मोमिना रज़ा की कविताएँ
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मोमिना रज़ा की कविताएँ
लिप्यन्तरण : नेहा वत्स
ख़्वाब और मलाल
एक ख़्वाब में
मेरी आँख खुली तो
पैरों की जगह ख़ुर थे
आधी रात का काला कौवा
एक चेतावनी था
मगर मैं न समझी…
मेरे बाल सफ़ेद क्यों हो गए?
ये निशानी है उस दुःख की
उस इंतेज़ार की
जो किसी ऐसे के लिए था
जो कभी आया ही नहीं
एक बार मैं
उजाड़ मैदानों में थमी थी
चाँद ने मुझे
रौशनी और माफ़ी की चादर ओढ़ा दी—
जो नानी की उस बद्दुआ की तरह चुभती थी :
“तुम हमेशा ग़लत लोगों से मुहब्बत करोगी।”
मुक्ति उस पार है
तो मैं चाँद के टुकड़े कर देती हूँ
काँच की तरह…
जैसे पुराने बुत किसी गुफा में टूटे हों
मैं ख़ामोशी की ज़ुबान कभी सीख न सकी
मैंने हर बार अपने पैर मिट्टी में धोए
जब भी हवा तुम्हारा नाम मुझ तक लाई
एक अकेला कुत्ता उस पार रोता है
जो कभी पाक हुआ करता था
कोठों ने
मस्जिद से ज़्यादा दुआएँ देखीं हैं
मैं अल्लाह से तुम्हारे बारे में
कभी बात न कर सकी।
दुःख
(1)
तुम जा-ए-नमाज़ से निकल कर
बाहर आते हो
मेरे टखनों को खुरचते हुए
एक मुद्दत हुई
तुम्हें याद किया था।
(2)
अंत असीम है
उस आयत की तरह
जिसे मैं बार-बार ग़लत पढ़ती हूँ
जो ख़ुद में ही कहीं तह हो गई है।
(3)
दुःख एक आध्यात्मिक साधना है
मैं रोज़ इसकी तरफ़ लौटती हूँ
घुटने टेकती हूँ, फिर उठ खड़ी होती हूँ
और तुम्हें वहीं छोड़ देती हूँ
जहाँ तुम थे।
एक ज़बान का ख़्वाब
एक दूर की अजनबी सर-ज़मीन में
मेरी हड्डियाँ मेरी माँ का दुःख नहीं उठातीं
अब ये बोझ मुझ पर भारी नहीं रहा
ये पुराने घिसे हुए धागे
तुम तक पहुँचना चाहते हैं
हमारे बीच एक ज़बान पैदा हुई थी,
ख़ामोशी और तड़प से
मगर मैं इसे अकेली ही बोलती हूँ
हर नज़्म जो मैं लिखती हूँ
एक उधड़ी हुई सीवन है
जिसे मैं ग़लत बुनती हूँ—
शायद एक दिन
मैं इसे ठीक कर लूँ
मगर अभी के लिए
मैं एक ऐसी ज़बान का
ख़्वाब देखती हूँ
जिससे हमारी तड़प को
एक नज़्म में समेट सकूँ
एक चिड़िया
हमारा वह गीत गाने की कोशिश करती है
जिसे दुनिया भूल चुकी है
शायद इस दूर की अजनबी दुनिया में
मेरी एक ऐसी मुहब्बत है
जो मेरे जिस्म से निकलने से
इनकार करती है।
काश मैं वो सियाह मीठा फल होती
काश मैं तुम्हारे मुँह में
सियाह मीठा फल होती
शाम की शराब जैसी गहरी
जो तुम्हारी मुक्ति की प्यास बुझा देती
पानी में भीगी हुई मख़मली रंगत
मैं तुम्हारे लबों को छूती हूँ
और तब तक खाई जाती हूँ जब तक
तुम्हारे मुँह पर मेरे निशान ना छूट जाएँ
मुझे काट लो
फूलों का बाग़ रोता है
चाँद मुस्कुराता है,
अपनी नज़रें झुका लेता है
और ना देखने का बहाना करता है
तुम्हारे दाँत मेरे वजूद को चबाते हैं,
जैसे भूख की कोई इबादत-गाह
तुम्हारी ज़बान
यादों का एक क़ाफ़िला है
जो मंत्रों की तरह मेरा नाम गुनगुनाती है
एक हराम फल जो तुम्हारी ख़ामोशी को चीर देता है—
एक ऐसी मिठास जो तुम्हारे लबों में ज़हर भर देती है
मैं तुम्हारे गले में एक मासूम ज़ख़्म की तरह खिलती हूँ
जो निगले जाने की दुआ माँगता है
गाढ़ा और निषिद्ध
तुमने मुझे कभी छुआ तक नहीं,
मगर मैं पहले ही फ़ना हो चुकी हूँ।
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मोमिना रज़ा लाहौर (पाकिस्तान) की एक युवा कवयित्री हैं। वह 2025-2026 के पाकिस्तान यूथ पोएट लॉरेट कार्यक्रम की अंग्रेज़ी श्रेणी की फाइनलिस्ट रही हैं और उनकी रचनाएँ दि अल्फ़ रिव्यू, पोयम्स इंडिया, बॉर्डरलेस और अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। मोमिन रज़ा की लेखनी विरह, शोक और इच्छा जैसे विषयों को छूती है और उनके लेखन में यह दिखता है कि आंतरिक घाव किस तरह आस्था, स्मृति और व्यक्तित्व के निर्माण को आकार देते हैं। हाल ही में उन्होंने प्रतिष्ठित लाहौर लिटरेरी फेस्टिवल और लकीर कहानियाँ में भी अपनी कविताओं का पाठ किया।
नेहा वत्स ख़ुद को एक पाठक कहना पसंद करती हैं। अलबत्ता डायरीनुमा लेखन उनके यहाँ दिखाई देता है। किसी साहित्यिक पत्रिका में उनके काम के प्रकाशन का यह प्राथमिक अवसर है। ईमेल : nsurabhi09@gmail.com
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अच्छी कविताएं पढ़ाने के लिए नेहा जी को साधुवाद
युद्ध में बरप रहे काले धुएं में मोमिना की कविताएं दुख की रोशनी सी हैं...