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विगत की व्याधि

  • 2 days ago
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विगत की व्याधि
कहानी : प्रियंका ओम 

ताला बंद मुख्य दरवाजे पर ऊपर से एक बाहरी ताला मढ़ कुंती देवी भारी बदन से डगमग चाल चलती हुई अपने कमरे की ओर बढ़ गई।

 

सोने से पहले यह उनका नैत्य हो गया है, कई-कई महीनों से।  


निर्मल बाबू के चेहरे पर उपहास उड़ाती एक तुर्श हँसी नुमायाँ हुई और फौरन ही लोप गई। उसकी जगह बेचारगी की मोटी-सी परत ने ले ली, ऐन वही जो आजकल तमाम वक्त उनकी आँखों की पुतलियों में छुपी होती है और ठीक ऐसे मौकों पर निकल कर समूचे वजूद पर पसर आती है। एकमात्र उनकी रस्सी कसने के अलावा कुंती देवी का नैत्य और है ही क्या? इस बोध के साथ ही उनकी मुखाकृति सख्त हो आई। 


पल्लवी ने नातिन का किरिया नहीं दिया होता तो गाली से तर देते बदजात को, सोचते हुए मन ही मन एक भद्दी-सी गाली देकर करवट बदल ली। और कर भी क्या सकते हैं वह इसके अतिरिक्त? उनकी जद में कुछ और है भी नहीं, हाथ-पैर बंधे हैं और जुबान पर जाबी लगी है! 


वैसे भी कुंती देवी पर गाली-गलौज बेअसर गुजरती है। निर्मल बाबू की घिनौनी गंदी गलियों का नाला बजबजाता रहता है। वह एकदम बेअसर "कान बहीर, पीठ गहीर किए" दैनिक में मसरूफ रहती है। रात के तीसरे पहर एक अजब-सी कसमसाहट उनकी नसों में बहने लगी।‌ बेबस कर देने वाली बेचैनी आकर गले में फँस गई,‌जैसे रोहू का कांटा। उनका दम घुटने लगा तो वह उठकर बालकनी में आ गए! 


हालांकि इस चौखना को अब बालकनी नहीं कहना चाहते निर्मल बाबू! स्याह डिब्बे जैसा कुछ यह बालकनी की व्याख्या स्पष्ट भाव में नहीं करता। इस जगह को वह ‘बंद’ कहना पसंद करेंगे। ऐसा स्याह बंद जहाँ अपनी परछाई भी नहीं दिखती। बंद और घुटन उनके जीवन में स्थाई रूप से आकर ठहर गया है। इससे निकलने का रास्ता उनकी मोतियाबिंद वाली आँखों को नहीं सूझता! 


वह वहाँ पड़ी एक जोड़ी बेंत की सोफानुमा कुर्सियों को देखते हैं। कितने चाव से लिया था इन्हें। मायूसी से उन्हें छूते हैं, सहलाते हैं। नीला खोल चढ़ी गद्दी, बेइस्तेमाल पड़ी बेकार हो रही है। पहली वाली पर बैठ जाते हैं।‌ वह हमेशा हमेशा उसी पर बैठा करते थे। दूसरी वाली बच्चों के आने के बाद इस्तेमाल हुआ करती थी। कई दफा कुंती देवी से संग बैठने का आग्रह करते थे किंतु वह हँसती, यौवना-सी लजाती हुई कहतीं, “हम नीचे ही ठीक हैं।” इस बंद का स्याह और रात का अँधेरा मिलकर एक साथ गदबदा गया है। थोड़ी-सी रोशनी का एक स्रोत, कम रोशनी वाला दूधिया बल्ब हुआ करता था पहले जिसे कुंती देवी ने निकलवा दिया कि बाहर के अँधेरे से भीतर की रोशनी में मौजूद व्यक्ति साफ दिखाई देता है। 


ऊपरी छज्जे तक काले रंग के काँच से घिरा यह बंद उनके कमरे और हॉल से जुड़ा हुआ है। कुंती देवी पक्की ईंटों की घेराबंदी करवाना चाहती थी लेकिन सोसाइटी के नियमों के तहत उन्हें काँच के साथ समझौता करना पड़ा। निर्मल बाबू ने सफेद शीशे का प्रस्ताव रखा था लेकिन कुंती देवी ने बड़ी ही दबंगई से नकार दिया, "सफेद शीशा का क्या फायदा? काला से धूप नहीं आएगा।" और धूप के बहाने से वह अपने सुख को कैद होते देखते रह गए थे और स्वच्छंदता को मजबूत तालों में मोहरबंद होते हुए जड़ तमाशबीन की तरह। वह खुद को निर्बल महसूस करते हैं। असहाय-सा एड़ी पर एड़ी चढ़ाए बैठे, बेआसरा हो, घुटने झुलाने लगे! 


“रहना आप दोनों को ही है, एडजस्ट तो करना पड़ेगा”, माँ के सगे, छोटे ने एक तरह से फैसला सुनाया था। उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। मनबहशी कुंती देवी के हिस्से आया था और उनके पाले समझौता गिरा था। वह मन मसोस कर रह गए थे। शेर के भी दांत गिर जाते हैं जब वह बूढ़ा हो जाता है, जवानी ताकत होती है। उन्हें अपने बुढ़ापे पर खेद होता है।


“तुम लोग जैसा उचित समझो।” कहकर चुप हो गए थे निर्मल बाबू। हालाँकि मन किलसता रहा था महीनों तक। छोटे ने मन बढ़ा दिया है वरना इतनी जुर्रत। खैनी मिलाने लगे थे वह, कुढ़ता है मन आज भी।


फ्लैट के चुनाव में इस बालकनी का बड़ा योगदान रहा। कई सारे फ्लैट्स देखने के बाद देर शाम यहाँ पहुँचे थे और तय कर के आए थे कि यह आखिरी है। किंतु यहाँ की बालकनी से दिखते उस चितेरे की उत्कृष्ट चित्रकारी, अंतहीन आसमान और सुदूर पहाड़ों का झुरमुट उनकी आँखों के किरमिच में छप गए थे।


“ऊपरी मंजिल अधिक गर्म होती है”, बच्चों ने समझाइश दी।


“इतनी बड़ी खुली बालकनी है, हवा की कोई कमी नहीं होगी” कहते हुए उन्होंने गहरी साँस ली थी, सुख की साँस! वही सुख जिसे भोगने का हक अब उनसे छीन लिया गया है, सोच एक गहरी साँस लेते हैं, बेबसी की! 


इस बालकनी में घंटों बैठना, कोई देशज गीत गुनगुनाते सुदूर आकाश में दहकते उस सेंदुरी गोले को पहाड़ों में धँसते देखना उनका सुकून था। जाड़ों की धूप हो या गर्मी की दोपहर, बालकनी में बैठना उन्हें हमेशा सुहाता था लेकिन घर की शांति की खातिर उन्हें अपने सुख की तिलांजलि देनी पड़ी। अब उनके हिस्से कैद का अजाब है! 


पहले-पहल तो कुंती देवी भी वहीं नीचे ड्योढ़ी पर बैठ उनसे बतियातीं। दुनिया भर की बातें, गाँव-घर की, रिश्तेदारों की, बेटे-बहुओं की और सब्जी-भाजी के भाव की। 


बाहर खुले में कुर्सी पर बैठे निर्मल बाबू ठीक सामने के आलीशान बंगले में होने वाली गतिविधियाँ साझा करते, “आज मीट-मुर्गा बन रहा है उनके यहाँ।”


वह पूछतीं, "आपको कैसे मालूम?"


“अरे चूल्हा बगान में लगा है आज!” कहते हुए वह हँसते कुंती देवी के भोलेपन पर और अपनी बूझ पर। 


कभी तार पर बैठी चिड़ियों की पाँत पूछते, “इन्हें देख रही हो? अगले ही मिनट सब उड़ जाएँगीं।”


उनके उड़ते ही कुंती देवी यश गातीं, “आपको तो सब मालूम होता है।”


ठीक तय वक्त साढ़े चार बजे चाय का पूछतीं, “पियब?”


“मन है तो बना लो”, निर्मल बाबू ऐसे कहते मानो उन्हें चाय की उतनी दरकार नहीं है जितनी कुंती देवी के साथ की है, इस वक्त-ए-मौजूँ में। 


कभी-कभी मामूली कहा-कही भी हुआ करती जिसे भात-दाल में अचार का स्वाद मानकर बिसर जाते दोनों प्राणी! 


किंतु पिछले तीन-चार वर्षों से जिंदगी विषाक्त हो गई है, हर शय में जहर घुल गया है। कुंती देवी अजब-अजब से किस्से कहने लगी है। वह उन किस्सों को ऐसी ठोस भाव-भंगिमा में परोसती हैं कि नायकिनी की गुंजाइश एक प्रतिशत भी शेष नहीं बचती। तमाम किस्सों को यूँ बरतती हैं मानो आँखों देखी हो जबकि उनकी आभासी आख्या में वह स्वयं सशरीर कहीं मौजूद नहीं होतीं।  


बच्चों के कान फूँकती रहती हैं, “जब हम पूजा करते हैं, तुम्हारे पिताजी उसको फोन से बुला लेते हैं।”


इसलिए अब उन्होंने पूजा-पाठ छोड़ दिया है। सारा दिन हॉल में टीवी पर राम कथा सुनते हुए निर्मल बाबू की निगहबानी करती हैं। मोबाइल की घंटी बजते ही चौकन्नी हो टीवी म्यूट कर पूछताछ शुरू कर देती हैं। 


“किसका फोन है?”


“फुसफुसा काहे रहे हैं, जोर से बोलिए, हम भी सुनेंगे।”


बहुत बार निर्मल बाबू खिसिया जाते हैं, "उसके साथ मिलकर तुमको जहर देकर मारने का प्लान बना रहे हैं।" इस पर कुंती देवी बड़ी ठसक से कहती हैं, "मेरा बच्चा सब आपको जेल में चक्की पिसवाएगा।”


उस दिन, कई-कई बरस पहले कुंती देवी की ऐसी ही किसी मुँहजोरी पर चिढ़ गए थे वह। "दुबारा सोचिएगा भी नहीं” कहते हुए छोटे ने उठा हाथ पकड़ लिया था। वह उसकी लाल आँखे याद कर आज भी चेत जाते हैं। “इससे तो अच्छा ही रहेगा”, कुंती देवी को जवाब देकर थोड़ा बेहतर महसूस करते हैं!


कुंती देवी को यकीन है कि ठीक आड़े टावर में रहने वाली बेवा दर्जी स्त्री से निर्मल बाबू का जी लगा है। सारा दिन फोन पर उसी से बात करते रहते हैं और रात उनके सो जाने के बाद उसे बुला लेते हैं। 


“अब हमसे बर्दास्त नहीं होगा, सोते हैं तो बाहर से हैंडल लगा देती हैं। शाम के बाद पानी पीने पर टोकती हैं। कहती हैं, ‘पेशाब करके सोइए।’ रिटायरमेंट के बाद सुख से जीने के लिए ये मकान लिया था जो घर तो बन ना सका कैदखाना बन गया और हम कैदी का जीवन जीने की खातिर लाचार हैं।” निर्मल बाबू की आवाज रोंदला गई थी। उन्हें इस तरह कमजोर देखना बच्चों के लिए ऐसा आश्चर्य था जिसकी विवेचना उनके लिए किसी शब्द संयोजन से मुमकिन नहीं।


दादा के शब्द ऊब से ऊँघे हुए थे, “ऐसा तो ना कहीं सुना, ना कुछ पढ़ा कभी” कहकर उसने झट से पल्ला झाड़ लिया था और छोटे की टिप्पणी छोटी थी, “माँ असहनीय होती जा रही है”, वह तंग आ चुका है इस रोज की चिक-चिक से। कहता है उसके अपने सौ जी के जंजाल हैं।


निर्मल बाबू की आवाज में कई भाव आपस में उलझे हुए थे। यह तय करना दुस्साध्य था कि अधिक क्या है, चिढ़ या थकान, या फिर गुस्सा। लेकिन अंततः एकमेव "हम ट्रक के नीचे आ जाएँगे" सुनकर पल्लवी काँप गई। आनन-फानन में वह आ गई है और इस वक्त पीछे वाले कमरे की बालकनी में खड़ी सोच रही है कि माँ से बात कैसे करे? 


पिछले चार-पाँच वर्षों से कुंती देवी ने निर्मल बाबू का जीना मुहाल कर रखा है। उनकी स्थिति बेचारे जैसी है। न वो ठीक से जी रहे हैं, न मर पा रहे हैं। कुंती देवी से कुछ कहो तो हर मर्तबा वही कहानी दुहराने लगती है। आजकल किसी की एक नहीं सुनतीं, येन-केन प्रकारेण अपनी कथा-कहानियों पर वास्तविकता का जामा पहनाने पर तुली रहती हैं, हर-हमेशा।


“नौ आलू था, रात गिनकर सोए थे। अभी बस पाँच हैं।”


इन दिनों हर बात इसी तरह कहने लगी हैं। उनके बात करने का यही तौर हो गया है। शुरुआत में पल्लवी उन्हें डपट देती थी और कुंती देवी चुप हो भी जाती थीं लेकिन अगली मर्तबा फिर से उसी पैटर्न की कोई दूसरी कहानी कहने लगतीं। उनके भीतर एक विचित्र तरह की दुराग्रही जिद चौकड़ी मार बैठ गई है, किसी जतन हिलती-डुलती नहीं, बज्र हो गई है।


“तीन किलो दाल था, दो किलो दे आए। तुम पतियाती नहीं हो।”


पल्लवी नाबूधों-सा समझाती, "देना ही होगा तो घर से क्यों देंगे, बाजार ही नहीं करवा देंगे? पिताजी इतने मूर्ख तो नहीं।”


“मूर्ख तो हम ही हैं इस घर में बस!”


कुंती देवी के तंज पर पल्लवी चुप हो जाती लेकिन भीतर कहीं कुछ कड़ाक से टूटता। जीवन भर यही तो किया है माँ ने और आज भी मस्तिष्क के तंतु वहीं अटके हैं। घर में सब्जियाँ आती तो वे उन्हें गिनकर रखती और बनाती भी गिनकर। 


“तेइस परवल था। दस आज बनाए, दस दूसरे दिन बनाएंगे।” सोने से पहले लेखा कहती, अगर जो पल्लवी नींद के जानिब कहानी पूछती। 


“बचे तीन का क्या होगा?” वह माँ की बातों में रस लेती। 


“चोखा बना देंगे” कहकर दाईं ओर से उसे अपने में चिपटाए कुंती देवी नींद की नदी में डुबुक जाती। और किसी अन्य दिन, “सात करेला था, तीन पिताजी के लिए भूज दिए, चार रखे हैं कल उसका सब्जी बनाएंगे।”


“माँ, तुम सब्जियाँ गिनती क्यों हो?”


“तुम्हारे पिताजी उसको दे आते हैं।”


कुंती देवी को आज भी उन्ही फंदों में उलझा देख पल्लवी का अंतस कलपता है।


“पता नहीं मेरे जाने के बाद ये दोनों एक साथ एक घर में कैसे रहेंगे?” उसका दूसरे शहर में तबादला हो गया था। पल्लवी को माँ-पिताजी की चिंता बेचैन किए रहती थी। 


पहला ट्रांसफर तो उसने किसी तरह रुकवा लिया था लेकिन इस बार बहुत कोशिशों के बाद भी बात नहीं बनी। भाइयों के विदेश रहनवास से माँ-पिताजी की जिम्मेदारी उसने स्वतः ही उठा ली थी। 


“बाद की उम्र में युवाओं जैसा प्रेम होता है। देख लेना, तोता-मैना जैसे रहेंगे।” भाभी उसको समझाती। सचमुच, जब भी फोन करती, कुंती देवी की लरजती आवाज़ सुन आश्वस्त होती। निर्मल बाबू हँसे बिना एक शब्द न बोलते, "अरे तुम चिंता क्यों करती हो, यहाँ सब ठीक है।"वह संतोष की साँस लेती! 


लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता रूमानियत का घरौंदा भड़भड़ाने लगा। कुंती देवी को निर्मल बाबू के तमाम क्रियाकलापों से गुरेज होने लगा। 


“बालकनी में बैठ सारा दिन पड़ोस की बहू को ताड़ते रहते हैं।” जब देखो तब कुंती देवी शिकायत की पोटली खोल बैठतीं। 


उसे खीज होती। ये बालकनी नहीं हुई, कथा-कहानियों का उद्गम हुआ, सबकी शिराएँ यहीं से निकलती हैं। दर्जी औरत से भी देखा-देखी यहीं से शुरू हुई और बंगले की बड़ी बहू, जिसका पति माइन्स में बड़ा अफसर है, से इशारेबाजी भी यहीं से चलती है।


बालकनी में शीशा चढ़वाने की माँ की सनक को पल्लवी का मौन समर्थन रहा। पिताजी ने एक बार खूब उम्मीद से उसकी तरफ़ देखा भी था लेकिन उसने "ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी" सोचकर उन्हें नजरअंदाज किया। 


पिताजी के साथ खड़े ना होने की पीड़ा उसे अक्सर शूल की तरह चुभती। माँ की गलत जिद का समर्थन उसे भीतर ही भीतर भँभोड़ता, खसोटता। माँ के ना चाहने के बाद भी पिताजी ने उसकी इच्छा पर उसका एडमिशन को-एड कॉलेज में करवा दिया था!


बीतते वक्त के साथ मलाल की काई जब सूख कर ऐंठने लगी तब बड़ी बेपरवाही से खुरच कर निकाल दिया पल्लवी ने लेकिन दिन-ब-दिन माँ की सनक बेलगाम होती जा रही थी, "सारा दिन पाप की खबर सुनते रहते हैं, इस उम्र में प्रवचन सुनना चाहिए।" शिकवा करतीं।


अब उन्हें पिताजी के न्यूज सुनने से भी एतराज़ होने लगा था और अंततः तोता-मैना की गुटर-गूँ कुत्ते-बिल्ली की लड़ाई में तब्दील होती गई। कई दफा आजिज आ कर निर्मल बाबू घर से निकल जाते लेकिन कुंती देवी ऐसी ढीठ होती जा रही हैं कि उन्हें किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। पुराने नीम के पेड़ की तरह अचल, जड़ जमाए डटी रहती हैं।


उस बार जब पल्लवी आई तो पड़ोस की बहू ने चाय के बहाने बुलाकर कुंती देवी को समझाने की हिदायत दी, “निर्मल बाबू को अपने पिताजी जैसा समझे हम, इनको माँ जैसा स्नेह दिए लेकिन इनके दिमाग में गूँ भरा है।”


वह अवाक-सी मुँह देखती रह गई थी।


“हम तो सह गए। अब उस विधवा बेचारी को बदनाम कर रही हैं। इस उमर में ये सब शोभा नहीं देता। माँ को समझाइए, निर्मल बाबू देवानंद नहीं हैं।”


अपमान की पीड़ा से पल्लवी तमतमा गई थी, “आपको इलाज की जरूरत है। आप पागल हो गई हैं।” और ना जाने क्या-क्या बोलती रही, गुस्से से उफनती रही। कुंती देवी तमाम वक्त निर्दोष-सी उसका मुँह देखती रहीं, मासूमियत भरी आँखों से, छोटी बच्ची की-सी। 


लौटते वक्त आंवले का अचार और घी का जार पकड़ा दिया।


कम अज कम इस बार तो ऐसा ना करतीं, भावावेश में मन ऐसा हुआ था कि पैर छूने की जगह लिपट गई। 


“अपनी कथा-कहानी आप दूसरों को क्यों सुनाती हैं?”


“सब पहले से जानते हैं” कुंती देवी ने सादगी से कहा, हमेशा की तरह निर्विकार, सुन्न-सपट, बेभाव। 


“कसम खाइए, अब आप किसी से कुछ नहीं कहेंगी” पल्लवी ने उनका हाथ पकड़ अपने सिर पर रख लिया। 


“नहीं कहेंगे”, कहने से पहले कुंती देवी ने हाथ खींच लिया था!


पल्लवी सुनती है, कुंती देवी धीरे-धीरे आ रही हैं। अपनी पीठ पर उनकी बेआवाज कदमों की थाप महसूस कर रही है‌। आहिस्ता-आहिस्ता कमर से चढ़ती हुई गर्दन के करीब आते-आते ठीक उन दिनों के जैसे उनकी देह गंध ने पीछे से उसे अपनी आगोश में भर लिया। मसालों में लिपटी हुई तेल-घी की मिश्रित गंध हमेशा की तरह उसकी दाईं ओर से तीक्ष्ण हो गई। 


पल्लो की मीठी पुकार पर उसने गर्दन घुमाकर देखा तो माँ के मांसल होंठ बेप्रयास पसर गए, आस-पास की झुर्रियाँ गहरा गईं और नेह उफनती आँखें मुस्कुरा उठीं, वक्त की तलब को बूझते हुए नेह के रेशे में उसने भी अपनी स्मित घोल दी। 


“अकेले यहाँ क्या कर रही हो बिटिया, माँ के साथ नहीं बैठोगी?”


“आपने पिताजी का जीना मुहाल कर रखा है” उसने बेसाख्ता कहा। चेहरे पर नरमी की जगह एक कठोरता उतर आई थी। 


“हम क्या कर रहे हैं? नगर वो घिना रहे हैं।”


“आप घिना रही हैं”, आवाज में तल्खी बढ़ गई। 


"वह रात को आती है, जब हम सो जाते हैं।"


“आपने देखा है?”


“आवाज सुनते हैं। खुसर-पुसर का, हँसने का।” 


“माँ!” कुंती देवी आगे कुछ कहती उसने इससे पहले ही उसने सख्ती से रोक दिया "पिता जी आत्महत्या कर लेंगे" अबके उसकी आवाज में कंपन था।


थोड़ी देर तक चुपचाप सवालिया आँखों से देखने के बाद कुंती देवी जाने लगीं तो उसने पीछे से ताना दिया "जब सचमुच ऐसा था, तब तो कुछ कर ना सकी थीं" 


कुंती देवी एक पल को रुकीं, फिर चलती चली गईं। डॉक्टर ने कहा है, “उन्हें अतिरिक्त स्नेह की ज़रूरत है” और वह...‌। पल्लवी अपने कहे के पछतावे में भीगती रही थी, ना जाने कितनी देर तक।


******


“माँ को स्किजोफ्रेनिया है।”


“ये क्या होता है?” उसने छोटे को बताया तो वह चौंक-सा गया। 


“एक प्रकार की मानसिक अवस्था जिसमें व्यक्ति हमेशा ही भ्रम-विभ्रम की दुनिया में रहता है, वह वास्तविक और अवास्तविक का फर्क नहीं समझता।”


“विस्तार से समझाओ।” 


“एक मानसिक बीमारी, जिसमें पीड़ित एक भ्रम अर्थात काल्पनिक दुनिया में जीता है। उसके अपने भीतर कई अजूबे चरित्र होते हैं, जो उसके अकेलेपन के साथी होते हैं, वह जो भी करता है उनकी शह पर करता है। ऐसी अवस्था को गाँव देहात में भूत-प्रेत की छाया कहते हैं।”


“मतलब एमपीडी, मल्टी पर्सनालिटी डिसऑर्डर?” उसकी आवाज में ढेरों आश्चर्य था।


“नहीं, वो अलग होता है।” 


“मैं कंफ्यूज हो रहा हूँ।”


“अभी हाल में ही स्किजोफ्रेनिया पर आधारित एक किताब पढ़ी। मुझे शक हुआ तो मैं मनोचिकित्सक से मिलने चली गई। सारे लक्षण वही के वही हैं। माँ भी स्किजोफ्रेनिक है। हालांकि डॉक्टर का कहना है कि एक स्किजोफ्रेनिया दूसरे से भिन्न होता है।”


“इस उम्र में मानसिक बीमारी? मेरी समझ से परे है।”


“बीमारी उम्र पूछकर नहीं आती, मानसिक व्याधियों में कई बार पुराना जख्म उभर आता है, कैंसर के जैसे। विगत में माँ ने कितना कुछ सहा है”, कहते हुए पल्लवी की आवाज धीमी हो गई।


“ठीक कैसे होगा?”


“परिवार वालों से स्नेह और संबल के साथ एंटीसाइकोटिक दवाइयों के बाद। मनोचिकित्सक के साथ काउंसलिंग के लिए मुझे संदेह है कि माँ तैयार होगी। तुम्हें तो पता है, कैसी जिद की गठरी है।”


“पहले तो माँ का स्वीकार करना जरूरी है कि वे स्किजोफ्रेनिक हैं।”


“यह इलाज का पहला चरण है।”


उसे यूँ औचक आया देख हैरान हुई थी जरूर लेकिन खुश भी कम नहीं थीं कुंती देवी "माँ बेटी पेट भर बतियायेंगे" आवाज में आनंद की थरथराहट उतर आई थी।

 

पल्लवी मात्र उनकी बेटी नहीं, सहेली भी थी। एकमात्र सहेली, जिससे कुंती देवी अपनी चुप्पियाँ बाँटतीं, मन की गांठे-गिरहें खोलतीं।


वे कहतीं, “उस किवाड़ के पीछे दो स्त्रियाँ रहती हैं– एक बूढ़ी, एक रूपसी। बूढ़ी सनकी स्त्री है, वह धतूरे का नशा करती है और रूपसी की बड़ी-बड़ी मत्स्यनैनी आँखों में काजल की रेख भौं के कोर तक खींची जाती है। वह जिसको भी एक नजर देखती है, उस पर मोह डाल देती है। उसके फूले हुए रक्तिम होंठ चूल्हे की आग-से दहकते हैं।”


“आपने कब देखा?”


“चाची कह रही थी जब कद्दूकस मांगने आई थी।”


“और क्या कही चाची?”


“वह बालों में जवाकुसुम तेल चुपड़ती है और उरोजों के बीच चमेली का फूल रखती है।”


“क्या सचमुच?” अचंभे से पल्लवी की आँखें फैल जाती हैं। 


“जब चलती है हवाओं में महक उठती है”, कुंती देवी रोटियाँ सेंकते हुए अनमने कहतीं और अचानक ही किसी गूढ़ रहस्य से पर्दा उठाते हुए जर्द आवाज में "हमसे तो तेल मसाला गंधाता है", कहकर मसखरी-सी मुस्कुरातीं, आँखें नचाते हुए। हालांकि किसी-किसी दिन वे भी गमकतीं, इत्र-सी, निर्मल बाबू-सी। जुदा लहक होती उनकी चाल में, रूमानी ठुनक आवाज में। नवेली-सी लरजती कुंती देवी निर्मल बाबू की एक आवाज के फौरन बाद ही बदल जातीं।‌हवा के झोंक से जैसे किताब का पन्ना पलटता है। 


निर्मल बाबू की एक पुकार पर चलकर नहीं लगभग दौड़ती जाती थीं कुंती देवी। मिनट भर की देरी बर्दाश्त नहीं किया करते थे वे। कई-कई बार तो परोसी थाली छोड़ निकल जाते थे कि देर हो गई। तब कुंती देवी गुनहगार की भाँति भूखी रहकर अपने आप को सज़ा देतीं, पश्चाताप करतीं।


घर के पिछले दरवाजे के बाहर गिरते सीत से साड़ी का उपरना भींगता, आँख की धार से अंचरा। कुंती देवी बुत बनी तब तक खड़ी रहतीं, जब‌ तक वह किवाड़ नहीं खुलता। वह किवाड़ उनकी जिन्दगी का बंद दरवाजा था। नशे में धुत निर्मल बाबू देर रात निकलते तब कुंती देवी पैर पड़तीं, माफ़ी माँगतीं, मनुहार करतीं, मासूम-सी दुलारतीं। बदले में अपमानित होतीं लेकिन हार नहीं मानतीं। 


उनकी आत्मपीड़ा में ही सुख था। उन्होंने सुख की परिभाषा में आधी-आधी रात जागकर प्रतीक्षा करना जाना!


“माँ तुम सो क्यों नहीं जातीं?” पल्लवी से उनका दुख सहन नहीं होता। 


“कोशिश करते हैं, नींद नहीं पड़ता।” 


निर्मल बाबू के कमरे का एक कोना चाय से पुता होता उन दिनों। वे नाश्ते के बाद दफ्तर के लिए तैयार होते। शर्ट का आख़िरी बटन लगाते-लगाते कुंती देवी चाय का कप लिए हाजिर रहतीं। बस चार घूँट अदरक वाली चाय। ना इससे अधिक, ना इससे कम। नपा-तुला समय, नपी-तुली सामग्री। जब तक वे चाय पीते, कुंती देवी वहीं खड़ी रहतीं ट्रे हाथ में संभाले। कभी-कभी निर्मल बाबू कुर्ता पहनते तो कुंती देवी की समय सारिणी गड़बड़ा जाती और फिर कोने की दीवार का रंग थोड़ा और गाढ़ा हो जाता, जिसे वह बाद में धोती-पोंछतीं। फिर कभी काली मिर्च, कभी लाल सूखी मिर्च तो कभी लौंग की पुड़िया रखती तिस पर भी ना जाने कहाँ से चींटियाँ आ जातीं। वे कोई कीटनाशक नहीं छिड़कने देतीं कि हत्या का पाप चढ़ेगा! 


उस किवाड़ के पीछे उरोज का फूल नाभि में खिला था और निर्मल बाबू फूल मसल आए थे कि जात-बिरादरी भी कोई चीज होती है। 


वह रात अमावस से काली थी। निर्मल बाबू उस किवाड़ से बाहर निकले, पीछे से एक धूसर आवाज भी निकली, "नर्क भोगेंगे नर्क, देख लेना" वह अनसुनी कर बिस्तर पर आ गिरे थे।


पीछे का किवाड़ बंद हो गया था, हमेशा के लिए। कुंती देवी शीत में नहीं भींगती किंतु वह आवाज रात की स्याही में छप गई थी, हमेशा के लिए, कभी नहीं मिटने के लिए। उस सनकी स्त्री की बात आजकल निर्मल बाबू के सीने पर साँप-सी लोटती है। मन जेठ की दुपहर तार पर टंगे तौलिये-सा टटाता है। अजब-सी कसमसाहट होती है, वह करवट-दर-करवट बदलते हैं। कई-कई बार उठ बैठते हैं। ऐसा लगता है, वह सिर पर तलवार लिए खड़ी है। जबकि उस दिन हँसी में उड़ा दिया था उसकी बात को और बात आई-गई हो भी गई थी। कौन याद रखता है ऐसी मामूली बातों को। लेकिन अब वाकई में जीवन नर्क है और उन्हें भोगना है। वह सिरहाना बदल कर फिर से सोने का प्रयास करते हैं।


एक जाड़े छुट्टी में गाँव गए तो गुलाबी रंगत लिए लंबे छरहरे निर्मल बाबू का गठबंधन माई ने परम सखी की बिटिया कुंती देवी से करा दिया। वे कुछ कह नहीं सके थे लेकिन पक्के रंग और मांसल शरीर की कुंती देवी के साथ साथ मन नहीं बँधा कभी भी। वह उन्हें अपने संग कहीं नहीं ले जाते। कभी बेमर्जी साथ ले जाना पड़ता भी तो सड़क पर निश्चित दूरी बनाकर चलते, पारिवारिक समारोहों में अजनबियों-सा रहते।


“पिताजी उस किवाड़ क्यों जाते हैं?” एक बार पल्लवी ने पूछा था। 


“हम तुम्हारे पिताजी के मन के नहीं।” सब्जी छौंकते हुए सीधा-सीधा कहा था कुंती देवी ने, बिना लाग-लपेट के।


“बगल गाँव की एगो रूपसी से मन रमा था लेकिन कपार में हमरे जैसन लिखी थी। गोरी-चिट्टी देखते ही लार टपकने लगता है। इधर-उधर खूब मुँह मारे। बदनाम बाजार की सीढ़ी भी चढ़े। फिर उस किवाड़ पीछे आकर टिक गए। हमको दुख नहीं है। मेरे भाग में तीन रत्न लिखा था मिल गया। हम संतुष्ट हैं।” 


कुंती देवी ने भतीजे के बियाह में नैहर जाने से पहले पसंद की साड़ी चाही तो निर्मल बाबू ने मुँह ऐंठते हुए कहा था, "तुम कुछ भी पहन लो, लगोगी भोकनी ही।" कुंती देवी कटकर रह गई थीं।


निर्मल बाबू उन्हें बाजार लेकर नहीं गए कभी, वार-त्योहार साड़ियाँ लाकर रख देते!


पल्लवी को अचानक लगा पिताजी की हालत पर उसका दुख धीरे-धीरे कम से कमता जा रहा है। 


कुंती देवी के चेहरे पर आच्छादित अजीब-सी सख्ती, एकदम नए रूप-रंग की, अजनबी-सी ओढ़ी हुई लेकिन खूब छजती हुई। उसे भीतर ही भीतर खुशी हो रही हैं, माँ के इस बदले रूप को देखकर। साथ ही साथ तनिक संशय भी कहीं जेहन में कि पिताजी सचमुच ट्रेन के नीचे आ गए तो?


दाईं तरफ से घेरते हुए पल्लवी बिस्तर पर करवट लिए अधलेटी कुंती देवी से लिपट गई।


“आपको हत्या का पाप लगेगा।”


“हम रूम बंद नहीं करेंगे अब।”


“आप गेट पर अपना ताला तो लगाती ही हैं,‌बालकनी भी बंद है। बाहर से कोई नहीं आ सकता!”


कुंती देवी उसकी तरफ पलट आईं, "पिछले साल जो पीला सिल्क साड़ी तुम लेकर आई थीं वो गायब है, तुम मानोगी नहीं, तुम्हारे पिताजी उसको दे आए होंगे।”


पल्लवी ने उन्हें अपने में समेट लिया। वह माँ के लिए कभी पीले रंग की कोई साड़ी लेकर नहीं आई!


उसने मन ही मन तय कर लिया है, माँ को अपने संग ले जाएगी और इलाज करवाएगी। यों वह जानती है, यह एक मुश्किल काम है और यह भी जानती है कि माँ को कैसे मनाना है।


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कथाकार प्रियंका ओम तंज़ानिया में रहती हैं। कहानी संग्रह : वो अजीब लड़की (2016), मुझे तुम्हारे जाने से नफ़रत है (2018), दिन हुए दिवंगत (2023)। उपन्यास : साज़-बाज़ (2025)। ईमेल : pree.om@gmail.com




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