बगैर भी। फिर रोज कुछ खास हो, यह जरूरी भी तो नहीं। रोज की माफिक एक और बेखास दिन बीत गया। इसी कल के बेखास दिन के बाद ही बेखास रात भी आई। इन दिनों रात को फिल्म देखने का चस्का लगा है। कल रात भी नेटफिलक्स पर एक फिल्म देखी। फिल्म यूँ सोचे तो कोई खास नहीं थी परन्तु फिल्म के नाम ने मुझे आकर्षित किया। अंग्रेजी फिल्म थी- 'लॉस्ट डॉटर'। सबटाइटल्स हिन्दी में थे, इसलिए देखना संभव हो सका। फिल्म बहुत धीमी, अधिक आवाजों के बगैर, चुप्पियों की भाषा कहती हुई थी।
नायिका प्रधान इस फिल्म में नायिका किसी कॉलेज में प्रोफेसर है। जिसकी उम्र लगभग अड़तालीस वर्ष है। वह अकेले ही छुट्टियाँ बिताने किसी दूसरे शहर आती है। उस शहर के समुद्र के किनारे ही एक अन्य परिवार भी अपनी छुट्टियों का मजा लेने आता है। प्रोफेसर महिला उस परिवार की एक युवती और उसकी सात-आठ साल की बच्ची की गतिविधियाँ बहुत ध्यान से देखती है। वह महसूस करती है कि किस तरह उस युवती का जीवन बच्ची के जन्म के बाद बदला होगा। इन गतिविधियों को देखने के दौरान ही उसे अपनी दो बच्चियों के साथ बिताया वक्त याद आता है। साथ ही याद आता है वह समय भी जब अपने बच्चों की देखभाल करने के दौरान वह अपना काम, अपनी इच्छाएँ, अपनी खुशी सब कुछ भूल जाती थी। भूल जाती थी खुद के लिए जीना भी। उसका जीना जैसे उसका नहीं होता और इसी कारण वह कई बार अपनी छोटी बच्चियों से दूर जाने की हर संभव कोशिश करने लगी ताकि वह अपना जीवन जी सके। वह जीवन जिस पर केवल और केवल उसका अधिकार था।
वह गौर करती है कि दूसरी युवती जो परिवार के साथ छुट्टियाँ मनाने भले आई थी, किन्तु वह खुश दिखाई नहीं देती है। उस युवती की मनोदशा अजीब है। देखने पर कहीं कोई दुख नहीं पर जैसे कोई सुख हाथ से छूटता चला जा रहा है।
मैं पैरवी नहीं कर रही हूं कि माँ को उसकी संतान की परवरिश करते या उसकी देखभाल करते हुए दुखी होना चाहिए और खुद को खुश न रखने के लिए ग्लानि का भाव मन में रखना चाहिए। किन्तु फिर भी कुछ तो ऐसा होता है जिसके लिए वह सामान्य नहीं हो पाती है।
देश कोई भी हो, बच्चे पालने का मुख्य दायित्व स्त्री का ही होता है। यह दायित्व उसे किसने और कब दिया, यह आज तक नहीं पता चला। जानती हूँ, बच्चों से माँ का संबंध गर्भनाल से जुड़ा होता है इसलिए बच्चा माँ के अधिक करीब होता है। जरा-सी चोट लगे तो वह माँ को ही सबसे पहले आवाज लगाता है। और माँ भी उसकी आवाज सबसे पहले सुनती है। मैं खुद दो बच्चों की माँ हूँ। उनको पालते हुए हमेशा कोशिश की कि अपने दायित्व से मुँह नहीं मोड़ूं।
किन्तु सच तो यह भी है कि कई बार ऐसा हुआ जब ढंग से फ्रेश तक नहीं हुई। बाल नहीं बने। खाना खाने बैठी तो बच्चे ने पॉटी के लिए आवाज लगाई। बच्चों की शैतानियों के कारण दूसरों के सामने शर्मिंदा भी हुई। रात भर सोई नहीं। पर मैं कोई अनोखी माँ नहीं थी। हर कोई करता है। मेरी माँ ने भी ऐसा किया और मेरी बेटी भी आने वाले समय में ये सब जिम्मेदारियाँ निभाएगी। हालांकि आज के वक्त में भले संयुक्त परिवार नहीं हैं लेकिन नैनी का विकल्प है। क्रेश खुले हैं। पैसा फेंक कर बहुत परेशानियों से निजात पाई जा सकती है किन्तु फिर भी क्या एक ही जिम्मेदारी को निभाते-निभाते उकताहट नहीं आ जाती है? कभी खुद को समय न दे पाने के कारण जीवन नीरस नहीं लगने लगता है? दूसरी तरफ यह मातृत्व का सुख सबसे बड़ा सुख है। वे दंपत्ति जिन्हें किसी कारण से यह सुख नहीं मिल पाया, उनका दु:ख वे ही जानते हैं।
खैर इस फिल्म की नायिका परिवर्तन की चाह और खुद के लिए जीने या कुछ वक्त खुद को देने के लिए अपने ही छोटे बच्चों से दूर जाने का मन बनाती हैं। कहीं पढ़ा था कि सही और गलत कुछ नहीं होता है। यह जिंदगी है और यहाँ आदमी के मन की कौन जानता है!
अड़तालीस वर्षीय यह अधेड़ स्त्री अपने अतीत को याद करती है। उसे अपनी छोटी बच्चियों को बीच-बीच में छोड़कर जाने का थोड़ा दुख है लेकिन कहीं भीतर ही भीतर वह खुश है कि उसने अपनी जिंदगी भी जी।
सही-गलत का फैसला नहीं कर सिर्फ यह कहूँ कि माँ बन जिम्मेदारियाँ उठाना आसान नहीं है। बच्चों को जन्म माँ ने दिया है। उसकी परवरिश करना माँ-बाप दोनों का दायित्व है। फिर भी कुछ वक्त खुद के लिए जीने की चाह में कितना कुछ ऐसा हो जाता है जिसे हम साधारण भाषा में स्वार्थी होना भी कह सकते हैं। लेकिन ऐसा होता है और इसलिए ही ये सच्ची कहानियाँ लिखी जाती हैं। फिल्में इन कहानियों पर बनती हैं। वैसे भी विदेशों में मानवीय संबंधों की जटिलता पर बहुत साहित्य रचा गया है। मुझे निर्मल वर्मा की लिखी कहानी 'छुट्टियों के बाद' याद आ रही है। उसमे भी सही-गलत कुछ नही है बस जीवन का एक ऐसा ही अनुभव लिखा गया है और इस 'लॉस्ट डॉटर में भी एक ऐसा ही किस्सा है, जहाँ अपनी खुशी माँ के दायित्वों पर भारी है। फिर भी माँ होने का अहसास सबसे अलग अहसास है। पर यह भी सच है कि इस फिल्म ने कल रात मेरी आँखों की नींद चुरा ली।

कवि-कथाकार विनीता बाडमेरा का एक कहानी संग्रह ‘एक बार आख़िरी बार' (2023) राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से प्रकाशित है। ईमेल : vbadmera4@gmail.com
%20(3).png)


विनीता ने डायरी विधा में अपनी कहानियों के तरीके को अजमाया है। बहुत ही सुंदर और रोचक प्रयोग किया है। वे मन को उड़ेल रही हैं। ठीक निर्मल वर्मा के पात्रों की तरह। यह हमें जीवन के दुख और सुख दोनों को बराबर नजर से देखने का तजुर्बा देती है। बहुत सुकून देनी वाला लेखन।
विनीता लगन से लिख रही है। यह कम है क्या!
स्मृतियों और घटनाओं को अपनी प्रबल/मार्मिक अनुभति के साथ बहुत ही स्वाभाविक रूप डायरी में व्यक्त किया हैं विनीता जी ने।
विनीता वाडमेरा जी की कुछ कहानियाँ पढ़ी हैं। दुनिया को देखने- समझने की उनकी कथाकार दृष्टि में कुछ ऐसा है कि वे मुझे भारतीय निम्न मध्य वर्ग के जीवन को दिखाने वाली प्रामाणिक कहानीकार लगती हैं।
आज गोल चक्कर पर उनकी डायरी पढ़कर उतना ही सुख मिला। कितना तरल गद्य लिखती हैं वे!
आदरणीया मिसेज़ बाड़मेरा जी,
किसने चुरा ली आँखों की नींद पढ़ते हुए विशेष रूप से 2 सितंबर 2025 वाली डायरी मन में उतर गई। कोणार्क वाली डायरी भी बहुत अच्छी लगी। उसमें आपने पाठक के लिए अपने ढंग से सोचने और अर्थ खोजने का पर्याप्त वैचारिक स्पेस छोड़ा है। आपकी डायरियाँ क्रमशः और अधिक परिपक्व तथा प्रभावशाली होती हुई दिखाई देती हैं।
आपको इस सुंदर लेखन के लिए हार्दिक बधाई और ढेरों शुभकामनाएँ। 🫰