top of page

बाकुम-बाकुम

  • Jun 27
  • 33 min read


बाकुम-बाकुम
कहानी : गीताश्री

उस दिन धूप कुछ ज्यादा ही पियराई हुई थी। 


चौधराइन मास्टरनी आंगन से निकल कर ओसारे पर बैठी थीं। नरम-नरम धूप पीती हुई। रोम-रोम में धूप की तासीर भर लेने को आतुर। रिटायरमेंट के बाद ऐसी धूप कहां नसीब। स्कूल में खुला मैदान था। जाड़े भर बच्चो की क्लास बाहर मैदान में ही लगा देती थीं। स्कूल छूटा, मैदान छूटा, धूप छूटी, जैसे संगी-साथी छूटे। कई बार धूप सेंकते-सेंकते ऊंघने भी लगती थीं। अब उस सुख की स्मृति बची है, धूप नहीं। स्मृति की धूप भी कम नहीं होती। तन-मन सेंक जाती है। आज धूप उनकी स्मृतियों से बाहर निकल आई थी, नरम-नरम धूप सीढ़ियों से चढ़ कर ओसारे तक आई थी। जैसे वे आंगन से निकल कर बाहर आई थीं, दबे पांव। दालान खाली पड़ा था। पतिदेव चौधरी साहब शहर गए थे, डॉक्टर का फेरा लगाने। साथ में दो सेवक। एक मारुति वैन चलाता था, दूसरा हरदम खैनी-चूना के लिए साथ रहता था, उन्हें लेकर गए। तभी दुआर खाली था। ओसरा पर फैलकर बैठीं। उन्हें दुआर पर बैठने की मनाही नहीं थी। उस इलाके की मास्टरनी रह चुकी हैं, उन्हें कौन रोकेगा। उन्हें उलझन होती थी कि चौधरी साहब बाहर मजमा लगा कर अपने पुराने जमाने की, बाप दादाओं के किस्से हांका करते थे। मास्टरनी जी टिक नहीं पाती थी, उनसे एक ही रिकॉर्ड सुना नहीं जाता था। मास्टरनी जी यानी सुनंदा देवी को हवेलीनुमा घर का बड़ा-सा आंगन काट खाने दौड़ता था। अगर किताबें और मोबाइल न होते तो उनका वक्त काटना मुश्किल था। उनके पास अपार अकेलापन था। कभी-कभी उन्हें लगता कि वे इस खंडहर होती हवेली में किसी परछाईं की तरह कैद हैं। सारे पट्टीदार शहर में बस गए थे, अपने बच्चों के पास चले गए। बड़े से आंगन में बची मास्टरनी जी और उनकी दो सेविकाएं। एक रसोई संभालती थी, दूसरी बाकी काम। मास्टरनी जी को घर का काम करने की आदत नहीं थी। शुरू से नौकरी करती रहीं। नौकरी के दौरान ही उस इलाके के दबंग चौधरी साहब से प्यार हुआ, इकरार हुआ और फिर दोनों किसी से डरे बिना वैवाहिक बंधन में बंध गए थे। उनके दो बेटे हुए, एक बंगलोर, दूसरा पुणे में बस गया। चौधरी साहब ने कभी राज्य के बाहर कदम नहीं रखा। उन्हें लगता था कि वो बाहर गए तो उनकी जमीनों पर उनके दुश्मन बाहुबली कब्जा न जमा लें। सो वो मग्न थे अपने गांव में। मास्टरनी जी बेटो के यहां, उनके साथ यात्रा करती रहती हैं। पति के कारण अपना शौक स्थगित नहीं की, कभी। दोनों में अघोषित समझौता था। 


उस दिन मास्टरनी जी जल्दी बाहर आकर प्लास्टिक की कुर्सी पर जम गई थीं। दिसंबर में उतनी गुनगुनी धूप उन्हें सुहा रही थी और दरवाजे का सन्नाटा भी सुहा रहा था। उनका आधिपत्य था आज। आंगने में धूप दबे पांव आती है और जल्दी चली जाती है। बाहर सुबह से शाम तक डटी रहती है धूप। धूप वैसे ही निर्भय होती है जैसे हवा, बारिश। आज तो वैसे भी दो दिन बाद कुहासा छंटा था तो धूप चमक उठी थी। कुर्सी पर जमे-जमे। चाय सुड़कते हुए उन्होंने सेविका नंबर एक को आवाज दी।


उनकी नजर पड़ी थी, फूलों की क्यारियों में। वहां पीले, कत्थई गेंदा फूलों की कतारे थीं। सूरजमुखी के कुछ पौधे थे, सूरज की तरफ सिर उठाए खड़े। क्यारी से लगा छोटा जमीन का टुकड़ा था जिसमें चौधरी साहब साग-सब्जी उगाया करते थे। उसमें सरसो के पौधों में फूल खिलने की पीत आभा झांक रही थी। 


"मुनिया...सरसो के साग खोंट रे। फूल आएगा तो पत्ता जुआ जाएगा, स्वाद नहीं मिलेगा। चल, हम भी खोटेंगे आज...लाओ मउनी (खर-पतवार की रंगीन छोटी टोकरी)।" 


चाय का कप वहीं स्टूल पर रख कर वे सीढ़ियों से नीचे उतर ही रही थीं कि दूर से उन्हें साइकिल की घंटी की टुनटुनाहट सुनाई दी। जैसे कोई टुनटुनाता हुआ चला आ रहा हो उनके द्वार पर और घरवालों का ध्यान खींचना चाहता हो। पांच ही सीढ़ी ऊपर था ओसारा। आखिरी सीढ़ी पर ही वे ठिठक गईं। तेजी से आती, बेचैन पहियों वाली एक साइकिल झटके से सीढ़ियों के पास आकर रुकी।


गहरे सांवले रंग की एक लड़की साइकिल से उतर रही थी। मांग में सिंदूर, माथे पर गुलाबी बिंदी, हाथों में लाल-पीली लहठी। गुलाबी सूती साड़ी।  


"देवी जी.." साइकिल को स्टैंड पर खड़ा करके लड़की मास्टरनी जी के पैरों पर झुकी। 


"कौन हो जी...?"


मास्टरनी जी अचकचाई। साग खोंटती हुई मुनिया और सितारा दोनों वहीं से खड़ी होकर नजारा देखने लगीं। 


"पहचानी हमको, हम रानी, आपकी मूसनी। भोला मुसहर की बेटी। कुरहनी ब्लॉक। याद नहीं, आप हमको घर से पकड़ के लाई थीं, जबरदस्ती पढ़ाई के लिए। बाबू से कितना लड़ी थीं...।" 


वह हंसने लगी थी। स्मृति में कितना जादू होता है।

 

"मूसनी...तू...!"


मास्टरनी जी का मुंह खुला रह गया। गाल पर हाथ रख कर उसे घूरने लगीं थीं। मानो कोई अचंभा देख लिया हो। 


फिर उन्हें बोध हुआ कि वे गलत नाम से उसे बुला रही हैं। बचपन में स्कूल में उसे मूसनी कहा करती थीं। अपनी भूल सुधार कर पूछ बैठीं- 


"रानी, तू इतनी बड़ी हो गई। तेरा ब्याह भी हो गया। अब कैसे आई रे..."


"देवी जी, आप हमको मूसनी ही कहिए। आपके लिए हम वही हैं। आप मूसनी बोलती हैं तो अच्छा लगता है। वही कहिए...।"


मास्टरनी जी को झटका लगा। वो तो चिढ़ कर मुसहर टोली के बच्चों का नाम रखीं थीं- चूहिया, घुघरी, चपटी, करियक्की, सूखड़ी...। इसका नाम मूसनी रखी थीं। शुरू-शुरू में इसने उन्हें बहुत तंग भी किया था। सिर्फ यही नहीं, दलित टोले की हर बच्ची ने उन्हें तंग किया था। वे कितनी परेशान हुई थीं। सरकार ने नोटिस जारी किया कि इन बस्तियों से बच्चियों को निकाल कर स्कूल तक लाएं। सबको साइकिल दें ताकि वे स्कूल आना-जाना शुरू करें। उनके स्कूल के सारे शिक्षक बहुत उखड़ गए थे इस आदेश से। मास्टरनी जी इस मुहिम की प्रभारी बना दी गई थीं। वे कई दिन तक इनकी बस्तियों में घूमती रहीं और लड़कियां तलाशती रहीं। उनके घरवालों को समझा-बुझा कर स्कूल भेजने को राजी करना पड़ा था। बच्चियां भी जैसे-तैसे उठ कर स्कूल चली आतीं, मानों आदेश का पालन कर रही हों, कोई आंतरिक इच्छा न हो। गंदा मुंह, नाक बहती हुई, बाल चिड़ियों के घोंसले, गंदे कपड़े। उस दौरान मास्टरनी जी को अपनी नौकरी पर अफसोस होता और ऐसा करते हुए उन्हें कई बार घिन आती थी कि ऐसे दिन देखने पड़ रहे। गंदे बच्चों के नाक-मुंह साफ करने पड़ रहे हैं। घर आकर खीझती और झकती रहती। अपने मुख्यमंत्री को कोसती रहती - "बज्जर पड़े सी एमवा पर, बहुत गलत काम किया, हमलोगो की इज्जत दो कौड़ी की कर दिया। ऐसे बच्चो को पढ़ाना तो ठीक था, लेकिन उनके घर-घर जाकर उनको निकालना, साफ सफाई करके स्कूल आने लायक बनाना, हमको तो देवी जी से दाई बना दिया।"  


चौधरी साब कहते - "नौकरी छोड़ दीजिए देवी जी।" फिर वो भुनभुनाना छोड़ देतीं। नौकरी से मोह कुछ ज्यादा ही था। उसकी वजह से ही वे चौधरी की हवेली की चौखट पार कर पाई थीं।  


धूप गवाह थी कि उस दिन, यादों के परिंदें सुनहरे पंख फड़फड़ा रहे थे।  


उस पल वहां धूप गवाह थी। मूसनी यानी रानी का चेहरा आत्मविश्वास से दमदमा रहा था। 


मास्टरनी जी उत्साह से भर उठीं। उनके रिटायरमेंट के बाद पहली बार कोई छात्रा मिलने आई थी। इतने बच्चों को पढ़ाया है, गिनती नहीं। लेकिन उनमें से कोई लौट कर नहीं आया। ये क्यों आई है। 


वो आखिरी सीढ़ी से नीचे उतर आईं और वहीं सीढ़ियों पर बैठ गईं। उन्हें लगा कि उनकी खोयी हुई दुनिया वापस मिलने आई है।  


"ओ...अच्छा। हां, हां, याद है...याद है...और भी लड़कियां थीं, सब छोटी-छोटी थीं। तुमको हम याद रह गए...वाह । कितनी बड़ी हो गई रे तुम। कैसे याद आई मेरी। हम तो 2019 में ही रिटायर कर गए। पांच साल हो गए। तुम कहां थी, आगे पढ़ी कि नहीं?" एक ही सांस में कई सवाल पूछ गईं।  


उन्होंने रानी को भी वहीं अपने साथ बैठने का इशारा किया। वो खड़ी रही। उत्साह और उतेजना से भरी हुई रानी साइकिल छोड़ ही नहीं रही थी। 


"ई साइकिल देख रही हैं, वही है, जो आप हमको दिलवाई थीं। आज भी हम संभाल कर रखे हैं। बियाह के बाद भी किसी को नहीं दिए हैं। यही हमारा गोर-हाथ हैं। कुच्छो हो जाए, हम उसको नहीं छोड़ेंगे।"


अपनी पुरानी साइकिल को लेकर ज्यादा ही अनुराग से भरी हुई थी। उसकी सीट पर प्यार से हाथ फेर रही थी। 


मास्टरनी जी ने गौर से उसे देखा, सांवले चेहरे पर धूप पड़ती है तो अलग आभा होती है। उनके भीतर मंथन चल रहा था। इतने बच्चो को पढ़ा चुकीं, सब न जाने कहां खो गए। ये लड़की क्यों उनके पास आई। उनकी सेविकाएं फिर से साग खोंटने में लग गई थीं। 


"हम आगे की पढ़ाई नहीं किए। बाबू मना कर दिया और हम घर का काम करने लगे। फिर बियाह कर दिया। हम स्कूल भी गए थे आपको ढूंढने। तब पता चला कि आप रिटायर हो गई हैं। बड़ी मुश्किल से आपका पता मिला हमको। स्कूल में कोई देबे नहीं किया। कैसे भी उपराए।"


"कौन है दूल्हा, क्या करता है, कौन गांव ससुराल है। कोई काम है...?"


उनके पास सवाल बहुत थे। रानी उर्फ मूसनी अपने अतीत में लौट चुकी थी। उस काल में पहुंच चुकी थी जहां से उसकी कहानी शुरु होती है। 


********


रानी कुमारी का स्कूल छूट गया था। सातवीं क्लास के बाद वो हाई स्कूल तक पढ़ना चाहती थी। कॉलेज में पढ़ाने की हैसियत तो नहीं थी पिता की। बमुश्किल गुज़ारा चलता था। चार भाई बहनों का भरा पूरा घर। रानी माँ के आगे बहुत गिड़गिड़ाई , उसकी सुनी न गई। उसे घर के काम में जोत दिया गया। खेतों में मजूरी करने लगी। उसे अपनी ग़रीबी से नफ़रत नहीं, शिकायत थी। शुरू-शुरू में स्कूल में मन नहीं लगता था। लेकिन रोज दोपहर में खाना मिलता और एक दिन साइकिल भी मिल गई। पीठ पर बस्ता लादने के लिए बैग मिल गया, ड्रेस भी बन गई। उसका दिल खिल गया। उसे सुनंदा देवी जी बहुत पसंद आती थीं, लेकिन वो हमेशा हिकारत भाव से उसे पुकारतीं- मूसनी!


शुरू में उसे समझ में नहीं आया कि उसको मूसनी क्यों कहती हैं?


एक दिन उसने शिक्षकों को बात करते सुन लिया। उसी दिन उसने तय किया कि चाहे भूखी मर जाए, मूष कभी नहीं खाएगी।


उसकी साइकिल उसकी सबसे प्रिय सहेली बन गई थी। लेकिन स्कूल छोड़ने के बाद भी साइकिल उसने अपने भाइयों को छूने न दी। वो उसे स्कूल के दिनों की याद दिलाती थी। उम्र अट्ठारह की हुई, ब्याह की बात चल निकली। तब उसने यही शर्त रखी थी कि साइकिल साथ लेकर जाएगी और बहुत दूर गाँव में ब्याह कर नहीं जाएगी।


इसीलिए पिता ने अपने गांव के नजदीक एक गांव का लड़का ढूंढ लिया। लड़का गुड्डू मांझी भी उतना ही पढ़ा था जितना रानी। दोनों की जोड़ी सबको पसंद आई थी। रानी भी खुश थी कि अपने गांव से दूर नहीं जाना पड़ेगा। लड़के के पास मोबाइल भी है। ये बात पता चली तो रानी भी मोबाइल खरीदने के लिए कसमसा उठी। भाई ने समझाया कि साइकिल बेच दे, मोबाइल आ जाएगा। फिर दोनों ख़ूब बतियाती रहना। साइकिल बेचने की बात सुनते ही रानी का पारा हाई हो गया।


दांत पीसती हुई भाई पर दौड़ी - "मुंहझौंसा कहीं का, खबरदार जो ऐसा सोचा भी। साइकिल किसी को नहीं देंगे। जान दे देंगे।"


पहले तो भाई उसका तेवर देख कर दंग रह गया, बहन की चढ़ी त्योरी, गुर्राती जुबान, तमतमाया चेहरा देख कर वह मैदान छोड़ गया। उसे साइकिल से जलन होती थी। रानी कभी हाथ नहीं लगाने देती थी। साइकिल को कौन ऐसे पोसता है। 


उस दिन से रानी उससे तनी रहने लगी और साइकिल के प्रति ज्यादा चौकस। पहिये में ताला बंद करके चाबी अपने “लेडीज़ बैंक” में रख लेती थी। वहाँ तक पहुँचने की कोशिश भाई नहीं करेगा। उसे ख़तरा मँडराने लगा था कि भाई इसे बेच कर मोबाइल लेने की फ़िराक़ में है। रानी को भी मोबाइल चाहिए था, मगर साइकिल की क़ीमत पर नहीं। उसने तय किया, अपने होने वाले दूल्हे से मुँह दिखाई पर यही माँगेगी। ये सोच कर उसे राहत मिली। मौक़ा मिलते ही उसको अपनी इच्छा बता देगी। गुड्डू बहुत शरीफ और मधुर लगा था। एक ही बार देखा और उसकी आवाज़ सुनी थी।


तभी से उम्मीद जग गई थी।


रानी ने नजारा देखा तो चकरा गई। उसे लगा कि अनपढ़ रहती तो शायद बात मान लेती। पढ़ाई के बाद लड़ाई बढ़ जाती है। आँख मूँद कर कोई बात मान लेने का मन नहीं करता है। चाहे सामने कोई हो। मन में तर्क उठते हैं। मन में सवाल उठते हैं। क्यों … किसलिए …।


इस समय यही हो रहा था उसके साथ। गुड्डू छप्पर पर चढ़ा हुआ था और वहां से बार-बार कह रहा था- “हम कूद के मर जायब।”


हल्के घूँघट में रानी सिर उठा कर उसको देखती है। पहले तो हँसी आती है फिर चेहरा सख़्त। उसके आसपास खड़ी औरतें और उसकी सास कह रही हैं - "बोलो पुतोहू - “हम कमा के खिलाएब !”


तभी वो नीचे उतरेगा। जब तक नहीं बोलोगी, वो नीचे नहीं आएगा। हमारे यहां का रिवाज है। बोलो बोलो…


फिर ऊपर से गुड्डू बहुत लय में बोला - “हम कूद के मर जायब”


रानी के मन में विद्रोह कर दिया। सिर पर से भारी भरकम साड़ी का पल्लू पीछे सरकाया, मुंह ऊपर उठाया और जोर से चिल्लाई - "हमीं काहे कमाके खिलायब। हम दोनों  मिलजुल के कमायब-खायब। नीचे उतरो।"


नयी नवेली, पढ़ी-लिखी मेहरारू की चिल्लाहट सुन कर गुड्डू और मजे में गाने लगा - "हम कूद के मर जायब।"


अब रानी चिल्लाई - "मर्द कमा के खिलाता है कि औरत? अजगुत रीत है यहां। हम नहीं बोलेंगे। हम बोलेंगे - दूनों कमाएंगे … मिलजुल खाएंगे...ठीक हय!"


गुड्डू धपाक से छप्पर से कूद गया नीचे पुआल पर। चोट लगने की गुंजाइश नहीं थी।


वो समझ गया कि क्रांतिकारी मेहरारू मिली है उसको। जबरन बात नहीं मनवाई जा सकती। कितनी देर छप्पर पर खड़ा रहेगा। तमाशे से अच्छा है कि कूद जाए। घर के छप्पर पर फैली कुम्हड़ा की घनी लतरें चुभ रही थीं। गुड्डू को अंदाज़ा नहीं था कि आगे उसके जीवन में क्या-क्या क्रांति होने वाली है। वो तो तमाशा बनने से बेहतर छप्पर से कूद गया।


ये रस्म अधूरी रह गई तो वहां जमा सारे रिश्तेदार रानी कुमारी पर कटाक्ष करने लगे थे। हवा में भुनभुनाहट थी। रानी को तसल्ली थी कि उसका मरद बात मानने वाला निकला। जिनगी ठीक से कट जाएगी। अगर मरद बवाली होता तो रानी रार ठान लेती। दबती नहीं किसी से। ब्याह से चाहे कुछ मिले न मिले, बागी लड़कियों को नइहर के दबाव से छुटकारा मिल जाता है। रानी ससुराल के अंगने में विधि-विधान करने गई, इधर गुड्डू को भड़काने वाले काम पर लग गए थे। 


"गुडुआ, देखना कैसे तुझे नचाएगी, सातवां पास लड़की लाए हो बेट्टा, भुगतोगे।"


गुड्डू अपने को तैयार कर रहा था सामना करने के लिए। दहेज में आई पुरानी साइकिल में ताला बंद देख कर उसे हंसी आती थी। उसके पास अपनी साइकिल थी इसलिए उसे कभी जरूरत नहीं महसूस हुई।


कुछ दिन तो अच्छे बीते। रानी ने घर को सँभाल लिया था। ससुर बाहर सोने लगे थे और सास आँगन में। वहाँ एक बड़ा चूल्हा था और तीन-चार छोटी-बड़ी हांडी पड़ी हुई थीं। वे सब ढंकी हुई थीं। चूल्हे पर नहीं चढ़ी थी। चूल्हा ठंडा था। खाना भी इसी अंगने में एक कोने में बनता था, उसके ऊपर छज्जा था। ताड़ के पत्तों से बना हुआ। 


कुछ दिन बाद गुड्डू खेतों में और हाट जाने लगा। गुड्डू की माँ और उसके पिता आँगन में चूल्हा जला कर हंडिया चढ़ाने लगे। उसमें गुड्डू भी उनकी मदद करता। सिर्फ रानी दूर रहती। उसे चूल्हे पर खदकने वाले पदार्थ से महक आती और जी मिचलाने लगता।


गुड्डू उसकी पैकिंग करता। पाउच बनाता या बोतलों में भरता। रानी अपने घर और आसपास यही सब तो देखते बड़ी हुई थी। यही उसके समाज का कुछ सालों से कमाई का ज़रिया बना हुआ था। खेत अपने थे नहीं। दूसरों के खेतों में काम करते थे। ज्यादा कमाई के लिए इस धंधे को अपना लिया था।


एक रात रानी ने उससे बात की-


“ऐ जी , मुझे अच्छा नहीं लगता कि तुम ये काम करो। थोड़ा बहुत तो पढ़े-लिखे हो न। तुम कोई और काम क्यों नहीं करते?


"कौन सा काम ? तुम ही बताओ। जो काम हम जानते हैं, वही करेंगे न। हमारी दारू ही बिकती है। तुमको तो पता ही है कि अंग्रेज़ी दारू खुलेआम नहीं मिलती। लोगों को रोज पीना है। कहाँ से आएगी?"


रानी ने ग़ौर किया, गुड्डू की आवाज़ में मिठास है। उसमें धैर्य है और जल्दी उत्तेजित नहीं होता। हंसता, हंसाता रहता है। मस्ती वाला स्वभाव लगा।


रानी उसे क्या काम सुझाती? सोच में पड़ गई। पूरा समाज इसी काम में डूबा है। पैसे भी आ रहे हैं। कौन छोड़ेगा भला? गैर-कानूनी काम होते हुए भी ये धंधा फलफूल रहा है। किसी को पुलिस, थाने का डर ही नहीं। धमकी से भी इन लोगो पर असर नहीं पड़ेगा। बहुत निरुपाय महसूस कर रही थी। 


एक रात घर के भीतर रानी जगी थी। उसे नींद नहीं। गुड्डू की आँखों में प्रेम निवेदन भरा था। खटिया पर दोनों के पैर आपस में गुंथे हुए थे। रानी बार-बार उसके पैरों की उंगलियों से अपनी उंगलियां छुड़ा लेती थी। उसका ध्यान कहीं और था।  


बाहर से किसी के गाने की आवाज आई-


"बाकूम बाकूम...बोले ढोलवा बाजे,

साजन के घर आज बारात साजे...का हो...

हंसी ठिठोली में देवरवा नाचे,

गोरी के गाल लाल हो जाए रे..का हो...

बाकूम बाकूम, अरे नाचे सब गाम,

रंग बरसे रस भरे कामिनी शाम...बाकुम बाकुम...

सासू कहे बहुरिया धीरे बोल

देवरवा कहे “भाभी हो, तोरा में गोल...का हो...”


"कौन गा रहा है, क्या गा रहा है जी?"


रानी को बहुत अचरज हुआ कि इतनी रात गए, कौन इतना सुर में गा रहा है। उसके टोले का दिन तो ऐसे बीतता है कि गाना-बजाना सुने जमाना हो जाता है। नइहर में तो उसके पिता की मंडली थी, कभी-कभी वहीं बैठ कर वो लोग भगत गाते थे। जिसके हाथ में जो रहता, उसे ही बजाता। बस सुरेश चच्चा के पास पुराना हारमोनियम था, वो लेकर आते। कोई खपरैल का टुकड़ा बजाता तो कोई पतले पत्थर से धुन निकालता तो कोई खंजरी ले आता। उसके पिता के पास पुरानी झाल पड़ी थी, पीतल की। बढ़िया बजाते थे। उनकी टोली मस्त रंग जमाती थी। 


ससुराल में आकर माहौल ही बदल गया था। यहां सिर्फ महुए की गंध महकती रहती थी। पूरी बस्ती में जहां-तहां पानी जमा था, कीचड़ इतनी कि सुअर लोटते रहते थे। रानी ने किताबों में सुंदर घर और साफ सुथरी बस्ती की तस्वीरें देखी थी और उन्हें मन में बसा लिया था। 


रात की इस नीरवता में कौन इतने मजेदार ढंग से गा रहा है। भगत गान तो कतई नहीं लग रहा है। 


“बाबू गा रहे? एतना बढ़िया ? क्या गला है? गाना केतना सुंदर है। क्या गा रहे हैं? हम कभी सुने नहीं ऐसा गाना।”


"बाबू जब ज्यादा चढ़ा लेते हैं तो उत्पात मचाते हैं। जोर-जोर से गाते हैं, झँझड़ी बजाते हैं। दौरा पड़ता है उनको। रात को गाते-गाते निकल जाते हैं। उनको पकड़ के लाना पड़ता है।"


गुड्डू उठ कर बैठ गया। उसकी आवाज में चिंता की लकीरें थीं।  


“आयं … गाने का भी दौरा पड़ता है। हम पहली बार सुने।


"इतना पीना नहीं चाहिए कि आदमी सुध गँवा दे। मत पीने दो जियादा।” रानी को सहानुभूति हुई। गुड्डू को चिंतित देख कर उसने बात बदली। 


“तुमको दौरा नहीं पड़ता गाने का ? सच बोलो- तब तो तुम भी गाते होंगे… है न ! आवाज तो बड़ी मीठी है मेरे सजन की।” रानी इतराई।


“स्कूल में गाते थे… हर शनिवार सांस्कृतिक कारजकरम होता था। मास्टर जी हम सबको कुछ कुछ करने बोलते थे। हम तो बाकुम -बाकुम गाते थे - गाना आता नहीं था। कुच्छ से कुच्छ जोड़ कर हम गा देते थे और अंत में गाते...का हो …।"


"मजेदार है...बाकुम...बाकुम...का हो...सुनने में अलग लग रहा है। पता नहीं क्या मतलब...।" रानी हंसी। 


"जानती हो, बाबू अब नहीं गा सकता। हंफनी उठता है। फेफड़ा में दम नहीं। चूल्हा भट्टी का धुंआ पी, पी के नास हो गया है।”


रानी की हंसी एक झटके से थम गई। 


गुड्डू माथा पकड़ कर लेट गया। उधर बाहर गाते हुए बाबू खाँसने लगा था। रात की निस्तब्धता में खाँसी की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी।


रानी ने बल्ब की हल्की रोशनी में देखा, गुड्डू चिंतित और उदास हो रहा था। मानो कोई चिंता उसे भीतर-भीतर ही खाए जा रही थी।


"बत्ती बुझा दें?"


गुड्डू अनमना पड़ा रहा।


"क्या हुआ? नींद नहीं आ रही का?" रानी अपनी उँगलियाँ उसके सीने पर फिराने लगी।


"सुनो, कल से हम भी तुम्हारे संग खेत में चले? अपनी-अपनी साइकिल पर …"


हल्की रोशनी में रानी उसे बड़ी मादक लग रही थी। उसने अपनी बाँहों का कसाव और बढ़ा दिया।


“पाँव से तुम्हारे अलता की ललाई उतरी नहीं है, तुम क्या खेत जाओगी? टोला कहेगा कि देख, गुड्डुआ अपनी मेहरारू से तुरंते खेती-बाड़ी कराने लगा। रुक जा अभी।”


"हम तो जबान दिए थे न कि दोनों मिलजुल कर कमाएंगे और खाएंगे। फिर काहे दिक्कत। टोला की फिकर करिएगा तो जीना ही मुस्किल। आप हम पर छोड़िए। फिर देखिए।" 


रानी उत्साह से भर गई थी। गुड्डू को उस पल लगा कि वह जीवन की गाड़ी का अकेला पहिया नहीं है। उसके बराबर एक पहिया और जुड़ गया है। उसे रानी पर भरोसा करना चाहिए। उसने करवट बदली, रानी की सांवली बांहों पर सिर रख कर आंखें मूंद ली। अनुराग का ये रंग भी होता है, किसी क्षणिक उत्तेजना से परे, आश्वस्ति और भरोसे का रंग। रानी की देह से निकलती हुई मिली-जुली गंध उसकी शिराओं में बहने लगी, स्नायु तंत्र ढीले पड़े और वो सो गया। बेखबर कि रानी जाग रही है। 


********


रानी की सास परबतिया रोज सुबह उठ कर भट्टी में आग फूंकती। बड़ी-बड़ी लकड़ी के अलावा और तेज आंच उठाने के लिए धान का भूसा झोंकती, जिससे आग भभक उठती। आग की लपटें बाहर तक निकलती। रानी दूर से देखती, परबतिया का चेहरा लाल हो जाता। ये रोज का क्रम था। रानी कभी भट्टी के आसपास से नहीं गुजरी जबकि एक, दो बार दबी जुबान में परबतिया ने उसे भूसा झोंकने को कहा था। परबतिया के भीतर थोड़ा सासपन आने लगा था। बहू को आए छह महीने से ज्यादा हुए थे। वो चाहती थी कि बहू घर का सारा काम संभाल ले। एक दिन बोल ही दिया - "लगता है, हम खटते-खटते एक दिन मरिए जाएंगे। कौन संभारेगा चूल्हा-भट्टी, अकेले गुड्डुआ से सपरेगा नहीं, बाप अलगे बीमार रहता है।"


रानी से महक बर्दाश्त नही होती। उसे महक तो अपनी झोंपड़ी के आसपास जमा कीचड़-पानी से भी आती। कच्ची सड़क से झोपड़ी तक आने में पानी जमा हो जाता है। रानी ने गुड्डू को बोल कर कुछ ईंटे मंगवाई और कच्ची सड़क से झोपड़ी तक पानी के ऊपर रख कर अपने लिए सड़क बना ली।  


वो अपनी सास की मदद करने में खुद को अक्षम महसूस कर रही थी। उससे जितना संभव था, काम कर देती थी। बस भट्टी के पास नहीं फटकना चाहती थी। गुड्डू जानता था कि जिद्दी मेहरारू मिली है, ठान ली है तो नहीं मदद करेगी। महुआ छानते-छानते उसकी तरफ देखता तो रानी झटक-मटक चल देती। दिन में एक बार साइकिल रोज चलाने लगी थी। कहीं भी निकल जाती। आस-पास के स्कूलों को निहार आती। 


गांव में एन जी ओ वाले आए तो उनके साथ सहयोग करने में लग गई। इसका मन बाहर ज्यादा रमता।


एक रात गुड्डू मचल गया- "कभी हमको भी साइकिल जितना पियार कर लो… बाकुम… बाकुम… साइकिल को चुम्मा-चाटी, मरदा को लुक्का-लाठी… का हो...।"


"दुर्ररर...।" रानी ने उसे केहुनी से धक्का दिया। 


"एक गायक की कोई इज्जत ही नहीं घर में...हम गाना बना कर गा रहे तुम्हारे लिए और तुम..."


"अरे जाओ...बड़े आए। इतना बोल कर चुप हो गई। एक बात मन में उठी और वहीं घुट कर रह गई- "गाना आता तो दारू नहीं बनाते।” 


ताना मार कर उसका दिल नहीं दुखाना चाहती थी। उसका जवाब वो जानती थी। यही कहेगा कि इसी से घर चलता है। यही हमारी रोजी-रोटी है।


वह चुप बैठ गई। पीढ़ा पर बैठी रानी को गुड्डू कुछ देर अपलक निहारता रहा। सोचता रहा कि उसकी मेहरारू उसके टोले की औरतों से अलग क्यों दिखती है। रानी उसके लिए आलू का चोखा बनाने में लगी हुई थी। हवा में लाल मिर्च की तीखी झांस उठी तो उसे छींक आ गई। 


रानी ने सिर उठाया- "तुम हमीं को घूर रहे हो इतनी देर से। चलो बैठो, खाना खा लो।" 


गुड्डू ने भात के बीचों बीच गड्ढा बनाया और मूंग की पतली दाल उड़ेली। उँगलियों से चोखा दाल में छपाक से डाला।


"ऐ जी तुम खा रहे हो कि खेल कर रहे हो। खाओ न।"


रानी ने टोका तो गुड्डू बोला- “हम लोग की जिनगी यही जुटाने में चला जाएगा क्या? “


“खाते समय रोते नहीं, खाना सरीर में नहीं लगता। तुम अइसे भी दुबरा रहे हो… हमीं ध्यान नहीं दे रहे तुम पर। हम आगे और अच्छा खाना बनाएँगे…”


“अच्छा खाना… कहाँ से? बापू लाचार हो गया। देह गिर गया। मइया भी खटिया पकड़ेगी जल्दी। कैसे चलेगा हमको यही चिंता खाए जा रही। “


रानी कुछ पल जमीन पर निगाहें गड़ाए रही। फिर निगाहें उठा कर अपनी झोंपड़ी को देखा।


आंगन बड़ा था, चारों तरफ ईंट और फूस का घेरा था। रानी ने गुड्डू की तरफ देखा। वो मुंह में भात का कौर रख लिया था।


“सुनो… एक छप्पर डाल लें अंगना में। बाबू बाहर सोते हैं, माता जी यहां सोती हैं। ठंड पड़ेगी इस बार कस के। हमको सुहा नहीं रहा कि बूढ़ा-बूढ़ी बाहर सोएं और हम जवान जहान भीतर।”


कहां‌ से, कैसे ? गुड्डू की आंखों में सवाल उभर आए, भारी सवाल थे, बोझ से पलकें झुक गईं। वो जल्दी-जल्दी कौर खाने लगा। रानी चुप रह गई।


"छप्पर कहां से छवाएंगे? बाप के घर से एगो साइकिल लेकर आई हो। बेच दो … पड़े-पड़े जंग लग रहा है।"


कुल पल के लिए रानी सकपका गई। क्या बोल रहा है गुड्डू। उसका प्राण प्रिय मरद, जिसके आगे मन प्राण से बिछी रहती है। जिसके लिए हौसला बन कर खड़ी है। वही ऐसी बानी बोल रहा है। रानी का मन हुआ, एक मुट्ठी गर्म भात थरिया से लेके अपने इस मर्द के मुँह पर फेंक दे। वो इस घर परिवार के लिए समृद्धि के दरवाज़े खोलना चाहती है। अपनी थोड़ी पढ़ी-लिखी बुद्धि लगा कर कुछ अच्छा करने की कोसिस कर रहे, ई प्रचंड मूरख… बिना कोसिसे के पहिले ही हार मान लेता है …हद्द है।


रानी ने अपने क्रोध पर काबू पाया। उसके दिमाग में साइकिल घूम रही थी। कैसे बोला ये बात। इसके बदले सुनना तो पड़ेगा। 


वहां से उठ गई। गुड्डू अकेला चुपचाप खाता रहा। वो रात उन पर भारी गुजरने वाली थी। झगड़े के बाद भी एक ही जगह सोना था। आज उससे सटने का मन नहीं था। उसकी साइकिल खतरे में थी। गुड्डू की कुदृष्टि उस पर पड़ चुकी थी।  


उसने तय किया खटिया पर नहीं सोएगी। 


उस दिन गुड्डू भी घर देर से लौटा। उसका खाना थरिया में रख कर रानी जल्दी लेट गई थी, फर्श पर। मिट्टी की फर्श ठंडी होती है। उसे अच्छा लग रहा था। अपने नइहर से लाई थी, पतली-सी सूजनी। खुद ही बनाई थी पुराने नये कपड़ो को मिला कर। दर्जी टोला का चक्कर लगाती और कपड़ों की बड़ी-छोटी कतरनें उठा लाती। माई की पुरानी साड़ियां भी मिल गईं। अपने ब्याह के लिए सूजनी और तकिया खोल, यही दो चीज बनाई। तकिया खोल पर फूल और नाम काढ़े। अपनी बनाई हुई चीजें बहुत सुकून देती हैं। रानी को अहसास हुआ। तकिया पर काढ़े गए फूलों से पहली बार खुशबू आ रही थी। उसने पलट कर नाक से फूलों को छुआ। सच में उसे गुलाब की गंध निकल रही थी। ये कैसे। वो हैरान। बार-बार सूंघती रही। मन का कसैलापन थोड़ा कम हुआ। वो तो ठाने बैठी थी कि गुड्डू ने टोका तो फट पड़ेगी। चाहे आवाज सब लोग सुन लें। वैसे भी उसके टोला में रात-दिन कुकुरझांव होता ही रहता है। कभी कोई पिट रहा है तो कोई पीट रहा है। गाली-गलौज तो आम बात है। औरतें भी आपस में झांव-झांव करती रहती थीं। बहुत ही अशांत टोला था, महुए की सड़ी हुई गंध से भरा हुआ। इससे हवा में नशा होता तो रानी अब तक मतवारी हो गई होती। 


घर में तनाव गहरा गया था। सब चुपचाप अपनी ड्यूटी निभा रहे थे। रानी चूल्हा चक्की सँभाल रही थी। सास-ससुर महुआ सुखाते और दारू बनाने की प्रक्रिया निपटाते। गुड्डू खेतों की ओर चला जाता। कभी मजूरी कर लेता। एक दिन की मजूरी में अच्छे पैसे मिलते, वो खुशी-खुशी घर लौटता मगर रानी से ज्यादा बात नहीं करता। दोनों को एक दूसरे से चिढ़-सी हो गई थी। गुड्डू खटिया पर सोता और रानी नीचे पतली सूजनी बिछा कर सो जाती। खुद को अपनी पहनी हुई साड़ी से ढँक लेती। गुड्डू रात में कसमसाता। मन करता, हाथ झुका कर रानी को ऊपर खींच ले। लेकिन सिहर जाता। अगर चीखने-चिल्लाने लगी तो आवाज आंगन और बाहर तक जाएगी। अगर-बगल में भी सुनाई देगा। बात का बतंगड बनते देर न लगेगी। रानी साइकिल उठा कर चल पड़ेगी तो वो कहां मुंह दिखाएगा। जाति-बिरादरी में सब दिल्लगी करेगा। कितनों की मउगी गरीबी की वजह से भाग चुकी है। गुड्डू उनमें शामिल नहीं होना चाहता। किसी भी तरह रानी को मना लेना चाहता है। मनाए कैसे? रानी ने उसकी मर्दानगी पर चोट कर दी। जैसे सबसे बड़ा निकम्मा और नाकारा हो।


उधर रानी सोने का नाटक करती, सोती नहीं। बाहर से आंखें बंद मगर आत्मा की आंखें जागी रहतीं।


बचपन की कहानियाँ, उनके किरदार आत्मा में ज़िंदा होते और वह उन्हें देखती। रानी के मन में क्या चल रहा है, उसे कतई अंदाजा नहीं। गुस्से में गुड्डू भी था और रानी भी। दोनों एक-दूसरे से रूठे थे। मनाने की पहल कौन करे। दोनों सोचते कि पहले वो झुके। खटिया के नीचे हाथ ही तो बढ़ाना है। गुड्डू सोचता, नीचे से हाथ ही तो उठाना है। एक बार खटिया पकड़ ले तो हम बाँहों में भर ऊपर उठा लेंगे। लेकिन नौबत नहीं आ रही थी।


गुड्डू रानी की उपेक्षा करके सो जाना चाहता था। आंखें मुंदने ही लगी थीं कि उसे अंधमूंदी आखों से कुछ झिलमिल-झिलमिल दिखाई दिया। आम की गाछी में रानी फुदक रही है। वो चिड़िया बन गई है, बड़े डैनो वाली चिड़िया। उसके डैनों से तेज हवा आ रही है, गुड्डू की लुंगी उधियाने वाली है। उसने जोर से लुंगी को पकड़ा। अचानक वो चिड़िया मछरी में बदल गई। उसके देखते-देखते चिड़िया ने काया बदली। वो अचरज से देखने लगा। रानी कितनी मायावी है। बड़े से पोखरे में वो सुनहरी मछरी तैर रही है।


वो किनारे पर खड़ा है, हाथ पानी में डाल कर उसे पकड़ना चाहता है। तभी रानी की हंसी पीछे से सुनाई दी। पानी से मछरी गायब। पीछे से साइकिल पर तेज-तेज पैडल मारती हुई रानी चली आ रही है। वो खिलखिला रही है अपने आप। जाने किस बात पर। वो अपनी जगह पर ठिठका रह जाता है। क्या माया है, कभी चिड़िया तो कभी मछरी और अब असली रूप में। क्यों छल रही है उसे। साइकिल चली आ रही है, रानी हंसती हुई उसे आवाज दे रही है..."गुड़्डू… गुड्डू..."


झटके से नींद खुली। रानी उसके चेहरे पर झुकी हुई थी, झकझोर कर जगा रही थी। भोर हो चुकी थी। बाबू काम पर जा चुके थे। माई का कहीं पता न था। वो अकबकाया हुआ उठा। 


"तुम तो अभी… साइकिल पर… चिड़िया… मछरी… क्या था… कहां गई थी...‌भोरे-भोरे…"


"क्या हुआ, पगला गए हो क्या। जरूर सपनिया रहे होगे। जागो, देखो, हम क्या खोजे हैं तुम्हारे लिए। तुम्हारी माई सब बताई हैं हमको। हमको बाबू का एक पिटारा मिला है। उसमें कुछ सामान है… और हमको मन में एक बिचार आया है। उठो...।"


गुड्डू कुछ बोले बिना चापाकल पर हाथ मुंह धोने भागा।


रानी के हाथ में कुछ सामान था।


गुड्डू दातुन करके लौटा तो देखा अंगना में रानी कुछ सामान पसार कर बैठी है। बहुत प्रफुल्लित। इतना कभी देखा नहीं। ऐसा क्या खजाना मिल गया कि भोरे-भोरे भंगिया गई है। लड़ाई-झगड़ा सब भूल गई। मुंह फुलाफूली था, वो भी खत्म। कुछ चमत्कार जैसा लग रहा।


रानी पानी का लोटा उसकी तरफ बढ़ाते हुए गाने लगी- 


"बाकूम बाकूम... बोले बाजा बाजे,

बारात चली रे, शहरिया साजे।

आगे-आगे नाचे लौंडा टोली,

पीछे हँसे सब बूढ़ा-जवानी जोली!

साजन के घरवा में लइकी नाचे,

झुमका हिले, ओठवा साजे।

डीजे बोले, बाजा गरजे,

दूल्हा मुसकाए, साली तरसे!  

बाकूम बाकूम...का हो..." 


रानी के हाथ में पुरानी झंझरी थी। उसको दायें हाथ से लय में बजा रही थी। पसरे हुए सामानों में रंगीन नकाब टाइप का पुराना चमचमाता हुआ कपड़ा था। 


"ये सब कहां से मिला?"


गुड्डू की आंखों के सामने एक धुंधली-सी तस्वीर उभरी। एक पुरुष छाया उसे बजा रही है, गा रही है और लोग आनंद उठा रहे। बैठकी जमी है, तालियां बज रही हैं। "गाओ...गाओ...देबू ...क्या गला पाए हो।” कोई कह रहा - "धारदार व्यंग्य गाते हो। जरा मुखिया जी का मजाक उड़ाओ ...उनके सार (साले) को भी मत छोड़ना।" 


देबू का चेहरा रंगीन , चमचम नकाब से ढंका है। गाने के बोल में मजाक उड़ाने का भाव है। 


"सबे पतोहू, उनके पतोहा…

बेटा गइल केरवानी (केला का बागीचा) में

सास गईल सिरहानी में 

दिया बरअ ता...लइका पढअ ता

दीया बुत गईल, लइका सुत गईल

बाकुम...बाकुम....का हो…”


लोग हंस रहे, औरतें खिलखिला रही हैं। सबने घेर रखा है। बाबू के हाथ में बड़ा-सा कटोरा है। गाना खत्म हुआ तो सब लोग कुछ न कुछ दे रहे हैं। बाबू के साथ खड़ा एक बच्चा सब कुछ समेट कर एक झोले में रख रहा है। 


वहां से बाबू आगे चल पड़ते हैं। आसपास के कई गांवो में लगन है, जहां उनको गाने जाना है। गाने से हंसाने जाना है। मजा दिलाने जाना है। बच्चा भी साथ-साथ घिसटता हुआ चला जा रहा है। 


धुंधलके में दृश्य बदलता है, जो एकदम साफ है।

 

बाबू को महुए और शराब का ठेकेदार समझा रहा है- कब तक गा, गा कर भीख मांगते रहोगे। सरकार शराबबंदी कर दी है। हमारी देसी की मांग बढ़ने वाली है। पहले कम थी। अब तेज होगी। हम लोग अच्छी क्वालिटी देंगे। पूरा टोला राजी है। तुम भी मान जाओ। बाबू थोड़ी आना-कानी करने के बाद अपना सारा तामझाम समेट कर पिटारे में रख देता है, जैसे कोई संपेरा अपने सांपों को रखता है। 


उसके बाद घर का माहौल बदला, महक बदली, रंगत बदली। हालात बेहतर हुए। बाबू गाना भूल गया। कभी-कभी देर रात गुनगनाता, खुद ही गाता, खुद ही हंसता। कभी नशे में तो कभी होश में। 


रानी ने पिटारा खोज लिया, खोल दिया। सांप पिटारे से बाहर। रानी उसे ऐसे घूर रही है, मानो गाना गा रही हो- "संपेरा बीन बजा...बीन बजा...मैं तो नाचूंगी...।" या रेडियो चला दिया हो किसी ने। 


"क्या सोच रहे हो...? मत सोचो...हम लोग हमेशा भाग को ही कोसते रहेंगे क्या। जात-पात, गरीबी इसी को कोसते मरेंगे। हाथ पर हाथ रख कर बैठे और रोते रहे कि हमारी जिनगी कैसे कटेगी। कुछ करोगे भी। कुछ अलग काम करने का प्रयास किए कभी? गाने का काम गंदा थोड़े है। हम लोग इस पर सोचेंगे...नये तरह से कुछ करेंगे...हम देवी जी के पास जाएंगे...वो मदद करेंगी हमारी।”

 

"तुम क्यों चाहती हो रानी...? हम ये सब करें जो कभी नहीं किए।" 


"जिन चीजों में हमको रुचि नहीं होती है न उसे हम उसे खोज नहीं पाते हैं। तुमको गाने में रुचि नहीं है या भीख मांगने जैसा महसूस हो रहा है। सच-सच बताओ...हम फिर रास्ता निकालेंगे..."


गुड्डू अनमना -सा बैठा रहा। 


"मुझे भूख लगी है। सतुआ ही दे दो घोर के। नींबू का रस चुआ देना..."


रानी ने वहां से सब सामान समेटा और झोपड़ी के अंदर चली गई। गुड्डू सतुआ पी कर काम पर चला गया। रानी के मन में खिन्नता भर गई। उसकी बात को महत्व दिए बिना चला गया। वो जैसे अधूरी-सी प्यास लिए बैठी रह गई। 


उस सुबह जब वो जगी थी, तब बाहर हल्का कुहरा था लेकिन उसके मन में उम्मीद का सूरज उगा था। उसे लगा था जैसे एक रात ने उसे जिंदगी की चाबी सौंप दी। हर चीज जो ठहरी हुई थी, वो गतिमान हो गई थी। गुड्डू के अनमनेपन के बावजूद रानी के मन में उम्मीद की हल्की लौ जल रही थी। 


उसके हाथ जो चीजें लगी थीं, उससे उम्मीद की लौ धधक गई। मन ही मन ठाना कि अगर गुड्डू नहीं माना तो धमकी से काम लेगी। पहले देवी जी से मिलेगी, उसने राय विचार करके कोई कदम उठाएगी। देवी जी स्कूल में एक मास्टर जी को समझाई थीं- "जेकरा गांड़ में दम होता है न बबुआ, जिनगी ओकरे परीच्छा लेती है। थोड़ा दम दिखाओ दम। तुम पक्का सफल हो जाओगे।"


ये बात गांठ बन कर मन में रह गई थी। मास्टर जी का क्या हुआ, नहीं पता मगर उसके लिए ये मंत्र हो गया। वो बिना कोशिश के हार नहीं मानेगी। दम दिखाएगी दम। रानी को देवी जी पसंद थीं। उनका रहन-सहन, बातचीत का अंदाज, मोहिनी हंसी। वो बात-बात में फकरा पढ़ती थीं। छोटा-सा स्कूल था। सबको सबकी बात सुनाई देती थी। उनकी बहुत-सी बातें याद हैं उसको। 


********


हम्मम। तो ये है तुम्हारी कहानी। 


"हमको क्या करना है ये बताओ...तुम मेरे पास आई हो, हम तुमको खाली हाथ तो नहीं जाने देंगे। बताओ..."


रानी और देवी जी देर तक खुसुर-फुसुर करते रहे। वहा साग खोंटती औरतों तक को कोई भनक न लगी। कुछ देर बाद रानी वहां से चली तो वो पैदल थी। हाथ में साग-सब्जी का झोला मलकिनी थमा दी थी। और भी कुछ दी होंगी, किसी ने नहीं देखा। देवी जी ने अपने सेवादार रमेसर को उसकी साइकिल को दूसरे आंगन में संभाल कर, लॉक करके रखने का आदेश दिया। रानी साइकिल विहीन लौट रही थी। साग खोंटने वालियां चकित कि ये क्या हो गया। मूसनी की साइकिल मालकिन ने क्यों रख ली। ऐसा क्यों की मालकिनी। 


एक मुंह बिचकाई- "इनसे दमड़ी भी न निकलता है। बेचारी की साइकिल भी रख ली।" 


दूसरी बोली- "रनियां एतना खुस-खुस काहे गई जी। कोई तो बात है। कोई अपनी चीज गंवा कर ऐसे अगराते हुए जाएगा का। तीन कोस दूर बोचहा गांव है, पैदल कैसे जाएगी।"


दोनों सशंकित होती हुई आंगन में चली गई। देवी जी कुछ देर सोच में डूबी रहीं। रानी को जाते हुए देखती रहीं। उन्हें रानी को देख कर कनक स्त्रोतम के एक श्लोक में वर्णित समुद्र कन्या कमला की मंथर, मंद , अलस चाल याद आई और उसकी अर्धोन्मिलित दृष्टि भी जिसके प्रभाव से ऋषियों की तपस्या भंग हो सकती थी। उन्हें रानी सबसे सुंदर लगी। 


उन्हें भीतर से पुलक जगी। वो किसी के काम आ सकती हैं। किसी को राह दिखा सकती हैं। उनकी पहुंच का फायदा किसी जरूरतमंद को मिल सकता है। मन ही मन ठान लिया कि अपनी पूरी ताकत झोंक देंगी। उन्हें इतना अच्छा कभी महसूस नहीं हुआ था। मानों उन्हें कोई काम मिल गया हो। बहुत दिन बाद कॉपी-कलम उठाई और कुछ लिखने की कोशिश करने लगीं। 


उधर उस शाम गुड्डू जब घर लौटा तो घर का माहौल ही बदला हुआ था। उसके बाबा अंगना में एक और कमरा उठा रहे थे। बांस और फूस को बांध कर दीवार तैयार कर कर रहे थे। उसकी माई उनको बांस छील-छील कर दे रही थी। रानी फूस उठा-उठा कर थमा रही थी। 


ये क्या हो रहा है? उसने आंगन में नजर दौड़ाई। बड़ी साफ-सफाई हुई थी। थोड़ी देर उन सबको वो घूरता रहा। 


"आज दस बोतल का ऑर्डर था। बना नहीं का। आप लोग किए क्या दिन भर? ठेकेदार आएगा लेने। क्या कहेंगे। एडवांस पैसे ले चुके हैं हम।" 


"तेरी मेहरारू हमारे लिए एक और झोपड़ी बनवा रही है। तुम भी लगो, जल्दी तैयार हो जाएगा। सर्दी बढ़ने वाली है। मेरी खांसी बढ़ गई है।" 


"ये सब सामान कहां से आया...? "गुड्डू हैरान हुआ। 


"मेहरारू से पूछो। साईकिल बेच आई।" 


इस बार माई बोली। वो तेजी से बांस छील रही थी। वो उत्साह में थी। 


गुड्डू के पैरो तले जमीन खिसक गई। होश उड़ गए। उसने आंगन के उस कोने की तरफ देखा जहां रानी की साइकिल लगी रहती थी। वहां खाली जगह टुनटुना रही थी। उसकी मेहरारू ने अपनी प्राणप्रिय साइकिल बेच दी। ऐसा कैसे। ये मामूली बात नहीं है। उसका सिर साइकिल के पहिये की तरह घूमने लगा। उसने आंगन में रखे मचिया का सहारा लिया, उस पर धम्म से बैठ गया। 


रानी का चेहरा देखने की हिम्मत न थी। न ही अपना चेहरा दिखाने की। उसके माई बाबू के लिए रानी ने अपनी साईकिल बेच दी। और एक वो है...रानी की बात ही नहीं सुन रहा है। आखिर ऐसा क्या चाहती है रानी उससे। उसकी बात सुन भी न सका था पूरा। मुझे इसकी साइकिल वापस लानी होगी। जाने किसको बेच आई। वही साइकिल मिले न मिले। क्यों किया ऐसा रानी...सोचते-सोचते उसे रुलाई आने लगी। 


"गुड्डुआ...ठीक ही कहती थी इसकी देवी जी। एक लइका पढ़ेगा तो घर बनाएगा। एक लइकी पढ़ेगी तो गांव।"


माई खिलखिला रही थी। उसे याद नहीं, माई को इतना हंसते कब देखा है।


गुड्डू की हिम्मत नहीं हो रही थी किसी से आंख मिलाने की। रानी से कुछ पूछने की। बार-बार साइकिल वाली जगह पर नजर जाती, वो नजरें झुका लेता। मुंह से आह निकली। कितना कठोर हृदय किया होगा। उसका भी तो हृदय कठोर है कि अपनी काबिल मेहरारू की बात ही नहीं सुनना चाहा। आखिर वो चाहती क्या है। क्या रास्ता सुझा रही है। कुछ तो खिचड़ी पक रही है उसके दिमाग में। कुछ खास न होता तो उसके घरवाले उसकी बातों में कैसे आ जाते। 


शायद रानी उसकी मनोदशा समझ रही थी। वो यही मनोदशा चाहती भी थी। बड़े इत्मीनान से उसके पास आई और ब्लाउज से छोटा-सा स्मार्ट फोन निकाल कर आगे कर दिया। पुराना ही लग रहा था। सेकेंड हैंड।


गुड्डू ने तो दो हजार वाला मोबाइल फोन शादी के समय मिले पैसों से खरीद लिया था। रानी हमेशा से स्मार्ट मोबाइल लेना चाहती थी। उसको वीडियो देखने का बड़ा शौक था। हमेशा कहती कि खुद कमाएगी तो पहली चीज मोबाइल ही खरीदेगी। गहना-गुड़ियां कुछ न चाहिए। बस मोबाइल की तमन्ना थी। वो भी स्मार्ट फोन। रानी छोटे-मोटे सपने नहीं देखती थी। उसकी तीर-कमान की तरह खींची हुई आंखों में रंगीन ख्वाहिशें छलछलाती रहती थीं। गुड्डू समझता था और उसे पूरा न कर पाने की अपनी अक्षमता पर कई बार शर्मिंदा हो चुका था। 


रानी के हाथों में मोबाइल आ चुका है। 


गुड्डू की आंखों में सवाल उभरे। 


"देवी जी...।" रानी के मुंह से बस इतना निकला।

 

"ओह..। तुम गई थी का वहां? तीन कोस चली गई ? काहे… पैदल कि साईकिल...?"


गुड्डू सोचा, इसी बहाने पता लग जाएगा कि साइकिल का क्या हुआ। सीधे पूछने का नैतिक साहस नहीं जुटा पा रहा था। 


"ये सब छोड़ो, देवी जी के पास चलो। वो बुलाई हैं। सिम कार्ड भी उनके पास आ गया होगा।" 


देवी जी के बारे में रानी से पहले भी मजेदार किस्से सुन चुका था। उनके बारे में अच्छा-खराब सब बताती रहती थी। 


गुड्डू के भीतर उसे मना करने का, अपनी स्त्री से विरोध जताने का मर्दाना साहस छूट चुका था। उसे जाना ही होगा। सोच बदलती है तो आंखें उसे प्रकट कर देती हैं। उसकी तरल आंखें कृतज्ञता से रानी को देखने लगी थीं। उसे कुछ नहीं पता कि आगे रानी कौन दिशा में लेकर जाएगी। उसने अपनी कलाई उसे थमा दी।



********


गुड्डू और रानी दोनों जब देवी जी के पास पहुंचे तो वो बाहर बैठी मोबाइल पर बात कर रही थीं और कुछ समझने की कोशिश कर रही थीं। दोनों को खटिया पर बैठने का इशारा किया। खुद कुर्सी पर बैठी थीं। चाहती थी कि उन्हें भी कुर्सी पर बैठाएं , लेकिन दोनों नही बैठेंगे और चौधरी जी आ टपके तो आफत कर देंगे। वे जानती थीं कि न उनकी हिचक टूटी है, न चौधरी लोगो का दिल बड़ा हुआ है। दोनों में वक्त लगेगा। गुड्डू तो खटिया पर बैठने से पहले हिचका था। रानी ने हाथ पकड़ कर बिठा लिया।  


"बेटा से बतिया रहे थे, सिंगापुर में बस गया है। वहीं से फोन किया था। कुछ पूछ रहे थे। तुम्हारे काम की चीज। हम सब समझ गए हैं। बैठो, हम समझाते हैं। मोबाइल चार्ज करके लाई हो।" 


"जी..." रानी ने मोबाइल आगे बढ़ा दिया। 


देवी जी ने अपने बटुआ से एक पेपर निकाला, उसमें सिम निकाल कर रानी के मोबाइल में डाल दिया। 


"और सब सामान कहां है?"


देवी जी के पूछते ही अपना झोला रानी ने आगे कर दिया। 


"गुड्डू के हाथ में दो...।" देवी जी ने गुड्डू को ध्यान से देखा। गहरा सांवला रंग, गबरू जवान लड़का। कुर्ता-पाजामा पहने भला लग रहा था। इसे और संवारा जा सकता है। 


रानी ने एक बड़ा-सा झुनझुना गुड्डू के हाथ में थमा दिया गया। गले में रंगीन गमछा देवी जी ने रानी को दिया कि इसके गले में डालो। एक सूची बैग गुड्डू के कंधे पर लटकाया गया। 


"तुमको मालूम है गुड्डू, कितनी बड़ी नियामत है तुम्हारे पास। तुम एक लोक कलाकार के बेटे हो। तुम खुद भी लोक कलाकार हो। इसको जिंदा रखो, रानी यही चाहती है। इतनी बड़ी कला को मरने मत दो। हम कई गांव में ढुंढवाए, कहां मिला "बाकुम बाकुम” गाने वाला। लल्लन बाबू बता रहे थे कि उनके ससुराल सिसवां बाजार में एक-दो कलाकार बचे हुए हैं। तुमको बचाना है इसको। हम लोग काम दिलाएंगे। मंचों पर भेजेंगे। बात चल रही है मेरी।" 


"रानी को एक काम सिखा देंगे। तेज है मूसनी..."


देवी जी को मूसनी बोलते हंसी आ गई। 


"आदत पड़ गई, बुरा मत मानना। रानी...हां, रानी को अंग्रेजी आती है। सातवीं क्लास में हमी पढ़ाए थे, कर लेगी न।" 


"थोड़ी-बहुत हमको भी आती है देवी जी..."


गुड्डू भी हंसने लगा। सर्दी की धूप उनकी हंसी से और चमक उठी थी। मोबाइल से रानी का फोटो खींच कर देवी जी ने इंस्टाग्राम पर प्रोफाइल बनाया। और गुड्डू को बाकुम-बाकुम गाने को कहा। वो खड़ा हो गया। गमछा सीधा किया। कंधे पर झोला टंगा था। बाबू की धुंधली तस्वीर साफ होने लगी थी। जैसे कोहरा छंटने के बाद वादियां साफ दिखाई देने लगती हैं। द्वार पर ही घूम-घूम कर गुड्डू गाने लगा-


"बाकुम...बाकुम…

सासू कहे बहुरिया धीरे बोल

देवरवा कहे भाभी हो, तोरा में गोल

हंसी-ठिठोली में सब दिल हारे,

नाच गावे सब बालक-बूढ़ा सारे।

बाकूम बाकूम, अरे बजा ढोलकिया...का हो..."


एक हाथ से झुनझुना बजा कर गुड्डू अपनी सुरीली आवाज में गा रहा था, उसकी काया में उसके बाबू प्रवेश कर चुके थे। उसकी आवाज में दोहरा दम आ गया था। रानी और देवी जी दोनों उसका वीडियो बना रही थीं। बाहर मजमा लग गया था। सारे आस-पास के लोग काम छोड़ कर सुनने आए। सबको मजा आ रहा था। झुनझुने की ध्वनि समां बांध रही थी। तभी चौधरी जी पधार गए।  


"क्या सब हो रहा है देवी जी। दुअरिया पर पमरिया बुलाई हैं का...। अभियो पमरिया मिलता है का?" 


चौधरी जी की रोबदार आवाज द्वार पर गूंजने लगी थी। देवी जी एक पल के लिए अकबका गईं कि अचानक कहां से प्रकट हो गए। ब्लॉक गए थे, जल्दी कैसे लौट आए। 


"कौन समांग (जाति) हो जी? ई सब क्या तमाशा लगा रखे हो दुआर पर, कहीं और जाकर नाचो-गाओ। देवी जी को कुच्छो बुझाता नहीं है।"


"गुड्डू...निराला । लोक कलाकार है...आप जाति क्यों पूछ रहे हैं। ये बात ठीक नहीं है।"


"पूछ दिए तो अपराध हो गया क्या। आप तो हद्दे रिएक्ट करती हैं देवी जी। ई बाकुम-बाकुम का है हो...कउन भासा में गाते हो कलाकार जी ?"


चौधरी जी अब हंसी उड़ा रहे थे। 


देवी जी तिलमिला गई थी। उन्हें चौधरी जी की ऐसी बोली चुभ गई थी। बड़ी मुश्किल से वो अपने जातीय अभिमान से ऊपर उठ रही थीं। उनके बेटे से हुई बातचीत ने उन्हें पूरी तरह बदल कर रख दिया था। चौधरी जी जैसे लोग कभी नहीं बदलेंगे। वो अपने द्वार पर कोई बखेड़ा नहीं चाहती थीं। वो कुछ कहतीं, उसके पहले ही रानी उखड़ गई-  


"हम वो समांग हैं जिनका नाम तक आप लोग नहीं लेते। न नेता सब चुनाव में लेता है। हमारे से किसी को कोई मतलब ही नहीं है। हमार जात का नाम भी आप ही लोगो का दिया हुआ है। हम मूस खाते थे। आप लोग बोले-मूसहर। अब हम लोग नहीं खाते। हमारे बच्चे भी नहीं खाएंगे। हम हुए न अन्नहर।" 


देवी जी से रहा नहीं गया। 


"हम आपको बाकुम-बाकुम के बारे में बताएंगे, जात-पात नहीं। हम बहुत खोज किए हैं, अभी करिए रहे हैं। हम इस कला को आगे बढ़ाएंगे। बाकुम-बाकुम नाद है, हिंदी में इसका कोई अर्थ नही है। बेटा बता रहा था कि इसकी ध्वनि अफ्रीकन भासा जैसी लग रही है। एक थ्योरी बताया कि झांसी की रानी की सेना में कुछ अफ्रीकन मूल के लोग भी थे। जब वो हार गई तो सेना तितर-बितर हो गई। अफ्रीकन मूल के लोग गंगा के आसपास बस गए। गुड्डू, रानी उसी समाज के लोग हैं। हो सकता है, बाकुम-बाकुम वहीं की भासा से निकला हो...।" 


देवी ने अपनी पूरी जानकारी उड़ेल दी। रानी अपना गुस्सा भूल कर उनका मुंह अचरज से देखने लगी। एकदम नई जानकारी दे रही थीं। उसे मालूम ही नहीं था कि उसका संबंध किसी योद्धा समुदाय से है। उसके पूर्वज योद्धा थे। अगर ये सच है तो ...। उसके भीतर योद्धा भाव और प्रखर होने लगा था। 


गड्डू चुप हो गया था लेकिन देवी जी की बाते सुन कर उसके मुंह से जोर से निकला- "बाकुम… बाकुम...।" 


चौधरी जी की मूंछे फड़क रही थीं। माथे पर चंदन टीका लगाए, गले में मोटे रुद्राक्ष की माला पहने भव्य लग रहे थे। देवी जी का बात करने का तरीका उन्हें खल गया था। 


हमको इतिहास पढ़ा रही हैं, इतिहास से वर्तमान की सच्चाई कैसे बदल जाएगी...। हुंह। वो दुआर पर बहस नहीं चाहते थे। सबके सामने पत्नी  से परास्त भी नहीं होना चाहते थे।


"बंद करिए ये सब… मेरे पीछे करिएगा बाकुम-साकुम...।"


हाथ उठा कर चौधरी जी ने फरमान जारी कर दिया। गुड्डू एक पल के लिए क्रोध से कांपा। उसने चौधरी जी को प्रणाम भी नहीं किया। चौधरी जी शायद चाहते थे कि उनके पैरो में झुके। वो नहीं झुक सका। झुनझुना लिए हौले-हौले हिलाता रहा। मानो चुनौती दे रहा हो। हांलाकि रानी को इतना जोर से बोलते सुन कर उसका जी धड़का मगर भीतर से सुकून भी मिला। जवाब ठोंक कर देती है रानी। वो क्यों पीछे रहे। उनकी जमीन में तो बसता नहीं। गांव भी अलग है। सुना कर ही लौटना ठीक होगा। 


"मालिक...अब हम देवी जी का रखा नाम हम आगे चलाएँगे।”


चौधरी जी का मुँह उतर गया जवाब सुन कर। उन्हें ऐसी तीखी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। गुड्डू जोर-जोर से झुनझुना बजाने लगा था। चौधरी जी बड़बड़ाने लगे - “केतना जमाना बदल गया है। दिमाग चढ़ गया है, सिर पर चढ़ कर नाचने लगा है सब। किस बात की अकड़ है…?”


गुड्डू गाने लगा - "बाकुम...बाकुम..का हो …"


गुड्डू ने सोचा न था कि वो अपने बाबू की तरह तत्काल कोई गीत बना कर सुना सकता है। इस वक्त उसकी काया बाबू की काया से छिटक कर स्वतंत्र हो गई। खुद पर हैरान हुआ जब उसके बोल फूटते चले गए- 


" बाकुम...बाकुम...का हो....

मेहरारू बोले चल कला दिखा दे

मरदा बोले चल चुप करा दे

हुन्के कपार पर नाचे कौआ

बारे खुद ही बागर मझउआ....

बाकुम..बाकुम...का हो...

ना मांगी हाथी-घोड़ा

ना मांगी कपड़ा-लत्ता

जा हो...

जुग-जुग जिअ

बेटा-पुतोह के लुगरी सिअ

बाकुम...बाकुम...का हो..। 


गाते -गाते रानी और गुड्डू वहां से निकले। पीछे-पीछे बच्चों और किशोरों की फौज उछलती हुई जा रही थी। देवी जी के इशारे पर रानी की साइकिल उनका सेवक रानी को थमा गया। रानी साइकिल पर सवार नहीं हुई, हाथ से हैंडल पकड़े मंथर गति से चली जा रही थी।


चौधरी जी भुनभुना रहे थे - "सर सोकलन का दिमाग खराब हो गया है। जरा-सा छूट दे दो तो कपार पर चढ़ कर मूत देता है। हिम्मत तो देखो, हम पर व्यंग्य कस के चला गया, सुरक्षित।" दो-चार गाली देना चाहते थे लेकिन उनके कान में सेवक ने कानून समझा दिया था। पता नहीं, समझे या नहीं। रानी और गुड्डू उनकी पहुंच से दूर निकल चुके थे।  


देवी जी ने हिकारत से चौधरी जी को देखते हुए किसी को फोन लगाया। वो कह रही थी कि रानी को जीविका दीदी का काम दीजिए। रानी का मोबाइल नंबर उससे साझा करती हुई आंगन की तरफ चली गई थीं। वो दिखा देंगी कि रानियां पैदा ही नहीं होतीं, बनाई भी जाती हैं। वो अपने पुरखों का पाप लेकर आगे नहीं जीना चाहती थीं। वो जान गई थीं कि लड़ाई शुरु हो गई है। उनके आगे सर्द अंधेरा था। अंधेरे का हठीला, परतदार ग्लेशियर। उनकी आत्मा की खरोंचे चेहरे पर उभर आईं और पूरी देह में फैलने लगी कि वो घबरा उठीं। वो अचानक जोर से चिल्लाई- चंदा, संझबाती जला रे। 


गोल चक्कर वेब पत्रिका अत्यंत सीमित संसाधनों से चल रही है। इस वेबसाइट के संचालन में आर्थिक सहयोग देने हेतु दिए गए क्यू आर कोड का उपयोग करें :


गीताश्री सुपरिचित कथाकार हैं। उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। 


उपन्यास : हसीनाबाद (2017), वाया मीडिया-एक रोमिंग कोरोस्पोंडेंट की डायरी (2020), राजनटनी (2020), अम्बपाली (2022), क़ैद-बाहर (2023), सामा चकवा (2024)।


कहानी संग्रह : प्रार्थना के बाहर एवं अन्य कहानियाँ (2013), स्वप्न, साज़िश और स्त्री (2015), डाउनलोड होते हैं सपने (2017), लेडीज़ सर्कल (2018), लिट्टी चोखा एवं अन्य कहानियाँ (2019), भूतखेला (2019), बलम कलकत्ता (2021), मन बसंत तन जेठ (2021), मत्स्यगंधा (2022), कामनाओं की मुंडेर पर (2025), दमनक जहानाबादी की विफल गाथा (2026)।


शोध कृतियाँ : सपनों की मंडी (आदिवासी लड़कियों की तस्करी पर आधारित, 2013), देहराग (बैगा जनजाति के गोदना कला और संस्कृति पर आधारित, 2013), देवियों का लोक (2026), हब्बा की खोज (2026)।


स्त्री विमर्श : स्त्री आकांक्षा के मानचित्र (2008), औरत की बोली (2011), अंधेरे समय में स्त्री (2018)।


संपादित किताबें : नागपाश में स्त्री (स्त्री विमर्श, 2010), कल के क़लमकार (बाल कथा, 2013), स्त्री को पुकारते हैं स्वप्न (कहानी संग्रह, 2013),‌हिंदी सिनेमा : दुनिया से अलग दुनिया (सिनेमा,‌ 2014), कथा रंगपूर्वी (कहानी संग्रह, 2015), तेईस लेखिकाएँ और राजेन्द्र यादव (व्यक्तित्व, 2009), उषाकिरण : क़िस्सों की खान ( आलोचना) प्रलेक प्रकाशन, 2020), वारिसों की ज़ुबानी (संस्मरण, 2020), रेखाएँ बोलती हैं-1 (रेखाचित्र, 2018), रेखाएँ बोलती हैं-2 (रेखाचित्र, 2019), अक्षुण्णा (स्त्री अस्मिता की कहानियाँ, 2021), वो क्या था? (रहस्यमय संस्मरण, 2020), वो भूली दास्ताँ (फ़िल्म गीतकार राजेन्द्र कृष्ण, 2022), मीठे घाट का पानी (उषाकिरण खान पर संस्मरणों का संग्रह, 2022), कैट क्लब (2026)। 


कथेतर गद्य : कुछ इधर ज़िंदगी कुछ उधर ज़िंदगी (यात्रा-वृत्तांत,‌ 2021), शहरगोई (संस्मरण, 2023)।


पुरस्कार/सम्मान : अंतराष्ट्रीय सृजन गाथा सम्मान (थाईलैंड), भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार, इलाहाबाद बैंक द्वारा साहित्य एवं कला क्षेत्र में दिया जाने वाला इला त्रिवेणी सम्मान (2012-2013), गाथांतर सम्मान (2018),  शिवना कथा सम्मान (2019), साबित्री बाई फूले सम्मान‌ (2018), सीनियर फ़ेलोशिप, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ( 2016-17),‌ प्रगल्भ-गौरांग सम्मान (2020), तिलका माँझी राष्ट्रीय सम्मान (2020), सूरज मारवाह साहित्य रत्न अवार्ड (2020), अखिल भारतीय शिक्षाविद पृथ्वीनाथ भान साहित्य सम्मान (2023), विद्यापति सम्मान, बिहार राजभाषा (2020-21),‌ रमाकान्त स्मृति पुरस्कार (2024), शिव कुमार शिव स्मृति सम्मान (2024), राजमणि देवी स्मृति साहित्य सम्मान (2024), स्पंदन कृति सम्मान (2025)।


Comments


bottom of page