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निर्वाण

  • 3 days ago
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निर्वाण
कहानी : विजयश्री तनवीर

"एक दिन तुम इस दुनिया से पूरी तरह ऊब जाओगी। उस दिन तुम्हें किसी को विदा कहते कोई शोक न होगा।"


कई साल पहले वह जून महीने की एक बेहद ठंडी शाम थी। जब सर्दसेर पहाड़ की बुलंदी पर बैठे एक कनफटे गोरे योगी ने मेरे अहमकाना तर्कों से उकताकर मुझे यह बद्दुआ दी थी। वह मनहूस दिन मेरे जीवन में बहुत जल्द आ गया था और उस एक दिन के बाद ऋत और अनृत के बीच झूलते हुए मैंने उसे लगभग रोज़ ही याद किया था। जब-तब मेरे भीतर उसके तम्बूरे की तान वीतराग-सी बज उठती है। 


इस वक़्त भी बेख़याली में शायद उसी का ख़याल बंधा था। जिसे मैं रेल के बाहर तेज़ी से भागते दृश्यों के रेले में बहकाने का जतन कर रही थी। रेल एक घण्टा छत्तीस मिनट देरी से चल रही थी। बदीह काँच के परे आसमान किरमिज़ी हो रहा था। यह शाम की चाय का वक़्त था। नीचे पड़े चाय के ख़ाली काग़ज़ी प्याले को देखकर मुझे देर से चाय की तलब उठी थी और चाय वाला कहीं नहीं था। कम्पार्टमेंट में हम चारों सहयात्री दौड़ती रेल के साथ अपने आप में विचर रहे थे। हम सब अपने अवसादों में डूबे थे। नज़री तौर पर किसी को किसी से सबब न था किंतु भीतर-भीतर हम सब एक-दूसरे की पूरी पड़ताल कर चुके थे।


मेरे सामने रतलाम से चढ़ी पैंसठ-सत्तर की औरत किसी आस में बार-बार अपने फ़ोन में झाँक रही थी। उसे देखकर मालूम होता था, कंधे पर दिलासा का हाथ रखते ही वह टूटकर रो पड़ेगी। थोड़ी देर पहले उसने किसी से संवाद किया था। उसकी आवाज़ में अनुनय थी,"महीने, दो महीने रहकर चली जाऊँगी… बड़े के घर जगह की क़िल्लत थी। विपुल कनाडा से छुट्टी पर आया है न।"


उस तरफ़ से जाने क्या कहा गया था कि बुढ़िया की आवाज़ और दीन हो गई थी,"मैं बैठक में रह लूंगी… वैसे भी वहाँ कमरे में अकेले पड़े जी घुटता था। यहाँ बच्चों में लगी रहूँगी।"


फ़ोन के दूसरी ओर आवाज़ ऊँची हो गई थी जो फ़ोन से निकलकर इधर-उधर फैल गई थी- "हद है... चलने से पहले पूछ तो लेतीं। हम हैं भी कि नहीं। देखता हूँ क्या हो सकता है।"


एक गड़ती हुई झल्लाहट के साथ फ़ोन काट दिया गया था। बुढ़िया की आँखों से लाचारी टपकने लगी थी जिसे उसने मुँह फेरकर अपनी साड़ी की किनारी में ज़ब्त कर लिया।


मेरी बग़ल में बैठी सादी-सूनी सी कमउम्र औरत गोद में मचलते बच्चे को थपक रही थी। उसने वडोदरा से ट्रेन पकड़ी थी। उसकी आँखों में दर्द मरोड़ ले रहा था। बैठने के बाद से उसने कुछ नहीं खाया था। उसका माथा चोटिल था। गर्दन और कलाइयों पर नील पड़े थे। आँखें सूजी हुई थीं। चाल में हल्की लँगड़ाहट थी। उसे स्टेशन पर शायद पिता छोड़ने आए थे। वे उसके सिर पर आशीर्वाद का हाथ फेरकर मिश्री घुली आवाज़ में नसीहतों के साथ कुछ रुपए उसकी साड़ी की खूँट में बांध गए थे- "पिए आदमी के मुँह नहीं लगते गिन्नी। नशे में हाथ उठा दिया होगा। जब पीकर आए, तू चुप लगाया कर। वैसे भला लड़का है… ऐसी छोटी-मोटी बातों पर कहीं घर छोड़ते हैं। पीहर में लड़की दो दिन को ही अच्छी लगती है। अब तू उनकी चीज़ है।" सुनते हुए लड़की ने हाँ-हूँ कुछ न कहा था। किंतु उसका चेहरा पथरीला हो गया था। उसने जाते हुए पिता से आँखें नहीं मिलाई थीं।


तीसरा हमसफ़र अपने रवैये से बेहद रूखा अट्ठाइस-तीस का सुदर्शन युवक था। उसके कसरती जिस्म, डील-डौल और बालों की काट को देखकर मेरा अनुमान था कि वह मॉडल होगा। फिर जब उसने अपनी तस्वीरों का पोर्टफ़ोलियो देखना शुरू किया तो मेरा यक़ीन पक्का हो गया।थोड़ी देर पहले हाथ में थमी 'सेनेका' की किताब के फ़लसफ़ों से ऊबकर वह अपनी शायिका पर आँखें मींचकर लेट गया था। वह मुम्बई से ही साथ था। मगर चुप और उखड़ा हुआ। वह जैसे ख़ुद से ही सरगिराँ था। वह शायद सिगरेट पीने के लिए बार-बार टॉयलेट जाता था। क्योंकि लौटने पर हर बार उसके पास से तम्बाकू की गंध उठती थी। जाने क्यों उसके दोनों हाथों पर खाल जैसे महीन काले दस्ताने चढ़े थे। कुछ ऐसे दस्ताने जो अमूमन धूप के असर से बचने को लड़कियाँ पहनती है। वह बेहद थुड़दिल और चिड़चिड़ा था। ट्रेन में बैठने के कुछ देर बाद ही वह मेरे हाथ में थमी किताब की एक पंक्ति पर मुझसे उलझ गया था- ‘दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए।’

"रबिश! कोरी बकवास है।" उसने मुँह बिचकाकर कहा था। मैं सोच रही थी वह आख़िर किस बात पर इतना नाराज़ था! वह मेरे बाजू में बैठी कमउम्र औरत के बच्चे को रोते देख भनभनाया था" आप उसे बहलाती क्यों नहीं… थोड़ा इधर-उधर टहल ही लीजिए। मेरा सिर फट रहा है।" आधे घण्टे पहले ज़्यादा मीठे को लेकर चायवाले से भी उसकी झड़प हुई थी- "तुम रोज़ी के लिए कोई और धन्धा करो। चाय- वाय तुम्हारे बूते का काम नहीं।"

 

साइड लोअर और अपर बर्थ अढ़ाई घण्टे से ख़ाली थीं। मैं टॉयलेट के निमित्त उठी। वहाँ तम्बाकू की गंध भरी थी। मेरे लिए यह नई नहीं थी। बहुत परिचित थी। मगर अब मुझे यह गन्ध असह्य लगती थी। इस वक़्त भी मुझे लगा जैसे वह गन्ध मेरे चेहरे और नथुनों पर चिपक गई है। मुझे रेल के क़ानून तोड़ने की इस धृष्टता के लिए लड़के की शिक़ायत करनी चाहिए थी। मगर मैंने अपने इस ख़याल को रद्द कर दिया था। इसके बजाय मैंने वॉश बेसिन पर खड़े होकर मुँह पर पानी के छींटे मारे। उसी दौरान ट्रेन झालावाड़ के छोटे-से स्टेशन पर रुकी थी। हालांकि ट्रेन लम्हे भर को ही रुकी थी। उसी गुरेज़ां लम्हे में गोया एक हादसा घट गया। उदास पड़े टू टियर कोच में एक-ब-एक सनसनी भर गई। फ़ोन में झाँकती औरत अपने खोल से निर्गत होकर हकबकाई-सी खड़ी हो गई थी। बाजू में बैठी युवती की खिन्नता का घेरा टूट गया था। बच्चे को लाड़ से सहलाती, थपकती उसकी हथेलियाँ रुक गईं थीं। नन्ही गुलाबी मुट्ठियाँ पोपता बच्चा चिहुँककर रोने लगा था। ऊपर की बर्थ पर ऊँघता चिड़चिड़ा युवक अधबैठा होकर दरवाज़े की ओर ताकने लगा था। पिछले कूपे में बैठे मुसाफ़िर अगले कूपे पर झुक आए थे।


एक तेईस-चौबीस की हसीन-तरीन लड़की ने चुस्ती से रेल के साथ दौड़ते हुए अपना बैग भीतर फेंका था और पोल पर झूलते हुए वह किसी तरह ऊपर चढ़ गई थी। उसका विलायती साथी लड़का अब भी ट्रेन की रफ़्तार के साथ संतुलन बनाकर दौड़ रहा था। पायदान पर चढ़ने के प्रयास में वह बार-बार लड़खड़ा कर रह जाता। डोर हैंडल पर आगे को झुकी लड़की हाँफती हुई चीख़ी थी- "रन फास्टर कार्लोस... थ्रो योर बैग इनसाइड।" लड़के की पीठ पर नीले-गुलाबी रंग का वज़नी हाइकिंग बैग था। पाँव में भारी जूते। वे शायद पहाड़ों के सफ़र पर निकल रहे थे। वह बहुत सारी जेबों वाला पायजामा और टी पहने था। उसकी हट्टी-कट्टी पुष्ट भुजाओं पर गोदने गुदे थे। कंधों से बैग उतारने की कोशिश में अचाक ही दौड़ता लड़का गिर गया। ट्रेन ने गति पकड़ ली। लड़का पीछे छूट गया। जैसे लड़की के प्राण छूट गए हों। अनिष्ट की शंका से थरथराती लड़की कानों पर हाथ रखकर ज़ोरों से चिल्लाई- 


"का----र्लो----सssssss।"


राग भय देता है। छूट जाने का भय। हम सब कुछ न कुछ छूट जाने की फ़िक्र से डरे हुए लोग हैं। रंज में डूबी लड़की सुबकते हुए अपने घुटनों में सिर देकर दरवाज़े से सटकर बैठ गई। मैं लड़की के नज़दीक भौचक खड़ी थी। मैं उसकी तसल्ली को कुछ कहती कि एक करिश्मे की तरह विलायती लड़का दूसरे कोच के दरवाज़े पर नमूद हुआ। हैरान लड़की उसकी छाती से लगकर फफक पड़ी।


"ओह कार्लोस! आइ थॉट आइ लॉस्ट यू।"


"बट आई कांट लूज़ यू .....यू हैव टू बी द मदर ऑफ़ माय डॉटर।"


लड़के ने शरारती हँसी के साथ कहा और आवेग में सबके सामने उसे अपनी बाहों में भरकर चूम लिया। उसने अंग्रेज़ी में पूछा कि क्या वह हमेशा उसके साथ रहेगी? लड़की ने अभिभूत होकर भरी आँखों से हामी भरी। लड़के ने जैसे लड़की के होठों को नहीं उसकी आत्मा को चूमा था। उसने अपनी सुर्मेदार आँखें मूँद लीं थीं। उनकी दैहिक भाषा में गहरा प्रेम था।


मैं मानो किसी रूमानी फ़िल्म के गुदगुदाते सुखांत से गुज़र रही थी। कोच में बैठे बाक़ी मुसाफ़िरों को भी उनके मिलन के बाद आराम आ गया था। लड़का दोषहीन अंग्रेज़ी बोल रहा था। हालाँकि वह कुछ भी हो सकता था। यूनानी, डच, ब्रितानी या इतालवी। मगर लड़की ने उसे कार्लोस पुकारा था। मेरी जानकारी के हिसाब से यह इतालवियों का पसंदीदा नाम है। उसके बाल सुनहरे नहीं थे। गहरे भूरे थे। छोटे कटे हुए। आँखों की पुतलियाँ सलेटी थीं। रंगत एकदम गोरी। लड़की ख़ालिस भारतीय थी। भरी-पूरी। उसके अंगों में लोच था हाव-भाव में नज़ाक़त। गन्दुमी रंग और सुर्मगीं आँखों वाली। उसने अपने घुंघराले बालों को चम्पई स्कार्फ़ की गांठ में कस रखा था। वे दोनों च्यूइंगम चबाते हुए साइड लोअर पर दू-ब-दू जम गए। अब मैं उन दोनों के नाम जानती थी। कुलाला कली कानों में ईयरफ़ोन ठूँसे धीमी आवाज़ में कोई अंग्रेज़ी गीत गुनगुनाने लगी। कार्लोस ने उसके स्कार्फ़ को अपने नथुनों से छुआकर एक भरपूर सांस खींचते हुए अपने गले में लपेट लिया। लाड़ दिखाते हुए कली ने उसकी कलाई पर बंधी उसकी दामी घड़ी में अपनी कलाई फंसा ली और उसके फ़ोन की गैलरी में तस्वीरें स्क्रॉल करने लगी।


सारे छल और प्रवंचनाओं के बाद भी प्रेम हमारे भीतर बच रहता है इसलिए उस दिलारा जोड़े को देख मुझमें एक हूक उठी थी। अबुलाए ही सुकांत की याद मेरे मन पर दस्तक देने लगी थी। जैसे उसे देखना हो कि क्या अब भी सुकांत वहीं रहता है! 


मुझे वह दिन भुलाए नहीं भूलता। उस तंगफ़ुर्सत दोपहर में आर्टिकल पूरा करने की हड़बड़ में मेरी अंगुलियाँ डेस्कटॉप के कीबोर्ड में उलझी थीं। फिर भी आँखें बार-बार सुकांत की ख़ाली टेबल का फेरा कर आती थीं। वह दो रोज़ का कहकर पुणे गया था। मगर छह दिन बाद भी उसकी कोई ख़बर नहीं थी। उसका फ़ोन लगातार बंद आ रहा था और उसकी तरफ़ से दफ़्तर में छुट्टी के लिए अर्ज़ी की कोई मेल नहीं थी। सवेरे से ही मौसम सुहेला था। तेज़ हवाएँ चल रही थीं। ख़बरों में तूफ़ान की आशंका थी। आँख खुलते ही मैंने अपनी देह के अनचीन्हे संकेतों की जाँच की थी और प्रेग्नेंसी किट पर दो गुलाबी लकीरें उभर आई थीं। मैं उन दो गुलाबी लकीरों की धनक में खोई थी। इतनी मीठी बात सुकांत को ऐसे नहीं बताऊँगी। इसके लिए मुझे उसका आलिंगन चाहिए। उसकी आँखों में देखकर ही कहूँगी।


तभी चुप पड़ा मेरा फ़ोन गुर्राया। किसी अनजान नम्बर से सुकांत था।


"कहाँ हो कुंज?"


"तुम्हारे पास" मैं हँस पड़ी थी, "मगर तुम कहाँ हो?"


"कल शाम को जुहू पर मिलो। कुछ ज़रूरी बात है।" 


वह हड़बड़ी में था। उसकी आवाज़ में सुस्ती थी। रोज़ सी शोख़ी और रूमानियत भी उस पर हावी नहीं थी। लेकिन मुझे कोई बदअंदेशी न हुई। मैं चहक रही थी। मौसम के सुहेलेपन की बचकानी ख़ुशी से भरी हुई।


"माँ मान गईं कांत?"


"कल बताता हूँ।"


"ऊँ हूँ। अभी।"


"अभी मुश्किल है।"


"सुनो! मेरे पास भी एक ज़रूरी बात है।"


"अच्छा। बताना।" उसने कोई ज़िद नहीं की थी। 


सवेरे का सुहेला मौसम रात भर में उग्र हो गया था। लगातार बारिश से निचले इलाक़ों में पानी भर गया था। रेल की पटरियाँ पूरी तरह डूब चुकी थीं। समंदर में उठे ज्वार से लहरें बेक़ाबू हो रही थीं। मैंने दोपहर में ही दफ़्तर छोड़ दिया था। मीलों लम्बा जाम था। मौसम का लुत्फ़ उठाने लोग सड़कों पर उतर आए थे। जनता से लगातार घरों में रहने की अपील की जा रही थी। हिदायतों को दरकिनार कर मैं जुहू की ओर चल पड़ी थी। सुकांत के दरपेश मुझे मौसम की परवाह न थी। जुहू की ओर जाने वाली सड़क बंद थी। समंदर ने कई मैट्रिक टन कचरा उगलकर किनारों पर फेंक दिया था। 


मैं सुकांत को इत्तला करती कि उसके नए नम्बर की थाप से मेरा फ़ोन बजने लगा। मगर वह सुकांत नहीं था। एक जनाना आवाज़ थी। कोई औरत गुस्से से गजबजाती ज़ोर से दहाड़ी थी-


"बे-श-र-म ........छि-ना-ल। कौन से लटकों झटकों से फँसाया तूने सुकांत को?"


"कौन है?" मेरा चेहरा सुर्ख़ हो गया था, "कांत कहाँ है?"


"बीवी हूँ उसकी… उसके बच्चों की माँ। तू बता, तू कौन है?"


गोया ज़लज़ला आ गया था। मेरे पाँव के तले की ज़मीन काँपने लगी थी। मैं कौन हूँ! मेरी नाभि में जैसे कोई फड़क उठा। मेरा हाथ मेरे उदर पर रेंग गया। तो क्या मैं किसी के टूटे घर की ईंटों से अपना आस्तान चिन रही थी! 


"मैं ....मैं....।" मेरे मुँह से शब्द न फूटे मैं गुंग हो गई थी।


"इतनी आग भरी है तेरे अंदर तो ....####" औरत लगातार भद्दी और फूहड़ गालियाँ बक रही थी। पत्नी होने के अपने वर्चस्व से लैस होकर मुझे ललकारती हुई। सुकांत पर अपनी पक्की दावेदारी साबित करती हुई। मेरे समूचे अस्तित्व पर बदबूदार कलौंस मलती हुई। 


फिर क्या हुआ कि गन्द बकते-बकते वह रो पड़ी-


"उसे छोड़ दो… मैं कहाँ जाऊँगी! मेरे बच्चों पर तरस खाओ!"


कदाचित मैं उस तिरस्कार से इतनी आहत न हुई थी जितनी उस दारुण याचना से।‌ मेरे सीने पर पीड़ाओं का पहाड़ रखा था। किंतु मैं पीड़ित थी या पीड़क यह तय नहीं कर पा रही थी। मैं पीड़ित थी तो वह औरत क्या थी! मैं पीड़क थी तो सुकांत क्या था! यह मेरी आत्मा को नंगा करने वाला अप्रच्छन्न प्रश्न था। सहसा मेरा हृदय मुझे धिक्कार भेजने वाली उस औरत के लिए प्रगाढ़ सहानुभूति से भर गया जिसे मैंने कभी नहीं देखा था और मैं कभी जिसे देखने की इच्छुक भी न थी। वह इतनी ही निस्सहाय और हीन थी, जितनी मैं। कदाचित मुझसे कहीं अधिक। मैं ग्लानि में गली जा रही थी। मैं एक दूसरी औरत को निराश्रित, दुर्बल और असुरक्षित नहीं बना सकती थी।


बारिश की क्रुद्ध बौछारें मुझे पूरी तरह भिगो चुकी थीं। हवाएं ऐसी बर्बर कि तिपहिये को पलटने पर उतारू थीं। एक पुलिसिया कारिंदा उग्र मौसम की तरह ही मुझ पर बरस पड़ा था-


"कहाँ जाना है.... दिखता नहीं मौसम बिगड़ रहा है।"


"कहीं नहीं।" मेरा दिमाग़ कुंद हो चुका था। मैं तिपहिये से उतरकर पगलाई-सी सड़क पर बैठ गई थी।


बाहर पाँच मीटर ऊँचा विनाशकारी ज्वार उठा था। रात-दिन दौड़ता शहर मेरी धड़कन की तरह थम गया था। मैं कैसे घर पहुँची थी, मुझे याद नहीं। मैं अपने आपे में नहीं थी। उस रौद्र शाम में मैंने एक निर्दोष हत्या के लिए आवश्यकता से अधिक गोलियाँ निगली थीं। चार दिन मैं पेट में घुटने दिए रक्त के जोहड़ में पड़ी रही। 


हफ़्ते बाद मैं और सुकांत मिले थे। एक आख़िरी बार। 


हवा हमारी तरह कहीं गुम थी। किनारों पर नारियल के पेड़ चौकन्ने खड़े थे। गीली रेत पर बैठी लहरों के स्वैश और बैकवॉश को ताकती हुई मैं सोच रही थी समंदर की मौज की तरह प्रेम अपनी उम्र लेकर आता है। सात बरसों से हम एकमेक थे। हमारी रसोई, हमारी तश्तरी, हमारा ग़ुस्लखाना, हमारा तौलिया, हमारा बिस्तर हमारी चादर, हमारा मन, हमारी देह। अब मेरे सामने जो सुकांत था, वह मेरा नहीं था। वह एक के बाद एक सिगरेट फूँक रहा था और मैंने उसे नहीं टोका था। मैंने अपना हक़ छोड़ दिया था। वह मुझसे अपनी आँखे चुराए था। बर्तन पर चढ़ा मुल्लमा छूट गया था।


"मैं बुरा हूँ न?" पता नहीं उसने किस उम्मीद में पूछा था। 


मगर मैं उसे बुरा कैसे कहती। मैंने उसकी देह का नमक खाया था। 


"नहीं।" मैंने अपना मुँह घुमा लिया था।


"तुम भले न कहो मैं कहे देता हूँ। मैं बुरा हूँ। अबकी तुम किसी बेहतर आदमी को चुनना।"


"क़ब्र पर क़ब्र नहीं बनती कांत।" मेरी शिराएँ खिंच गईं थीं। टीस बेल की तरह फैल रही थी। और बैठे रहने का न मन बचा था न हौंसला। मैं खड़ी हो गई। सुकांत ने मेरे हाथ थामकर अपने माथे से लगा लिए थे।


"मुझे माफ़ कर देना कुंज।"


"कर दिया।"


अगर उसकी पत्नी उसे माफ़ कर सकती थी तो मैं क्यों नहीं। अलविदा की मुलाक़ात में मैं एक साध्वी की तरह उदार हो गई थी। या फिर एक प्राण छोड़ती देह की तरह निर्मल। हाँ, मैं शायद उस घड़ी मर गई थी।


मैं बारहवीं मंजिल के अपने फ़्लैट की खिड़की से नीचे झाँकती। मुझे ख़याल आता मुझे उस खिड़की से नीचे कूद जाना चाहिए। मेरे अंदर रवां-दवां ज़िंदगी ठहर गई थी। मैं यार्ड में खड़े उस उजाड़ पेड़ को खड़ा देखती जिसने पतझड़ का दुःख उठाया था। उसे देखते हुए मुझे लगता, मैं भी एक उजड़ा दरख़्त हूँ जिस पर अब कभी वसन्त नहीं आएगा। मैंने कंसोल टेबल पर रखी हमारी प्रेमिल तस्वीर को बारहवें माले से नीचे फेंक दिया था जिसे सोने से पहले मैं रोज़ चूमा करती थी।


मेरे अंदर शोक का एक कड़ा और खुरखुरा फोड़ा सा बन गया था। जो हर वक़्त टीसता था। चिपचिपी पीर भरा फोड़ा। यह वात, पित्त या सन्निपात के दोष से नहीं उभरा था। यह ठीक मेरे दिल के ऊपर छल से उपजी हीनता की गांठ थी जिसमें रक्त सड़कर मवाद बन गया था। मेरे दुःस्वप्नों में मेरे हलक में अजन्मे बच्चे के नरम गोश्त के टुकड़े भर जाते। मेरी हथेलियाँ लहू में डूबी होतीं। मेरा शरीर सड़ रहा होता। मैं आत्यंतिक पीड़ा से कराह उठती। ढीठ पीड़ा सीजने को न आती। 


मैं जान गई थी, पीड़ा ही प्रेम का प्राप्त है।

 

तब मैंने मुम्बई छोड़ने का फ़ैसला लिया था। जबकि मैं उस शहर में नहीं रहती थी। वो रंगगरंग शहर मुझमें रहता था। उसने मुझे जकड़ रखा था। यह जकड़न बोझिल नहीं थी। यह ऐसी थी, जैसे कोई बुख़ार से हुलहुलाते, टूटते बदन को अपनी टाँगों में जकड़ ले। मगर अब मेरी रूह को वो शहर हराम था।


दौड़ती हुई रेल मेरे ख़यालों की चाल से होड़ कर रही थी। फिर भी डेढ़ घण्टे का विलम्ब अब तक दुगुना हो चुका था। बाहर सूनी सहराई में पतझड़ की चाँदई रात निर्द्वंद्व सोई थी। बीच-बीच में कोई शहर या स्टेशन गुज़रता। रौशनी की पट्टियां और छल्ले हमारे ऊपर बिछ जाते। रेल सेवक यात्रियों की रुचि और चयन के हिसाब से भोजन वितरित कर गया था। बूढ़ी औरत ने मधुमेह और रक्तचाप की दवा खाने भर के लिए बमुश्किल आधी रोटी खाई थीं। उसने फ़ोन को अपनी गोद में रखा था। अब उसकी उम्मीद की तरह फ़ोन की बैटरी भी डूब रही थी। उसने घबराकर अपना फ़ोन चार्जिंग पर लगा दिया था। दस्तानों वाले लड़के ने ऊपर बैठे-बैठे ही दाल-चावल, सब्ज़ी सानकर चम्मच से गटक लिए थे। और अब गहरी लीनता से अपनी तस्वीरों का पोर्टफ़ोलियो देख रहा था। बच्चे वाली माँ ने रेल सेवक को भोजन की मनाही की थी। उसने शाम की चाय के बचे हुए बिस्कुट दो घूँट पानी के साथ कुतरकर बोतल स्टैंड में फंसा दी थी। उसके चेहरे पर सूखे आँसुओं की लकीरें खिंची थीं। अपनी उदासी की थकन में वह बैठे-बैठे ही ऊँघने लगी थी। दोपहर का खाना अभी तक मेरे कलेजे पर पड़ा था। सो मैं बिना खाए ही अपनी बर्थ पर लेट गई थी। प्रेमी जोड़े ने डटकर खाया था। कली शायद निरामिष थी उसने प्रेमी कार्लोस की थाली से एक ग्रास भी न खाया मगर कार्लोस ने उसका शेष भोजन मंदिर से मिले प्रसाद की तरह निबटाया था। खाकर वह अपनी शायिका पर पसर गया था। कली उसके मोबाइल फ़ोन में एकाग्र होकर कोई खेल खेलने लगी थी।

हम सब सोने के उपक्रम में थे। सफ़ाईकर्मी जूठी थालियाँ समेट चुका था। टी.टी.ई. राउंड पर था। वह बारी-बारी सबके टिकट की जाँच कर रहा था। उसने अपनी तस्वीरों में गुम लड़के को हिलाया-


"टिकट दिखाइए।"


लड़का अपने बटुए से टिकट निकालने लगा। टी.टी.ई. उसके दस्ताने चढ़े हाथों को मुसलसल संदिग्ध निगाह से देख रहा था। इस बात को भाँपते ही लड़का तमक उठा।


"क्या है? क्या देखना है, टिकट या मेरे हाथ? 

उसने ज़हरी अंदाज़ में पूछा। 


"दिखा दीजिए। आपके हाथों में कोई भेद है क्या? टी .टी. ई ने मुस्कराकर फ़िकरा चुस्त किया।


लड़का किसी सिरफिरे के सदृश ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा। 


"हाँ देखो मेरे हाथ .... क्या भेद है .. सब देखो।"

उसने अपने दस्तानों को हाथों से खींचकर हवा में उछाल दिया। 


उफ़्फ़ उसके हाथ! बहुत अजीब थे। चितकबरे। जैसे केंचुल की तरह उसके हाथ चाम छोड़ रहे हों। उसके हाथों की चमड़ी जगह-जगह से सफ़ेद पड़ गई थी। 


सब सकते में थे। टी. टी. ई कुछ बड़बड़ाता हुआ मुड़ गया था। रुलाई रोकने की कोशिश में लड़का हँसने लगा था। फिर हँसते-हँसते अपनी हथेलियों में मुँह ढाँपकर रो पड़ा। 


"छूत नहीं है ये। मगर मैं अछूत हो गया हूँ। मैंने बताया, वे नहीं माने...‌ सारे कॉन्ट्रैक्ट छिन गए। अब मैं बेकार हूँ ... रद्दी और निकम्मा। डॉक्टर कहता है मेरी त्वचा में रंग बनाने वाली कोशिकाएँ मर गई हैं… अच्छा होता मैं भी मर जाता।"


उसकी रुलाई से मेरी आँखें भीगने लगी थीं। मेरा मन हुआ था मैं उसके दोनों हाथों को अपने हाथों में जकड़कर कहूँ, "अब इन्हें मत छुपाना। दुनिया इन हाथों से ज़्यादा कुरूप और बदरंग है।

उसे अपनी ठोकर पर रखो।"


रेल के डिब्बे की बत्तियाँ बुझने लगी थीं। लोगों ने अपने पर्दे चढ़ा लिए थे। लड़के के भीतर भरी भड़ास निकल गई थी। वह रीडिंग लैम्प की पीली रौशनी में उँगलियों में कलम दबाए शायद किताब में अपने मन से मेल खाती सतरें तलाशने लगा था। बुढ़िया अब भी बेटे के जवाब की इन्तज़ारी में करवटें बदल रही थी। आख़िर उसके फ़ोन पर संदेश की दो आहटें हुईं। हताश मन को आस बंधी। वह अँधेरे में ही चमड़े के थैले में अपनी ऐनक टोहने लगी- "किधर गया...‌ यहीं तो रखा था।" फिर उसे याद आया कि वह अपनी ऐनक बेटे के घर की सिंगारमेज़ पर ही छोड़ आई है।


"मैं पढ़ दूँ?"मैंने आग्रह किया। 


बूढ़ी औरत ने कृतार्थ भाव से गर्दन हिलाई। संदेश दो टुकड़ों में था। लिखा था-‌ "कारोबार मंदा चल रहा है। प्रेमा ने मनौती माँगी थी। हम माँ वैष्णो की यात्रा पर हैं। फिर शायद कश्मीर भी हो आएं। प्रेमा कब से ज़िद किए बैठी है।

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अकाउंट में कुछ पैसे भेज रहा हूँ। एक दिन किसी होटल में रुककर वापसी की टिकट करा लेना।”


मैं हर्फ़न-हर्फ़न दोनों संदेश पढ़ गई। थोड़ी देर पहले बूढ़ी औरत के जिस्म में भरी चुस्ती पस्ती में बदलती गई। फिर सारे सफ़र में वह करवट लेकर निष्प्राण पड़ी रही।


निचली बर्थ पर कमउम्र लड़की की देह का कम्पन बता रहा था कि वह अब भी गुपचुप रो रही है। मैं सोच रही थी वह बूढ़ी औरत कहाँ जाएगी जिसकी परछाइयों ने उसे बेआसरा कर दिया हो! उस दुधमुँहे बच्चे की माँ का क्या होगा जिसे पिता और पति दोनों ने एक वस्तु समझा! उस युवक का क्या बनेगा जिससे अकारण ही उसके सपने छीन लिए गए! मुझमें बैठी मैं मुझ पर हँस पड़ी- "और तुम? अपनी कहो। तुम्हारा क्या होगा कुंज!… जिस भाई के पास जा रही हो, उसे क्या कहोगी कि जिसके साथ सात बरस बिन ब्याहे घर बसाए रखा, जिसके लिए उपवास रखे, उसकी अपनी दुनिया है। उसकी दुनिया में तुम नाहक हो।"


मेरा रीता मन और रीता हो गया। आँखें भी नींद से ख़ाली थीं। घुमंतू गोरे योगी की बद्दुआ फल रही थी। वह मेरे सामने खड़ा मुझ पर हँस रहा था। 


पहली बार मैंने उसे मंदिर के निकट भिक्षा माँगते देखा था। दरअसल मैंने पहली बार एक फ़क़ीर को दूसरे फ़क़ीर से भिक्षा माँगते देखा था। वह बढ़िया हिंदी बोल रहा था। मुझे कौतुक हुआ था। मैं वहीं रुकी रही। देसावरी योगी के लिए देसी फ़क़ीर इतना उदार न था। इसलिए मैंने पूछा- "क्या चाहिए? 


"बीस रुपए।"


"मेरे पास छुट्टे नहीं हैं।" मेरी बात पर देसी फ़क़ीर चौकन्ना हो गया।


"मैं कर दूँगा। पाँच रुपए लगेंगे।"


मुझे हँसी आ गई थी- "दूँगी।"


उसके बिछावन के तले रुपयों और सिक्कों का ढेर था। उसने पाँच रुपए काटकर मुझे पिचानवे लौटा दिए थे। मैंने पचास का नोट उस गोरे दरवेश की हथेली पर रख दिया।


"बस बीस की ही ज़रूरत है।"


"रख लो। बाद को काम आएंगे।"


"एक साधु भविष्य के लिए संचय नहीं करता। आज आपकी कृपा हुई कल किसी और की होगी।" वह हँसा था। हँसते हुए उसके होठों से एक जादुई अर्धगोल चाँद बन गया था। वह चुम्बकीय था। बेहद लुभावना। लंब-तड़ंग, छह फुट से निकलता हुआ क़द, ऊँची नासिका, चौड़ा ललाट और कपाट वक्ष। उसके चिरे हुए कानों में मोटी कलमनुमा लकड़ियाँ डली थीं। उसकी आँखें कुछ भूरी सलेटी थीं। या सलेटी नीली। मैं उसके साथ मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगी। 


"कहाँ से हो?"


"इसी दुनिया से। मगर दुनियादार नहीं।"


"मेरा मतलब किस देश के हो?"


"फ्रांस।"


"नाम क्या है?"


"लौकिक नाम फ़्रेडरिक और अलौकिक संसार में नाम का कोई अर्थ नहीं।"


"तुम अपने देश क्यों नहीं लौट जाते?"


"लौटने को ही आया था, लौट न सका।"


"क्यों?"


"प्रेम में छला गया। लौटने की राह न मिली। अब सोचता हूँ, वहाँ क्या है?"


"यहाँ भी क्या है?


"फ़क़ीर के लिए यहाँ क्या और वहाँ क्या।"


मैं उससे और बहुत सी बातें करना चाहती थी। किंतु वह चलबांक था मैं सुस्तगाम। उसके साथ चलने को मुझे उसके पीछे भागना पड़ रहा था। उसके साथ भागते हुए एक तिलकधारी ने मेरी ओर हिकारत से देखा था- "चार धाम तफ़रीह की जगह हो गया हैं।" दूसरे ने कहा, "बहुत जानो साहब कि कुत्ता साथ नहीं लाई।" फिर बाज़ार के किसी मोड़ पर वह खो गया था। 


दूसरी बार वह ठीक दो दिन बाद मिला था। पहाड़ों की लगभग हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर हवा बहुत उग्र थी। दोपहर बाद जून के महीने में भी हाड़ों में सिहरन भरने वाली ठंड थी।‌क्षथोड़ी देर पहले हल्की बारिश हुई थी तो फिसलन के कारण पैरों की पेशियों को तानकर, पंजे और एड़ियाँ जमाकर जमाकर उतरना पड़ रहा था। उतरते हुए एक जगह ज़मीन थोड़ी समतल हुई तो रुककर सांस ली। वहाँ तीन-चार बड़ी चट्टानें थीं। काली कमली वाले पाँचेक देशी दरवेशों से घिरा हुआ वह एक चट्टान पर तनकर बैठा था। कंपाने वाली ठंड में भी उसके बदन का ऊपरी हिस्सा नंगा था। निखालिस हिंदू साधु की तरह कमर से घुटनों तक गफ़ गेरुआ लुंगी और गमछा। हाथ में तंबूरा। वह एक विलक्षण पल था जब मैंने उसे देखा था। सांझ के सूरज की केसरिया झांई में हर चीज़ का रंग बदल गया था। आसमान, घास-पत्ते, चट्टानें और पत्थरों को काटकर बहता हुआ पानी। सबके रंग कुछ देर को बिल्कुल बदल गए थे। यह एक अस्थाई लम्हा था। जैसे उसे फिर से देखने की मेरी ख़ुशी अस्थाई थी। जैसे उससे बातें करने के बाद हुआ क्लेश भी अस्थाई था। चट्टान पर बैठे हुए उसने मिट्टी की नली से ढेर सा धुँआ अपने भीतर खींचकर हवा में छोड़ दिया। गंजेड़ी धुँआनोश साधु मत्त होकर तम्बूरे और चग़ान की धुन पर झूम रहे थे- "दिन-रात मुसाफ़िर जात चला ..ssss"


उसके अस्तित्व को धुँए में छीजते देख मुझे शोक हुआ था। मैं उसके पास बैठ गई थी।


"दुनिया में लौटने के… जीने के अनगिन बहाने हैं।"


"मगर वे सब बहाने हैं। आगे जाने के लिए लौटते पथिक से पूछो कि रास्ता कैसा है।" 


मेरी तक़रीरों पर वह लगातार मुस्कराता रहा। उसकी मुस्कान में उपहास था। मैं उसकी मुस्कराहट से कुढ़ रही थी।


"तुम नहीं समझोगे क्योंकि तुम्हारे धुआँसे जीवन में जीवन जैसा कुछ नहीं है?"


सहसा उसका ताबदार चेहरा लोहित हो उठा। माथे पर शिकंज पड़ गई। उसने अपनी नीली नीमबाज़ पुतलियों से मुझे देखा-


"जो मुझसे जीवन की बात करते हैं, मैं उनसे कहता हूँ मैं मर चुका हूँ।"


वह अपना तंबूरा उठाकर खड़ा हो गया-‌ "एक दिन तुम इस दुनिया से पूरी तरह ऊब जाओगी। उस दिन तुम्हें इस दुनिया को विदा कहते कोई शोक न होगा।"


और तेज़ क़दमो से पहाड़ उतरता गया।


मैं उसकी पीठ पर चिल्लाई थी- "वह-दिन-कभी-न-आएगा ....जीवन बोझ देता है तो ढोने को कंधे भी।"


नियति का खेला, आज मेरे फ़लसफ़े बदल गए थे। फ़्रेडरिक को सोचते-सोचते मैं नींद के झोंके में बह गई। 


रात को न जाने क्या वक़्त हुआ था। मेरी नींद शोरगुल से खुली थी। कोच में हंगामा बरपा था। रेल में जाग भर गई थी। बुझी हुई बत्तियाँ जल गई थीं। खिंचे हुए पर्दे सरकने लगे थे। अंग्रेज़ी में गालियाँ बकता कार्लोस बौराया सा इधर-उधर भागता फिर रहा था। उसकी टांगे और ज़बान शराबी के ढब लड़खड़ा रही थीं। उसके खाने में ज़रूर कोई नशेदार चीज़ थी। वह कभी अपनी सीट के तले झाँकता, कभी हमारी सीट के तले। कभी दरवाज़े की ओर भागता, कभी टॉयलेट की किवाड़ पर लात मारता। कभी अपने बाल नोचता कभी माथा फोड़ता। वह गला फाड़कर बराबर चीख़ रहा था- "दैट फ़किंग बिच टुक एवरीथिंग।"


उसका बैग, मोबाइल फ़ोन और उसकी दामी कलाई घड़ी को हथियाकर बेख़बर रात की ख़ामोशी में कार्लोस की दिलकश महबूबा किसी स्टेशन पर उतर गई थी। बेचारा कार्लोस! बिराने देश में उसके पास अब अपनी कोई पहचान की कोई सनद बाक़ी न थी। 


शायद यूँ ही तय होता होगा इश्के़ मजाज़ी से इश्के़ हक़ीक़ी होने तक का सफ़र। राग और विराग के बीच थोड़ी ही तो दूरी है। सीली हुई धुंध में रेल अपनी रफ़्तार से दौड़ रही थी। रेल को अपना गंतव्य ज्ञात था। मगर कंपार्टमेंट में हम पाँचों अपने ठिकाने से अनजान चुप्पाए बैठे थे। हम पाँचों सर्वहारा थे। निरुपाय! निठौर और निघरघट!


अचानक सदमा खाया कार्लोस बेसुध होकर गिर पड़ा था। किसी ने ट्रेन की जंज़ीर खींच दी। 

यह डोईवाला स्टेशन था यहाँ से ऋषिकेश कोई दस-बारह मील था। उस गोरे यायावर का पक्का ठिकाना 'स्वर्गाश्रम'। लगा कहीं नज़दीक से उसने मुझे उलाहना भेजा है। उसके होठों पर मुस्कान का अर्धगोल चंद्रमा बैठ गया है।


"मैंने कहा था न, एक दिन तुम इस दुनिया से पूरी तरह ऊब जाओगी। उस दिन तुम्हें इस दुनिया को विदा कहते कोई शोक न होगा।"


जैसे मैंने अपना गंतव्य खोज लिया हो। एक उजली दुनिया जो मेरे बहुत क़रीब थी। मैं डोईवाला स्टेशन पर उतर गई थी। मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा था लेकिन मुझे लगा वो पैंसठ पार की बूढ़ी औरत, गोद के बच्चे की माँ, विटिलिगो से त्रस्त लड़का और कार्लोस किसी दिन मुझे वहीं मिलेंगे।


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विजयश्री तनवीर सुपरिचित कथाकार हैं। कहानी संग्रह : अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार (2018), सिस्टर लिसा की रान पर रुकी हुई रात (2022)।‌ पुरस्कार/सम्मान : हंस कथा सम्मान‌ (2022), सविता कथा सम्मान (2023), कृष्ण चन्दर कथा सम्मान (2024)।


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