top of page

प्रेम और युद्ध

  • May 8
  • 6 min read

Updated: Jul 8



मूल कहानी :‌ नगुयेन न्गोक थुआन
अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद : विजय कुमार यादव


प्रस्तुत कहानी ‘प्रेम और युद्ध’ उत्तर आधुनिक और अतियथार्थवादी शैली के लिए जानी जाती है, जो कि अधिकांश वियतनामी युद्ध कथाओं की पारंपरिक समाजवादी यथार्थवाद शैली में दुर्लभ है। ऊपरी तौर पर यह कहानी युद्ध और उसके विनाशकारी, सर्वभक्षी स्वभाव का एक सरल रूपक प्रतीत होती है लेकिन कथावाचक की उस नामहीन, मानवभक्षी महिला पात्र के प्रति भावनाओं के सूक्ष्म पक्ष इस अत्यधिक सरल व्याख्या को जटिल बना देते हैं–

 


अफ़वाहें थीं कि मनुष्य के रूप में वह राक्षसी है। इसलिए मुझे तनिक भी हैरानी नहीं हुई जब उसकी बग़ल में सोकर एक सुबह जागा तो पाया कि मेरी एक टाँग गायब है।


“जब मैं नींद में था, उस समय क्या तुमने मेरी एक टांग खा ली?” मैंने उससे पूछा।


वह नाराज़ हो गई और कहा कि अब से वह मुझे अपने साथ नहीं सुलाएगी। 


“ऐसा न करो,” मैंने मिन्नत की और कहा, “ मुझे लगने लगा है कि मैं वास्तव में तुमसे प्यार करता हूँ। लोग तुम्हारे बारे में जो कुछ कहते हैं, मैं उस पर विश्वास नहीं करता। तुम्हारी मुस्कान कितनी सुंदर है, तुम्हारे दांत कितने सफ़ेद हैं। तुम उन दांतों का इस्तेमाल मुझे काटने के लिए या अपने कोमल होंठों का उपयोग मेरा खून चूसने के लिए थोड़े ही करोगी।”


लेकिन वह फिर भी मुझसे नाराज थी।


मैंने उसे मनाते हुए कहा, “जब मैंने कल तुमसे यह पूछा था कि रात को सोते समय क्या तुमने मेरी टांग चबा ली थी, तो मैं सिर्फ मज़ाक़ कर रहा था।”


लेकिन उसने मुझ पर विश्वास नहीं किया।


“तुम भी बाकी लोगों की तरह ही हो। तुम भी वही सब कह रहे हो जो दूसरे लोग कहते हैं मेरे बारे में।”


उसकी बात सुनकर मैंने कहा, “ख़ैर, छोड़ो उन बातों को। काफी सोचने के बाद मुझे लग रहा है कि शायद मैंने अपनी टाँग युद्ध में गवाई थी। मुझसे ही भूल हुई होगी। जानती हो, अब मुझे याद आया कि युद्ध हुए तो बहुत दिन हो गए। असल में हमारे देश ने इतने युद्ध देखे हैं कि उन्हें ठीक से याद रखना मुश्किल है।”


अपनी टाँग गवाने के कुछ दिन बाद बैसाखियों के सहारे चलकर मैं उससे माफ़ी माँगने पहुँचा।  वह अब नाराज़ नहीं थी और उसने मुझे माफ़ कर दिया।


“ख़राब याददाश्त होना कोई चरित्र दोष नहीं है,” उसने कहा। “वैसे भी, मुझे पता है कि तुम मानसिक रूप से थोड़े विचलित हो।”


अचानक हम फिर से एक-दूसरे के प्यार में पड़ गए, पहले से भी ज़्यादा तीव्रता से। उसने मुझे अपने होंठ भी चूमने दिए।


उस सप्ताहांत, उसने मुझे फिर से अपने साथ  सोने दिया।


इस बार उसने कहा, “तुम मेरे पैरों के पास सो सकते हो।”


“पैरों के पास?” मैंने पूछा।


“हाँ, मेरे पैरों के पास,” उसने कहा।


उसके पैर सफ़ेद जेड पत्थर के टुकड़े की तरह सफ़ेद थे। उसके पैर इतने सफ़ेद थे कि मुझे लगा कि शायद वह उन्हें कभी चलने के लिए इस्तेमाल नहीं करती होगी। उसके पैर मुझे एक जोड़ी नाज़ुक सफ़ेद हाथ जैसे लग रहे थे।

आधी रात को मैंने उसके पैरों को छुआ तो अचानक मुझे अजीब तरह का झटका लगा, लेकिन उसके साथ-साथ ख़ुशी भी हुई।

उसके बाद मैं सो गया। संतुष्ट। तृप्त। 


अगली सुबह जब मैं उठा और देखा कि मेरी दूसरी टाँग भी गायब है तो मुझे उससे पूछना पड़ा, “कल रात जब मैं सो रहा था, तो क्या तुमने मेरी दूसरी टाँग भी खा ली?”


मैं कह तो गया लेकिन तुरंत ही मुझे अपने कहे पर पछतावा भी हुआ। मेरी बात सुनकर वह क्रोध से काँपने लगी। उसकी आँखें भर आईं।  उसका गला रुंध गया। कुछ बोल नहीं पाई।  

अंततः उसने मुझे घसीट कर कमरे से बाहर निकाला और धड़ाम से दरवाज़ा बंद कर दिया।


खाली बरामदे में रेंगते हुए मैं बेहद उदास महसूस कर रहा था। मुझे एहसास हुआ कि शायद उस पर से मेरा विश्वास उठ गया है। सोचता रहा कि मैं यह जीवन जी तो चुका हूँ लेकिन इस पर विश्वास नहीं करता। मैं प्यार पर विश्वास नहीं करता। मैं अपने दिल की बात सुनने की बजाय दूसरों की बात सुनता हूँ।


उसने मुझे अपने कमरे से बाहर ज़रूर निकाला लेकिन मैं दरवाज़े के सामने से हटा नहीं। इस उम्मीद में वहीं बैठा रहा कि शायद वह अपना विचार बदल दे।


मैं बैठा रहा, और इंतज़ार करता रहा.......।


इस दरम्यान हर कोई उसी अफ़वाह को बार-बार दोहरा रहा था कि वह मनुष्य के रूप में राक्षसी   है।


अंततः, एक बरसाती दिन में उसने दरवाज़ा खोला और मुझे अंदर आने दिया। फिर चुपचाप मेरे कटे हुए पैरों की चोटों की सफाई करने लगी। 


मैंने कहा, “यह तुम्हारी वजह से नहीं हुआ, शायद यह युद्ध की वजह से हुआ। हमने इतने युद्ध देखे हैं—फ्रांसीसियों के साथ युद्ध, अमेरीकियों के साथ युद्ध, और चीनियों के साथ युद्ध। मैं शायद यह भूल गया था कि तुमसे मिलने से पहले ही किसी न किसी युद्ध में मैंने अपने दोनों पैर खो दिए थे। पुराने युद्धों की वजह से ही हमारे प्यार के बीच दरार आई है। 


“मुझे माफ़ कर दो,” मैंने कहा।


“युद्ध को माफ कर दो। हर उस चीज़ को माफ़ कर दो जो हमारी यादों को नष्ट करती है। या हमें याद न रखने की वजह बनती है। या हमें पीड़ा पहुँचाती है।” यह बोलते हुए मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।


उसने कहा, “युद्ध पर नाराज़ होना बेकार है।”


इसके साथ ही मुझे पता चला कि उसने मुझे माफ़ कर दिया है।


“युद्ध एक घिनौनी चीज़ है । गलीज़”, मैंने कहा।

 

मेरी बात सुनकर वह ख़ुश होकर हँसने लगी। 


ज़ाहिर तौर पर वह भूल गई थी कि हमारे बीच मनमुटाव हुआ था और इसलिए उसने फिर से मुझे अपने साथ रात बिताने दी।


उसने कहा, “आज रात मैं तुम्हें अपने कंबल के भीतर सोने दूँगी।”


उसकी बार सुनकर मेरा हृदय बल्लियों उछल पड़ा था। इतनी ही प्रसन्नता मुझे उस दिन हुई थी जिस दिन हमारे देश का दक्षिणी हिस्सा मुक्त हुआ था।   


“युद्ध ने हमें अलग कर दिया है,” मैंने कहा। 


“लेकिन शांति हमारे हृदयों को गुलाब के फूलों की नाईं खिलने देगी,” मैंने कहा।


“मैं शांति से प्यार करता हूँ,” मैंने फिर कहा।


“और मैं युद्ध से नफरत करती हूँ,” उसने कहा।


“मैं भी,” मैंने कहा।


जब मैं तीसरी बार उसके साथ सोकर जागा, तो देखा कि मेरे दोनों हाथ भी ग़ायब हैं।


“ज़रूर, मैंने युद्ध में अपने हाथ और पैर खो दिए होंगे। मुझे शायद याद नहीं रहा” मैंने कहा। 


“मेरे प्रिय,” उसने कहा, “यह तुम्हारी ग़लती नहीं है। तुम्हारी याददाश्त ख़राब हो गई है, बस। ख़राब याददाश्त के लिए किसी को दोष नहीं दिया जा सकता।”


“ठीक कहा!” मैं बोला। “यह सब युद्ध की वजह से हुआ है। भाड़ में जाए युद्ध!”


“हमें अमेरीकियों की निंदा करनी चाहिए,और फ्रांसीसियों की भी,” मैंने कहा।


“और चीनियों की  भी!” उसने कहा।


“हमें उनका विरोध करना चाहिए,” मैंने कहा।


“जापानी फ़ासीवादियों का भी,” उसने कहा।


“मैं बहुत ख़ुश हूँ,” मैंने कहा।


इसके पहले उसने मुझे कभी इतना प्यार नहीं किया था।


मैंने कहा, “मैं इश्तहार छपवाऊँगा ताकि उसके द्वारा लोगों को बताया जा सके कि हमें युद्ध से नफ़रत करनी चाहिए। हमें युद्ध-विरोधी होना चाहिए। युद्ध हमारे आपसी प्यार को नष्ट कर देता है।”


उसने कहा, “आज रात मैं अपने वक्षों के नीचे तुम्हारा सिर रखने दूँगी।”


“तुम्हारे उरोजों के नीचे?” मैंने पूछा।


“हाँ,” उसने कहा। “मेरे वक्षों के नीचे।”


मैंने अपना सिर उसके वक्षों के नीचे रखा और सो गया। मैं इसके पहले उसके हृदय के इतना क़रीब कभी नहीं रहा।


जब मैं चौथी बार उसके साथ सोकर जागा, तो अपने पूरे शरीर को छुआ और महसूस किया कि मेरा सिर नहीं है।


“कोई समस्या नहीं है,” मैंने कहा। “यह बिलकुल सामान्य है। युद्ध का अनुभव करने के बाद हर कोई अपना सिर खो देता है। वैसे भी, सिर होने से हम और पागल हो जाते हैं,” मैंने कहा।


“युद्ध हमें पागल बना देता है,” उसने कहा।


उसके प्यार पर भरोसा करने के लिए वह मुझे इनाम देना चाहती थी।


उसने कहा, “आज रात ख़ास है। मैं तुम्हें सब कुछ देना चाहती हूँ।”


“सब कुछ?” मैंने कहा।


“हाँ, सब कुछ,” उसने कहा।


मेरी आत्मा उछल पड़ी। मैं उसकी बाँहों में समा  गया। मैं जानता था कि मैं इस प्यार का हक़दार हूँ। मैंने युद्ध में पर्याप्त बलिदान दिया था। यह मेरे सभी दुखों के लिए एक अद्भुत इनाम था।

इसके बाद मैं सो गया।


सिर्फ़ सच्चा प्यार करने वाले लोग ही इस बात को समझ सकते हैं कि जब कोई औरत आपके  शरीर से मांस का एक टुकड़ा काट कर उसे चबाती है, उसे केवल उसी समय सच्चे प्यार की अनुभूति होती है।


जब मैं पाँचवीं बार उसके पास सोकर जागा, तो मैंने यह देखने की ज़हमत नहीं उठाई कि अब मेरे शरीर के कौन से हिस्से गायब हैं। इस बार मैं केवल उसके लिए अपने प्यार के बारे में सोच रहा था।


यही अब मेरे पास है, यही प्यार। जब यह नींद में ठंडा हो जाता है, तो सुबह उठते ही मुझे इसे फिर से गर्म करना पड़ता है।


मुझे युद्ध से और भी नफरत करनी है, उसकी और भी निंदा करनी है।


चीन, फ्रांस, अमेरिका…वासियो ! तुम सभी क्रूर थे। मुझे तुमसे नफ़रत है!


मैं उन लोगों से भी नफ़रत करता हूँ जिन्होंने हमारे देश के ख़िलाफ़ कभी युद्ध नहीं किया लेकिन भविष्य में ऐसा करने की योजना बनाते हैं।


ये मेरे अंतिम शब्द हैं। एक ऐसे व्यक्ति की ओर से कहे गए अंतिम शब्द जो प्यार और युद्ध के लिए मरता है।


गोल चक्कर वेब पत्रिका अत्यंत सीमित संसाधनों से चल रही है। इस वेबसाइट के संचालन में आर्थिक सहयोग देने हेतु दिए गए क्यू आर कोड का उपयोग करें :


नगुयेन न्गोक थुआन का जन्म 1972 में बिन्ह थुआन में हुआ था और वह वर्तमान में हो ची मिन्ह सिटी में रहते हैं। वह एक दृश्य कलाकार हैं और अपनी लेखनी के लिए कई साहित्यिक पुरस्कार भी जीत चुके हैं। 


विजय कुमार यादव लेखक एवं अनुवादक हैं। गोल चक्कर पर इनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : विजय कुमार यादव


Comments


bottom of page